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आगामी वित्तीय वर्ष में मुद्रास्फीति में कमी: RBI | 10 Apr 2020 | भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रीलिम्स के लिये:

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, कोर मुद्रास्फीति

मेन्स के लिये:

मुद्रास्फीति में कमी के कारण

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति रिपोर्ट (MPR) में कहा है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index- CPI) आधारित मुद्रास्फीति, जो पिछले कुछ महीनों में बढ़ गई थी, के वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान कम रहने की उम्मीद है। 

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

Low-expectations

मुद्रास्फीति में कमी के प्रमुख कारण 

कोर मुद्रास्फीति (Core  Inflation) 

  • कोर मुद्रास्फीति ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं को छोड़कर सभी वस्तुओं और सेवाओं के दामों में बढ़ोतरी दिखाती है। सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2000-01 में इसका पहली  बार उपयोग किया गया।  
  • यह देश की महँगाई दर को बेहतर ढंग से परिभाषित नहीं करती, क्योंकि इसमें महँगाई में मुख्य रूप से शामिल ऊर्जा और खाद्य सामग्रियों की गणना नहीं की जाती।   
  • वर्ष 2015 -2016 से सरकार ने इसके एक नए प्रारूप ‘कोर- कोर मुद्रास्फ़ीति’ (Core -Core Inflation) का उपयोग प्रारंभ किया, जिसके अंतर्गत मुद्रास्फीति की गणना खाद्य सामग्रियों, ईंधन एवं प्रकाश, परिवहन एवं संचार जैसी मदों को बाहर करके की जाती है।   

कुछ मामलों में मुद्रास्फीति वृद्धि के संकेत 

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 

  • CPI भारत में उपभोक्ताओं की खपत और क्रय शक्ति आदि में व्यापक अंतर की गणना करता है। 
  • CPI मुद्रास्फ़ीति के  माइक्रो लेवल विश्लेषण के लिये इस्तेमाल की जाती है। 
  • उपभोक्ताओं के मध्य सामाजिक-आर्थिक अंतरों को ध्यान में रखते हुए भारत में CPI  के चार प्रकार हैं:     
    • औद्योगिक मज़दूरों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) 
    • शहरी गैर मैनुअल कर्मचारियों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI -UNME)
    • खेतिहर मज़दूरों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL)
    • ग्रामीण क्षेत्र के मज़दूरों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-RL)

आगे की राह 

स्रोत: द हिंदू