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प्रिलिम्स फैक्ट्स

रैपिड फायर

कोलंबिया का हिप्पो संकट एवं वंतारा का पुनर्स्थापन प्रस्ताव

स्रोत: द हिंदू

गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा ने कोलंबिया से 80 हिप्पो के पुनर्स्थापन का प्रस्ताव दिया है। यह पहल कोलंबियाई सरकार द्वारा पारिस्थितिकीय चिंताओं के कारण आक्रामक हिप्पो आबादी को नियंत्रित करने/मारने के निर्णय के बाद सामने आई है।

  • हिप्पो की आबादी वर्ष 1981 में 4 से बढ़कर आज लगभग 170 तक पहुँच गई है, क्योंकि वे मैग्डालेना नदी बेसिन में विस्तृत हो चुके हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो वर्ष 2035 तक इनकी संख्या लगभग 1000 तक पहुँचने का अनुमान है।
  • कोलंबिया ने वर्ष 2022 में हिप्पोपोटामस एम्फीबियस को एक आक्रामक विदेशी प्रजाति घोषित किया तथा GonaCon वैक्सीन के माध्यम से नसबंदी (Sterilisation) का विकल्प भी अपनाने का प्रयास किया, किंतु यह बड़े पैमाने पर महँगा एवं अप्रभावी सिद्ध हुआ।
  • हालाँकि पुनर्स्थापन के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं, जिनमें बेहोशी से जुड़े जोखिम, पकड़ने के दौरान तनाव, लॉजिस्टिक जटिलताएँ, उच्च परिवहन लागत, सामाजिक समूहों को बनाए रखने की आवश्यकता, जल उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा भिन्न जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन शामिल हैं।

हिप्पोपोटामस एम्फीबियस

  • हिप्पोपोटामस एम्फीबियस उप-सहारा अफ्रीका का स्वदेशी एक विशाल, अर्द्ध-जलीय शाकाहारी जीव है (नर का वज़न 3000 किलोग्राम तक हो सकता है), जो अपने क्षेत्रीय एवं आक्रामक स्वभाव तथा तापमान नियंत्रण हेतु अधिकांश समय जल में रहने की प्रवृत्ति के लिये जाना जाता है।
  • यह दूसरा सबसे बड़ा स्थलीय जीव (हाथी के बाद) है तथा विशेष रूप से जलीय परिवेश में अत्यधिक क्षेत्रीय एवं आक्रामक स्वभाव प्रदर्शित करता है।
  • यह एक शाकाहारी जीव है, जो मुख्य रूप से घास पर निर्भर करता है और अपने शरीर के तापमान को संतुलित रखने के लिये दिन का अधिकांश समय जलमग्न रहते हुए व्यतीत करता है।
  • यह एक इकोसिस्टम इंजीनियर के रूप में कार्य करता है, जो अपशिष्ट के माध्यम से भूमि से जल में पोषक तत्त्वों का स्थानांतरण करता है। गैर-स्थानीय आवासों में इससे प्रायः सुपोषण (Eutrophication) तथा पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। 
  • आवास क्षरण एवं अवैध शिकार के कारण इसे IUCN रेड लिस्ट में सुभेद्य श्रेणी तथा CITES परिशिष्ट II में सूचीबद्ध किया गया है, जो इसके संरक्षण संबंधी चिंताओं को रेखांकित करता है।

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और पढ़ें: आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ


प्रारंभिक परीक्षा

वर्ष 1857 से पूर्व के विद्रोह

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स 

चर्चा में क्यों?

वर्ष 1857 के विद्रोह को परंपरागत रूप से "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" के रूप में मनाया जाता है, इससे पहले भी कई भीषण उपनिवेश-विरोधी विद्रोह हुए थे, जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) की बढ़ती हुई सत्ता को चुनौती दी थी।

वर्ष 1857 के विद्रोह से पहले हुए विभिन्न उपनिवेश-विरोधी आंदोलन कौन-कौन से थे?

