रैपिड फायर
RBI ने रुपये में लागू NDF प्रतिबंधों में रियायत दी
हाल ही में, बाज़ार में बेहतर स्थिरता और आर्बिट्रेज जोखिमों में कमी के बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने रुपये से संबद्ध नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) लेन-देन पर पूर्ववर्ती प्रतिबंधों को आंशिक रूप से वापस ले लिया है।
- आंशिक छूट: बैंकों को अब सीमित संबंधित-पक्ष लेन-देन, जैसे- मौजूदा अनुबंधों का निरस्तीकरण और अवधि-विस्तार करने की अनुमति दी गई है, जबकि विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न साधनों (डेरिवेटिव) पर व्यापक प्रतिबंध अभी भी यथावत बने हुए हैं।
- हालाँकि, इस कदम का तात्कालिक रुपया विनिमय दर पर विशेष प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ और डॉलर की मज़बूती जैसे व्यापक वैश्विक कारक मुद्रा की स्थिति को प्रभावित करते रहते हैं।
- नियामक स्थिति: ऑनशोर बाज़ार में निवल खुली स्थिति पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा अपरिवर्तित बनी हुई है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक सतर्क नियामक रुख को दर्शाती है।
- पहले लगाए गए प्रतिबंधों का कारण: पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बाद विदेशी मुद्रा की अस्थिरता बढ़ने तथा ऑनशोर एवं ऑफशोर बाज़ारों के बीच आर्बिट्रेज की स्थिति में वृद्धि के कारण ये प्रतिबंध लगाए गए थे।
नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) के संदर्भ में
- नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) एक नकद-निपटान आधारित व्युत्पन्न (डेरिवेटिव) अनुबंध होता है, जिसका उपयोग उन मुद्राओं पर जोखिम से बचाव या सट्टा लगाने के लिये किया जाता है, जहाँ वास्तविक विनिमय पर प्रतिबंध होता है।
- भारतीय रुपये जैसी मुद्राओं के लिये विदेशी बाज़ारों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, विशेष रूप से विदेशी निवेशकों द्वारा।
- NDF बाज़ार, तटवर्ती और अपतटीय विदेशी मुद्रा बाज़ारों के बीच मध्यस्थता के अवसर उत्पन्न कर सकते हैं।
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भारत का 99वाँ रामसर स्थल: शेखा झील पक्षी अभयारण्य
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ स्थित शेखा झील पक्षी अभयारण्य को रामसर स्थल (अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि) के रूप में नामित किया है, जिससे भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्या 99 तथा राज्य में इनकी संख्या 12 हो गई है।
- उत्पत्ति: यह 25 हेक्टेयर में फैली मीठे पानी की एक बारहमासी आर्द्रभूमि है। इसका निर्माण 1852 में ऊपरी गंगा नहर के बनने के दौरान हुआ था, जिसने इस झील को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया।
- पारिस्थितिक महत्त्व: यह आर्द्रभूमि 166 से अधिक जलपक्षी प्रजातियों के लिये एक महत्त्वपूर्ण शीतकालीन आवास के रूप में कार्य करती है, जिनमें पेंटेड स्टॉर्क और बार-हेडेड गूज़ जैसी प्रमुख प्रजातियाँ शामिल हैं। साथ ही, यहाँ काले हिरण (अनुसूची-I प्रजाति) और नीलगाय जैसे स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं।
- वनस्पति एवं वनावरण: प्रमुख वृक्ष प्रजातियों में टर्मिनलिया अर्जुना (Terminalia arjuna) और जामुन (सिज़ीगियम क्यूमिनी) शामिल हैं, किंतु स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को लैंटाना कैमरा (Lantana camara), पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus) तथा जलकुंभी जैसी आक्रामक विदेशी प्रजातियों से बढ़ता हुआ खतरा है।
- मानवजनित खतरे: आर्द्रभूमि का क्षरण गाद जमाव (वर्ष 1991 में अवैज्ञानिक टीला निर्माण के कारण), भूमि वितरण योजनाओं से वनावरण में कमी तथा समीपवर्ती सड़क निर्माण से बढ़ी शिकार-संबंधी संवेदनशीलता के कारण हो रहा है।
- इसके अतिरिक्त, सिंघाड़े की गहन खेती ने प्रवासी पक्षियों के भोजन हेतु उपलब्ध सतही क्षेत्र को कम कर दिया है।
- यूट्रोफिकेशन: जलकुंभी की अत्यधिक एवं अनियंत्रित वृद्धि गंभीर यूट्रोफिकेशन उत्पन्न कर रही है, जिससे जल निकाय का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और जलपक्षियों के आवास क्षेत्र में कमी आ रही है।
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बिहार में दालों की पहली संरचित खरीद
भारत सरकार ने पीएम-आशा (PM-AASHA) के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) आधारित खरीद को मज़बूत किया है, जिसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ में संचालन का विस्तार किया गया है तथा आत्मनिर्भर दलहन मिशन के अंतर्गत बिहार में पहली संरचित दलहन खरीद पहल शुरू की गई है, ताकि किसानों का समर्थन किया जा सके और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके।
- बिहार दलहन खरीद पहल: बिहार में मसूर (दाल) की संगठित खरीद राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ (NCCF) के नेतृत्व में शुरू की गई है, जिसमें राष्ट्रीय सहकारी विपणन संघ (NAFED) अपने सहकारी नेटवर्क के माध्यम से मूल्य समर्थन योजना के तहत संचालनों को विस्तार देने की तैयारी कर रहा है।
- छत्तीसगढ़ MSP खरीद: यहाँ खरीद NCCF द्वारा संचालित है, जिसमें ई-समयुक्ति डिजिटल मंच और कई ज़िलों में PACS केंद्रों का उपयोग किया जा रहा है, जिसका ध्यान चना एवं मसूर जैसी फसलों पर और बड़े पैमाने पर किसानों की भागीदारी पर केंद्रित है।
आत्मनिर्भर दलहन मिशन
- परिचय: केंद्रीय बजट 2025–26 में घोषित, दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन (मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस) अक्तूबर 2025 में शुरू किया गया था। यह एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2025–26 से 2030–31 के बीच दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
- प्रमुख फसलें: यह मिशन विशेष रूप से तूर (अरहर), उड़द और मसूर पर केंद्रित है, जो दैनिक उपभोग के लिये महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वर्तमान में उत्पादन में कमियों का सामना कर रही हैं।
- प्रमुख उद्देश्य: यह आयात कम करने, उपज में सुधार लाने, जलवायु-प्रतिकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने और दीर्घकालिक पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
पीएम-आशा (प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान)
- परिचय: यह योजना (PM-AASHA) वर्ष 2018 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और किसानों को मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिये शुरू की गई थी।
- उद्देश्य: इस योजना का उद्देश्य लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, मनमानी बिक्री (डिस्ट्रेस सेल) को कम करना तथा विशेष रूप से दलहन एवं तिलहन के किसानों के लिये कृषि आय स्थिरता को मज़बूत करना है।
- घटक: इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित तीन घटकों के माध्यम से एक व्यापक मूल्य समर्थन ढाँचा प्रदान किया जाता है:
- मूल्य समर्थन योजना (PSS) – दलहन, तिलहन और खोपरा की भौतिक खरीद के लिये।
- मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) – जब बाज़ार मूल्य MSP से नीचे गिर जाए, तो किसानों को अंतर की भरपाई के लिये।
- निजी खरीद एवं भंडारण योजना (PPSS) – खरीद प्रक्रिया में निजी क्षेत्र को शामिल करने के लिये।
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और पढ़ें: दलहन में आत्मनिर्भरता |
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DNT समुदायों के लिये SEED योजना
हाल ही में विमुक्त, घुमंतू एवं अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के लिये विकास एवं कल्याण बोर्ड (DWBDNC) ने वित्तीय वर्ष 2025–26 के दौरान SEED योजना के तहत महत्त्वपूर्ण प्रगति की सूचना दी, जिसमें बढ़ी हुई पहुँच और प्रभाव को रेखांकित किया गया।
SEED योजना:
- परिचय: यह (SEED योजना) एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसे फरवरी 2022 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा विमुक्त, घुमंतू एवं अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के लिये शुरू किया गया था।
- इस योजना का पाँच वर्षों (2021–22 से) के लिये ₹200 करोड़ का परिव्यय है और इसे DWBDNC द्वारा पंजीकरण एवं निगरानी के लिये एक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है।
- प्रमुख घटक: यह योजना निम्नलिखित चार मुख्य घटकों पर केंद्रित है:
- प्रतियोगी परीक्षाओं और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिये निशुल्क कोचिंग
- PMJAY के माध्यम से स्वास्थ्य बीमा कवरेज
- आय सृजन के लिये आजीविका समर्थन
- PMAY जैसी योजनाओं के माध्यम से आवास सहायता
DNT, NT और SNT समुदाय
- परिचय: 'विमुक्त जनजातियाँ' शब्द उन समुदायों को संदर्भित करता है जिन्हें एक बार ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 के तहत वर्गीकृत किया गया था।
- भारत सरकार ने वर्ष 1952 में इन अधिनियमों को समाप्त कर दिया, जिससे इन समुदायों का विघटन हुआ।
- इन समुदायों में से कुछ, जिन्हें विमुक्त सूचीबद्ध किया गया था, घुमंतू भी थे।
- घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों को उनके रूप में परिभाषित किया गया है जो एक स्थान पर स्थायी रूप से न रहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरण करते हैं।
- हालाँकि अधिकांश विमुक्त जनजातियाँ (DNT) अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणियों में फैली हुई हैं, कुछ DNT इनमें से किसी भी श्रेणी (SC/ST/OBC) में शामिल नहीं हैं।
