26/11 हमलों के बाद से भारत की आतंकवाद विरोधी प्रतिक्रिया में बदलाव | 28 Nov 2025

प्रिलिम्स के लिये: नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG), विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA), राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA), मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC), नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (NATGRID), आंतरिक जलक्षेत्र/प्रादेशिक जल, सीईआरटी-इन (CERT-In: कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम – इंडिया)

मेन्स के लिये: 26/11 हमले के बाद भारत की आतंकवाद-रोधी संरचना में किये गए प्रमुख बदलाव, भारत की आतंकवाद-रोधी क्षमताओं में अब भी बनी सीमाएँ, आतंकवाद-रोधी प्रयासों को मज़बूत करने के लिये उठाए जा सकने वाले कदम

स्रोत: TH

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रपति ने 26/11 हमले में अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी और सभी से आतंकवाद के हर रूप के विरुद्ध अपने संकल्प को पुनः मज़बूत करने का आह्वान किया।

  • 26 नवंबर, 2008 को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़े 10 सशस्त्र आतंकवादियों ने मुंबई में हमले किये, जिसके परिणामस्वरूप 60 घंटे तक चले इस अभियान में 166 लोगों की दुखद मृत्यु हुई, जिनमें 18 सुरक्षा कर्मी भी शामिल थे।

26/11 के हमलों के बाद भारत के आतंकवाद-रोधी ढाँचे में कौन-से प्रमुख सुधार किये गए?

  • कानूनी सुधार: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) अधिनियम, 2008 को अधिनियमित किया गया, जिसने अंतर-राज्य समन्वय मुद्दों पर काबू पाते हुए, आतंकवादी मामलों की जाँच के लिये एक संघीय निकाय के रूप में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की स्थापना की।
    • आतंकवादी कृत्य की परिभाषा को व्यापक बनाने के लिये विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) में संशोधन किया गया। 
  • खुफिया जानकारी को मज़बूत करना: 2010 में स्थापित नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (NATGRID) एक सुरक्षित, एकीकृत डेटाबेस बनाकर एक प्रमुख आतंकवाद-रोधी पहल के रूप में कार्य करता है, जो सुरक्षा एजेंसियों को सूचना साझा करने और कई सरकारी स्रोतों से डेटा का उपयोग करके संदिग्धों को ट्रैक करने में सक्षम बनाता है। 
    • इसने वास्तविक समय सूचना समन्वय को सक्षम करने के लिये मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC) को बढ़ाकर राष्ट्रीय खुफिया संरचना को और मज़बूत किया।  
  • तटीय सुरक्षा सुदृढ़ीकरण: भारत ने एक बहुस्तरीय रक्षा प्रणाली लागू की, जिसमें भारतीय नौसेना समग्र समुद्री सुरक्षा के लिये ज़िम्मेदार है तथा भारतीय तटरक्षक बल क्षेत्रीय जल का प्रबंधन करता है तथा समुद्री पुलिस स्टेशनों के साथ समन्वय करता है। 
    • जहाज़ों की आवाजाही पर नज़र रखने के लिये समुद्र तट के किनारे रडार सेंसरों का एक तटीय निगरानी नेटवर्क भी स्थापित किया गया।
  • पुलिस और विशेष बलों का आधुनिकीकरण: तेज़ प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये कई राज्यों ने अपने विशेष बल स्थापित किये, जैसे महाराष्ट्र में फोर्स वन। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) को विकेंद्रित करते हुए मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता में चार क्षेत्रीय हब स्थापित किये गए, ताकि पूरे देश में तेज़ और प्रभावी तैनाती सुनिश्चित की जा सके।
  • सॉफ्ट टारगेट सुरक्षा: होटलों और हवाई अड्डों जैसे प्रमुख सॉफ्ट टारगेटों की सुरक्षा को उन्नत प्रोटोकॉल, CCTV कैमरे और एक्सेस कंट्रोल के साथ काफी उन्नत किया गया।
    • इसके साथ ही डिजिटल खतरों का सामना करने के लिये CERT-In को सशक्त बनाकर भारत की साइबर सुरक्षा को मज़बूत किया गया।

कौन-सी प्रमुख सीमाएँ भारत की आतंकवाद-रोधी क्षमताओं को प्रभावित कर रही हैं?

  • राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी सिद्धांत का अभाव: भारत के पास अभी भी एकीकृत और दीर्घकालिक आतंकवाद-रोधी सिद्धांत नहीं है, जिसके कारण प्रतिक्रिया-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जो केवल बड़े हमलों के बाद ही सक्रिय होता है।
    • स्पष्ट रणनीतिक ढाँचे के बिना नीतियाँ राजनीतिक नेतृत्व के साथ बदलती रहती हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये सुसंगत और द्वि-दलीय दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाता।
  • खुफिया तंत्र: लगातार ‘स्टोव-पाइपिंग’ यानी खुफिया जानकारी अभाव का रहना है, जहाँ IB, R&AW और राज्य पुलिस जैसी एजेंसियों के बीच सुचारु समन्वय की कमी है, जिससे मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC) की प्रभावशीलता घटती है।
    • नवंबर 2025 के लाल किला कार विस्फोट ने सुरक्षा एजेंसियों के बीच गहरी समन्वय की कमी के आभाव को उजागर किया, क्योंकि पड़ोसी राज्यों में पहले बरामद किये गए विस्फोटकों से संबंधित जानकारी न तो समय पर मिल पाई और न ही प्रभावी रूप से साझा की गई।
    • आलोचकों का तर्क है कि MAC में सूचना एकीकरण के अभाव के कारण दिल्ली पुलिस समय पर कार्रवाई नहीं कर सकी।
  • कानूनी और न्यायिक खामियाँ: आतंकवाद के मामलों में भारत की न्यायिक प्रक्रिया कमज़ोर अभियोजन के कारण बाधित रहती है, जहाँ कमज़ोर जाँच और गवाहों को डराने-धमकाने के कारण अक्सर मज़बूत प्रारंभिक साक्ष्य के बावजूद मामले विफल हो जाते हैं।
    • उदाहरण के लिये, जुलाई 2025 में मुंबई की एक विशेष NIA कोर्ट ने वर्ष 2008 के मालेगाँव विस्फोट मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया, यह देखते हुए कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में विफल रहा, जिससे आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।
  • तकनीकी खामियाँ: सुरक्षा एजेंसियों के पास चरमपंथी प्रचार के खिलाफ प्रभावी जवाबी रणनीति का अभाव है और परिष्कृत ऑनलाइन आतंकवादी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिये उनके पास असमान साइबर फॉरेंसिक क्षमताएँ हैं।
    • आतंकवादी समूह अब पारंपरिक निगरानी से बचने के लिये डेड-ड्रॉप विधियों (ड्राफ्ट को बिना भेजे साझा ईमेल खातों में सहेजना) और पीयर-टू-पीयर क्रिप्टो ट्रांसफर का उपयोग करते हैं, जबकि खुफिया एजेंसियाँ ​​ऐसे एंक्रिप्टेड संचार को डिकोड करने के लिये आवश्यक साइबर-इंटेलिजेंस विश्लेषकों और भाषा विशेषज्ञों की कमी से जूझ रही हैं।
  • जनशक्ति और क्षमता संकट: जुलाई 2025 तक NIA को 541 रिक्तियों के साथ 28% कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ा, जिससे प्रमुख परिचालन पद, विशेष रूप से निरीक्षक और DSP कम संख्या में रह गए और विशेष कैडर के बजाय प्रतिनियुक्ति पर निर्भरता बढ़ गई। 
    • राज्य एंटी-टेररिज़्म स्क्वाड (ATS) यूनिट्स भी कम सुसज्जित हैं, उनके पास समर्पित फायरिंग रेंज, आधुनिक नाइट-विजन गियर और फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं का अभाव है, जैसा कि CAG ऑडिट में बार-बार उल्लेख किया गया है।

