प्रारंभिक परीक्षा
सॉलिड ट्यूमर के लिये CAR-T थेरैपी में उल्लेखनीय प्रगति
चर्चा में क्यों?
साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में CAR-T (Chimeric Antigen Receptor T-cell) थेरैपी में एक उल्लेखनीय प्रगति रिपोर्ट की गई है। इसमें बताया गया है कि जेनेटिक रूप से संशोधित प्रतिरक्षा कोशिकाएँ सॉलिड ट्यूमर में पहले से ‘छिपी हुई’ कैंसर कोशिकाओं का पता लगाकर उन्हें नष्ट कर सकती हैं।
सॉलिड ट्यूमर पर अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- पारंपरिक CAR-T कोशिकाओं की सीमाएँ: पारंपरिक CAR-T थेरैपी, यद्यपि रक्त कैंसर में प्रभावी है, लेकिन सॉलिड ट्यूमर में यह अपेक्षाकृत कम प्रभावी रहती है, क्योंकि इसे सक्रिय होने के लिये मज़बूत एंटीजन संकेतों की आवश्यकता होती है।
- एंटीजन की विविधता (कोशिकाओं के बीच सतह पर मौजूद एंटीजन के व्यक्त होने में अंतर) के कारण, कई ट्यूमर कोशिकाएँ लक्ष्य प्रोटीन को बहुत कम मात्रा में व्यक्त करती हैं या पूरी तरह से नकारात्मक दिखाई देती हैं; इससे वे प्रतिरक्षा प्रणाली के हमले से बच निकलती हैं और बाद में ट्यूमर के दोबारा उभरने का कारण बनती हैं।
- सॉलिड ट्यूमर में 'स्यूडो-हेटेरोजेनिटी': इस अध्ययन में पाया गया कि ट्यूमर कोशिकाएँ वास्तव में एंटीजन-नेगेटिव नहीं होतीं, बल्कि वे लक्ष्य प्रोटीन को बहुत ही कम स्तर पर व्यक्त करती हैं, इस स्थिति को 'स्यूडो-हेटेरोजेनिटी' कहा जाता है।
- वैज्ञानिकों ने पाया कि कैंसर कोशिकाएँ संभवतः इस प्रोटीन की थोड़ी मात्रा इसलिये बनाए रखती हैं क्योंकि यह उनके अस्तित्व के लिये आवश्यक होता है।
- शोधकर्त्ताओं ने यह भी पहचाना कि EZH2 एंजाइम, क्रोमैटिन संरचना में परिवर्तन करके CD70 (जो किडनी और ओवेरियन कैंसर के 70-80% मामलों तथा लगभग 25% पैंक्रियाटिक कैंसर में पाया जाता है) के प्रकटीकरण को दबा देता है। इससे प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है और ट्यूमर कोशिकाएँ पारंपरिक उपचारों के लिये ‘अदृश्य’ प्रतीत होती हैं।
- इसके अतिरिक्त, पहले जिन्हें CD70-निगेटिव माना गया था, ऐसे लगभग 80-90% ट्यूमर कोशिकाओं में भी वास्तव में CD70 के सूक्ष्म स्तर पाए गए। यह संकेत देता है कि बेहतर संवेदनशीलता के साथ अधिकांश ट्यूमर कोशिकाओं को लक्षित किया जा सकता है।
- HIT रिसेप्टर के माध्यम से बढ़ी हुई संवेदनशीलता: इस बाधा को दूर करने के लिये, वैज्ञानिकों ने HLA-इंडिपेंडेंट T-सेल (HIT) रिसेप्टर विकसित किया है, जो एंटीजन की पहचान को सीधे T-सेल के प्राकृतिक सक्रियण पथ से जोड़ता है।
- शोधकर्त्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह डिज़ाइन T-कोशिकाओं को बहुत कम एंटीजन घनत्व पर प्रतिक्रिया करने की अनुमति देता है, जिससे हिडेन ट्यूमर सेल को पहचानने की उनकी क्षमता में सुधार होता है।
- ज़ेनोग्राफ्ट मॉडल (चूहों में विकसित ह्यूमन ट्यूमर): इसमें पारंपरिक CAR-T सेल थेरेपी ने ट्यूमर को कम तो किया, लेकिन कम-एंटीजन (कमज़ोर लक्ष्य संकेत) वाली कोशिकाओं के कारण वे विफल रहे, जबकि HIT T-सेल थेरेपी ने उन्हें पूरी तरह समाप्त कर दिया और स्थायी रूप से ट्यूमर को हटाने में सफलता प्राप्त की।
- सुरक्षा चिंताएँ और वैज्ञानिक सावधानी: वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि उच्च संवेदनशीलता सामान्य कोशिकाओं पर भी हमला कर सकती है, लेकिन CD70 अधिकतर महत्त्वपूर्ण अंगों में अनुपस्थित होता है, इसके दुष्प्रभाव अस्थायी थे और 'सेफ्टी स्विच' के माध्यम से जोखिमों को कम किया जा सकता है।
CAR-T सेल थेरेपी क्या है?
