गंगा-यमुना को ‘जीवित व्यक्ति’ का दर्ज़ा उत्तराखंड को स्वीकार्य नहीं। | 27 Jun 2017

संदर्भ
उत्तराखंड सरकार ने गंगा और यमुना नदियों को एक ‘जीवित व्यक्ति’ का दर्ज़ा दिये जाने और तीन सरकारी अधिकारियों को इन नदियों का संरक्षक बनाए जाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश को स्थगित करने के लिये उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है।

प्रमुख बिंदु 

  • राज्य सरकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 20 मार्च के निर्णय का स्वागत किया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक विशेष याचिका में सरकार ने कहा है कि  गंगा और यमुना को अंतर-राज्यीय नदियाँ नहीं मानने में उच्च न्यायालय से चूक हुई है।
  • उच्च न्यायालय  ने एक  आदेश में  कहा था कि नमामि गंगे  कार्यक्रम के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और उत्तराखंड के एडवोकेट-जनरल इन नदियों के कानूनी संरक्षक होंगे। उनकी ज़िम्मेदारी गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियों की सुरक्षा और संरक्षण करने की होगी। उत्तराखंड सरकार को इसी बात से शिकायत है।
  • उत्तराखंड सरकार का कहना है कि इन नदियों में किसी के आत्महत्या करने या बाढ़ के कारण लोगों के मरने को आधार बना कर जिन अधिकारियों को इन नदियों का संरक्षक बनाया गया था, उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। 
  • राज्य सरकार यह जानना चाहती है कि अन्य राज्यों में गंगा और यमुना के साथ कुछ होने पर उत्तराखंड के मुख्य सचिव को उत्तरदायी कैसे ठहराया जा सकता है? क्या मुख्य सचिव के पास केंद्र या अन्य राज्य सरकारों से उनके निर्देशों का पालन करवाने का अधिकार है? इन्हीं कारणों से राज्य को सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाना पड़ा है |
  • यदि अन्य राज्यों में किसी भी तरह का  विवाद खड़ा होता  है, तो मुख्य सचिव किसी अन्य राज्य या संघ के खिलाफ कोई भी निर्देश नहीं दे सकता इसलिये उत्तराखंड राज्य गंगा और यमुना नदियों को ‘एक कानूनी व्यक्ति’ या ‘जीवित संस्था’ के रूप में घोषित नहीं कर सकता। 

निष्कर्ष
गंगा नदी मुख्य रूप से धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। यदि उच्च न्यायालय के निर्णय का पालन किया जाता है, तो हो सकता है कि लोगों को गंगा में स्नान करने से मना करने और उसे गंदा  करने से रोकने संबंधी याचिकायें डाली जाए।