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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

रैपिड फायर

18वाँ राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस

स्रोत: द हिंदू

18वें राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने सिविल सेवकों को शुभकामनाएँ दीं और सुशासन तथा राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया, ज़मीनी स्तर के कार्यान्वयन से लेकर नीति-निर्माण तक उत्कृष्टता, करुणा और नवाचार के साथ भारत की प्रगति को बढ़ाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

  • प्रत्येक वर्ष इस दिन, प्रधानमंत्री प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों के कार्यान्वयन और नवाचार में उपलब्धियों के लिये ज़िलों व कार्यान्वयन इकाइयों को सार्वजनिक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिये प्रधानमंत्री पुरस्कार (PMAEPA) प्रदान करते हैं।
  • राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस: यह प्रत्येक वर्ष 21 अप्रैल को सिविल सेवकों के समर्पण का सम्मान करने के लिये मनाया जाता है। इसे पहली बार वर्ष 2006 में मनाया गया, यह सरदार वल्लभभाई पटेल के 21 अप्रैल, 1947 को दिल्ली के मेटकॉफ हाउस में प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के प्रोबेशनरों को संबोधित करने का स्मरण कराता है, जहाँ उन्होंने सिविल सेवकों को "भारत का इस्पात ढाँचा" कहा था।
  • PMAEPA: केंद्र और राज्य सरकारों के ज़िलों और संगठनों द्वारा किये गए असाधारण एवं नवीन कार्यों को स्वीकार करने, पहचानने और पुरस्कृत करने के लिये सार्वजनिक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिये प्रधानमंत्री पुरस्कार (PMAEPA) प्रदान किये जाते हैं।
    • चयन प्रक्रिया में एक स्क्रीनिंग समिति, विशेषज्ञ समिति द्वारा मूल्यांकन और कैबिनेट सचिव तथा प्रधानमंत्री द्वारा अंतिम अनुमोदन शामिल है।
    • पुरस्कार में एक ट्रॉफी, एक प्रशस्ति पत्र और सार्वजनिक कल्याण संबंधी पहलों का समर्थन करने के लिये 20 लाख रुपये शामिल हैं।
  • सिविल सेवाओं से संबंधित पहल: मिशन कर्मयोगी, लेटरल एंट्री स्कीम (LES), ई-समीक्षा और केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS)

18th National Civil Services Day

और पढ़ें: सिविल सेवा दिवस 


प्रारंभिक परीक्षा

माइक्रोप्लास्टिक के जोखिम में सुंदरबन

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), कोलकाता के एक अध्ययन में यह सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक्स सुंदरबन में खाद्य जाल को बाधित कर रहे हैं तथा कार्बन चक्र को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे इस महत्त्वपूर्ण ब्लू-कार्बन पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

सुंदरबन पर अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?

  • चिंताजनक प्रदूषण स्तर: अध्ययन में सागर द्वीप के निकट स्थित मूरीगंगा मुहाना में माइक्रोप्लास्टिक्स की उच्च सांद्रता पाई गई।
    • मानसून ऋतु के दौरान माइक्रोप्लास्टिक का स्तर लगभग 40% तक बढ़ गया। भारी वर्षा के कारण अंदरूनी शहरी कचरा, ‘रंगहीन कण’ तथा पुराने क्षतिग्रस्त प्लास्टिक नदियों और नालों के माध्यम से सीधे डेल्टा क्षेत्र में पहुँच जाते हैं।
  • स्रोत: पहचाने गए प्लास्टिक कणों में लगभग आधे रेशों (संभवतः वस्त्रों से उत्पन्न) के रूप में थे, इसके बाद टुकड़ों (Fragments) का स्थान रहा।
  • ‘प्लास्टिस्फीयर’ का निर्माण: हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग से पता चला कि प्लास्टिक कण मौसमीय प्रभाव के कारण क्षतिग्रस्त होकर दरारें बना रहे हैं और खंडित होकर नैनोप्लास्टिक्स में परिवर्तित हो रहे हैं।
    • इन दरारों में बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों के जटिल समुदाय विकसित हो जाते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘प्लास्टिस्फीयर’ कहा जाता है।
  • कार्बन भंडार: चूँकि ये प्लास्टिक लगभग 90% कार्बन से बने होते हैं, इसलिये ये कृत्रिम कार्बन सिंक के रूप में कार्य कर रहे हैं। इनके अपघटन के दौरान ये जल में विलेय कार्बनिक कार्बन (DOC) का उत्सर्जन करते हैं।
    लीच किया हुआ (रिसाव से निकला) DOC (Dissolved Organic Carbon - घुलनशील कार्बनिक कार्बन) एक कृत्रिम खाद्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। यह समुद्री बैक्टीरिया को प्राकृतिक स्तर से कहीं अधिक तेजी से बढ़ने और अपनी संख्या बढ़ाने में सक्षम बनाता है, जिससे सूक्ष्मजीवों की गतिशीलता (microbial dynamics) बदल जाती है और कार्बन चक्र की गति तेज हो जाती है।
    • रिसकर निकला DOC एक कृत्रिम खाद्य स्रोत का कार्य करता है, जिससे समुद्री बैक्टीरिया प्राकृतिक स्तरों से कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ने और अपनी संख्या बढ़ाने में सक्षम बनाता है, इसके परिणामस्वरूप सूक्ष्मजीवों की गतिशीलता में बदलाव आता है और कार्बन चक्र की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है।
      • माइक्रोप्लास्टिक्स पर मौजूद सूक्ष्मजीव जैवजनित कार्बन का उत्पादन करके इसमें और योगदान देते हैं, जिससे प्राकृतिक कार्बन चक्र में व्यवधान और अधिक बढ़ जाता है।
  • ‘ब्लू कार्बन’ दक्षता के लिये खतरा: मैंग्रोव महत्त्वपूर्ण ‘ब्लू कार्बन’ पारिस्थितिक तंत्र हैं, जो सामान्यतः वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित करने और संगृहीत करने में अत्यंत कुशल होते हैं।
    • शोधकर्त्ताओं ने चेतावनी दी है कि प्लास्टिक से उत्पन्न कृत्रिम कार्बन का प्रवेश और उससे होने वाली सूक्ष्मजीवों की तीव्र वृद्धि प्राकृतिक कार्बन चक्र को बाधित कर सकती है, जिससे सुंदरबन एक कार्बन सिंक (अर्थात वे “कम ब्लू” बन सकते हैं) के रूप में कम प्रभावी हो सकते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स

  • परिभाषाएँ और पैमाना: दोनों के बीच मुख्य अंतर उनके सूक्ष्म आकार में होता है:
    • माइक्रोप्लास्टिक्स: इन्हें 5 मिलीमीटर (5 mm) से छोटे प्लास्टिक कणों, रेशों या दानों के रूप में परिभाषित किया जाता है। इनका आकार तिल के बीज के बराबर या उससे भी छोटा होता है।
    • नैनोप्लास्टिक्स: ये माइक्रोप्लास्टिक्स के अत्यंत सूक्ष्म टूटे हुए कण होते हैं, जिन्हें सामान्यतः 1 माइक्रोमीटर (1 μm या 1,000 नैनोमीटर) से छोटे आकार के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • वर्गीकरण: इनके उद्गम के आधार पर इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
    • प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक्स: ये वे सूक्ष्म प्लास्टिक कण हैं जिन्हें जानबूझकर व्यावसायिक उपयोग के लिये छोटे आकार में निर्मित किया जाता है।
      • इसके उदाहरणों में चेहरे के स्क्रब और टूथपेस्ट में इस्तेमाल होने वाले माइक्रोबीड्स (सूक्ष्म प्लास्टिक कण) तथा सिंथेटिक कपड़ों (जैसे– पॉलिएस्टर और नायलॉन) से धुलाई के दौरान निकलने वाले माइक्रोफाइबर शामिल हैं।
    • द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक्स: ये बड़े प्लास्टिक उत्पादों (जैसे– पानी की बोतलें, मछली पकड़ने के जाल और प्लास्टिक बैग) के पर्यावरणीय प्रभावों (जैसे– धूप, हवा, पानी तथा रासायनिक अपक्षय) के कारण टूटकर छोटे कणों में बदलने से बनते हैं।
      • सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (UV) किरणों, समुद्री लहरों और तापमान में उतार-चढ़ाव के संपर्क में आने से प्लास्टिक भंगुर (कमज़ोर) हो जाता है और टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव
    • जैव-संचयन और जैव-आवर्द्धन: माइक्रोप्लास्टिक्स को समुद्री जीव अक्सर भोजन समझकर खा लेते हैं, जिनमें छोटे ज़ूप्लैंकटन से लेकर बड़े व्हेल तक शामिल हैं।
      • एक बार निगल लेने के बाद ये माइक्रोप्लास्टिक्स पाचन तंत्र में रुकावट पैदा कर सकते हैं या भोजन करने के व्यवहार को बदल सकते हैं, ये प्लास्टिक शरीर में जमा होते जाते हैं और खाद्य शृंखला में ऊपर की ओर बढ़ते हुए उनकी सांद्रता और भी अधिक सघन होती जाती है।
    • “ट्रोजन हॉर्स” प्रभाव: प्लास्टिक रासायनिक स्पंज की तरह काम करते हैं। वे आसपास के पानी से ज़हरीले प्रदूषकों को अवशोषित कर उन्हें केंद्रित कर लेते हैं, जैसे– भारी धातुएँ और स्‍थायी कार्बनिक प्रदूषक (POPs)
      • जब कोई जानवर प्लास्टिक खाता है, तो वह इन विषाक्त पदार्थों की एक सांद्रित खुराक को भी निगल लेता है।

सुंदरबन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

  • भौगोलिक स्थिति: सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा सतत मैंग्रोव वन है, जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के डेल्टा पर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाला है।
    • यह एक अद्वितीय मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र है, जो भूमि और समुद्र के बीच स्थित है, जिसमें ज्वारीय जल द्वारा लगातार आकारित द्वीपों का एक मोज़ेक शामिल है और यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भारत (पश्चिम बंगाल राज्य के भीतर) और बांग्लादेश में फैला हुआ है।
  • पारिस्थितिकीय महत्त्व:
    • 'सुंदरी' वृक्ष: वन का नाम सुंदरी वृक्ष (हेरिटिएरा फोम्स) से लिया गया है, जो इस क्षेत्र की एक प्रमुख मैंग्रोव प्रजाति है जो अपनी कठोर लकड़ी और न्यूमेटोफोरस (विशिष्ट श्वसन जड़ें जो कीचड़ से ऊपर की ओर बढ़ती हैं) के लिये जानी जाती है।
    • ब्लू कार्बन सिंक: मैंग्रोव वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को अत्यधिक कुशलता से अवशोषित करते हैं और इसे अपनी बायोमास तथा नीचे की मिट्टी में संगृहीत करते हैं।
      • यह सुंदरबन को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष में एक महत्त्वपूर्ण "ब्लू कार्बन" ईकोसिस्टम बनाता है।
    • प्राकृतिक ढाल: सघन मैंग्रोव नेटवर्क एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक बायो-शील्ड के रूप में कार्य करता है, जो पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटीय समुदायों को बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होने वाले तूफान, सुनामी और चक्रवातों के विनाशकारी प्रभावों से बचाता है।
  • जैव विविधता और वन्यजीव:
    • रॉयल बंगाल टाइगर: सुंदरबन दुनिया का एकमात्र मैंग्रोव वन है जहाँ बाघ निवास करते हैं।
    • समृद्ध जीव: यह पारिस्थितिक तंत्र वन्यजीवों की एक विशाल शृंखला का समर्थन करता है, जिसमें खारे पानी का मगरमच्छ (एस्टुआरिन क्रोकोडाइल), गंभीर रूप से लुप्तप्राय उत्तरी नदी टेरापिन (बटागुर बास्का) और गंगा डॉल्फिन  शामिल हैं।
  • संरक्षण और वैश्विक स्थिति: सुंदरबन के भारतीय भाग में कई अतिव्यापी संरक्षण टैग हैं:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'ब्लू-कार्बन ईकोसिस्टम' क्या हैं?
मैंग्रोव, समुद्री घास और लवणीय दलदल जैसे ईकोसिस्टम जो वायुमंडलीय CO₂ को कुशलतापूर्वक ग्रहण और संगृहीत करते हैं।

2. प्लास्टिस्फीयर क्या हैं?
माइक्रोप्लास्टिक सतहों पर बनने वाले सूक्ष्मजीवी समुदाय, जो समुद्री पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को बदल देते हैं।

3. माइक्रोप्लास्टिक सुंदरबन के लिये हानिकारक क्यों हैं?
ये कृत्रिम कार्बन स्रोतों के रूप में कार्य करते हैं, खाद्य जाल को बाधित करते हैं और कार्बन पृथक्करण दक्षता को कम करते हैं।

4. सुंदरबन का क्या महत्त्व है?
यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन, एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और एक महत्त्वपूर्ण जलवायु बफर है।

5. माइक्रोप्लास्टिक कार्बन चक्र को कैसे प्रभावित करते हैं?
ये डिकंपोज ऑर्गनिक कार्बन (DOC) उत्सर्जित करते हैं और जैविक कार्बन उत्पादन को बढ़ावा देते हैं, जिससे प्राकृतिक कार्बन गतिशीलता परिवर्तित होती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित संरक्षित क्षेत्रों पर विचार कीजिये: (2012)

  1. बाँदीपुर  
  2. भितरकनिका 
  3. मानस  
  4. सुंदरबन

उपर्युक्त में से किसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया है?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1, 3 और 4

