प्रिलिम्स फैक्ट्स (07 Apr, 2026)



इस्पात उत्पादन में सिनगैस

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में प्राकृतिक गैस, LPG और प्रोपेन की कमी को दूर करने के लिये इस्पात उद्योग की भट्ठियों में सिनगैस (सिंथेसिस गैस) का उपयोग किया गया है। यह गैल्वनाइजिंग और कलर-कोटिंग भट्ठियों में अपनी तरह का पहला अनुप्रयोग है, जो ईंधन व्यवधानों के दौरान संचालन की निरंतरता सुनिश्चित करता है।

सिनगैस

  • परिचय: यह कोयला गैसीकरण के माध्यम से उत्पादित एक स्वच्छ ईंधन है, जो कोयला, बायोमास या अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित करता है। यह मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एवं हाइड्रोजन (H₂) से बना होता है।
  • अनुप्रयोग: इसका उपयोग गैल्वनाइजिंग और कलर-कोटिंग भट्ठियों जैसी उच्च-तापमान औद्योगिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ डायरेक्ट रिड्यूस आयरन (DRI) उत्पादन और ब्लास्ट फर्नेस में किया जाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: यह LNG और कोकिंग कोयला जैसे आयातित ईंधनों पर निर्भरता कम करता है, साथ ही मेथनॉल और अमोनिया जैसे रसायनों के लिये फीडस्टॉक के रूप में भी कार्य करता है।
  • महत्त्व: यह कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को कम करता है, कम-कार्बन इस्पात उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा का समर्थन करता है, साथ ही कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म (CBAM) के अनुपालन में सहायता करता है और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाता है।

और पढ़ें: कोयला गैसीकरण


संलयन ऊर्जा की व्यवहार्यता

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

नेचर एनर्जी  में प्रकाशित हालिया अध्ययन चेतावनी देता है कि वर्तमान में नाभिकीय संलयन (न्यूक्लियर फ्यूज़न) की लागत अनुमान अधिक आशावादी हैं, जिससे स्वच्छ ऊर्जा निवेश के असमर्थनीय आवंटन को लेकर चिंता उत्पन्न हो रही है।

  • विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इस तरह के अवास्तविक अनुमान अधिक व्यवहार्य जलवायु समाधानों के लिये धन के प्रवाह को भटका सकते हैं और लागत में कमी तथा पैमाने की क्षमता सुधारने के लिये वैकल्पिक रिएक्टर डिज़ाइन, ईंधन और छोटे विन्यासों की खोज करने का सुझाव देते हैं।

संलयन क्या है?

  • परिचय: संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो छोटे, हल्के परमाणु (जैसे– हाइड्रोजन के समस्थानिक) एक साथ मिलकर एक बड़ा एवं भारी परमाणु बनाते हैं और इस दौरान विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यही वह ऊर्जा प्रक्रिया है जो सूर्य और तारों को संचालित करती है।
    • उदाहरण के लिये, सूर्य में हाइड्रोजन के नाभिक मिलकर हीलियम का निर्माण करते हैं और इस प्रक्रिया में प्रकाश और ताप के रूप में ऊर्जा मुक्त होती है।
  • ऊर्जा उत्सर्जन: नाभिकों के संलयन से ऊर्जा इसलिये मुक्त होती है क्योंकि संलयन उत्पाद का द्रव्यमान व्यक्तिगत परमाणुओं के योग से कम होता है। इस ‘लुप्त/लॉस्ट’ द्रव्यमान, जिसे मास डिफेक्ट (Mass Defect) कहते हैं, को आइंस्टीन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत (E=mc²) के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

Fusion_Energy_Viability

  • संलयन के लिये आवश्यक परिस्थितियाँ:
    • उच्च तापमान: लगभग 100 मिलियन°C
    • उच्च दबाव: परमाणु नाभिकों को संलयन के लिये पर्याप्त समीप लाने हेतु।
    • प्लाज़्मा: पदार्थ उच्च-ऊर्जा अवस्था में होता है, जहाँ परमाणु आयनों और इलेक्ट्रॉनों में विभाजित हो जाते हैं।
  • टोकामक: टोकामक एक संलयन रिएक्टर है, जो प्लाज़्मा को एक डोनट-आकार के पात्र में सीमित और नियंत्रित करने के लिये चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करता है। इसकी प्रभावशीलता इस बात से मापी जाती है कि यह प्लाज़्मा को बिना क्षय के कितनी देर तक बनाए रख सकता है। 
    • अधिक समय तक प्लाज़्मा को सीमित रखने से रिएक्टर निरंतर और विश्वसनीय संलयन अभिक्रियाएँ प्राप्त करने के और अधिक निकट पहुँचते हैं।
  • Q मान (ऊर्जा लाभ गुणांक): Q मान किसी संलयन रिएक्टर की दक्षता को मापता है।
    • यह उत्पन्न ऊर्जा और निवेशित ऊर्जा का अनुपात होता है। यदि Q मान 1 से अधिक हो, तो इसका अर्थ है कि रिएक्टर अपनी खपत से अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है।
  • संलयन बनाम विखंडन: विखंडन वह प्रक्रिया है जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में किया जाता है। इसमें एक भारी नाभिक (जैसे– यूरेनियम) छोटे नाभिकों में विभाजित होकर ऊर्जा मुक्त करता है।
    • वहीं संलयन में हल्के नाभिक आपस में मिलकर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। संलयन से विखंडन की तुलना में बहुत कम रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिससे यह स्वच्छ ऊर्जा के लिये अधिक आकर्षक विकल्प बन जाता है।

नाभिकीय संलयन बनाम नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय संलयन 

परिभाषा

विखंडन का आशय एक बड़े परमाणु का दो या दो से अधिक छोटे परमाणुओं में विभाजन से है।

नाभिकीय संलयन का आशय दो हल्के परमाणुओं के संयोजन से एक भारी परमाणु नाभिक के निर्माण की प्रकिया से है।

घटना

विखंडन प्रकिया सामान्य रूप से प्रकृति में घटित नहीं होती है।

प्रायः सूर्य जैसे तारों में संलयन प्रक्रिया घटित होती है।

ऊर्जा आवश्यकता

विखंडन प्रकिया में दो परमाणुओं को विभाजित करने में बहुत कम ऊर्जा लगती है।

दो या दो से अधिक प्रोटॉन को एक साथ लाने के लिये अत्यधिक उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्राप्त ऊर्जा

विखंडन से निकलने वाली ऊर्जा रासायनिक प्रतिक्रियाओं की तुलना में लगभग एक लाख गुना अधिक होती है, लेकिन यह नाभिकीय संलयन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा से कम होती है।

संलयन से प्राप्त ऊर्जा विखंडन से निकलने वाली ऊर्जा से तीन से चार गुना अधिक होती है।

ऊर्जा उत्पादन 

विखंडन प्रकिया का उपयोग परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में किया जाता है।

यह ऊर्जा उत्पादन के लिये  एक प्रायोगिक तकनीक है।

नाभिकीय संलयन की आर्थिक व्यवहार्यता के समक्ष चुनौतियाँ

  • संलयन विद्युत संयंत्र बड़े पैमाने के और अत्यधिक पूंजी-गहन होते हैं, जिन्हें शीतलन और तापन जैसी आंतरिक प्रक्रियाओं को बनाए रखने के लिये बहुत अधिक ऊर्जा उत्पादन की आवश्यकता होती है।
  • यह तकनीक अत्यंत जटिल है और प्रायः परमाणु विखंडन से अधिक जटिल होती है, जिसमें आपस में जुड़ी हुई डिज़ाइन संरचनाएँ होती हैं, जो मानकीकरण और बड़े पैमाने पर विस्तार को सीमित करती हैं।
  • संलयन संयंत्रों को भूकंपीय जोखिम, जल उपलब्धता और नियामकीय परिस्थितियों जैसे कारकों के आधार पर स्थल-विशिष्ट अनुकूलन की आवश्यकता होती है, जिससे इनके बड़े पैमाने पर मानकीकृत निर्माण की संभावना कम हो जाती है।
  • ये सीमाएँ लागत में कमी की कम संभावना उत्पन्न करती हैं, जिससे मामूली लाभ के लिये भी बड़े पैमाने पर विस्तार की आवश्यकता होती है और यह तकनीक सौर ऊर्जा तथा उन्नत विखंडन तकनीकों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में सीमित रह जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नाभिकीय संलयन क्या है?
संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें हल्के नाभिक एक भारी नाभिक बनाने के लिये संयोजित होते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

2. संलयन के लिये किन परिस्थितियों की आवश्यकता होती है?
 संलयन के लिये अत्यधिक उच्च तापमान, उच्च दाब और प्लाज़्मा की आवश्यकता होती है, जिसे प्रायः टोकामक का उपयोग करके प्राप्त किया जाता है।

3. संलयन में Q मान क्या है?
Q मान निर्गत ऊर्जा का निवेशित ऊर्जा से अनुपात है, Q>1 का अर्थ है शुद्ध ऊर्जा लाभ।

4. संलयन की आर्थिक व्यवहार्यता के लिये क्या चुनौतियाँ हैं?
उच्च लागत, जटिल डिज़ाइन, सीमित मानकीकरण और विस्तारशीलता (स्केलेबिलिटी) संलयन को आर्थिक रूप से कम प्रतिस्पर्द्धी बनाती हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. परमाणु रिएक्टर में भारी पानी का कार्य होता है: (2011)

(a) न्यूट्रॉन की गति को धीमा कर देना।

(b) न्यूट्रॉन की गति बढ़ाना।

(c) रिएक्टर को ठंडा करना।

(d) परमाणु प्रतिक्रिया को रोकना।

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिये। (2018)


भारत के प्रमुख बंदरगाहों पर कार्गो की भारी बढ़ोतरी

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अधीन भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 2025–26 में 915 मिलियन टन कार्गो (कार्गो से तात्पर्य भूमि, जल या वायु द्वारा परिवहन किये जाने वाले सामान से है) का परिवहन किया, जिसमें 7.06% की वृद्धि हुई, जो मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 के तहत दक्षता लाभ को दर्शाता है।

  • इसके अतिरिक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का एकीकरण परिचालन दक्षता, लॉजिस्टिक्स अनुकूलन और निर्णय लेने को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है, जो भारत के समुद्री परिवर्तन में अगले चरण को चिह्नित करता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में बंदरगाह के प्रदर्शन की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • लक्ष्यों को पार करना: प्रमुख बंदरगाहों ने सामूहिक रूप से 915.17 मिलियन टन (MT) कार्गो का अभूतपूर्व परिवहन किया, जो 904 MT के वार्षिक लक्ष्य को सफलतापूर्वक पार कर गया।
  • शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ता: शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ताओं में दीनदयाल पत्तन प्राधिकरण (160.11 MT), उसके बाद पारादीप पत्तन प्राधिकरण (156.45 MT) और जवाहरलाल नेहरू पत्तन प्राधिकरण (JNPA) (102.01 MT) शामिल थे।
    • विशाखापटनम पत्तन प्राधिकरण, मुंबई पत्तन प्राधिकरण, चेन्नई पत्तन प्राधिकरण और न्यू मंगलोर पत्तन प्राधिकरण ने भी मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया।
  • उच्चतम वृद्धि दर: वृद्धि दर के संदर्भ में गोवा के मोरमुगाओ पत्तन प्राधिकरण ने 15.91% की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, उसके बाद कोलकाता डॉक सिस्टम (14.28%) और JNPA (10.74%) का स्थान था।
  • विकास को गति देने वाले कारक:
    • डिजिटल परिवर्तन: IT और स्वचालन द्वारा संचालित स्मार्ट पोर्ट और डिजिटल पहलों को अपनाना, जो परिचालन में प्रमुख दक्षता लाभ प्रदान कर रहा है।
      • राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (मरीन) और मैरीटाइम सिंगल विंडो एक ही प्लेटफॉर्म से एकीकृत व्यापार सुविधा को सक्षम कर रहे हैं।
      • सागर सेतु प्लेटफॉर्म और ई-समुद्र; एकीकृत समुद्री सेवा पोर्टल सभी समुद्री सेवाओं को एक ही छत के नीचे ला रहा है।
      • वन-नेशन-वन-डॉक्यूमेंट (ONOD) और वन-नेशन-वन-प्रोसेस (ONOP) सुधार: सीमा शुल्क, आप्रवासन और स्वास्थ्य सहित सभी बंदरगाहों में दस्तावेज़ीकरण को मानकीकृत करना और अनावश्यक प्रक्रियाओं को समाप्त करना।
      • जो प्रक्रियाएँ पहले भौतिक रूप से संचालित होती थीं, वे अब पूरी तरह डिजिटल हो गई हैं, जिससे देरी, कागज़ी कार्यवाही और मानवीय त्रुटियाँ कम हो गई हैं।
      • स्मार्ट बंदरगाह अब परिवर्तन के अगले चरण के रूप में AI-संचालित बुद्धिमान बंदरगाहों में विकसित होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
    • मुख्य वस्तुओं के प्रबंधन में वृद्धि: कोयला, कच्चा तेल, कंटेनर, उर्वरक तथा पेट्रोलियम, तेल और स्नेहक (POL) जैसी प्रमुख वस्तुओं की बढ़ी हुई मात्रा ने कुल कार्गो वृद्धि को प्रोत्साहित किया है।
    • संचालन दक्षता में सुधार: टर्नअराउंड समय में उल्लेखनीय कमी (2013–14 में लगभग 4 दिन से घटकर 2025 में 1 दिन से भी कम) और कारोबार सुगमता में सुधार ने बंदरगाहों के प्रदर्शन को सुदृढ़ किया है।
    • क्षमता विस्तार और आधुनिकीकरण: भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत किये गए सुधारों के साथ बंदरगाह अवसंरचना के विस्तार तथा उन्नयन ने कार्गो प्रबंधन क्षमता एवं संचालन दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।

भारतीय बंदरगाहों को AI के साथ एकीकृत करना

  • AI परियोजना नियोजन को बेहतर बना सकता है, संचालन संबंधी निर्णयों को अधिक प्रभावी कर सकता है, व्यापार सुगमता को बढ़ा सकता है और ऊर्जा के कुशल उपयोग को सुनिश्चित कर सकता है।
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के एक पायलट अध्ययन में वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह पर भीड़भाड़ का पूर्वानुमान लगाने और जस्ट-इन-टाइम बर्थिंग को सक्षम बनाने में AI की उपयोगिता प्रदर्शित हुई, जिससे ईंधन तथा समय की बचत संभव हुई।
  • AI की प्रभावशीलता के लिये बड़े पैमाने पर डेटा आवश्यक होता है। वर्तमान में विक्रेता-आधारित बिखरे हुए सिस्टम के कारण AI को संस्थागत रूप देकर ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ (DPI) के रूप में विकसित करना चाहिये, ताकि मानकीकृत डेटा, परस्पर संचालन क्षमता, साझा रजिस्ट्रियाँ और मज़बूत साइबर सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

स्मार्ट पोर्ट्स बनाम AI (थिंकिंग) पोर्ट्स

पहलू

स्मार्ट बंदरगाह

AI (थिंकिंग) पोर्ट्स

दृष्टिकोण और केंद्रबिंदु

प्रौद्योगिकी-आधारित, स्वचालन और संचालन की रीयल-टाइम निगरानी पर केंद्रित।

निर्णय-आधारित, AI का उपयोग करते हुए पूर्वानुमानित अंतर्दृष्टियों और परिणाम-आधारित योजना पर केंद्रित।

कार्यप्रणाली और अनुकूलन

वर्तमान घटनाओं पर प्रतिक्रिया करता है और अलग-अलग प्रणालियों (साइलो) के भीतर अनुकूलन करता है।

भविष्य के परिदृश्यों का पूर्वानुमान लगाता है और एकीकृत प्रणालियों में अनुकूलन करता है।

निर्णय-निर्माण और परिणाम

सीमित निर्णय-समर्थन के साथ डेटा की दृश्यता प्रदान करता है, जिससे गति और दक्षता में सुधार होता है।

