प्रारंभिक परीक्षा
भारत में विशेषाधिकार नोटिस और संसदीय विशेषाधिकार
चर्चा में क्यों?
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के असफल होने के बाद प्रधानमंत्री के बयानों के चलते संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए भारत के प्रधानमंत्री के विरुद्ध विशेषाधिकार नोटिस दायर किया गया है।
विशेषाधिकार नोटिस क्या है?
- परिचय: एक विशेषाधिकार नोटिस (या प्रस्ताव) संसद के किसी सदस्य (सांसद) द्वारा प्रस्तुत एक औपचारिक नोटिस है जिसमें उनके संसदीय अधिकारों, उन्मुक्तियों या सदन की गरिमा के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है।
- इसका उपयोग उन सदस्यों या बाहरी लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिये किया जाता है जिन्होंने विशेषाधिकार का हनन किया है या सदन की अवमानना की है (जैसे– सदन को गुमराह करना, तथ्यों को छिपाना या सदस्यों पर अपमानजनक टिप्पणी करना)।
- नियम: इसे लोकसभा में नियम 222 और राज्यसभा में नियम 187 के तहत पेश किया जाता है।
- पीठासीन अधिकारी की भूमिका: अध्यक्ष (लोकसभा) या सभापति (राज्यसभा) पर्यवेक्षण का पहला स्तर होता है।
- पीठासीन अधिकारी इसकी जाँच करता है और सदन में इसे उठाने की सहमति देने या रोकने का निर्णय ले सकता है।
- अध्यक्ष/सभापति द्वारा नोटिस स्वीकार किये जाने के बाद, सदस्य सदन से अनुमति [सदन की औपचारिक अनुमति जो किसी सदस्य को किसी विशेष मामले (जैसे– विशेषाधिकार मुद्दा) को चर्चा के लिये उठाने की अनुमति देती है] मांगता है और यदि कोई आपत्ति नहीं होती है या कम-से-कम 25 सदस्य समर्थन करते हैं, तो अनुमति प्रदान कर दी जाती है।
- विशेषाधिकार नोटिस आमतौर पर प्रश्नकाल के बाद चर्चा की जाती है, लेकिन अत्यावश्यक मामलों में कभी भी अनुमति दी जा सकती है।
- विचार: एक बार स्वीकार होने के बाद सदन सीधे बहस कर सकता है या जाँच, अन्वेषण और रिपोर्ट के लिये सदन की विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है। हालाँकि अंतिम निर्णय सदन पर ही निर्भर करता है।
- विशेषाधिकार समिति:
- प्रकृति: यह एक स्थायी संसदीय समिति है। इसका कार्य अर्द्ध-न्यायिक है।
- लोकसभा: इसमें अध्यक्ष द्वारा मनोनीत 15 सदस्य होते हैं।
- राज्यसभा: इसमें सभापति द्वारा मनोनीत 10 सदस्य होते हैं।
- कार्य: यह विशेषाधिकार के उल्लंघन से जुड़े प्रत्येक प्रश्न की जाँच करती है, तथ्यों का निर्धारण करती है और की जाने वाली कार्रवाई के बारे में सदन को सिफारिशें करती है।
- निष्पक्ष सुनवाई: आरोपी सदस्य को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?