- परिचय: यह इम्यूनोथेरेपी का एक रूप है (एक ऐसा उपचार जो कैंसर से लड़ने के लिये शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक प्रणाली का उपयोग करता है)।
- प्रक्रिया:
- निष्कर्षण: रोगी के रक्त से T-कोशिका (T-सेल - एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका जो संक्रमण से लड़ने के लिये ज़िम्मेदार होती है) निकाली जाती हैं।
- जेनेटिक इंजीनियरिंग: प्रयोगशाला में इन T-कोशिकाओं को उनकी सतह पर काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर्स (CAR) नामक विशेष रिसेप्टर्स बनाने के लिये आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है।
- गुणन और इन्फ्यूजन: इन संशोधित, "सुपरचार्ज्ड" T-कोशिकाओं की संख्या लाखों में बढ़ाई जाती है और फिर उन्हें वापस रोगी के रक्तप्रवाह में डाल दिया जाता है।
- कार्यविधि: ये CAR 'हीट-सीकिंग मिसाइलों' की तरह कार्य करते हैं, जो T-कोशिकाओं को एक विशिष्ट एंटीजन (प्रोटीन) वाली कैंसर कोशिकाओं को पहचानने, उनसे जुड़ने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम बनाते हैं।
- रक्त कैंसर में सफलता: CAR-T थेरेपी ल्यूकेमिया और लिंफोमा जैसे "तरल" या रक्त कैंसर के खिलाफ अत्यधिक सफल रही है।
- इसका कारण यह है कि रक्त कैंसर कोशिकाओं में आमतौर पर लक्षित एंटीजन (जैसे CD19) का उच्च और समान घनत्व होता है।
- CAR-T थेरेपी की सीमाएँ:
- साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम (CRS): इसके एक गंभीर और संभावित रूप से जीवन के लिये खतरनाक दुष्प्रभाव हैं, जिसमें सक्रिय T-कोशिकाएँ भारी मात्रा में इन्फ्लैमेट्री साइटोकाइन उत्सर्जित करती है। इससे तेज बुखार, रक्तचाप में गिरावट और अंगों की विफलता हो सकती है।
- न्यूरोटॉक्सिसिटी: रोगियों को भ्रम, प्रलाप या दौरे जैसी तंत्रिका संबंधी समस्याओं का अनुभव हो सकता है (इसे ICANS के रूप में जाना जाता है)।
- उच्च लागत: CAR-T सेल थेरेपी प्रत्येक रोगी के लिये व्यक्तिगत होती है। विश्व स्तर पर इसकी लागत लाखों डॉलर होती है, जिससे यह काफी हद तक सामान्य लोगों की पहुँच से बाहर हो जाती है।
- विनिर्माण समय: इसमें कोशिकाओं के उत्सर्जन, इंजीनियरिंग करने और उनकी संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया में कई सप्ताह लगते हैं, जिस दौरान आक्रामक कैंसर और अधिक बढ़ सकता है।
CAR-T थेरेपी में भारत की प्रगति
- अक्तूबर 2023 में भारत ने NexCAR19 को मंज़ूरी दी, जो देश की पहली स्वदेशी रूप से विकसित CAR-T सेल थेरेपी है।
- इम्यूनोएक्ट (ImmunoACT), IIT बॉम्बे और टाटा मेमोरियल अस्पताल द्वारा संयुक्त रूप से विकसित, इसे B-cell लिम्फोमा और बी-एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया के इलाज के लिये डिज़ाइन किया गया है।
महत्त्व: NexCAR19 ने इस थेरेपी की लागत को लगभग 3–4 करोड़ रुपये (आयातित) से घटाकर लगभग 40 लाख रुपये कर दिया है, जिससे भारत में उन्नत कैंसर उपचार तक पहुँच अधिक सुलभ हो गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. CAR-T सेल थेरेपी क्या है?