AI-आधारित निर्णय क्षमता को सक्षम बनाते हुए अग्रिम और सक्रिय निर्णय लेने में मदद करता है, जिससे बंदरगाह अधिक स्मार्ट और भविष्य के लिये तैयार बनते हैं।

भारत में बंदरगाह

  • बंदरगाह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जो निर्यात-आयात (EXIM) कार्गो का लगभग 95% मात्रा के आधार पर और 70% मूल्य के आधार पर प्रबंधित करते हैं।
  • भारत में 12 प्रमुख बंदरगाह हैं (महाराष्ट्र के वधावन में प्रस्तावित 13वाँ प्रमुख बंदरगाह अभी विकासाधीन है), जो पूर्णतः भारत सरकार के स्वामित्व में हैं और प्रमुख पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2021 के तहत संचालित होते हैं।
    • इनमें दीनदयाल बंदरगाह, मुंबई बंदरगाह, जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह, मोरमुगाओ बंदरगाह, न्यू मंगलौर बंदरगाह, कोचीन बंदरगाह, वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह, चेन्नई बंदरगाह, कामराजार बंदरगाह, विशाखापत्तनम बंदरगाह, पारादीप बंदरगाह और श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह शामिल हैं।
  • भारत में किसी भी प्रमुख बंदरगाह का पूर्ण निजीकरण नहीं किया गया है, क्योंकि भूमि और जलतट (वाटरफ्रंट) का स्वामित्व भारत सरकार के पास ही रहता है। हालाँकि संचालन में निजी भागीदारी मौजूद है, जो लैंडलॉर्ड बंदरगाह/सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत होती है।
  • प्रमुख बंदरगाह का प्रशासन पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जबकि गैर-प्रमुख बंदरगाह राज्य सरकारों या राज्य समुद्री बोर्डों के अधीन होते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 का क्या महत्त्व है?
इसका उद्देश्य बंदरगाह-आधारित विकास, लॉजिस्टिक्स एकीकरण और आधुनिकीकरण के माध्यम से भारत को एक वैश्विक समुद्री शक्ति में परिवर्तित करना है।

2. बंदरगाह सुधारों में ONOD और ONOP क्या हैं?
वन नेशन वन डॉक्यूमेंट (ONOD) और वन नेशन वन प्रोसेस (ONOP) देश के सभी बंदरगाहों में दस्तावेज़ीकरण तथा प्रक्रियाओं का मानकीकरण करते हैं, जिससे दोहराव और विलंब में कमी आती है।

3. AI बंदरगाह संचालन में सुधार कैसे कर सकता है?
AI भीड़भाड़ का पूर्वानुमान, जस्ट-इन-टाइम बर्थिंग, निर्णय-निर्माण और ऊर्जा दक्षता को बढ़ाता है, जिससे समग्र लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन में सुधार होता है।

4. भारत के व्यापार में बंदरगाहों की क्या भूमिका है?
बंदरगाह मात्रा के आधार पर लगभग 95% EXIM कार्गो और मूल्य के आधार पर 70% माल का संचालन करते हैं, जिससे वे आर्थिक विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

5. बंदरगाहों में AI अपनाने की एक प्रमुख चुनौती क्या है?
खंडित डेटा प्रणालियाँ और मानकीकरण की कमी, जो पारस्परिक संचालन (इंटरऑपरेबिलिटी) और AI के प्रभावी उपयोग को सीमित करती हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न: भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है? (2017)

(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।

(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।

(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।

उत्तर: (c)


युवा संगम

स्रोत: पीआईबी 

वर्ष 2023 में अपने लॉन्च के बाद से युवा संगम का विस्तार कई चरणों में हुआ है, जिसमें हज़ारों युवाओं ने भाग लिया है और चरण-VI (2026) के लिये हाल के पंजीकरणों ने इस कार्यक्रम को 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विस्तारित कर दिया है।