नागरिक विद्रोह

विद्रोह का नाम 

कारण

मुख्य विवरण

संन्यासी-फकीर विद्रोह (1763–1800)

वर्ष 1770 के अकाल के बाद आर्थिक संकट और तीर्थयात्रियों पर लगे प्रतिबंध।

बंकिम चंद्र की रचना 'आनंदमठ' में हिंदुओं और मुसलमानों की समान भागीदारी का प्रमुखता से वर्णन किया गया था। अंततः वारेन हेस्टिंग्स ने इसे कुचल दिया था।

पोलिगर युद्ध (1795–1805)

ब्रिटिशों द्वारा कर्नाटक क्षेत्र के सैन्य सरदारों (पोलिगरों) से प्रत्यक्ष कर वसूलने के प्रयास।

वीरपांडिया कट्टाबोम्मन और शिवगंगा के मरुथु बंधुओं जैसे महान व्यक्तित्वों के नेतृत्व में, उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग किया और अंग्रेज़ों के खिलाफ  एकजुट विरोध का आह्वान करते हुए तिरुचिरापल्ली घोषणा (1801) प्रकाशित की।

वेलु थम्पी का विद्रोह (1808–1809)

सहायक संधि के वित्तीय बोझ और त्रावणकोर में ब्रिटिश मनमानी।

त्रावणकोर के दीवान (प्रधानमंत्री) वेलू थम्पी के नेतृत्व में, उन्होंने कुंदारा घोषणा (1809) जारी की, जिससे जनता को हथियार उठाने के लिये सफलतापूर्वक एकजुट किया गया।

पाइका विद्रोह (1817)

जबरन वसूली वाली भू-राजस्व नीतियाँ और ओडिशा के वंशानुगत मिलिशिया (पाइका) द्वारा धारित किराया-मुक्त भूमि का नुकसान।

बख्शी जगबंधु के नेतृत्व में, पाइका विद्रोहियों ने सशस्त्र संघर्ष किया, पुलिस स्टेशनों में आग लगा दी और ईस्ट इंडिया कंपनी के खज़ानों को लूटा, इससे पहले कि वर्ष 1818 में विद्रोह को दबा दिया गया।

जनजातीय विद्रोह

विद्रोह का नाम

कारण

मुख्य विवरण

चुआर विद्रोह (1766–1816)

मिदनापुर ज़िले में भूमि राजस्व की आक्रामक मांग और अकाल।

दुर्जन सिंह जैसे स्थानीय कबीलेवासियों और विस्थापित ज़मींदारों के नेतृत्व में, उन्होंने मुख्य रूप से गुरिल्ला युद्धनीति का प्रयोग किया।

कोल विद्रोह (1831–1832)

आदिवासी भूमि का बड़े पैमाने पर गैर-आदिवासी बाहरी लोगों (सिखों और मुसलमानों) को हस्तांतरण।

छोटानागपुर क्षेत्र में बूढ़ो भगत के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन को दबाने के लिये बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान की आवश्यकता पड़ी।

संथाल विद्रोह (हुल) (1855–1856)

स्थायी बंदोबस्त के तहत साहूकारों (महाजनों) और पूर्वी भारतीय आयोग द्वारा उत्पीड़न।

सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में हुए प्रयासों के परिणामस्वरूप संथाल परगना को एक अलग ज़िले के रूप में स्थापित किया गया।

खोंडो विद्रोह (1837–1856)

अंग्रेज़ों द्वारा मानव बलि (मेरिया) की प्रथा को दबाने के प्रयास ।

चक्र बिसोई के नेतृत्व में, जनजाति ने अपनी पारंपरिक सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं की रक्षा के लिये संघर्ष किया।

किसान और सामाजिक-धार्मिक आंदोलन

विद्रोह का नाम

कारण

मुख्य विवरण

पागल पंथी (1825–1835)

पूर्वी बंगाल में ज़मींदारों द्वारा किसानों का शोषण।

करम शाह द्वारा स्थापित, उनके पुत्र टीपू शाह ने क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर एक संक्षिप्त समानांतर प्रशासन स्थापित किया।

फरायजी विद्रोह  (1838–1857)

भू-राजस्व में परिवर्तन और ज़मींदारों के विरुद्ध काश्तकारों के अधिकारों की सुरक्षा।

हाजी शरीयतुल्लाह द्वारा स्थापित और बाद में उनके पुत्र दूदू मियाँ के नेतृत्व में चले इस आंदोलन ने EIC की भूमि नीतियों के विरुद्ध मुस्लिम किसानों को एकजुट किया।

वहाबी आंदोलन (1830–1860 के दशक)

शुद्ध इस्लाम की ओर लौटने और पश्चिमी/ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव का विरोध करने की इच्छा।

रायबरेली के सैयद अहमद द्वारा स्थापित, यह पूरे उत्तरी भारत में अंग्रेज़-विरोधी एक प्रमुख संगठित आंदोलन बन गया।

कूका आंदोलन (1840 के दशक से आगे)

पंजाब में ब्रिटिश प्रभाव के विरुद्ध सिख संप्रभुता की समाप्ति और धार्मिक सुधार।

भगत जवाहर मल द्वारा स्थापित, इसके अनुयायी हाथ से बुने हुए कपड़े पहनते थे और ब्रिटिश शिक्षा तथा कानूनों का बहिष्कार करते थे।

प्रारंभिक सैनिक विद्रोह

विद्रोह का नाम 

कारण

मुख्य विवरण

वेल्लोर विद्रोह(1806)

सख्त नए सैन्य ड्रेस कोड (जैसे कि जातिगत प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाना, दाढ़ी को छोटा करना और पगड़ी के स्थान पर गाय/सुअर की खाल से बनी एक नई गोल टोपी लगाना)। 

सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया, कई ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी और मैसूर के शासक (टीपू सुल्तान के बेटों) का झंडा फहरा दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना ने बड़ी बेरहमी से इस विद्रोह को कुचल दिया, जिसमें सैकड़ों सिपाही मारे गए।

बैरकपुर विद्रोह (1824)

प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध (1824–1826) के दौरान 47वीं नेटिव इन्फैंट्री ने समुद्र पार कर म्याँमार जाने से इनकार कर दिया था, क्योंकि समुद्र पार करना (काला पानी) उनके धार्मिक विश्वासों में वर्जित था।

विरोध कर रहे सिपाहियों पर अंग्रेज़ों द्वारा गोलीबारी किये जाने के बाद 47वीं नेटिव इन्फैंट्री को भंग कर दिया गया।

34वीं N.I. का विद्रोह (1844)

सिंध में सेवा के लिये भत्ते (विदेशी सेवा भत्ता) की वापसी को लेकर विवाद।

कई रेजिमेंटों ने सिंध जाने से इनकार कर दिया, जब तक कि उनकी वित्तीय शिकायतों का समाधान नहीं कर दिया जाता।


1857_Revolt

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' में 1857 से पहले के किस विद्रोह का प्रसिद्ध चित्रण किया गया है?
संन्यासी-फकीर विद्रोह (1763–1800)। इसने अंग्रेज़ों के कारण उत्पन्न आर्थिक संकट के विरुद्ध हिंदू-मुस्लिम एकता को उजागर किया।

2. तिरुचिरापल्ली घोषणा (1801) का क्या महत्त्व था?
पॉलिगार युद्धों के दौरान जारी की गई यह, दक्षिण भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध एकजुट प्रतिरोध की शुरुआती अपीलों में से एक थी।

3. किस विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों द्वारा एक अलग प्रशासनिक ज़िले का निर्माण किया गया?
1855–56 का संथाल विद्रोह (हुल), जिसका नेतृत्व सिधू और कान्हू ने किया था, के परिणामस्वरूप संथाल परगना को एक अलग ज़िले के रूप में बनाया गया।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 2. संथाल विद्रोह के शांत हो जाने के बाद, औपनिवेशिक शासन द्वारा कौन-सा/से उपाय किया/किये गए? (2018)

