भारत में हिरासत में हिंसा | 27 Nov 2025

प्रिलिम्स के लिये: अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 20(1), अनुच्छेद 20(3), मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR), इंटरनेशनल कवनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स, इंटरनेशनल कवनेंट ऑन इकोनॉमिक, सोशल एंड कल्चरल राइट्स, UNCAT, NHRC।

मेन्स के लिये: भारत में हिरासत में यातना (कस्टोडियल टॉर्चर), हिरासत में यातना को रोकने के लिये आवश्यक उपाय।

स्रोत: TH

चर्चा में क्यों? 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस थानों और केंद्रीय अन्वेषण एजेंसी के ऑफिस में CCTV कैमरे लगाने के अपने वर्ष 2020 के आदेश का ठीक से पालन न होने पर ध्यान देने के बाद हिरासत में यातना/कस्टोडियल टॉर्चर के मुद्दे पर फिर से विचार किया। राजस्थान में आठ महीनों में 11 हिरासत में हुई मौतों की रिपोर्ट से यह चिंता और बढ़ गई है।

नोट: वर्ष 2020 में, परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को हिरासत में यातना रोकने के लिये सभी पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरे और रिकॉर्डिंग सिस्टम लगाने का निर्देश दिया था।

  • यह आदेश राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राजस्व खुफिया निदेशालय जैसी केंद्रीय एजेंसियों तथा पूछताछ और गिरफ्तारी की शक्तियों वाली किसी भी एजेंसी पर लागू होता है।
  • न्यायालय ने कहा कि ये सुरक्षा उपाय सम्मान और जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिये आवश्यक हैं।

हिरासत में हिंसा क्या है?

  • हिरासत में हिंसा: इसे किसी भी भारतीय कानून में परिभाषित नहीं किया गया है। यह शब्द हिरासत (अर्थात वैध हिरासत या सुरक्षा) और हिंसा को जोड़ता है, जिसका अर्थ पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी व्यक्ति को पहुँचाई गई शारीरिक या मानसिक क्षति है।
  • इसका उल्लेख किसी भी भारतीय कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है। यह शब्द कस्टडी (अर्थात् वैध हिरासत या संरक्षण) तथा हिंसा को मिलाकर बनता है, जो पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी व्यक्ति पर की गई शारीरिक या मानसिक क्षति को दर्शाता है।
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत हिरासत को पुलिस हिरासत (पूछताछ के लिये 15 दिनों तक) और न्यायिक हिरासत (जमानत या सजा पूरी होने तक जेल में हिरासत) में वर्गीकृत किया गया है।
    • हिरासत में हिंसा में यातना, हमला, उत्पीड़न, अपमान, बलात्कार और यहाँ तक ​​कि मृत्यु भी शामिल है, जो तब होती है जब कोई व्यक्ति आधिकारिक हिरासत में होता है।
  • भारत में हिरासत में हिंसा:
    • प्राचीन भारत: कौटिल्य के अर्थशास्त्र  में अत्यंत कठोर दंडों का उल्लेख मिलता है, जिनमें अंग-भंग, जलाना और पशुओं द्वारा हमला करवाना शामिल थे।
  • मध्यकालीन काल: मुग़ल काल में शरीयत-आधारित कानूनों के तहत कठोर शारीरिक दंड आम कानून-प्रवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा थे।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक काल: वर्ष 1861 के पुलिस अधिनियम ने दमन के लिये एक बल का निर्माण किया।
    • राजनीतिक कैदियों और सामान्य बंदियों को अक्सर पीटा जाता था, भूखा रखा जाता था या गंभीर शारीरिक दंड दिया जाता था। 
    • 1894 का कारागार अधिनियम, जिसने जेल अधिकारियों को व्यापक अधिकार प्रदान किये, आज भी जेल प्रशासन को प्रभावित करता है।
  • स्वतंत्रता के बाद की अवधि:  स्वतंत्रता के बाद, भारत ने बहुत कम सुधार के साथ अपनी औपनिवेशिक युग की पुलिसिंग और जेल प्रणाली को बरकरार रखा। 
    • नियंत्रण और जबरदस्ती की पुरानी मानसिकता कायम रही तथा पुराने कानूनों, कमज़ोर जवाबदेही और खराब संस्थागत आधुनिकीकरण के कारण हिरासत में हिंसा जारी रही।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को वर्ष 2023-2024 के दौरान न्यायिक हिरासत में मृत्यु से संबंधित 2,346 नई सूचनाएँ और पुलिस हिरासत में मृत्यु से संबंधित 160 सूचनाएँ प्राप्त हुईं।

भारत में हिरासत में हिंसा को किस प्रकार नियंत्रित किया जाता है?