Yuva Sangam

युवा संगम कार्यक्रम

  • परिचय: युवा संगम एक युवा सहभागिता कार्यक्रम है, जो एक भारत श्रेष्ठ भारत पहल के अंतर्गत आता है, जो अनुभवात्मक शिक्षा और अंतर-राज्यीय अनुभव के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है।
    • एक भारत श्रेष्ठ भारत, जिसे 31 अक्तूबर, 2015 को राष्ट्रीय एकता दिवस पर लॉन्च किया गया था, का उद्देश्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संस्कृति, भाषा, पर्यटन एवं ज्ञान के आदान-प्रदान में निरंतर आपसी संबंधों से जोड़कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है।
  • भागीदारी: यह कार्यक्रम 18–30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के लिये तैयार किया गया है, जिसमें छात्र, NSS स्वयंसेवक, नेहरू युवा केंद्र संगठन (NYKS) के सदस्य और युवा पेशेवर शामिल हैं। प्रतिभागी तय किये  गए राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की संरचित अध्ययन यात्राओं पर जाते हैं, जहाँ वे स्थानीय संस्कृति, समुदायों, संस्थानों तथा विकास परियोजनाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ते हैं।
  • क्रियान्वयन: यह शिक्षा मंत्रालय द्वारा निर्देशित है और उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है, जो युवाओं की भागीदारी के लिये एक संरचित मंच प्रदान करता है। यह कार्यक्रम 'संपूर्ण सरकार' दृष्टिकोण का पालन करता है, जिसमें शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन तथा युवा मामलों जैसे कई मंत्रालय और क्षेत्र शामिल हैं।
  • महत्त्व: यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है, जो वास्तविक अनुभवों के माध्यम से अनुभवात्मक और अंतः विषय शिक्षण पर बल देती है। साथ ही यह एक ज्ञान-आधारित और भविष्य-उन्मुख पीढ़ी को तैयार कर 'विकसित भारत @2047' के राष्ट्रीय संकल्प को मूर्त रूप देने में सहायक है।

और पढ़ें: युवा संगम


ऑक्टोपस के प्रजनन में हेक्टोकोटिलस की भूमिका

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में शोधकर्त्ताओं ने पाया कि नर ऑक्टोपस एक विशेष भुजा, हेक्टोकोटिलस, का उपयोग न केवल शुक्राणु स्थानांतरण के लिये करते हैं, बल्कि इसे एक संवेदी अंग के रूप में भी प्रयोग करते हैं, जो स्पर्श के द्वारा मादा को 'स्वाद' के माध्यम से पहचानता है। यह अनुकूलन इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ऑक्टोपस प्रायः एकाकी होते हैं और बहुत कम ही अपने साथी से मिलते हैं।

  • यह नर ऑक्टोपस को मादा के प्रजनन तंत्र और त्वचा में प्रोजेस्टेरोन का पता लगाकर उनकी पहचान करने में सक्षम बनाता है तथा पूर्ण अंधकार में भी गर्भाधान के लिये अंडाशय (ओविडक्ट) का स्थान निर्धारित करने में सहायता करता है।
  • यह प्रक्रिया CRT1 रिसेप्टर के माध्यम से संचालित होती है, जो प्राचीन न्यूरोट्रांसमीटर रिसेप्टर्स से विकसित हुआ है और अब शिकार की पहचान तथा साथी की पहचान- दोनों कार्य करता है।
  • यह अनुकूलन ऑक्टोपस और स्क्विड जैसे सेफलोपॉड्स में व्यापक रूप से पाया जाता है, जिसमें संवेदी पहचान और शुक्राणु संप्रेषण को एक ही उपांग में एकीकृत किया गया है।
    • सेफलोपॉड्स मोलस्का संघ का एक वर्ग हैं, जिनकी विशेषताएँ मुलायम शरीर, स्पष्ट/प्रमुख सिर, बड़ी आँखें तथा भुजाओं या टेंटाकल्स की एक वलयाकार शृंखला होती है, जिनका उपयोग संचलन, पकड़ने और संवेदन के लिये किया जाता है।
  • ये निष्कर्ष दर्शाते हैं कि प्रोटीनों में आणविक परिवर्तन जटिल व्यवहारों को संचालित कर सकते हैं और समुद्री जैव विविधता में योगदान देते हैं।

Hectocotylus in Octopus Reproduction

और पढ़ें: सेफलोपॉड्स का संरक्षण