देवदासी प्रथा अब भी प्रचलित | 15 Jan 2019

चर्चा में क्यों?


हाल ही में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), मुंबई और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (TISS), बेंगलुरु द्वारा ‘देवदासी प्रथा’ पर दो नए अध्ययन किये गए। ये अध्ययन देवदासी प्रथा पर नकेल कसने हेतु विधायिका और प्रवर्तन एजेंसियों के उदासीन दृष्टिकोण की एक निष्ठुर तस्वीर पेश करते हैं।


प्रमुख बिंदु

  • कर्नाटक देवदासी (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम, 1982 (Karnataka Devadasis (Prohibition of Dedication) Act of 1982) के 36 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस कानून के संचालन हेतु नियमों को जारी करना बाकी है जो कहीं-न-कहीं इस कुप्रथा को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
  • देवी/देवताओं को प्रसन्न करने के लिये सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करने की यह कुप्रथा न केवल कर्नाटक में बनी हुई है, बल्कि पड़ोसी राज्य गोवा में भी फैलती जा रही है।
  • अध्ययन के अनुसार, मानसिक या शारीरिक रूप से कमज़ोर लड़कियाँ इस कुप्रथा के लिये सबसे आसान शिकार हैं। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के अध्ययन की हिस्सा रहीं पाँच देवदासियों में से एक ऐसी ही किसी कमज़ोरी से पीड़ित पाई गई।
  • NLSIU के शोधकर्त्ताओं ने पाया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर स्थित समुदायों की लड़कियाँ इस कुप्रथा की शिकार बनती रहीं हैं जिसके बाद उन्हें देह व्यापार के दल-दल में झोंक दिया जाता है।
  • TISS के शोधकर्त्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि देवदासी प्रथा को परिवार और उनके समुदाय से प्रथागत मंज़ूरी मिलती है।

प्रथा खत्म क्यों नहीं होती?

  • व्यापक पैमाने पर इस कुप्रथा के अपनाए जाने और यौन हिंसा से इसके जुड़े होने संबंधी तमाम साक्ष्यों के बावजूद हालिया कानूनों जैसे कि-यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय (JJ) अधिनियम, 2015 में बच्चों के यौन शोषण के एक रूप में इस कुप्रथा का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है।
  • भारत के अनैतिक तस्करी रोकथाम कानून या व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 में भी देवदासियों को यौन उद्देश्यों हेतु तस्करी के शिकार के रूप में चिह्नित नहीं किया गया है।
  • अध्ययन ने यह रेखांकित किया है कि समाज के कमज़ोर वर्गों के लिये आजीविका स्रोतों को बढ़ाने में राज्य की विफलता भी इस प्रथा की निरंतरता को बढ़ावा दे रही है।

देवदासी प्रथा है क्या?

  • प्राचीन समय से ही हमारे समाज में तमाम कुरीतियों और अंधविश्वासों का बोलबाला रहा है जो समय के साथ व्यापक वैज्ञानिक चेतना के विकसित होने से धीरे-धीरे लुप्त होते गए। किंतु हमारे समाज में आज भी कुछ ऐसी कुरीतियों और अंधविश्वासों का अभ्यास व्यापक पैमाने पर किया जाता है जो 21वीं सदी के मानव समाज के लिये शर्मसार करने वाली हैं। इन्हीं कुरीतियों में से एक है- देवदासी प्रथा।
  • इस प्रथा के अंतर्गत देवी/देवताओं को प्रसन्न करने के लिये सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करना होता है।
  • इस प्रथा के अनुसार, एक बार देवदासी बनने के बाद ये बच्चियाँ न तो किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर सकती है और न ही सामान्य जीवन व्यतीत कर सकती है।

स्रोत- द हिंदू