- परिचय: संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियाँ और छूट हैं, जिनका लाभ संसद का प्रत्येक सदन, उसकी समितियों तथा उसके सदस्यों को प्राप्त होता है।
- ये विशेषाधिकार भारत के महान्यायवादी को भी प्राप्त होते हैं, लेकिन राष्ट्रपति को नहीं, यद्यपि राष्ट्रपति संसद का एक अभिन्न अंग है (राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत पृथक् संवैधानिक उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं)।
- उद्देश्य: ये संसदीय कार्यों के प्रभावी निष्पादन के लिये आवश्यक होते हैं और अन्य निकायों या व्यक्तियों को प्राप्त अधिकारों से अधिक होते हैं।
- विशेषाधिकारों के प्रकार:
- सामूहिक विशेषाधिकार: ये सदन के समग्र अधिकार होते हैं, जैसे– कार्यवाही को विनियमित करने का अधिकार, अवमानना के लिये दंड देने का अधिकार तथा बाहरी व्यक्तियों को सदन से बाहर रखने का अधिकार।
- व्यक्तिगत विशेषाधिकार: ये सदस्यों को प्राप्त अधिकार होते हैं, जैसे– संसद में वाक् स्वतंत्रता तथा सिविल मामलों में गिरफ्तारी से छूट।
- संसदीय विशेषाधिकारों के स्रोत:
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 105, अनुच्छेद 122, अनुच्छेद 194 और अनुच्छेद 212 संसद के सदस्यों (MP) तथा राज्य विधानसभाओं के सदस्यों (MLA) को विभिन्न प्रकार के विशेषाधिकार प्रदान करते हैं।
- विधिक आधार: अनुच्छेद 105(3) संसद को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह कानून द्वारा संसद और उसके सदस्यों के अधिकारों, विशेषाधिकारों एवं उन्मुक्तियों को परिभाषित करे।
- अब तक संसद द्वारा इन विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध करने हेतु कोई व्यापक कानून पारित नहीं किया गया है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत संसदीय सत्रों के दौरान तथा उनके आसपास की अवधि में दीवानी मामलों में गिरफ्तारी से छूट प्रदान की जाती है।
- लोकसभा की विशेषाधिकार समिति की अनुशंसाएँ (1994 एवं 2008): समिति ने इस विषय का विस्तृत अध्ययन किया और लगातार संसदीय विशेषाधिकारों के संहिताकरण के विरुद्ध अनुशंसा की।
- सर्वसम्मति यह है कि संहिताकरण से प्रत्येक विशेषाधिकार संबंधी मामले को विधिक समीक्षा के अधीन लाया जा सकता है, जिससे सदन की अपने आंतरिक मामलों पर विशिष्ट अधिकारिता और संप्रभुता प्रभावित होगी।
- विशेषाधिकार का हनन: विशेषाधिकार का हनन (BoP) तब होता है जब किसी व्यक्ति या समूह द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन या अनदेखी की जाती है।
संसदीय विशेषाधिकारों पर विधिक दृष्टिकोण
विशेषाधिकार बनाम मूल अधिकार
- केशव सिंह मामला (1964): अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि अनुच्छेद 194(3) के अंतर्गत राज्य विधानसभाओं तथा विस्तार से अनुच्छेद 105(3) के अंतर्गत संसद की शक्तियाँ और विशेषाधिकार मूल अधिकारों के अधीन हैं।
- केशव सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्थापित किया गया कि विशेषाधिकारों और मूल अधिकारों के बीच उत्पन्न होने वाले संघर्षों का समाधान सामंजस्यपूर्ण व्याख्या के माध्यम से किया जाना चाहिये।
- शर्मा मामला (1959): इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने किसी संघर्ष की स्थिति में अधिकारों के अनुक्रम को स्पष्ट किया:
- अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) स्वतः ही संसदीय विशेषाधिकारों पर अधिरोहण नहीं करता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) फिर भी लागू होता है।
विधिक प्रक्रिया पर अभिसमय (न्यायालयों से प्राप्त नोटिस):
- पीठासीन अधिकारियों द्वारा उपस्थित न होना: एक स्थापित संसदीय परंपरा के अनुसार, राज्यसभा के सभापति (या लोकसभा के अध्यक्ष) सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय से नोटिस प्राप्त होने पर न तो उसका उत्तर देते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होते हैं।
- यह प्रक्रिया विशेष रूप से तब प्रदर्शित हुई जब 1964 के केशव सिंह मामले के दौरान सभापति ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने से मना किया तथा पुनः 1974 के राष्ट्रपति चुनाव संदर्भ के दौरान भी यही स्थिति रही।
- प्रक्रिया: उपस्थित होने के बजाय इस विषय पर सामान्यतः सदन में चर्चा की जाती है और संबंधित दस्तावेज़ों को विधि एवं न्याय मंत्री को उचित कार्रवाई के लिये भेजा जाता है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण और सदन की गरिमा बनाए रखी जाती है।
विदेशी नागरिकों पर विशेषाधिकार संबंधी न्यायिक अधिकारिता
- स्वराज पॉल मामला (1984): संसद किसी विदेशी नागरिक पर भी विशेषाधिकार संबंधी न्यायाधिकार का प्रयोग कर सकती है।
- महान्यायवादी की राय के अनुसार, संसद किसी विदेशी नागरिक के विरुद्ध व्यक्तिनिष्ठ अधिकारिता का प्रयोग तभी कर सकती है, जब उसके द्वारा अवमानना या विशेषाधिकार का हनन भारत के भीतर किया गया हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. विशेषाधिकार नोटिस क्या है?
