ग्राउंड ज़ीरो, माओवादिओं का नया ज़ोन | 16 Jun 2017

संदर्भ
माओवादी छत्तीसगढ़ के पश्चिमी भाग में नए ज़ोन बनाने के लिये  जमा हो रहे हैं। यह एक छोटा सा भू-खंड है जो एक निर्माणाधीन सड़क से घिरा हुआ है। इस सड़क का निर्माण उत्तरी राजनंदगाँव में गतापर से मलाईदा  तक किया जा रहा  है। यह इलाका मध्य प्रदेश की सीमा से मात्र 20 किलोमीटर दूर है।

मुख्य बिंदु 

  • माओवादी अपने प्रमुख गढ़ बस्तर के बाहर जिस नए इलाके (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ ज़ोन)  को अपना नया संचालन  ज़ोन  बनाने जा रहे हैं वहाँ  की परिस्थितियाँ  उनके अनुकूल है, जैसे- यह जंगली इलाका है, आबादी कम है एवं आदिवासी अधिक  हैं, जिन्हें लगता है कि वे विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं।  
  • मलाईदा गाँव के लोगों की शिकायत हैं कि उन्हें तेंदू पत्ते का उचित मूल्य नहीं मिलता हैं, उनके इलाके में निकट कोई अस्पताल भी नहीं है। नज़दीकी अस्पताल 35 किलोमीटर दूर है। एक प्राथमिक विद्यालय है परन्तु वहाँ अध्यापक नहीं हैं। मलाईदा में 100 से अधिक लोग रहते हैं।
  • माओवादिओं  के दस्तावेजों  से पता चलता है कि वे स्थानीय मुद्दों (जैसे बाँस की कीमतें या अन्य वन उत्पाद ) को उठाकर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मज़बूत बनाना चाहते हैं। 
  • स्थानीय आबादी की शिकायत रहती है कि वे बाँस और तेंदू पत्ते से जो कुछ बनाकर गुज़ारा करते हैं उन्हें उसकी उचित कीमत नहीं दी जाती।  उनका कुछ हिस्सा ठेकेदार ले जाते हैं, तो कुछ अन्य राज्यों के लोग।
  • यहाँ की मुख्य सड़कों पर थोड़ी-बहुत मोबाइल सुविधा है भी परन्तु अन्य इलाकों में वह भी नहीं है। छत्तीसगढ़ प्रशासन का कहना है कि वह इन समस्यायों को दूर करने का प्रयास कर रही है । 
  • भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने यहाँ कैम्प लगा रखा है । यदि माओवादी यहाँ अपना बेस बना लेते हैं तो उन्हें यहाँ से उखाड़ना कठीन  होगा। इस तरह यह इलाका दूसरा बस्तर बन सकता है। इसलिये  आईटीबीपी का यहाँ होना आवश्यक है। वे गाँव वालों से बातें करते हैं। यहाँ बन रही सड़क की सुरक्षा करते हैं, ताकि माओवादी यहाँ जम न सकें।
  • माओवादिओं के लिये  यहाँ काम आसान नहीं है। माओवादिओं के आने से गाँव के लोग सतर्क हो गए हैं।  लोग यहाँ कुछ बताना नहीं चाहते हैं। इसका असर पुलिस के साथ-साथ माओवादिओं पर भी पड़ा है। माओवादिओं को जहाँ ग्राम समिति बनाकर भी सफलता नहीं मिल रही है वहीं पुलिस को भी कोई विशेष सूचना नहीं मिल रही है। यहाँ तक कि सरपंच या प्रभावशाली लोग भी खामोस हैं। लोग न तो माओवादिओं को समर्थन दे रहे हैं  और न ही पुलिस को कुछ बताते हैं। 

निष्कर्ष :
माओवाद का पौधा स्थानीय समर्थन से ही मज़बूत होता है। अतः इस तरह की सावधानी व जागरूकता से ही माओवाद की जड़ कमज़ोर होगी।