(c) केवल 2, 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b) 


मेन्स

प्रश्न. मैंग्रोव के रिक्तीकरण के कारणों पर चर्चा कीजिये और तटीय पारिस्थितिकी का अनुरक्षण करने में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। (2019)


रैपिड फायर

भारत के वन कार्बन भंडारण का भविष्य

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में एनवायर्नमेंटल रिसर्च: क्लाइमेट में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत के वन वर्ष 2100 तक अपने कार्बन भंडारण को लगभग दोगुना कर सकते हैं, जो एक ओर जलवायु परिवर्तन के शमन की बड़ी संभावनाओं को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर उभरते पारिस्थितिकीय जोखिमों को भी उजागर करता है।

  • अनुमानित कार्बन बायोमास वृद्धि: अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2100 तक वनस्पति कार्बन बायोमास में निम्न-उत्सर्जन परिदृश्य में 35% की वृद्धि, मध्यम-उत्सर्जन मार्ग में 62% की वृद्धि तथा उच्च-उत्सर्जन (जीवाश्म ईंधन-प्रधान) परिदृश्य में लगभग 97% तक वृद्धि होने का अनुमान है।
    • सबसे तीव्र वृद्धि वर्ष 2050 के बाद होने की संभावना है।
  • वृद्धि के प्रमुख कारक: यह वृद्धि दो परस्पर क्रियाशील कारकों से प्रेरित है, वायुमंडलीय CO₂ का बढ़ा हुआ स्तर (जो प्रकाश-संश्लेषण और जल-उपयोग दक्षता को बढ़ाता है) तथा बढ़ी हुई वर्षा (जो वृक्षों की वृद्धि के लिये उपलब्ध नमी को बढ़ाती है)।
  • अपरंपरागत भौगोलिक परिवर्तन: आश्चर्यजनक रूप से कार्बन भंडारण में सबसे अधिक सापेक्ष वृद्धि पारंपरिक वन क्षेत्रों के बजाय राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश के मरुस्थलीय तथा अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में होने का अनुमान है।
    • भारत के सबसे पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र, जैसे– पश्चिमी घाट और हिमालय में पारिस्थितिक संतृप्ति तथा विशिष्ट क्षेत्रीय जलवायु दबावों के कारण तुलनात्मक रूप से कम सापेक्ष वृद्धि देखी जाएगी।
  • ‘छिपे हुए दबाव’ (Masked Stress) की चेतावनी: शोधकर्त्ता सावधान करते हैं कि वन वनस्पति और कार्बन भंडारण में अनुमानित वृद्धि अनिवार्य रूप से सकारात्मक नहीं है, क्योंकि वर्तमान मॉडल मृदा पोषक तत्त्वों की सीमाओं तथा जलवायु-जनित व्यवधानों, जैसे– वनाग्नि, सूखा, कीट प्रकोप और वनोन्मूलन जैसे महत्त्वपूर्ण कारकों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करते हैं।
    • परिणामस्वरूप, कार्बन भंडार में दिखाई देने वाली वृद्धि गहरे पारिस्थितिकीय दबाव को छिपा सकती है, जिससे वनों की अस्थिरता, क्षरण और भविष्य में बड़े पैमाने पर कार्बन के उत्सर्जन के संभावित जोखिम को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • आधिकारिक अनुमानों से भिन्नता: अध्ययन का दीर्घकालिक मॉडलिंग भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आधिकारिक आँकड़ों से भिन्न निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।
    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुसार, वास्तविक क्षेत्रीय एवं रिमोट सेंसिंग आँकड़ों के आधार पर कार्बन भंडार में अपेक्षाकृत धीमी और स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो वर्ष 2013 में 6.94 बिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2023 में 7.29 बिलियन टन हो गई है तथा वर्ष 2030 तक इसके 8.65 बिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है।
  • राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों के लिये महत्त्व: इन कार्बन गतिशीलताओं को समझना भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्यों (2031-35) को प्राप्त करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसमें हाल ही में देश के वन कार्बन सिंक लक्ष्य को वर्ष 2035 तक 3.5-4 अरब टन CO₂ समतुल्य तक बढ़ाया गया है।

और पढ़ें: कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) 


रैपिड फायर

सी ब्रीज़ पर वैश्विक तापन का प्रभाव

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में एक अध्ययन में बताया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग वृद्धि तटीय शहरों में समुद्र-भूमि पवन प्रणालियों को कमज़ोर कर रही है, जिससे उनके शीतलन प्रभाव में कमी आ रही है।

  • ग्लोबल वार्मिंग वृद्धि से तात्पर्य पृथ्वी की औसत सतही तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि से है, जो मुख्यतः मानव गतिविधियों के कारण होती है, विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और मीथेन (CH₄) जैसे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से।

सी ब्रीज़ 

  • परिचय: सी ब्रीज़ एक स्थानीय पवन प्रणाली है, जो भूमि और समुद्र के बीच गर्म होने के अंतर के कारण उत्पन्न होती है। दिन के समय तापीय अंतर के कारण समुद्र से ठंडी हवा भूमि की ओर बहती है, जबकि रात में यह प्रक्रिया उलट जाती है।
    • इसके विपरीत स्थल पवन एक अपतटीय हवा है जो मुख्यतः रात में या ठंडी परिस्थितियों में चलती है, जब भूमि समुद्र की तुलना में तेज़ी से ठंडी हो जाती है। इससे भूमि पर उच्च दाब बनता है और हवा भूमि से समुद्र की ओर बहती है।
  • मुख्य निष्कर्ष: बढ़ते समुद्री तापमान भूमि–समुद्र के तापीय अंतर को कम कर रहे हैं, जिससे पवन तंत्र कमज़ोर हो रहा है और इसकी आवृत्ति तथा तीव्रता दोनों में कमी आ रही है। परिणामस्वरूप मुंबई और मियामी सहित 18 प्रमुख तटीय महानगरों में समुद्री पवन वाले दिनों की संख्या में लगभग 3% की गिरावट दर्ज की गई है।
    • मध्यम अक्षांश वाले शहर जैसे लंदन, न्यूयॉर्क, शंघाई और ब्यूनस आयर्स में इसमें अधिक तीव्र गिरावट देखी गई है।
  • प्रभाव: कमज़ोर होती पवनें शहरी तापमान में वृद्धि, प्राकृतिक शीतलन में कमी और वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी का कारण बन सकती हैं, जिससे स्वास्थ्य और रहने योग्य परिस्थितियाँ प्रभावित होती हैं।
    • वर्ष 2050 तक यदि उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहता है, तो समुद्री पवनें लगभग 4.5 गुना तेज़ी से कमज़ोर हो सकती हैं।

Land_Vs_Sea_Breeze

और पढ़ें: रिकॉर्ड ग्लोबल वार्मिंग और भारत पर इसका प्रभाव


रैपिड फायर

FSSAI द्वारा अश्वगंधा का विनियमन

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने न्यूट्रास्यूटिकल्स और सप्लीमेंट्स में अश्वगंधा के उपयोग के संबंध में एक एडवाइज़री (परामर्श) जारी किया है।

  • नियामक आधार: खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2016 (अनुसूची IV) के अनुसार, स्वास्थ्य पूरक और संबंधित उत्पादों में उपयोग के लिये केवल पौधों के निर्दिष्ट भागों के उपयोग की ही अनुमति है।
  • परिचय: अश्वगंधा (Withania somnifera) एक औषधीय जड़ी-बूटी है जिसे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले के रूप में जाना जाता है। इसे एक एडेप्टोजेन के रूप में वर्गीकृत किया गया है (जो शरीर को तनाव प्रबंधित करने में मदद करता है)। इसके अलावा यह मस्तिष्क की कार्यक्षमता को भी बढ़ाता है और रक्त शर्करा को कम करता है, साथ ही चिंता तथा अवसाद के लक्षणों से लड़ने में मदद करता है।
    • इसका व्यापक रूप से आयुर्वेदिक दवाओं, न्यूट्रास्यूटिकल्स, हर्बल चाय, प्रोटीन मिश्रणों और वेलनेस उत्पादों में भी उपयोग किया जाता है।
  • पत्तियों पर प्रतिबंध का कारण: निर्देश के अनुसार, अश्वगंधा की केवल जड़ों और उनके अर्क (extracts) के उपयोग की अनुमति है, जबकि पत्तियों और उनके अर्क को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसका कारण पत्तियों में विथानोलाइड्स (जैसे कि विथाफेरिन-ए) का उच्च स्तर होना है, जो सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न कर सकता है।
    • आयुष मंत्रालय ने भी निर्माताओं को पत्तियों के उपयोग से बचने का निर्देश दिया है और खाद्य व्यवसाय संचालकों (FBOs) को निर्धारित सीमाओं और पौधों के अनुमत हिस्सों का पालन करना अनिवार्य होगा।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)

  • FSSAI एक स्वायत्त वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत की गई है। यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है तथा इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है।

Ashwagandha

और पढ़ें: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) 


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