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार या दंड से स्वतंत्रता शामिल है। 
  • अनुच्छेद 20(1): इसमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो उस समय कानून के तहत अपराध नहीं था, जिससे अत्यधिक या पूर्वव्यापी दंड पर रोक लगती है। 
  • अनुच्छेद 20(3): किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिये मज़बूर किये जाने से संरक्षण प्रदान करता है। यह प्रावधान आरोपी को यातना, दबाव या जबरन स्वीकारोक्ति से बचाता है।

कानूनी प्रावधान

  • भारतीय न्याय संहिता (2023): यह उन व्यक्तियों को दंडित करती है जो हिंसा या दबाव के माध्यम से स्वीकारोक्ति या जानकारी प्राप्त करने के लिये जानबूझकर चोट या गंभीर चोट पहुँचाते हैं।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS, 2023): यह अनिवार्य करती है कि गिरफ्तारी और हिरासत वैध कारणों और प्रलेखित प्रक्रियाओं के अनुसार ही की जाए।
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम (2023): यह किसी भी ऐसे स्वीकारोक्ति कथन को अमान्य घोषित करता है जो प्रलोभन, धमकी, दबाव या किसी वादे के आधार पर कराया गया हो।

अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा उपाय

  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर, 1945: यह अनिवार्य करता है कि कैदियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाए तथा यह पुष्टि करता है कि उनके मौलिक अधिकार और स्वतंत्रता नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा के तहत संरक्षित रहें (भारत ने 1979 में ICCPR की पुष्टि की)। 
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर, 1945: यह अनिवार्य करता है कि कैदियों के साथ गरिमा के साथ व्यवहार किया जाए। यह भी सुनिश्चित करता है कि अंतर्राष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर वाचा (ICCPR), जिसे भारत ने वर्ष 1979 में अनुमोदित किया, के तहत उनके मौलिक अधिकार और स्वतंत्रताएँ सुरक्षित रहें।
  • मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948): यह व्यक्तियों को यातना, क्रूर व्यवहार और जबरन हिरासत किये जाने से बचाता है तथा सम्मान एवं सुरक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करता है। 

हिरासत में यातना रोकने के निर्देश

  • भारतीय विधि आयोग ने अपनी 273वीं रिपोर्ट (2017) में भारत से UNCAT की पुष्टि करने और यातना को अपराध घोषित करने वाला एक समर्पित कानून बनाने का आग्रह किया।
  • न्यायिक घोषणाएँ: 
    • डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी और हिरासत के दिशा-निर्देश निर्धारित किये, थर्ड-डिग्री विधियों पर रोक लगाई तथा लोक सेवकों द्वारा हिरासत में हिंसा के लिये राज्य को जवाबदेह ठहराया।
    • नांबी नारायणन बनाम सिबी मैथ्यूज और अन्य (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने गलत तरीके से गिरफ्तारी और उत्पीड़न के कारण हुए भारी अपमान के लिये उन्हें मुआवजा देने का आदेश दिया, जो हिरासत में यातना और झूठे मुकदमे से होने वाली गंभीर मानसिक पीड़ा को रेखांकित करता है।

