स्थानीय स्वशासन और महिलाएँ | 25 Aug 2020

प्रिलिम्स के लिये

73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन, स्थानीय स्वशासन संबंधी अन्य कानूनी प्रावधान

मेन्स के लिये

स्थानीय स्वशासन की अवधारणा और इसमें महिलाओं की भूमिका


चर्चा में क्यों?

हरियाणा सरकार, पुरुषों और महिला उम्मीदवारों के लिये पंचायत चुनावों में 50:50 फीसदी आरक्षण प्रदान करने के लिये एक विधेयक लाने की योजना बना रही है, जिसके तहत प्रत्येक कार्यकाल की समाप्ति के बाद महिला और पुरुष उम्मीदवारों के बीच सीटों की अदला-बदली की जाएगी।

प्रमुख बिंदु

  • गौरतलब है कि हरियाणा इस प्रकार की विधि को अपनाने वाला देश का पहला राज्य होगा।
  • हरियाणा का यह फॉर्मूला सरपंचों और ग्राम वार्डों, खंड समितियों और ज़िला परिषदों के सदस्यों के पद पर लागू किया जाएगा।
  • हरियाणा में नियम के लागू होने पर यदि किसी वार्ड या गांव की अध्यक्षता एक पुरुष द्वारा की जाती है, तो इसका प्रतिनिधित्व अगले कार्यकाल में एक महिला द्वारा किया जाएगा।
  • उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के अनुसार, इस विधेयक का उद्देश्य महिलाओं के लिये आरक्षण की व्यवस्था करना नहीं है, बल्कि इस विधेयक का उद्देश्य पुरुषों और महिलाओं के लिये समान अवसर सुनिश्चित करना है।
    • ध्यातव्य है कि देश के राज्यों में महिलाओं को स्थानीय स्वशासन में 50 प्रतिशत का आरक्षण प्रदान किया गया है, और ऐसे राज्यों में महिलाओं का प्रतिनिधित्त्व तकरीबन 67 प्रतिशत है।
  • लाभ: इस प्रकार की व्यवस्था का उद्देश्य महिलाओं और पुरुषों के बीच अवसर की समानता सुनिश्चित करना है।
  • सीमाएँ: महिलाओं को पंचायत के भीतर विभिन्न परस्पर विरोधी हितों का प्रबंधन करने और बातचीत करने के कौशल सीखने में समय लग सकता है, हालाँकि सरकार द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को इस संबंध में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

स्थानीय स्वशासन की अवधारणा

  • लोकतंत्र का सही अर्थ होता है सार्थक भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण जवाबदेही। जीवंत और मज़बूत स्थानीय शासन भागीदारी और जवाबदेही दोनों को सुनिश्चित करता है।
  • स्थानीय स्वशासन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि यह देश के आम नागरिकों के सबसे करीब होता है और इसलिये यह लोकतंत्र में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने में सक्षम होता है।
  • सही मायनों में स्थानीय सरकार का अर्थ है, स्थानीय लोगों द्वारा स्थानीय मामलों का प्रबंधन। यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि स्थानीय समस्याओं और ज़रूरतों की समझ केंद्रीय या राज्य सरकारों की अपेक्षा स्थानीय लोगों को अधिक होती है।


स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी

  • वर्ष 1992 में भारत सरकार ने शासन के विकेंद्रीकृत मॉडल को अपनाने तथा भागीदारी एवं समावेशन को मज़बूत करने के लिये 73वें और 74वें संविधान संशोधन को पारित किया।
  • इस संशोधन के माध्यम से महिलाओं तथा अनुसूचित जाति (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST) से संबंधित लोगों के लिये सीटों के आरक्षण को अनिवार्य कर दिया गया।
  • ऐसे कई अध्ययन मौजूद हैं जो यह दर्शाते हैं कि सरकार द्वारा दिये गए इस आरक्षण ने सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में काफी सुधार किया है।
  • कई अध्ययनों में पाया गया है कि स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी की सबसे अच्छी बात यह है कि स्थानीय शासन में मौजूद महिलाएं संवेदनशील वर्गों खासतौर पर महिलाओं और बच्चों की ज़रूरतों और हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करती हैं।

स्थानीय स्वशासन में महिलाओं के लिये चुनौती

  • पितृसत्तात्मकता: प्रायः यह देखा जाता है कि कई महिलाओं को अपने परिवार से चुनाव लड़ने की अनुमति ही नहीं मिलती है, साथ ही कई महिलाएँ अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के लिये पर्दे के पीछे से काम करती रहती हैं और उन्हें कोई नहीं जान पाता है।
    • घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ, पर्दा प्रथा और घरेलू हिंसा आदि कारक महिलाओं के कामकाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
  • आवश्यक कौशल का अभाव: अधिकांश महिला प्रतिनिधि पहली बार इस प्रकार सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करती हैं, जिसके कारण पंचायतों के मामलों का प्रबंधन करने के लिये उनके पास पर्याप्त ज्ञान और कौशल का अभाव होता है।
    • सरकारी प्रशिक्षण एजेंसियों द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम समय में सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को कवर करने में असमर्थ हैं।
  • दो बच्चों की नीति: भारत के कई राज्यों ने पंचायत के चुनाव लड़ने के लिये दो अथवा दो से कम बच्चों की नीति को सख्ती से लागू किया है, कई बार यह नीति स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ने में महिलाओं के समक्ष बाधा उत्पन्न करती है।
  • जाति व्यवस्था: ग्रामीण भारत की जड़ों में मौजूद जाति व्यवस्था महिलाओं खासतौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिये स्वतंत्र एवं प्रभावी रूप से कार्य करने में चुनौती खड़ी करती है।
  • प्रशासनिक स्तर पर महिलाओं की कमी: प्रशासनिक तथा अन्य स्तरों पर महिला सहकर्मियों के प्रतिनिधित्त्व के अभाव के कारण भी महिलाओं को अपने रोज़मर्रा के काम-काज में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

आगे की राह

  • हरियाणा सरकार का वर्तमान प्रस्ताव एक स्वागतयोग्य कदम है। हालाँकि, राज्य सरकार को यह ध्यान रखना चाहिये कि महिलाओं और पुरुषों के बीच सामाजिक-राजनीतिक समानता सुनिश्चित करने के लिये केवल प्रतिनिधित्व में समानता लाना ही पर्याप्त नहीं है, इसके अलावा महिलाओं की अपेक्षाकृत वंचित स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये।
  • ग्रामीण स्थानीय स्वशासन में महिलाओं के प्रतिनिधित्त्व को बढ़ाने से संसद में भी उनके बेहतर प्रतिनिधित्त्व की संभावना बढ़ जाएगी, जो कि वर्तमान में केवल 14 प्रतिशत है।
  • महिला प्रतिनिधियों के क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में सरकारों को नागरिक समाज संगठनों, महिला समूहों, शैक्षणिक संस्थानों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे यूएन वीमेन (UN Women) आदि को भी शामिल किया जाना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस