जलवायु के लिये स्मार्ट-खेती | 28 Feb 2017

विगत वर्ष 2016 में अवशिष्ट अल नीनो (Residual El Nino) के कारण पड़ने वाले प्रभावों के संबंध में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 के उत्तरार्ध में अल नीनो के भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित करने की संभावना व्यक्त की गई थी| यदि इस सन्दर्भ में गंभीरता से विचार करें तो यह कृषि अर्थव्यवस्था के प्रबंधकों के लिये चिंता का विषय है| दक्षिणी राज्यों विशेषकर कर्नाटक और केरल में पहले से ही लम्बे समय से शुष्क मौसम बना हुआ है| यही कारण है कि ये राज्य मुश्किल से ही वर्ष में किसी दूसरी प्रकार की फसलों का उत्पादन कर पाते हैं|

प्रमुख बिंदु

  • स्पष्ट है कि इस समस्या से निपटने के लिये मौसम विभाग (Met Department) आईसीएआर और कृषि विश्वविद्यालयों को वर्षा, तापमान, फसल का चुनाव और आगतों (विशेषकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में) के सम्बन्ध में एक सूक्ष्म स्तर की समझ विकसित करने के लिये अधिक उचित दिशा में कार्य करने की आवश्यकता हैं|
  • वर्षा के स्थानिक और लौकिक वितरण की अनियमित प्रवृत्तियों का तापमान में वृद्धि से कहीं अधिक प्रभाव फसल के उत्पादन (ये दोनों मौसम परिवर्तन की विशेषताएँ हैं) पर पड़ता है, क्योंकि भारत की आधी से अधिक फसलों के उत्पादन में वर्षा की बहुत अधिक आवश्यकता होती है|
  • शोधकर्ताओं के संकेतानुसार, जब तापमान में परिवर्तन के कारण कीटों की गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है तो लगभग 50 प्रतिशत फसलें उस वर्ष में होने वाली वार्षिक औसत वर्षा पर निर्भर करती हैं|
  • ध्यातव्य है कि चालू वर्ष के लिये की गई मौसम की भविष्यवाणी के अंतर्गत यह निहित किया गया है कि इस वर्ष हिन्द महासागर में कुछ गरम गतिविधियाँ होने की आशंका व्यक्त की जा रही है| दुसरे शब्दों में कहा जाए तो इस वर्ष मौसम पर एल नीनो का प्रभाव पड़ने की सम्भावना हैं|
  • उल्लेखनीय है कि आईओडी ( Indian Ocean Dipole – IOD) गतिविधियों का भारत के वर्षा पैटर्न पर गहरा प्रभाव पड़ता हैं| परन्तु यह प्रभाव केवल देश के पश्चिमी तट तथा मध्य भारत तक ही सीमित होता है|  
  • ध्यातव्य है कि आईओडी तथा एल नीनो के कारण प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में सूखे तथा बाढ़ आने की सम्भावना प्रबल होती हैं| कभी-कभी यह प्रभाव इस क्षेत्र विशेष के बजाय किसी अन्य क्षेत्र में भी हो जाता है|
  • इसके अतिरिक्त आईओडी तथा एल नीनो के प्रभाव के कारण कभी-कभी कृषि उत्पादन में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि देखने को मिलती है तो कभी-कभी ह्रास|
  • स्पष्ट है कि अच्छे मानसून के विषय में सटीक जानकारी प्राप्त करने लिये कृषि शोध के केंद्र को लम्बे समय तक (सम्भवतः दशकों तक) तालुका स्तर पर जलवायु पैटर्न के मानचित्रण की ओर केन्द्रित किया जाना चाहिये|
  • ध्यातव्य है कि केरल सरकार द्वारा इस दिशा में अपने प्रयासों को आरंभ कर दिया गया हैं| इस शोध में जिन सिंचित क्षेत्रों में आगत गहन खेती (Input-intensive farming) पर बल दिया गया वहां अधिक परम्परागत क्षेत्रों जैसे वर्षा परिवर्तनशीलता प्रबंध को (managing rain variability) नजरअंदाज किया गया|
  • हालाँकि अनियमित मौसम के दौरान मौसम का मानचित्रण एक चुनौती भी हो सकता है| यही कारण है कि मोटे तौर यह स्वीकार किया गया है कि एक सूक्ष्म क्षेत्र में प्रत्येक चार वर्षों में एक बार सूखा पड़ता है| 
  • मई 2015 में रिजर्व बैंक के एक दस्तावेज में मानसून और भारतीय कृषि के सम्बन्ध में एक संकट क्षेत्र की ओर संकेत किया गया था| 
  • शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका एक कारण एक शंका (वर्षा नहीं होगी तथा इस प्रकार इस क्षेत्र को निवेश प्राप्त नहीं होंगे) के कारण एक उचित वर्ष में भी उच्च गुणवत्ता युक्त उर्वरक का प्रयोग किया जाना है|

निष्कर्ष

अतः जलवायु बुद्धिमत्ता (Climate intelligence) कृषि नीति और इसकी प्रसार सेवाओं का एक अभिन्न भाग बन सकती है| यही कारण है कि कृषि का वानिकी क्रियाओं के साथ एकीकृत एवं टिकाऊ कृषि की ओर भी एक अनुकूल झुकाव अवश्य होना चाहिये| सम्भवतः इस परिवर्तन के अनुपालन के लिये कृषकों को पर्याप्त मात्रा में साख और समर्थन प्रदान किये जाने की आवश्यकता है| साथ ही कृषि से संबंधित संकट के लिये वर्षा मानचित्रण के लिये सूक्ष्म स्तर की यथार्थता को अवश्य विकसित करना चाहिये|