आतंकवाद-रोधी प्रयासों को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • MAC के साथ तकनीकी एकीकरण को सुदृढ़ करना: MAC डेटा फीड्स के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) को एकीकृत करना।
    • यह अवरुद्ध डेटा (चैट्स, वित्तीय लेन-देन, यात्रा रिकॉर्ड) की विशाल मात्रा का विश्लेषण कर सकता है, पैटर्न पहचान सकता है, संभावित हमलों की भविष्यवाणी कर सकता है और संदिग्ध नेटवर्क को मानव विश्लेषकों की तुलना में कहीं अधिक कुशलता से चिह्नित कर सकता है।
  • अंतिम चरण में पुलिस को सशक्त करना: चूँकि राज्य पुलिस पहले प्रतिक्रिया देने वाले होते हैं, इसलिये उनकी क्षमता को मज़बूत करने हेतु आधुनिक उपकरणों, विशेष आतंकवाद-रोधी प्रशिक्षण और समय पर क्रियान्वयन योग्य प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये MAC/SMAC खुफिया साझा करने वाले सिस्टम के लिये निरंतर वित्तीय सहायता आवश्यक है।
  • कानूनी प्रावधानों को सशक्त बनाना: आतंकवाद-रोधी न्याय को मज़बूत करने के लिये त्वरित न्यायालय की आवश्यकता है, ताकि मुकदमों को शीघ्रता से निपटाया जा सके और ये निरोधक प्रभाव डालें। साथ ही UAPA जैसे कानूनों की नियमित समीक्षा और संशोधन करना भी आवश्यक है, ताकि आधुनिक खतरों का सामना किया जा सके तथा सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किये जा सकें।
  • आतंकवाद वित्तपोषण पर अंकुश लगाना: आतंकवाद के वित्तपोषण पर अंकुश लगाने के लिये हवाला लेन-देन, क्रिप्टोकरेंसी भुगतानों और फंडिंग में शामिल शेल कंपनियों की सख्त निगरानी हेतु वित्तीय खुफिया इकाई (FIU) की क्षमता बढ़ाई जाए तथा आतंकवाद को समर्थन देने वाले देशों पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिये FATF के साथ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को और मज़बूत किया जाए।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: विदेशी हमलों की रोकथाम के लिये अमेरिका, इज़राइल, फ्राँस और गल्फ देशों के प्रमुख साझेदारों के साथ वास्तविक समय में प्रभावी खुफिया सहयोग को सुदृढ़ करना।
    • बहुपक्षीय मंचों (संयुक्त राष्ट्र, G20, BRICS, SCO) के माध्यम से कूटनीतिक दबाव डालें ताकि आतंकवाद के राज्य-प्रायोजकों को अलग किया जा सके, जिसका समर्थन ‘नो मनी फॉर टेरर’ जैसी पहलों द्वारा किया जाए।

निष्कर्ष

भारत में भविष्य की आतंकवाद-रोधी रणनीतियों को 26/11 के बाद किये गए सुधारों पर आधारित होना चाहिये, जिसमें असंगठित खुफिया तंत्र, न्यायिक अंतराल, साइबर खतरों और जनशक्ति की कमी को संबोधित किया जाए। एकीकृत सिद्धांत, उन्नत तकनीक का समेकन और मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर ज़ोर देने से एक सक्रिय, अनुकूल एवं समन्वित आतंकवाद-रोधी संरचना बनाई जा सकती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. 26/11 के बाद भारत की तटीय सुरक्षा संरचना में किये गए प्रमुख बदलावों की समीक्षा कीजिये। इन बदलावों ने हमलों के दौरान उजागर हुई कमज़ोरियों को किस हद तक दूर किया है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 26/11 के बाद कौन-से प्रमुख संस्थागत सुधार लागू किये गए?
मुख्य सुधारों में NIA का निर्माण/सुदृढ़ीकरण, तटीय निगरानी नेटवर्क का विस्तार, मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC) का सशक्तीकरण, NATGRID का विकास, NSG हब का विकेंद्रीकरण और राज्य स्तर पर विशेष बलों (जैसे, फोर्स वन) का गठन शामिल है।

2. नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (NATGRID) आतंकवाद-रोधी क्षमता को कैसे मज़बूत करता है?
NATGRID सुरक्षा एजेंसियों के लिये एक एकीकृत डेटाबेस बनाता है, जिससे विभिन्न सरकारी स्रोतों से डेटा का उपयोग करके संदिग्धों को ट्रैक किया जा सकता है और जानकारी साझा करके खुफिया समन्वय को बेहतर बनाया जा सकता है।

3. कौन-सी निरंतर मौजूद कमियाँ भारत की आतंकवाद-रोधी क्षमता को बाधित करती हैं?
निरंतर बनी हुई समस्याओं में खुफिया जानकारी का अलग-अलग विभाजन (स्टोव-पाइपिंग), राज्य पुलिस की असमान क्षमताएँ, साइबर एवं निगरानी में तकनीकी कमी, न्यायिक/अभियोजन कमज़ोरियाँ और सिद्धांत व पुनर्वास कार्यक्रमों में अंतराल शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स 

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