असम राइफल्स की दोहरी नियंत्रण संरचना | 07 Sep 2020

प्रिलिम्स के लिये

असम राइफल्स, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल

मेन्स के लिये

सीमा प्रबंधन से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को असम राइफल्स (Assam Rifles) के लिये दोहरी नियंत्रण संरचना को समाप्त करने अथवा उसे बनाए रखने को लेकर निर्णय लेने हेतु 12 सप्ताह का समय दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • ध्यातव्य है कि वर्तमान में असम राइफल्स का नियंत्रण गृह मंत्रालय (MHA) तथा रक्षा मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
  • इस संबंध में मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि चूँकि इस मामले में सैनिक/पूर्व-सैनिक भी शामिल हैं और उनके हित सर्वोपरि हैं, इसलिये इस मामले को निपटने में और अधिक देर नहीं की जा सकती है। 
    • उल्लेखनीय है कि यह मामला बीते तीन वर्ष से इसी प्रकार लंबित पड़ा हुआ है।
  • उच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, दोनों मंत्रालय के सचिवों, थल सेनाध्यक्ष, असम राइफल्स के महानिदेशक और इस मामले से संबंधित अन्य सभी हितधारकों से निर्धारित अवधि के भीतर निर्णय लेने में सहयोग करने का अनुरोध किया है।

क्या है असम राइफल्स?

  • असम राइफल्स गृह मंत्रालय (MHA) के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत आने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (Central Armed Police Forces-CAPFs) में से एक है।
  • यह बल भारतीय सेना के साथ मिलकर पूर्वोत्तर में कानून व्यवस्था के रख-रखाव के अलावा भारत-म्याँमार सीमा की रक्षा भी करता है।
  • प्रशासनिक और प्रशिक्षण स्टाफ के अलावा असम राइफल्स के पास 63,000 से अधिक सैनिक और कुल 46 बटालियन हैं।
  • ऐतिहासिक दृष्टि से असम राइफल्स का गठन वर्ष 1835 में कछार लेवी (Cachar Levy) नामक एक एकल सैन्यबल के रूप में पूर्वोत्तर भारत में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था। कुछ समय बाद इस सैन्य बल को वर्ष 1870 में कुछ अतिरिक्त बटालियनों के साथ असम सैन्य पुलिस बटालियन में परिवर्तित कर दिया गया।
    • वर्ष 1917 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इसका नाम बदलकर असम राइफल्स कर दिया गया। वर्ष 1962 में चीनी आक्रमण के बाद असम राइफल्स को सेना के संचालन नियंत्रण में रखा गया।

असम राइफल्स की भूमिका

  • असम राइफल्स भारत के सबसे पुराने अर्द्ध-सैनिक बलों में से एक है जिसे वर्ष 1835 में ब्रिटिश भारत में सिर्फ 750 सैनिकों के साथ बनाया गया था। तब इस बल ने दो विश्व युद्धों और वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में हिस्सा लिया है, साथ ही इसने पूर्वोत्तर में आतंकवादी समूहों के विरुद्ध चलाए गए अभियानों में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • यह स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात् सबसे अधिक सम्मानित अर्द्ध-सैनिक बल बना हुआ है। असम राइफल्स को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कुल 76 वीरता पदकों से सम्मानित किया गया था। 
  • असम राइफल्स ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी कई लड़ाईयाँ लड़ी थीं और इस दौरान इसे 48 वीरता पदकों से सम्मानित किया गया था।
  • स्वतंत्रता के बाद से असम राइफल्स ने 188 सेना पदकों के अलावा 120 शौर्य चक्र, 31 कीर्ति चक्र, पाँच वीर चक्र और चार अशोक चक्र जीते हैं।