- जनसंख्या वितरण: भारत में लगभग 150 विमुक्त जनजातियाँ और लगभग 500 घुमंतू समुदाय हैं, जो कुल जनसंख्या का लगभग 10% हैं।
- चुनौतियाँ: काका कालेलकर आयोग, मंडल आयोग और राष्ट्रीय आयोग ने इन समुदायों की ऐतिहासिक उपेक्षा, पूर्वाग्रह और लक्षित कल्याणकारी उपायों की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
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और पढ़ें: विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजाति के आर्थिक सशक्तीकरण हेतु योजना |
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भारत-मिस्र रक्षा सहयोग
भारत और मिस्र ने काहिरा में 11वीं संयुक्त रक्षा समिति की बैठक आयोजित की, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना और भविष्य की साझेदारी के लिये एक रोडमैप तैयार करना था।
- रक्षा सहयोग रोडमैप (2026–27): दोनों पक्ष एक दूरदर्शी योजना पर सहमत हुए, जिसमें संरचित सैन्य संपर्कों का विस्तार करने, संयुक्त प्रशिक्षण को तीव्र करने, समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने और सैन्य अभ्यासों के दायरे एवं जटिलता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- रक्षा उद्योग सहयोग: भारत ने अपने रक्षा विनिर्माण विकास पर प्रकाश डाला, जिसमें उत्पादन 20 अरब डॉलर से अधिक है और लगभग 4 अरब डॉलर का निर्यात 100 से अधिक देशों को किया जाता है।
- समुद्री और वायु सेना सहयोग: पहली बार नौसेना-से-नौसेना वार्ता आयोजित की गई; भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में अपनी नौसेना की भूमिका और सूचना संलयन केंद्र (इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर) के योगदान को रेखांकित किया।
- भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने वायु सेना सहयोग को मज़बूत करने के लिये मिस्र की वायु सेना के नेतृत्व के साथ भी संवाद किया।
- ऐतिहासिक और रणनीतिक संदर्भ: भारत–मिस्र रक्षा संबंध 2022 के रक्षा सहयोग पर हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) पर आधारित हैं तथा 2023 में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाए जाने के साथ और अधिक मज़बूत हुए हैं, जो गहरे होते रणनीतिक समन्वय को दर्शाता है।
- हेलियोपोलिस युद्ध स्मारक पर भारतीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा अर्पित श्रद्धांजलि दोनों देशों के बीच साझा ऐतिहासिक संबंधों और लंबे समय से चले आ रहे सद्भाव को उजागर करती है।
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और पढ़ें: भारत-अफ्रीका साझेदारी की पुनर्संरचना |
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ओडिशा की बॉक्साइट पहाड़ियों तक रेल संपर्क
हाल ही में सरकार ने ओडिशा में स्थित सिजिमाली और कुटरुमाली बॉक्साइट पहाड़ियों को जोड़ने के लिये टिकीरी से एक नई ब्रॉड-गेज रेलवे लाइन प्रस्तावित की है। यह क्षेत्र रेल अधिनियम, 1989 के तहत अधिसूचित है और इसका उद्देश्य बॉक्साइट-समृद्ध क्षेत्रों में खनन गतिविधियों को सुगम बनाना है।
- स्थान: ये बॉक्साइट पहाड़ियाँ ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी ज़िलों में स्थित हैं तथा पूर्वी घाट का हिस्सा हैं, जो भारत के पूर्वी तट के साथ विस्तृत एक असतत और अपरदित पर्वत शृंखला है।
- चिंताएँ एवं विरोध: इस परियोजना को आजीविका के संभावित नुकसान, वन व्यपवर्तन, जल सुरक्षा संबंधी मुद्दों तथा पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में अधिकारों की सुरक्षा को लेकर जनजातीय समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
- पारिस्थितिक महत्त्व: यह क्षेत्र खनिज संसाधनों और जैव विविधता से समृद्ध होने के साथ-साथ पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है, जिसमें वनाच्छादित पहाड़ियाँ, जनजातीय बस्तियाँ और नदी प्रणालियाँ शामिल हैं, जिससे यह बड़े पैमाने पर खनन और अवसंरचना परियोजनाओं के लिये अत्यधिक संवेदनशील बन जाता है।
बॉक्साइट
- बॉक्साइट एल्यूमिनियम के निर्माण के लिये प्रयुक्त प्रमुख अयस्क है।
- यह मुख्यतः टर्शियरी निक्षेपों में पाया जाता है और लैटेराइट शैलों से संबंधित होता है। यह प्रायद्वीपीय भारत के पठारों, पर्वतीय श्रेणियों तथा तटीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता है।
- ओडिशा भारत का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, जहाँ कालाहांडी, संबलपुर, बोलांगीर और कोरापुट में इसके प्रमुख भंडार स्थित हैं। इसके अतिरिक्त झारखंड के लोहरदगा क्षेत्र में भी समृद्ध भंडार पाए जाते हैं।
- अन्य प्रमुख उत्पादक राज्यों में गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र शामिल हैं, जबकि छत्तीसगढ़ के अमरकंटक पठार में भी उल्लेखनीय भंडार मौजूद हैं।
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