  1. 'संथाल परगना' नामक राज्यक्षेत्रों का सृजन किया गया।  
  2. किसी संथाल द्वारा गैर-संथाल को भूमि अंतरण करना गैर-कानूनी हो गया।

नीचे दिये गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से किसने 19वीं शताब्दी में भारत में जनजातीय विद्रोह के लिये एक सामान्य कारक प्रदान किया? (2011)

(a) भूमि राजस्व और आदिवासी उत्पादों पर कर लगाने की नई प्रणाली की शुरुआत

(b) आदिवासी क्षेत्रों में विदेशी धार्मिक मिशनरियों का प्रभाव

(c) आदिवासी क्षेत्रों में बिचौलियों के रूप में बड़ी संख्या में साहूकारों, व्यापारियों और राजस्व किसानों का उदय।

(d) आदिवासी समुदायों की पुरानी कृषि व्यवस्था का पूर्ण विघटन

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारत के इतिहास के संदर्भ में "उलगुलान" अथवा महान उपद्रव निम्नलिखित में से किस घटना का विवरण था? (2020)

(a) 1857 का विद्रोह

(b) 1921 का मापिला विद्रोह 

(c) 1859-60 के नील विद्रोह 

(d) 1899-1900 के बिरसा मुंडा का विद्रोह

उत्तर: (d)


रैपिड फायर

फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन

स्रोत:द हिंदू

फाइबर-ऑप्टिक-गाइडेड ड्रोन रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों में एक अत्यधिक विघटनकारी तकनीकी शक्ति के रूप में उभरे हैं, जो पारंपरिक रक्षा प्रणालियों को दरकिनार करते हुए आधुनिक मोर्चे की लड़ाई को पुन: परिभाषित कर रहे हैं।

  • कार्यप्रणाली एवं प्रौद्योगिकी: ये ड्रोन एक पतले फाइबर-ऑप्टिक स्पूल (जो 50 किमी. तक विस्तारित हो सकता है) का उपयोग करके संचालित होते हैं जो प्रकाश संकेतों के माध्यम से टेलीमेट्री और उच्च-बैंडविड्थ वीडियो प्रसारित करता है, इस प्रकार पारंपरिक वायरलेस रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) संचार का स्थान ले लिया जाता है।
  • रणनीतिक लाभ: RF ड्रोन के विपरीत, फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) जैमिंग और एंटी-ड्रोन आवृत्तियों से अप्रभावित रहते हैं, जिससे हमले के क्षण तक निर्बाध, वास्तविक समय नियंत्रण एवं उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी संभव हो पाती है।
    • ये हल्के फाइबरग्लास से बने होते हैं, जिससे इनका थर्मल और रडार सिग्नेचर न्यूनतम होता है।
  • वैश्विक तैनाती: रूस फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन, जिन्हें फर्स्ट-पर्सन व्यू (FPV) अटैक ड्रोन के नाम से भी जाना जाता है, तैनात करने वाला पहला देश था, जिसके चलते यूक्रेन ने भी इन्हें अपना लिया। हिज़्बुल्लाह भी इज़रायल की रक्षा प्रणालियों के खिलाफ इन ड्रोनों का सक्रिय रूप से उपयोग कर रहा है। 
  • परिचालन संबंधी सीमाएँ: चुनौतियों में फाइबर कनस्तर और पेलोड का वज़न शामिल है जो बैटरी के जीवनकाल को प्रभावित करता है एवं साथ ही तेज़ हवाओं या दुश्मन लड़ाकों द्वारा भौतिक केबल के टूटने की भेद्यता भी शामिल है। 
    • निर्माता वर्तमान में केवलर-युक्त सुरक्षात्मक कोटिंग्स का उपयोग करके इस समस्या को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।
  • उपाय: वर्तमान रक्षा प्रणालियाँ मुख्यतः भौतिक और बुनियादी हैं, जैसे धातु के पिंजरे और सुरक्षात्मक जाल (जिन्हें 'कोप केज' भी कहा जाता है)भविष्य के रक्षा अनुसंधान का मुख्य ध्यान अवरक्त या ध्वनिक सेंसरों का उपयोग करके प्रारंभिक पहचान एवं निर्देशित-ऊर्जा हथियारों (लेज़र) के माध्यम से ऑप्टिकल लाइनों को निष्क्रिय करने पर केंद्रित है ।
  • पर्यावरण पर प्रभाव: हल्के पॉलिमर ऑप्टिकल फाइबर के व्यापक उपयोग से गंभीर 'युद्ध जनित प्रदूषण' उत्पन्न हो रहा है। 
    • विस्फोटों और आग के कारण इन केबलों के क्षरण से सूक्ष्म प्लास्टिक तथा विषैले पदार्थ मृदा, हवा एवं जल में फैल जाते हैं, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिक खतरें उत्पन्न होते है।