विवाद

  • ध्यातव्य है कि यह दोहरी संरचना वाला एकमात्र अर्द्धसैनिक बल है, असम राइफल्स का प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय (MHA) और संचालन नियंत्रण रक्षा मंत्रालय के अधीन सेना द्वारा किया जाता है। 
  • इसके अर्थ है कि असम राइफल्स के लिये वेतन और बुनियादी ढाँचा गृह मंत्रालय द्वारा प्रदान किया गया है, जबकि कर्मियों की नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति आदि का निर्णय सेना द्वारा लिया जाता है।
  • महानिदेशक (DG) से लेकर महानिरीक्षक (IG) तक असम राइफल्स के सभी वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति सेना द्वारा ही की जाती है और इन पदों पर अधिकांश भारतीय सेना के अधिकारी कार्यरत होते हैं। इस बल की कमान भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल के पास होती है।
  • असम राइफल्स को लेकर चल रहा विवाद भी इसी दोहरी संरचना प्रणाली से उत्पन्न होता है। स्वयं असम राइफल्स के अंदर और गृह मंत्रालय तथा रक्षा मंत्रालय दोनों ओर से किसी एक मंत्रालय को बल के पूर्ण नियंत्रण दिये जाने की मांग की जा रही है, जिससे बल को और कुशलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सके।
  • गौरतलब है कि स्वयं असम राइफल्स के अंदर एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो बल के नियंत्रण को पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय को दिये जाने के पक्ष में है, क्योंकि इससे असम राइफल्स के सैनिकों/पूर्व-सैनिकों को गृह मंत्रालय के तहत आने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की तुलना में बेहतर भत्ता और सेवानिवृत्त लाभ मिलेगा।
    • हालाँकि सेना के तहत सेवानिवृत्ति की आयु 35 वर्ष है, जबकि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के तहत सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष है, लेकिन सेना के जवानों को वन-रैंक-वन-पेंशन का लाभ भी मिलती है जो CAPF को नहीं मिलती है।

गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय को पूर्ण नियंत्रण क्यों चाहिये?

  • गृह मंत्रालय का तर्क है कि लगभग सभी सीमा रक्षक बल गृह मंत्रालय के परिचालन नियंत्रण में आते हैं और यदि असम राइफल्स को गृह मंत्रालय के पूर्व नियंत्रण में दिया जाता है तो इससे देश की सीमा को एक व्यापक तथा एकीकृत दृष्टिकोण मिल सकेगा।
  • गृह मंत्रालय की माने तो असम राइफल्स 1960 के दशक में निर्धारित कार्य पद्धति के आधार पर काम कर रहा है, वहीं गृह मंत्रालय के नियंत्रण में आने से इसकी कार्य पद्धति को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की पद्धति के आधार पर विकसित किया जाएगा।
  • वहीं भारतीय सेना का तर्क है कि असम राइफल्स ने सेना के साथ समन्वय के माध्यम से काफी बेहतरीन कार्य किया है और यह सशस्त्र बल की तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने मुख्य कार्य पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
    • यह भी तर्क दिया गया है कि असम राइफल्स सदैव से ही एक पुलिस बल न होकर एक सैन्य बल रहा है और इसे इसी रूप में विकसित किया गया है।

निष्कर्ष

असम राइफल्स के नियंत्रण का यह मामला बीते कई वर्षों से इसी प्रकार बना हुए है। सेना को नियंत्रण दिये जाने के समर्थकों के अनुसार, चूँकि असम राइफल्स के सैनिक भारतीय सेना के जवानों के साथ एक समान परिस्थितियों में कार्य करते हैं, इसलिये उनके वतन और भत्तों की सुविधाओं में असमानता के कारण जवान का मनोबल काफी प्रभावित होता है। वहीं गृह मंत्रालय को पूर्ण नियंत्रण दिये जाने के समर्थकों का मत है कि इससे बल की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी। ऐसे में आवश्यक है कि उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए निर्देश का पालन किया जाए और समय सीमा में रहते हुए इस मुद्दे को जल्द-से-जल्द हल किया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस