पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों की खोज करने का भारत का विशिष्ट अधिकार | 23 Aug 2017

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय भारतीय महासागरीय बेसिन (Central Indian Ocean Basin - CIOB) के समुद्र तट में  पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों (polymetallic nodules) का पता लगाने संबंधी भारत के विशेषाधिकार को पाँच साल के लिये बढ़ा दिया गया है। आई.एस.ए. (International Seabed Authority - ISA) के 23वें सत्र में सर्वसम्मति से यह अनुमोदित किया गया। इस सत्र का आयोजन 18 अगस्त, 2017 को किंग्स्टन, जमैका में किया गया था।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों संबंधी विकास गतिविधियों हेतु भारत को अंतर्राष्ट्रीय जल के तकरीबन 75000 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में विशिष्ट अधिकार प्राप्त है। ये सभी अधिकार इसे आई.एस.ए. द्वारा प्रदान किये गए हैं। 
  • एक अनुमान के अनुसार, पॉलीमैटेलिक ग्रंथि संसाधनों की कुल क्षमता 380 मिलियन टन के करीब है, जिसमें 4.7 मिलियन टन निकिल, 4.29 मिलियन टन तांबा और 0.55 मिलियन टन कोबाल्ट तथा 92.59 मिलियन टन मैंगनीज़ के होने की संभावना जताई गई है।

पृष्ठभूमि 

  • वर्ष 1987 में भारत अग्रणी निवेशक का दर्ज़ा प्राप्त करने वाला ऐसा पहला देश है, जिसे पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों के संबंध में अन्वेषण एवं उनके उपयोग के लिये यू.एन. द्वारा केंद्रीय भारतीय महासागरीय बेसिन में एक विशेष क्षेत्र आवंटित किया गया।
  • पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences) के माध्यम से पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों के संबंध में अन्वेषण एवं उपयोग पर एक दीर्घकालिक कार्यक्रम का संचालन करने वाले शीर्ष 8 देशों/ठेकेदारों में से भारत एक है।
  • इस दीर्घकालिक कार्यक्रम के अंतर्गत पॉलीमेटैलिक ग्रंथियों के संबंध में सर्वेक्षण एवं अन्वेषण, पर्यावरणीय अध्ययन, खनन क्षेत्र में तकनीकी विकास तथा धातु निष्कर्षण जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इतना ही नहीं इन क्षेत्रों में कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हासिल की गई हैं।

पॉलीमेटैलिक ग्रंथियाँ क्या है?

  • पॉलीमेटैलिक ग्रंथियाँ (जिसे मैंगनीज़ ग्रंथियाँ भी कहा जाता है) आलू के आकार की होती हैं, इनमें बड़े पैमाने पर छिद्रपूर्ण नलिकाएँ पाई जाती हैं।
  • ये गहरे समुद्र में विश्व महासागरों के समुद्र तलों की ढलानों पर पाई जाती हैं।
  • मैंगनीज़ और लोहे के अलावा, इनमें निकिल, तांबा, कोबाल्ट, सीसा, मोलिब्डेनम, कैडमियम, वैनेडियम, टाइटेनियम आदि धातुएँ पाई जाती हैं। इन सभी में निकिल, कोबाल्ट और तांबे को सबसे अधिक आर्थिक एवं सामरिक महत्त्व की धातुएँ माना जाता है।

रिमोटली ऑपरेबल सब्मेरिसिबल

  • इस कार्य हेतु 6000 मीटर पानी की गहराई पर काम करने में सक्षम एक दूरस्थ ऑपरेबल पनडुब्बी (Remotely Operable Submersible - ROSUB 6000) भी विकसित की गई है।
  • इतना ही नहीं, इसका 5289 मीटर की गहराई में सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया जा चुका है। 
  • केंद्रीय भारतीय महासागरीय बेसिन में खनन क्षेत्र के संबंध में विस्तृत भू-तकनीकी जानकारियों को प्राप्त करने तथा 5462 मीटर पानी की गहराई में सफलतापूर्वक परीक्षण करने के लिये ही इस स्व:स्थाने मृदा परीक्षण उपकरण (in-situ soil testing equipment) वाले उपकरण को विकसित किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण 

  • अंतर्राष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण (International Seabed Authority), संयुक्त राष्ट्र संघ का एक निकाय है। इस निकाय को अंतर्राष्ट्रीय जल में महासागरों के समुद्रों में पाए जाने वाले निर्जीव संसाधनों के संबंध में अन्वेषण तथा शोषण आदि कार्यों को विनियमित करने के लिये स्थापित किया गया है।
  • भारत, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण के काम में सक्रिय रूप से योगदान देता है। 
  • वर्ष 2016 में भारत को आई.एस.ए. की परिषद के सदस्य के रूप में पुनः निर्वाचित किया गया।