इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर लीगल मेट्रोलॉजी | 18 Sep 2023

प्रिलिम्स के लिये:

इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर लीगल मेट्रोलॉजी, लीगल मेट्रोलॉजी, मीटर अभिसमय (Metre Convention), इंटरनेशनल सिस्टम ऑफ यूनिट्स (SI), फॉरेन एक्सचेंज

मेन्स के लिये:

भारत के लिये OIML प्रमाणन प्राधिकरण का महत्त्व

स्रोत: पी.आई.बी.

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत 13वाँ ऐसा देश बन गया है जो OIML (इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर लीगल मेट्रोलॉजी) सर्टिफिकेट जारी कर सकता है।

  • उपभोक्ता मामले विभाग का लीगल मेट्रोलॉजी डिवीज़न अब OIML प्रमाणपत्र जारी करने के लिये अधिकृत है।

लीगल मेट्रोलॉजी:

  • लीगल मेट्रोलॉजी, मेट्रोलॉजी की एक शाखा को संदर्भित करती है जो वाणिज्यिक लेन-देन और अन्य क्षेत्रों में सटीकता, स्थिरता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये माप और माप उपकरणों से संबंधित विनियमन तथा कानून पर ध्यान केंद्रित करती है जहाँ माप महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मेट्रोलॉजी माप और उसके अनुप्रयोग का विज्ञान है।
  • कानूनी मेट्रोलॉजी का प्राथमिक उद्देश्य माप के लिये स्पष्ट और समान मानक स्थापित करके उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों दोनों के हितों की रक्षा करना है।

नोट:

  • CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL-India), भारत का राष्ट्रीय मेट्रोलॉजी संस्थान (NMI) है जो भारत में SI इकाइयों के मानकों को बनाए रखता है और वज़न तथा माप के राष्ट्रीय मानकों को कैलिब्रेट करता है।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर लीगल मेट्रोलॉजी (OIML): 

  • परिचय:
    • OIML की स्थापना वर्ष 1955 में हुई थी और इसका मुख्यालय पेरिस में है।
    • यह एक अंतर्राष्ट्रीय मानक-निर्धारण निकाय है जो कानूनी मेट्रोलॉजी अधिकारियों और उद्योग द्वारा उपयोग के लिये मॉडल नियमों, मानकों तथा संबंधित दस्तावेज़ों को विकसित करता है।
    • यह नैदानिक ​​थर्मामीटर, अल्कोहल साँस विश्लेषक (Alcohol Breath Analysers), रडार गति मापने वाले उपकरण, बंदरगाहों पर पाए जाने वाले जहाज़ टैंक और पेट्रोल वितरण इकाइयों जैसे मापन उपकरणों के प्रदर्शन पर राष्ट्रीय कानूनों एवं  विनियमों को सुसंगत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • भारत की सदस्यता:
    • भारत वर्ष 1956 में OIML का सदस्य बना। उसी वर्ष भारत ने मीटर अभिसमय  पर हस्ताक्षर किये
      • वर्ष 1875 का मीटर अभिसमय , जिसे औपचारिक रूप से मीटर अभिसमय या मीटर संधि के रूप में जाना जाता है, एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है जिस पर 20 मई, 1875 को पेरिस, फ्राँस में हस्ताक्षर किये गए थे।
      • इसने इंटरनेशनल सिस्टम ऑफ यूनिट्स (SI) की स्थापना की, जो मीट्रिक प्रणाली का आधुनिक रूप है।
  • OIML प्रमाणपत्र:
    • OIML-CS डिजिटल बैलेंस, क्लिनिकल थर्मामीटर इत्यादि जैसे उपकरणों के लिये OIML प्रमाणपत्र और उनके संबंधित OIML प्रकार के मूल्यांकन/परीक्षण रिपोर्ट जारी करने, पंजीकृत और उपयोग करने की एक प्रणाली है।
    • अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में वज़न या माप की ब्रिकी का OIML पैटर्न अनुमोदन प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है। यह दुनिया भर में स्वीकृत एकल प्रमाणपत्र है।
    • भारत के शामिल होने के साथ OIML प्रमाणपत्र जारी करने के लिये अधिकृत देशों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। वे देश जो OIML प्रमाणपत्र जारी कर सकते हैं:
    • ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड, चीन, चेक गणराज्य, जर्मनी, डेनमार्क, फ्राँस, यूके, जापान, नीदरलैंड, स्वीडन और स्लोवाकिया (और अब भारत भी)।

OIML प्रमाणपत्र प्राधिकरण बनने का भारत के लिये महत्त्व: 

  • निर्यात में आसानी: उदाहरण के लिये मान लीजिये कि नोएडा में डिजिटल बैलेंस बनाने वाला एक उपकरण-निर्माता है जो अमेरिका या किसी अन्य देश में निर्यात करना चाहता है। इससे पहले, उसे प्रमाणन के लिये अन्य 12 (योग्य) देशों में से एक के पास जाना आवश्यक होगा।
    • अब प्रमाणपत्र भारत में जारी किये जा सकते हैं और इसके द्वारा प्रमाणित उपकरण निर्यात योग्य (अतिरिक्त परीक्षण शुल्क के बिना) होंगे और पूरी दुनिया में स्वीकार्य होंगे।
  • बेहतर विदेशी मुद्रा: इस कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था को कई मायनों में मदद मिलने की उम्मीद है, जिसमें निर्यात में वृद्धि, विदेशी मुद्रा की कमाई और रोज़गार सृजन शामिल है।
    • चूँकि इसके लिये केवल 13 देश ही अधिकृत हैं, इसलिये पड़ोसी देश और निर्माता प्रमाणीकरण कराने के लिये भारत आ सकते हैं। इसलिये यह विदेशी मुद्रा के मामले में भारत के लिये राजस्व अर्जक होगा।