यह एक इम्यूनोथेरेपी है, जिसमें मरीज की T-कोशिकाओं को आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है ताकि वे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट कर सकें।
2. सॉलिड ट्यूमर में CAR-T थेरेपी कम असरदार क्यों होती है?
एंटीजन की विषमता और कम एंटीजन प्रदर्शन के कारण कई ट्यूमर कोशिकाएँ प्रतिरक्षा तंत्र की पहचान से बच निकलती हैं।
3. HIT रिसेप्टर इनोवेशन क्या है?
यह एक संशोधित रिसेप्टर होता है, जो T-सेल को बहुत कम एंटीजन स्तर को भी पहचानने में सक्षम बनाता है, जिससे ट्यूमर को अधिक प्रभावी ढंग से लक्षित किया जा सकता है।
4. NexCAR19 क्या है?
यह भारत की पहली स्वदेशी CAR-T थेरेपी है, जिसे CDSCO द्वारा बी-सेल कैंसर के कम लागत वाले उपचार के लिये अनुमोदित किया गया है।
5. CAR-T थेरेपी के मुख्य जोखिम क्या हैं?
मुख्य जोखिमों में साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम (CRS), न्यूरोटॉक्सिसिटी, उच्च लागत और निर्माण में लगने वाला लंबा समय शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, मानव शरीर में B कोशिकाओं और T कोशिकाओं की भूमिका का सर्वोत्तम वर्णन है? (2022)
(a) वे शरीर को पर्यावरणीय प्रत्यूर्जकों (एलर्जनों) से संरक्षित करती हैं।
(b) वे शरीर के दर्द और सूजन का अपशमन करती हैं।
(c) वे शरीर के प्रतिरक्षा-निरोधकों की तरह काम करती हैं।
(d) वे शरीर को रोगजनकों द्वारा होने वाले रोगों से बचाती हैं।
उत्तर: (d)
रैपिड फायर
पहला भारत-जापान AI रणनीतिक संवाद 2026
अप्रैल 2026 में मुंबई में भारत-जापान कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) रणनीतिक संवाद का उद्घाटन हुआ, जो दोनों देशों के बीच मज़बूत, नवाचार और विश्वसनीय द्विपक्षीय AI ईकोसिस्टम की स्थापना की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।
- नेतृत्व और भागीदारी: इस वार्ता की सह-अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्रालय (MEA, साइबर कूटनीति प्रभाग) और जापान के विदेश मंत्रालय (साइबर सुरक्षा प्रभाग) ने की, जिसमें दोनों देशों की सरकारी एजेंसियों और AI उद्योग के प्रतिनिधि एक साथ सम्मिलित हुए।
- इसमें संपूर्ण AI स्टैक में रणनीतिक सहयोग, नीतिगत अभिसरण को बढ़ावा देने, सह-निर्माण तथा औद्योगिक क्षेत्रों के लिये AI समाधानों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- प्रतिभा और नवाचार: दोनों पक्षों ने AI प्रतिभाओं की अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता को मज़बूत करने और सहयोगात्मक तकनीकी परियोजनाओं के माध्यम से संयुक्त अनुसंधान का विस्तार करने के उपायों पर विचार किया।
- संवाद में AI शासन, नैतिक नीतियों के निर्माण और बहुपक्षीय मंचों में भागीदारी हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर भी जोर दिया गया।
- रणनीतिक सामंजस्य: भारत-जापान AI रणनीतिक संवाद 2026, भारत-जापान AI सहयोग पहल को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाता है, जिसकी आधिकारिक घोषणा प्रधानमंत्रियों द्वारा अगस्त 2025 में की गई थी।
- दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि: AI सहयोग भारत–जापान के अगले दशक के संयुक्त दृष्टिकोण का एक केंद्रीय स्तंभ है, जिसमें दोनों देशों ने दीर्घकालिक सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
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रैपिड फायर
नीलगिरि में नए प्रागैतिहासिक शैल कला स्थल की खोज
हाल ही में याकाई हेरिटेज ट्रस्ट ने तमिलनाडु के नीलगिरि ज़िले में स्थित ‘ऊर पारे’ नामक एक प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला स्थल की खोज की सूचना दी, जिससे इसके सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक महत्त्व पर प्रकाश पड़ा।
- स्थान: यह स्थल कोटागिरि क्षेत्र के वेल्लरिकोम्बई गाँव के निकट स्थित है और समुद्र तल से लगभग 1100 मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित है। यह शैलाश्रय परंपरागत रूप से स्वदेशी इरुला और कुरुम्बा समुदायों द्वारा, विशेषकर शहद संग्रहण गतिविधियों के दौरान, उपयोग में लाया जाता रहा है।
- संरचना: इस स्थल पर लगभग 30 स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकने वाली आकृतियाँ तथा कई धुंधले रूपांकन दर्ज किये गए हैं, जिन्हें लाल गेरू (Red Ochre) से एकरंगी संरचना के रूप में चित्रित किया गया है।
- शैली: इन चित्रों को सूक्ष्म रेखाचित्रों, मोटी रेखाओं से बनी आकृतियों तथा ज्यामितीय मिश्रित रूपों की श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
- चित्रण: इस कलाकृति में शंक्वाकार हेडड्रेस/शिरोभूषण वाली मानवाकृतियाँ, दीर्घ मानवीय आकृतियाँ, सीढ़ीनुमा शारीरिक संरचनाएँ तथा पॉइंटेड आयताकार पैटर्न जैसे अनुष्ठानिक प्रतीक शामिल हैं, जो प्रागैतिहासिक अनुष्ठान प्रथाओं और अलौकिक विश्वासों से संबंधों का संकेत देते हैं।
- कालक्रम: पुनःरंगाई और अध्यारोपण के साक्ष्य विभिन्न सांस्कृतिक कालों में बहु-चरणीय कलात्मक गतिविधि की ओर संकेत करते हैं।
- अन्य स्थल: आस-पास के महत्त्वपूर्ण शैल कला स्थलों में एलुथुपरई और थोलिक्किपरई शामिल हैं, जो समान बहु-स्तरीय चित्रकला परंपराओं के लिये जाने जाते हैं।
रैपिड फायर
मज़दूरों के अधिकारों के कथित उल्लंघन को लेकर CITU ने ILO का रुख किया
भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (CITU) ने औपचारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में याचिका दायर की है, जिसमें केंद्र सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार पर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में श्रमिकों के मौलिक अधिकारों के व्यवस्थित उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
- कथित उल्लंघन: यह शिकायत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की समिति ऑन फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन के समक्ष दायर की गई, जिसमें संगठन की स्वतंत्रता, संघ बनाने के अधिकार, सामूहिक वार्ता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकारों के ‘गंभीर, व्यापक और व्यवस्थित’ उल्लंघन का उल्लेख किया गया।
- CITU ने अप्रैल 2026 में श्रमिकों की लामबंदी के दौरान सामूहिक गिरफ्तारी, बल प्रयोग और शांतिपूर्ण श्रम विरोध प्रदर्शनों के अपराधीकरण जैसे दमनकारी उपायों का हवाला दिया।
- CITU ने पुलिस की ज्यादतियों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच, प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामलों की वापसी और सामूहिक वार्ता तंत्र की पुनर्स्थापना की मांग की है।
- आर्थिक कारक: ये विरोध प्रदर्शन वास्तविक मज़दूरी, जीवनयापन की बढ़ती लागत और श्रम संहिताओं को लेकर चिंताओं से प्रेरित थे, जिसमें उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मज़दूरी के निर्वाह स्तर से भी नीचे होने का हवाला दिया गया है।
- अंतर्राष्ट्रीय मानक: याचिका में ILO से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है कि भारत ILO कन्वेंशन संख्या 98 और मौलिक सिद्धांतों पर ILO घोषणा का अनुपालन करे।
- ILO कन्वेंशन संख्या 98 में श्रमिकों, नियोक्ताओं और समाज के लिये सामूहिक वार्ता तंत्र को प्रभावी बनाने हेतु बुनियादी सिद्धांत को निर्धारित किया गया है।
- वर्ष 1998 में अपनाई गई और वर्ष 2022 में संशोधित, कार्यस्थल पर मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों पर ILO घोषणा, कार्यस्थल में बुनियादी मानवीय मूल्यों को बनाए रखने के लिये सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों द्वारा की गई एक वैश्विक प्रतिबद्धता है।
- इसमें बताया गया है कि ILO के सभी सदस्य देश, संबंधित संधियों के अनुसमर्थन की परवाह किये बगैर, सिद्धांतों की पाँच मुख्य श्रेणियों का सम्मान करें और उन्हें बढ़ावा दें।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के पाँच मूल श्रम मानक निम्नलिखित हैं:
- संगठित एवं सामूहिक वार्ता के अधिकार पर कन्वेंशन।
- बलात् श्रम का उन्मूलन पर कन्वेंशन।
- बलात् श्रम पर कन्वेंशन।
- भेदभाव (रोजगार और व्यवसाय) पर कन्वेंशन।
- सुरक्षित और स्वस्थ कार्य वातावरण।
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और पढ़ें: श्रमिक प्रदर्शन और श्रम सुधार, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन |
रैपिड फायर
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और ऑपरेशन ग्लोबल-हंट
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ऑपरेशन ग्लोबल-हंट के तहत मादक पदार्थ तस्कर मोहम्मद सलीम डोला को तुर्किये से वापस लाने में सफलता प्राप्त की। यह इस पहल के तहत पहली बड़ी सफलता है और अंतर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क के विरुद्ध भारत की कार्रवाई में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
ऑपरेशन ग्लोबल-हंट
- परिचय: ऑपरेशन ग्लोबल-हंट भारतीय भगोड़ों द्वारा संचालित लगभग 100 अंतर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क को समाप्त करने के लिये तीन वर्षीय रणनीतिक पहल है। इसका लक्ष्य हेरोइन, कोकीन, फेंटेनिल और सिंथेटिक ड्रग्स की तस्करी करने वालों पर इंटरपोल नोटिस, संपत्ति फ्रीज़ करने जैसे उपायों के माध्यम से कार्रवाई करना है।
- समन्वय: इसमें NCB, मुंबई पुलिस, गुजरात ATS तथा अंतर्राष्ट्रीय प्राधिकरणों के बीच समन्वित कार्रवाई शामिल है, जिससे सीमा-पार प्रवर्तन क्षमताएँ मजबूत होती हैं।
- नीतिगत ढाँचा: यह पहल भारत की व्यापक ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ मादक पदार्थ विरोधी नीति का हिस्सा है, जिसे नार्को कोऑर्डिनेशन सेंटर (NCORD) के माध्यम से अधिक सुदृढ़ बनाया गया है। साथ ही वर्ष 2029 तक निर्धारित लक्ष्यों और निगरानी व्यवस्था के साथ एक राष्ट्रव्यापी नशा-विरोधी अभियान भी प्रस्तावित है।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB)
- परिचय: NCB (नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो), नई दिल्ली (मुख्यालय), भारत में नशीली दवाओं के प्रवर्तन और खुफिया जानकारी के लिये सर्वोच्च एजेंसी है, जिसका गठन वर्ष 1986 में स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम, 1985 के प्रावधानों के तहत किया गया था।
- नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के कार्य और शक्तियाँ: यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और प्रवर्तन तथा नीतियों के कार्यान्वयन के लिये विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के साथ समन्वय करता है।
- मादक पदार्थों को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानून: औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940, स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार, निवारण (PITNDPS) अधिनियम, 1988 तथा स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थों पर राष्ट्रीय नीति।
- वैश्विक प्रयास: भारत प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का हस्ताक्षरकर्त्ता है जैसे: सिंगल कन्वेंशन ऑन नारकोटिक ड्रग्स, 1961 (1972 के प्रोटोकॉल द्वारा संशोधित), मन:प्रभावी पदार्थों पर अभिसमय, 1971, मादक पदार्थों और स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1988।
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