और पढ़ें: अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष में हथियार


रैपिड फायर

मिशन दृष्टि: विश्व का पहला ऑप्टोसार उपग्रह

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

गैलेक्स आई नामक भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप ने स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट पर अपना पहला उपग्रह 'मिशन दृष्टि' सफलतापूर्वक लॉन्च किया, जो एक साथ आने वाले बहु-सेंसर भू-अवलोकन में एक वैश्विक उपलब्धि है। 190 किलोग्राम वज़नी मिशन दृष्टि, भारत का अब तक का सबसे बड़ा निजी तौर पर विकसित भू-अवलोकन उपग्रह है।

  • ऑप्टो-सार तकनीक: दृष्टि विश्व का पहला उपग्रह है जिसे एक ही स्थान की ऑप्टिकल (मल्टी-स्पेक्ट्रल) और सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) दोनों प्रकार की छवियों को एक ही समय में कैप्चर करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • ट्रॉपिकल क्लाउड कवर समस्या का समाधान: पारंपरिक ऑप्टिकल उपग्रह बादलों या रात के समय के माध्यम से नहीं देख सकते हैं, जो भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों के लिये एक बड़ा मुद्दा है; दृष्टि के SAR सेंसर बादलों में प्रवेश करते हैं जबकि ऑप्टिकल सेंसर सहज स्पष्टता प्रदान करते हैं, जो सभी मौसम, दिन-रात इमेजिंग प्रदान करते हैं।
    • जब बादल दृश्य को अवरुद्ध करते हैं, तो उपग्रह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को नियोजित करता है ताकि SAR डेटा से ऑप्टिकल जैसी छवियों को पुनर्जीवित किया जा सके, जिससे जानकारी गैर-विशेषज्ञों के लिये सुलभ हो जाती है।
  • एक साथ तुल्यकालन: उपग्रह एक स्वामित्व प्रौद्योगिकी स्टैक का उपयोग करता है जो ऑप्टिकल और SAR सेंसर को सिंक्रनाइज़ करता है, जो आमतौर पर अलग-अलग कोणों से छवियों को कैप्चर करते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि डेटा फ्यूजन तुरंत होता है, बिना अलग-अलग डेटासेट के मैन्युअल संरेखण की आवश्यकता के, जो दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण नवाचार है।
  • रणनीतिक उपयोगिता: यह सीमा निगरानी, रक्षा, आपदा प्रतिक्रिया, कृषि, बुनियादी ढाँचे की योजना और बीमा मूल्यांकन का समर्थन करता है, क्योंकि रडार इमेजिंग बाढ़, चक्रवात या भूस्खलन के दौरान क्लाउड कवर को बायपास करता है।
  • निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र: यह लॉन्च भारत के बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को मज़बूत करता है, जो अग्निकुल कॉसमॉस (3D-प्रिंटेड इंजन) और स्काईरूट (निजी तौर पर निर्मित रॉकेट) जैसे अग्रदूतों के साथ जुड़ता है।

और पढ़ें: भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग का उदय


रैपिड फायर

हंतावायरस प्रकोप

स्रोत: द हिंदू 

दुर्लभ हंतावायरस के संदिग्ध प्रकोप के कारण डच क्रूज़ जहाज़ MV होंडियस पर सवार लगभग 150 लोग केप वर्डे (पश्चिम अफ्रीका का एक द्वीपीय देश) के तट के निकट फँस गए हैं।

  • रोग की प्रकृति: हंतावायरस वायरसों का एक समूह है, जो गंभीर बीमारियाँ उत्पन्न करता है, मुख्यतः हंतावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (HPS) जो तीव्र श्वसन संकट (acute respiratory distress) से चिह्नित है तथा हेमरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (HFRS) जो आंतरिक रक्तस्राव और गुर्दा विफलता से चिह्नित है।
  • वाहक एवं संचरण: यह एक जूनोटिक रोग है, जो विशिष्ट कृंतकों जैसे डियर माइस, व्हाइट-फुटेड माइस तथा कॉटन रैट्स द्वारा वहन किया जाता है।
    • मनुष्यों में यह वायरस मुख्यतः एरोसोलाइज़ेशन के माध्यम से फैलता है अर्थात संक्रमित कृंतकों के अपशिष्ट (मूत्र, मल या लार) से उत्पन्न वायुजनित वायरल कणों को साँस के साथ ग्रहण करने पर। यह संक्रमण प्रायः झाडू लगाने या सफाई जैसे कार्यों के दौरान होता है, जब संक्रमित अपशिष्ट विचलित हो जाते हैं।
    • इस वायरस की पहचान PCR परीक्षण के माध्यम से की जाती है, जैसा कि कोविड जैसे वायरसों के निदान में उपयोग किया जाता है।
  • लक्षण एवं रोग की प्रगति: संक्रमण प्रारंभ में 1 से 8 सप्ताह की ऊष्मायन अवधि के भीतर फ्लू-सदृश लक्षणों, जैसे बुखार, मांसपेशियों में दर्द तथा थकान, के रूप में प्रकट होता है।
    • इसके बाद यह तीव्रता से गंभीर श्वसन अवस्था में परिवर्तित हो सकता है, जिसमें साँस लेने में कठिनाई एवं सीने में जकड़न जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। समय पर उपचार न मिलने पर यह घातक सिद्ध हो सकता है।
    • वैश्विक स्तर पर हंतावायरस से प्रतिवर्ष अनुमानतः 1.5-2 लाख मामले सामने आते हैं। यह कोविड-19 एवं इन्फ्लुएंज़ा जैसे वायुजनित रोगों की तुलना में कम संक्रामक है, क्योंकि सामान्यतः यह व्यक्ति-से-व्यक्ति नहीं फैलता।
      • हालाँकि एंडीज़ वायरस जो हंतावायरस का एक विशिष्ट प्रकार है और अर्जेंटीना तथा चिली में स्थानिक है; में दुर्लभ परिस्थितियों में व्यक्ति-से-व्यक्ति संचरण के मामले भी देखे गए हैं।
  • उच्च जोखिम वाले समूह: ऐसे व्यक्ति जो कृंतक-प्रवण वातावरण में रहते या कार्य करते हैं, जैसे किसान, निर्माण श्रमिक एवं कैंपिंग करने वाले लोग, संक्रमण के उच्च जोखिम में होते हैं।
    • इसके अतिरिक्त, पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ तथा कमज़ोर प्रतिरक्षा तंत्र (Immunocompromised) वाले व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और उन्हें कृंतकों के संपर्क या उन्हें सँभालने से बचना चाहिये।
  • उपचार प्रोटोकॉल: वर्तमान में हंतावायरस के लिये कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार, पूर्ण उपचार या टीका उपलब्ध नहीं है।
    • चिकित्सीय प्रबंधन: उपचार पूरी तरह से सहायक होता है, जिसमें लक्षणों का प्रबंधन किया जाता है। विशेष रूप से गंभीर अवस्था में फेफड़ों की कार्यक्षमता बनाए रखने हेतु ऑक्सीजन थेरेपी तथा मैकेनिकल वेंटिलेशन का उपयोग किया जाता है।
  • रोकथाम (Prevention): चूँकि इसका कोई चिकित्सीय उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिये रोकथाम पूरी तरह से सक्रिय कृंतक नियंत्रण तथा मानव आवासों में संक्रमण रोकने हेतु कठोर स्वच्छता प्रोटोकॉल के पालन पर निर्भर करती है।

