सहकारी समितियों के लिये न्यूनतम योग्यता | 12 Jul 2017

संदर्भ 
ग्रामीण सहकारी समितियों एवं अन्य सहकारी निकायों में सदस्यता के चुनाव के लिये न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बन गया है।

प्रमुख बिंदु 

  • इसके लिये राजस्थान में राज्य सहकारी समिति नियम 2003 में संशोधन किया गया है तथा सोमवार को इसकी अधिसूचना ज़ारी की गई है ।
  • इससे दस हज़ार सहकारी एवं कृषि साख समितियों को लाभ पहुँचेगा । 
  • राज्य के विभिन्न सहकारी समितियों के शासक बोर्ड में चुने जाने के लिये शैक्षणिक योग्यता कक्षा पाँचवी से लेकर कक्षा आठवीं तक कर दी गई है।

सहकारी समिति किसे कहते हैं?

  • सहकारी अर्थात साथ मिलकर कार्य करना। सहकारी समिति लोगों का ऐसा संघ होता है, जो अपने पारस्परिक लाभ के लिये स्वेच्छा-पूर्वक सहयोग करते हैं।
  • यह ऐसे व्यक्तियों की स्वयंसेवी संस्था है, जो अपने आर्थिक हितों के लिये कार्य करते हैं। यह अपनी सहायता स्वयं और परस्पर सहायता के सिद्धान्त पर करती है। 
  • सहकारी समिति में कोई भी सदस्य व्यक्तिगत लाभ के लिये कार्य नहीं करता है। इसके सभी सदस्य अपने-अपने संसाधनों को एकत्र कर उनका अधिकतम उपयोग कर कुछ लाभ प्राप्त करते हैं, जिसे वह आपस में बांट लेते हैं।
  • भारत में सहकारिता आन्दोलन की शुरुआत 1904 में फेड्रिक निकल्सन द्वारा सहकारी ऋण समिति की स्थापना के साथ हुई थी। आज इसका दायरा काफी विस्तृत हो चुका है।
  • भारत के संविधान के भाग 9 (ख) के अनुच्छेद 243 में इसका प्रावधान किया गया है।

सहकारी समितियों से लाभ 

  • यह एक स्वैच्छिक संगठन है, जो पूंजीवादी तथा समाजवादी दोनों प्रकार के आर्थिक तंत्रों में पाया जाता है।
  • सहकारी समिति का नियंत्रण लोकतांत्रिक तरीके से होता है। इसका प्रबंधन लोकतांत्रिक होता है तथा ‘एक व्यक्ति-एक मत’ की संकल्पना पर आधारित होता है।
  • कोई भी सक्षम व्यक्ति किसी भी समय सहकारी समिति का सदस्य बन सकता है और जब चाहे स्वेच्छा से समिति की सदस्यता को छोड़ भी सकता है।
  • चूँकि सहकारी समिति में सदस्य उपभोक्ता अपने माल की आपूर्ति पर स्वयं नियंत्रण रखते हैं, इसलिये इन समितियों के व्यवसाय में मध्यस्थों को मिलने वाले लाभ का कोई स्थान नहीं रहता।
  • सहकारी समितियों के सदस्यों की देनदारी केवल उनके द्वारा निवेशित पूंजी तक ही सीमित होती है। एकल स्वामित्व व साझेदारी के विपरीत सहकारी समितियों के सदस्यों की व्यक्तिगत संपत्ति पर व्यावसायिक देनदारियों के कारण कोई जोखिम नहीं होता।
  • सहकारी समिति का कार्यकाल दीर्घ अवधि तक स्थिर रहता है। किसी सदस्य की मृत्यु, दिवालियापन, पागलपन या सदस्यता से त्याग-पत्र देने से समिति के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।