किसी सांसद द्वारा विशेषाधिकार के उल्लंघन या सदन की अवमानना का आरोप लगाते हुए, नियम 222 (लोकसभा) के अंतर्गत प्रस्तुत एक औपचारिक प्रस्ताव।
2. संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?
अनुच्छेद 105 और 194 के तहत विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ, जो संसद और उसके सदस्यों के स्वतंत्र रूप से कार्य करने को सुनिश्चित करती हैं।
3. विशेषाधिकार समिति की क्या भूमिका है?
यह उल्लंघनों की जाँच करती है, साक्ष्यों की पड़ताल करती है, और सदन को कार्रवाई की अनुशंसा करती है।
4. क्या संसदीय विशेषाधिकार निरपेक्ष हैं?
नहीं, वे मौलिक अधिकारों के अधीन हैं, जैसा कि केशव सिंह मामले में 'सामंजस्यपूर्ण निर्वचन' का उपयोग करते हुए स्पष्ट किया गया था।
5. शर्मा केस (1959) ने क्या स्थापित किया?
यह निर्णय देता है कि संसदीय विशेषाधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) पर प्रधानता रखते हैं, लेकिन वे अनुच्छेद 21 के अधीन रहते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत की संसद किसके/किनके द्वारा मंत्रिपरिषद के कृत्यों के ऊपर नियंत्रण रखती है? (2017)
- स्थगन प्रस्ताव
- प्रश्नकाल
- अनुपूरक प्रश्न
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न. भारत के संदर्भ में, संसदीय शासन-प्रणाली में निम्नलिखित में से कौन-सा/से सिद्धांत संस्थागत रूप से निहित है/हैं? (2013)
1. मंत्रिमंडल के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं।
2. जब तक मंत्रियों को संसद का विश्वास प्राप्त रहता है तब तक ही वे अपने पद पर बने रहते हैं।
3. राज्य का अध्यक्ष ही मंत्रिमंडल का अध्यक्ष होता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
मेन्स:
प्रश्न. संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (इम्यूनिटीज़), जैसे कि वे संविधान की धारा 105 में परिकल्पित हैं, अनेकों असंहिताबद्ध (अन-कोडिफाइड) और अ-परिगणित विशेषाधिकारों के जारी रहने का स्थान खाली छोड़ देती हैं। संसदीय विशेषाधिकारों के विधिक संहिताकरण की अनुपस्थिति के कारणों का आकलन कीजिये। इस समस्या का क्या समाधान निकाला जा सकता है? (2014)
रैपिड फायर
विश्व पृथ्वी दिवस 2026
विश्व पृथ्वी दिवस, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मातृ पृथ्वी दिवस भी कहा जाता है, एक वैश्विक आयोजन है जो प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता ह्रास जैसी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा सामूहिक कार्रवाई को प्रेरित करना है।
- वर्ष 2026 की थीम: 2026 की थीम ‘हमारी शक्ति, हमारा ग्रह’ (Our Power, Our Planet) है, जो सामुदायिक सहभागिता, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण तथा पर्यावरणीय क्षति के लिये जवाबदेही बढ़ाने पर विशेष बल देती है।
- ऐतिहासिक उत्पत्ति: पृथ्वी दिवस का आरंभ 22 अप्रैल, 1970 को हुआ, जिसे आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत माना जाता है। इसकी पहल अमेरिका के सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन द्वारा वर्ष 1969 में हुए सांता बारबरा तेल रिसाव की घटना के बाद की गई थी।
- 1970 की प्रारंभिक रैलियों और विरोध प्रदर्शनों ने सीधे तौर पर प्रमुख पर्यावरणीय कानूनों के निर्माण तथा अमेरिका में पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2009 में एक प्रस्ताव पारित कर 22 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय मातृ पृथ्वी दिवस के रूप में नामित किया।
- वैश्विक पहुँच: यह अब 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है, जिसमें सरकारें, गैर-सरकारी संगठन (NGO) और आम नागरिक एक साथ जुड़कर भागीदारी करते हैं।
- मुख्य महत्त्व: यह प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु नीतियों को आगे बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण मंच है तथा भावी पीढ़ियों के लिये स्थायी जीवनशैली अपनाने के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाता है।
- पृथ्वी के संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता: भारत का सतत विकास की ओर रुख उसके पंचामृत संकल्पों में परिलक्षित होता है, जिनमें वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (नेट-ज़ीरो), वर्ष 2030 तक 50% नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना शामिल है। यह विकास को वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ जोड़ते हुए कथन से उत्तरदायित्व की ओर परिवर्तन का संकेत देता है।
- इसे पर्यावरण संरक्षण हेतु एक बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण द्वारा और सुदृढ़ किया गया है, जिसमें सौर ऊर्जा विस्तार, FAME के तहत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, प्रोजेक्ट टाइगर के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण तथा राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के ज़रिये प्रदूषण नियंत्रण जैसी पहलें शामिल हैं, जो मिलकर सतत विकास के लिये व्यावहारिक मार्ग प्रदान करती हैं।
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रैपिड फायर
जापान ने रक्षा निर्यात नियमों को उदार बनाया
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अपनी शांतिवादी नीति से ऐतिहासिक मोड़ लेते हुए जापान ने अप्रैल 2026 में हथियार निर्यात पर "पाँच श्रेणी" प्रतिबंध को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया। इस कदम से अन्य देशों को मारक आयुधों के निर्यात की अनुमति मिल गई।
- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही के बाद, जापान ने एक शांतिवादी संविधान अपनाया। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 9 युद्ध का त्याग करता है और युद्ध क्षमता वाले बलों को बनाए रखने पर प्रतिबंध लगाता है, जो गैर-आक्रामकता और अंतर्राष्ट्रीय शांति के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
- 'पाँच श्रेणी" प्रतिबंध का अंत: पूर्व में निर्यात पाँच गैर-मारक क्षेत्रों जैसे- बचाव, परिवहन, चेतावनी, निगरानी और सुरंग-मार्जन, तक सीमित था।
- वर्ष 2026 का संशोधन मिसाइलों, विध्वंसकों और लड़ाकू जेटों के निर्यात की अनुमति देता है। यह बदलाव जापान के घरेलू रक्षा उद्योग को पुनरुज्जीवित करने का लक्ष्य रखता है।
- GCAP उत्प्रेरक: इस निर्णय को ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) द्वारा त्वरित किया गया, जो यूके और इटली के साथ वर्ष 2035 तक छठी पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान बनाने के लिये एक त्रिपक्षीय परियोजना है।
- जापान को उत्पादन लागत का प्रबंधन करने और एक व्यवहार्य परियोजना भागीदार बने रहने के लिये इस जेट को तीसरे देशों को निर्यात करने की क्षमता की आवश्यकता है।
- प्राप्तकर्त्ता और सुरक्षा उपाय: मारक आयुधों का निर्यात उन 17 देशों (अप्रैल 2026 तक) तक सीमित है, जिन्होंने टोक्यो के साथ द्विपक्षीय रक्षा-प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं (जिनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, फिलिपींस और अमेरिका शामिल हैं)।
- इसके अतिरिक्त ऐसे अंतरणों के लिये जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्वीकृति की आवश्यकता होती है, जो आमतौर पर सक्रिय संघर्षों में शामिल देशों या संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के अधीन देशों के लिये निषिद्ध हैं, जबकि प्राप्तकर्त्ताओं को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार उपकरण का उपयोग करने के लिये प्रतिबद्ध होना चाहिये।
भारत-जापान रक्षा सहयोग
- रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग: रक्षा उपकरण और प्रौद्योगिकी सहयोग पर संयुक्त कार्यसमूह (JWG-DETC) और वर्ष 2017 से बढ़ते B2B एंगेजमेंट, बढ़े हुए उद्योग और MSME लिंकेज के माध्यम से भारत-जापान सहयोग गहरा हुआ है, जिसे वर्ष 2023 में जापान के "उपकरण और प्रौद्योगिकी अंतरण के लिये तीन सिद्धांतों" में संशोधन द्वारा और बढ़ावा मिला है, जो अधिक रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग को सक्षम बनाता है।
- उन्नत सैन्य अंतर-संचालन क्षमता: नियमित त्रि-सेवा जुड़ाव और JIMEX, मालाबार, धर्म गार्जियन और वीर गार्जियन (वायु सेना) जैसे संयुक्त अभ्यास, साथ ही तटरक्षक सहयोग ने समन्वय और परिचालन समन्वय में सुधार किया है।
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रैपिड फायर
सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांग-अनुकूल जेल सुधारों के लिये पैनल का गठन किया
सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट की अध्यक्षता वाली एक उच्च-शक्ति प्राप्त समिति को जेलों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने के लिये एक व्यापक योजना निर्माण का निर्देश दिया है, जिसमें सुरक्षा संबंधी विचारों के साथ सुधार को एकीकृत किया जाएगा।
- परिचय: समिति मूल रूप से खुली सुधारक संस्थाओं में सुधार के लिये गठित की गई थी और इसके दायरे का विस्तार अब दिव्यांगता-समावेशी जेल सुधारों को शामिल करने के लिये किया गया है, जो एक व्यापक प्रणालीगत दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- समिति को अब सहायक उपकरणों की खरीद, रखरखाव और सुरक्षा के लिये समान मानदंड बनाने का कार्य सौंपा गया है, जो कैदियों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
- उपाय: पिछले आदेशों न्यायालय ने सहायक उपकरणों, विशिष्ट चिकित्सा देखभाल और बढ़े हुए परिचारक अधिकारों का प्रावधान अनिवार्य किया, साथ ही उल्लंघनों के लिये दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत दंड की चेतावनी दी।
- न्यायालय ने अधिकार-आधारित दृष्टिकोण पर ज़ोर दिया, यह कहते हुए कि दिव्यांग कैदियों को अनुच्छेद 14 और 21 के तहत संरक्षित किया जाना चाहिये, यह सुनिश्चित किया कि कारावास के दौरान समानता और गरिमा कमज़ोर न हों।
- संरचना: समिति की संरचना का विस्तार सामाजिक न्याय और दिव्यांग सशक्तीकरण से संबंधित प्रमुख मंत्रालयों और विभागों को शामिल करने के लिये किया गया है, जिससे समन्वित संस्थागत प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो सके।
- मूल्यांकन: न्यायालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मौजूदा कानूनों, प्रथाओं और सुविधाओं की एक संरचित, सतत और विशेषज्ञ-संचालित समीक्षा की परिकल्पना की है ताकि एकजुट कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।
- एक समयबद्ध तंत्र स्थापित किया गया है, जिसके तहत समिति को चार महीनों के भीतर एक समेकित स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
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रैपिड फायर
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-III (PMGSY-III)
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-III (PMGSY-III) को मार्च 2025 के बाद भी मार्च 2028 तक जारी रखने और इसके बजट में वृद्धि को मंज़ूरी दी है, ताकि ग्रामीण कनेक्टिविटी (संपर्क व्यवस्था) को और मज़बूत किया जा सके।
- परिचय: PMGSY केंद्र सरकार की एक योजना है, जिसे वर्ष 2000 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य असंपर्कित ग्रामीण बस्तियों को हर मौसम में चलने योग्य सड़क संपर्क प्रदान करना है।
- यह योजना मूल रूप से 100% केंद्र प्रायोजित पहल थी, लेकिन वित्तीय वर्ष 2015-16 से इसका वित्तपोषण केंद्र और राज्य सरकारों के बीच 60:40 के अनुपात में साझा किया जाने लगा।
- PMGSY योजना के विभिन्न चरणों के तहत लगभग 800,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया गया है और 180,000 बस्तियों को जोड़ा गया है।
- PMGSY-III का मुख्य उद्देश्य: यह मार्गों को मज़बूत करने पर केंद्रित है तथा प्रमुख ग्रामीण संपर्कों को समेकित करता है, जो आवासों को ग्रामीण कृषि बाज़ारों, उच्च माध्यमिक विद्यालयों और स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ते हैं।
- समय-सीमा: यह योजना मैदानी क्षेत्रों में सड़कों और पुलों तथा पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के लिये निर्माण की समय-सीमा मार्च 2028 तक और पहाड़ी क्षेत्रों में पुलों के लिये मार्च 2029 तक बढ़ा देती है।
- लाभ: यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी, बाजार पहुँच में सुधार करेगी, परिवहन लागत कम करेगी, रोज़गार सृजित करेगी, आवश्यक सेवाओं तक पहुँच को बढ़ाएगी, ग्रामीण-शहरी विभाजन को समाप्त करेगी और विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण का समर्थन करेगी।
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