भारत में हिरासत में हिंसा को रोकने में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • कमज़ोर कानूनी ढाँचा: भारत में अभी भी यातना की स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं है, जिससे अभियोजन मुश्किल हो जाता है और प्रवर्तन में बड़े अंतर रह जाते हैं।
    • 1861 का पुलिस अधिनियम और 1894 का कारागार अधिनियम जैसी औपनिवेशिक कानून अभी भी पुलिसिंग और जेल प्रशासन को न्यूनतम सुधार के साथ आकार देते हैं।
    • यातना निवारण विधेयक कभी कानून नहीं बन पाया और व्यापक विरोध-यातना कानून की अनुपस्थिति हिरासत में होने वाले दुरुपयोग को रोकने में एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
  • जवाबदेही की कमी और संस्थागत संरक्षण: BNSS के तहत अभियोजन के लिये पहले से सरकार की अनुमति आवश्यक होने के कारण अधिकारी कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रहते हैं।
    • हिरासत में होने वाली मौतों की जाँच में देरी, साक्ष्यों के नष्ट होने और जाँच की स्वतंत्रता की कमी के कारण दोषसिद्धि की दर कम रहती है।
  • औपनिवेशिक पुलिसिंग संस्कृति और दंडात्मक मानसिकता: भारत में पुलिसिंग की संस्कृति अभी भी औपनिवेशिक जड़ों से प्रभावित है, जो नियंत्रण बनाए रखने के लिये बल प्रयोग पर आधारित थी।
    • कुछ अधिकारी मानते हैं कि अपराधियों से निपटने के लिये शारीरिक ज़बरदस्ती आवश्यक है, और कुछ मामलों में थर्ड-डिग्री तरीके पुलिस की उपसंस्कृति का हिस्सा बन गए हैं।
    • ‘सख्त कार्रवाई’ की सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक हस्तक्षेप इन दंडात्मक रुझानों और प्रथाओं को और अधिक मज़बूत करते हैं।
  • व्यावसायिक दक्षता और भ्रष्टाचार का अभाव: फोरेंसिक तरीकों, मानवाधिकारों और गैर-ज़बरदस्ती पूछताछ में अपर्याप्त प्रशिक्षण के कारण अधिकारी अक्सर शारीरिक बल पर निर्भर रहते हैं।
    • आधुनिक जाँच उपकरणों और वैज्ञानिक क्षमता की कमी के कारण जानकारी निकालने के लिये यातना को एक आसान रास्ता माना जाता है।
    • हिरासत में हिंसा का अक्सर भ्रष्टाचार के उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है; शक्तिशाली स्टेशन हाउस अधिकारी (SHO)-आधारित पदानुक्रम ऐसे दुराचार को बढ़ावा देता है, जिससे यातना वित्तीय लाभ या प्रभाव का साधन बन जाती है।
  • विलंबित न्याय और कमज़ोर निगरानी तंत्र: धीमी न्यायिक प्रक्रियाएँ, विलंबित चिकित्सा रिपोर्टें और अप्रभावी मजिस्ट्रेटीय जाँच हिरासत में होने वाले दुरुपयोग को अनियंत्रित छोड़ने का अवसर उत्पन्न करते हैं।
    • NHRC जैसी निगरानी संस्थाएँ दिशा-निर्देश जारी करती हैं, लेकिन उनकी सिफारिशें केवल सलाहकार होती हैं और अक्सर उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है।
    • यहाँ तक कि CCTV लगवाने जैसे न्यायालय के आदेशों का भी पालन कम होता है, जिससे हिरासत में हिंसा न्यूनतम जांच के साथ जारी रहती है।

भारत में हिरासत में हिंसा को कैसे रोका जा सकता है?

  • कानून में हिरासत में हिंसा की परिभाषा तय करना और CAT का अनुमोदन करना: भारत को ‘हिरासत में हिंसा’ की स्पष्ट कानूनी परिभाषा निर्धारित करनी चाहिये और यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (CAT) का अनुमोदन करना चाहिये, जिसे भारत ने वर्ष 1997 में हस्ताक्षरित तो किया था, लेकिन अभी तक अनुमोदित नहीं किया है।
    • CAT का अनुमोदन भारत को वैश्विक मानकों के अनुरूप बाध्य करेगा, यातना को एक दंडनीय अपराध के रूप में परिभाषित करने की आवश्यकता उत्पन्न करेगा और जवाबदेही तंत्र को मज़बूत करेगा।
    • CAT के अनुरूप एक एंटी-टॉर्चर लॉ लागू करने से हिरासत में होने वाले अत्याचारों के प्रति शून्य सहनशीलता का स्पष्ट संदेश जाएगा तथा राज्य को ऐसे उल्लंघनों को रोकने, जाँच करने और दंडित करने के लिये बाध्य करेगा।
  • प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाना: CCTV निगरानी, डिजिटल गिरफ्तारी रिकॉर्ड और क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) जैसे वास्तविक समय की रिपोर्टिंग प्रणालियों का विस्तार किया जाना चाहिये।
    • प्रौद्योगिकी दुरुपयोग की संभावनाओं को कम करती है और साक्ष्यों की गुणवत्ता में सुधार करती है।
  • पेशेवर क्षमता में सुधार: पुलिस कर्मियों को अनबलित पूछताछ, फॉरेंसिक उपकरणों और वैज्ञानिक जाँच में प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
    • मानवाधिकार संवेदनशीलता, तनाव प्रबंधन कौशल और नैतिक पुलिसिंग मॉड्यूल को प्रशिक्षण अकादमियों में शामिल किया जाना चाहिये।
  • मानवाधिकार संस्थाओं को सुदृढ़ करना: NHRC को केवल सलाहकार भूमिका के बजाय बाध्यकारी अधिकार दिये जाने चाहिये। हिरासत में हुई मृत्यु की 24 घंटे के भीतर रिपोर्टिंग पूरी तरह से अनिवार्य होनी चाहिये और अनुपालन न करने पर परिणामस्वरूप दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिये।
  • सार्वजनिक जागरूकता और कानूनी साक्षरता बढ़ाना: नागरिकों को अपनी गिरफ्तारी के अधिकारों और सुरक्षा उपायों के बारे में सूचित किया जाना चाहिये। नागरिक समाज, मीडिया और सामुदायिक पुलिसिंग पहलों के माध्यम से हिंसक पुलिसिंग के प्रति सहनशीलता को कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष

भारत में हिरासत में हिंसा कमज़ोर कानूनी सुरक्षा, अपर्याप्त जवाबदेही और पुराने पुलिस ढाँचों के कारण बनी हुई है। संवैधानिक अधिकारों और मानव गरिमा की रक्षा के लिये निगरानी तंत्र को मज़बूत करना, कानून में यातना की स्पष्ट परिभाषा जोड़ना और CAT का अनुमोदन करना अत्यंत आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. औपनिवेशिक पुलिस ढाँचे और दंडात्मक पुलिस उप-संस्कृति भारत में हिरासत में हिंसा के मुख्य कारण हैं। विवेचना कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. हिरासत में हिंसा क्या है?
हिरासत में हिंसा वह शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न है जो पुलिस या राज्य प्राधिकरणों द्वारा हिरासत में रखे गए व्यक्तियों पर किया जाता है। इसमें पिटाई, यौन हिंसा, धमकियाँ, नींद से वंचित करना और जबरन स्वीकारोक्ति करवाना शामिल हैं। यह अनुच्छेद 21 (गरिमा के अधिकार) का उल्लंघन करता है।

2. हिरासत सुरक्षा के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश कौन-से हैं? 
डी.के. बसु (1997) ने गिरफ्तारी, हिरासत और चिकित्सकीय परीक्षण से संबंधित प्रक्रियागत सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए। परमवीर सिंह सैनी (2020) ने पुलिस थानों व पूछताछ कक्षों में CCTV और रिकॉर्डिंग सिस्टम अनिवार्य किये गए, ताकि यातना को रोका जा सके।

3. भारत को UNCAT की पुष्टि क्यों करनी चाहिये?
यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCAT) की पुष्टि करने से भारत को यातना को अपराध घोषित करना, रोकथाम के उपाय अपनाना, स्वतंत्र शिकायत तंत्र विकसित करना और जवाबदेही को मज़बूत करना अनिवार्य होगा, जिससे बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय मानकों को पूरा किया जा सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले साल के सवाल (PYQ)

मेन्स 

प्रश्न. यद्यपि मानवाधिकार आयोगों ने भारत में मानवाधिकारों की सुरक्षा में काफी हद तक योगदान दिया है, फिर भी वे ताकतवर और प्रभावशालियों के विरुद्ध अधिकार जताने में असफल रहे हैं। इनकी संरचनात्मक एवं व्यावहारिक सीमाओं का विश्लेषण करते हुए सुधारात्मक उपायों के सुझाव दीजिये। (2021) 

प्रश्न. भारत में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एन.एच.आर.सी.) सर्वाधिक प्रभावी तभी हो सकता है, जब इसके कार्यों को सरकार की जवाबदेही को सुनिश्चित करने वाले अन्य यांत्रिकत्वों (मकैनिज़्म) का पर्याप्त समर्थन प्राप्त हो। उपरोक्त टिप्पणी के प्रकाश में, मानव अधिकार मानकों की प्रोन्नति करने और उनकी रक्षा करने में, न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं के प्रभावी पूरक के तौर पर, एन.एच.आर.सी. की भूमिका का आकलन कीजिये। (2014)