एरोसोल से प्रभावित होता मानसून | 03 Jul 2017

संदर्भ
ग्रीन हाउस गैसें मानसून  की चिंता का कारण बनती हैं, लेकिन वैज्ञानिकों को वायुमंडल में मौजूद कणों के बारे में अधिक चिंता हो रही है। एक अध्ययन के अनुसार वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कण भारतीय मानसून  को प्रभावित कर रहे हैं। 

क्या है एरोसोल ?

  • सूक्ष्म ठोस कणों अथवा तरल बूंदों के हवा या किसी अन्य गैस में कोलाइड को एरोसोल(Aerosol) कहा जाता है। एरोसोल प्राकृतिक या मानव जनित हो सकते हैं। हवा में उपस्थित एरोसोल को वायुमंडलीय एरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, वायुमंडलीय प्रदूषक कण तथा धुआँ एरोसोल के उदाहरण हैं। 
  • सामान्य बातचीत में, एरोसोल  फुहार को संदर्भित करता है, जो कि एक डब्बे या सदृश पात्र में उपभोक्ता उत्पाद के रूप में वितरित किया जाता है। तरल या ठोस कणों का व्यास 1 माइक्रोन या उससे भी छोटा होता है। 

 प्रमुख बिंदु 

  • शोधकर्ता ग्रीन हाउस गैसों के कारण भारतीय मानसून  की लंबी अवधि के बारे में चिंता कर रहे हैं। उनको अब लगता है कि वाहनों के धुएँ से, अधजले फसल अवशेषों से तथा धूल और रासायनिक अपशिष्ट से निकलने वाला एरोसोल जीवनदायी बरसात के मौसम को और भी अधिक कमज़ोर कर रहा है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के  जलवायु-विज्ञानी आर कृष्णन के नेतृत्व में एक टीम इस निष्कर्ष पर आई है। यह टीम अगली सदी में भारतीय मानसून  पर ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव का अध्ययन कर रही है।  
  • 2015 में श्री कृष्णन ने ‘क्लाइमेट डाईनॉमिक्स’ नामक  एक पत्रिका में बताया है कि ग्रीन हाउस गैसें, एरोसोल और वन एवं  कृषि आवरण में बदलाव का मिश्रण पिछले कई वर्षों से मानसून  की ताकत को प्रभावित कर रहा था। पिछले 50 वर्षों से मानसून  के कमजोर होने की बात की जा रही थी ।  
  • यह परिणाम गणितीय मॉडलिंग और कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित था। हालाँकि, व्यक्तिगत कारकों का सापेक्ष योगदान तब स्पष्ट नहीं था।  
  • परन्तु अब नए शोध से स्पष्ट हुआ है कि मानसून  को कमज़ोर करने के प्रमुख कारण के रूप में पारंपरिक कारकों की तुलना में एरोसोल  कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण कारक हो सकता है।  

नया मॉडल

  • जलवायु-विज्ञानी आर कृष्णन और उनकी टीम ने एक अद्यतन पूर्वानुमान मॉडल का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल इस वर्ष भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पूर्वानुमान के लिये किया था।
  • यह मॉडल भारत का पहला स्वदेशी तरीके से वैश्विक उष्णन (ग्लोबल वार्मिंग) से जलवायु परिवर्तन का पूर्वानुमान तैयार करने में मदद करेगा और जलवायु परिवर्तन रिपोर्टों पर अंतर-सरकारी पैनल का हिस्सा होगा।
  • गौरतलब है कि आसमान में धूल के बादल सूरज की किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने से रोक देते हैं तथा धरती और समुद्र के तापमानों को कम करते हैं, जिससे मानसून , जो इन दोनों के बीच के तापमान के अंतर से उत्पन्न होता है, कमज़ोर हो जाता है।