और पढ़ें:  हंतावायरस


रैपिड फायर

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ब्रेन डेथ के एपनिया परीक्षण की समीक्षा

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ब्रेन डेथ का निर्धारण करने में एपनिया परीक्षण की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली याचिका की जाँच करने पर सहमति व्यक्त की और एक विशेषज्ञ समीक्षा का निर्देश दिया।

  • ब्रेन डेथ अथवा मस्तिष्क स्टेम मृत्यु, एक ऐसी अपरिवर्तनीय स्थिति है जिसमें साँस लेने जैसी आवश्यक क्रियाओं सहित मस्तिष्क की सभी गतिविधियाँ बंद हो जाती हैं। यद्यपि रोगी वेंटिलेटर जैसे जीवन रक्षक उपकरण पर रहता है और साँस लेता रहता है, फिर भी वह प्रभावी रूप से मृत होता है और उसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।
  • जीवन रक्षक यंत्रों पर होने के बावजूद, ब्रेन डेथ की अवस्था में मौजूद मरीज़ हृदय और फेफड़े जैसे अंगों का दान कर सकते हैं, जिनका दान जीवित व्यक्ति नहीं कर सकते, जिससे वे अंग प्रत्यारोपण के लिये उपयुक्त उम्मीदवार बन जाते हैं।
  • नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) के मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुसार, अस्पताल प्रभारी, एक न्यूरोलॉजिस्ट या न्यूरोसर्जन और इलाज करने वाले चिकित्सक सहित चार सदस्यीय बोर्ड को कम-से-कम दो बार 12 घंटे के अंतराल पर यह पुष्टि करनी होगी कि रोगी के मस्तिष्क का कार्य अपरिवर्तनीय रूप से बंद हो गया है।

एपनिया परीक्षण

  • परिचय: एपनिया परीक्षण का उपयोग ऑक्सीजन की आपूर्ति बनाए रखते हुए लेकिन वेंटिलेशन बंद होने पर सहज श्वास संबंधी जाँच करके ब्रेनस्टेम के कार्य का आकलन करने के लिये किया जाता है।
  • उपयोग: इसका उपयोग आमतौर पर गहन चिकित्सा इकाइयों (intensive care units-ICU) में ब्रेन डेथ प्रमाणन प्रोटोकॉल के हिस्से के रूप में किया जाता है।
  • चिंताएँ: विशेषज्ञों का तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों (जैसे- विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश) के अनुसार, एपनिया परीक्षण का उपयोग केवल पुष्टिकरण परीक्षण के रूप में किया जाना चाहिये, न कि एकमात्र मानदंड के रूप में। यह परीक्षण मस्तिष्क में रक्त प्रवाह को कम कर सकता है, जिससे ब्रेन डेथ हो सकती है या ब्रेन डेथ का कारण बन सकती है।
  • वैकल्पिक परीक्षण: विशेषज्ञों का सुझाव है कि अधिक सटीकता के लिये ब्रेन डेथ का निर्धारण इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (EEG), फोर-वेसल सेरेब्रल एंजियोग्राफी, रेडियोन्यूक्लाइड एंजियोग्राफी या कंप्यूटेड टोमोग्राफी एंजियोग्राफी जैसे पूरक परीक्षणों पर आधारित होना चाहिये।
  • महत्त्व: नैतिक अंग प्रत्यारोपण और जीवन के अंतिम चरण के चिकित्सा निर्णयों के लिये ब्रेन डेथ का सटीक निर्धारण महत्त्वपूर्ण है।

और पढ़ें: न्यूरालिंक द्वारा मानव मस्तिष्क प्रत्यारोपण


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