प्रारंभिक परीक्षा
सांता मार्टा जलवायु सम्मेलन
चर्चा में क्यों?
वैश्विक GDP के लगभग 50% का प्रतिनिधित्व करने वाले 50 से अधिक देशों के प्रतिनिधि, जीवाश्म ईंधनों से दूर संक्रमण पर आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने हेतु सांता मार्टा, कोलंबिया में एकत्र हुए।
- यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के पक्षकार सम्मेलन (CoP) की धीमी तथा सर्वसम्मति-आधारित वार्ताओं के प्रति बढ़ती निराशा के परिणामस्वरूप आयोजित किया गया, क्योंकि ये वार्ताएँ प्रायः जीवाश्म ईंधनों की चरणबद्ध समाप्ति के मुद्दे पर गतिरोध की स्थिति में बनी रही हैं।
सांता मार्टा जलवायु सम्मेलन क्या है?
- पृष्ठभूमि: जीवाश्म ईंधनों से दूर संक्रमण पर आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की सह-मेज़बानी कोलंबिया और नीदरलैंड्स द्वारा की गई।
- इसे ऐसे कोलिशन ऑफ द विलिंग/इच्छुक देशों का गठबंधन के लिये एक ‘सुरक्षित मंच’ के रूप में परिकल्पित किया गया, जो पारंपरिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलनों के राजनीतिक गतिरोधों से आगे बढ़ते हुए जीवाश्म ईंधनों की चरणबद्ध समाप्ति हेतु निर्णायक कार्रवाई करने के लिये तैयार हैं।
- उद्देश्य: जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को समाप्त करने तथा नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों की ओर संक्रमण के लिये व्यावहारिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रोडमैप विकसित करना, साथ ही व्यापार एवं वित्तीय नीतियों को हरित संक्रमण के अनुरूप बनाना।
- सम्मेलन की प्रमुख विशेषताएँ: आपूर्ति-पक्षीय शासन संबंधी कमियों को दूर करने हेतु, विशेषकर लघु द्वीपीय विकासशील राज्यों (SIDS) की ओर से, जीवाश्म ईंधन अप्रसार संधि के समर्थन में गति बढ़ती हुई देखी गई।
- प्रतिभागियों ने हरित संक्रमण लक्ष्यों के अनुरूप व्यापार, वित्त तथा कार्बन मूल्य निर्धारण को संरेखित करने पर बल दिया, जिसमें जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना भी शामिल है। साथ ही, विकासशील देशों को ज़ीरो-कार्बन मार्ग की ओर न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करने हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया गया।
- फ्राँस ने यूरोप का पहला ईंधन-वार जीवाश्म ईंधन निष्क्रमण रोडमैप प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार कोयले का उपयोग वर्ष 2030 तक, तेल का वर्ष 2045 तक तथा गैस का वर्ष 2050 तक समाप्त कर दिया जाएगा।
- सीमाएँ:
- शीर्ष उत्सर्जकों की अनुपस्थिति: इस सम्मेलन की सबसे बड़ी सीमा यह रही कि विश्व के तीन प्रमुख ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जक अमेरिका, चीन और भारत सांता मार्टा बैठक में प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे।
- सार्वभौमिक बाध्यकारी प्राधिकार का अभाव: चूँकि यह UNFCCC के बाहर कार्यरत एक ‘इच्छुक देशों का गठबंधन’ है, इसलिये इसके निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से ऐसे नए अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे या तंत्र को अनिवार्य नहीं बनाते, जो वैश्विक स्तर पर लागू हों।
- वित्तीय चुनौती: यद्यपि कई प्रतिबद्धताएँ की गईं, किंतु अपेक्षाकृत गरीब देशों में बड़े आर्थिक परिवर्तन को समर्थन देने हेतु आवश्यक वित्तीय तंत्रों का वास्तविक विकास अब भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।
- अगला कदम: सहभागी देशों ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। इसके अंतर्गत दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन वर्ष 2027 की शुरुआत में तुवालु (प्रशांत महासागर स्थित द्वीपसमूह देश) में आयोजित किया जाएगा, जिसकी सह-मेज़बानी आयरलैंड द्वारा की जाएगी।
UNFCCC का पक्षकार सम्मेलन (COP)
- परिचय: COP, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) का सर्वोच्च निर्णय-निर्माण निकाय है। इसके सदस्य देश प्रतिवर्ष बैठक कर जलवायु प्रगति की समीक्षा करते हैं, समझौतों पर वार्ता करते हैं तथा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC) जैसी प्रतिबद्धताओं को अद्यतन करते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) को वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में जलवायु प्रणाली में मानवजनित जोखिमपूर्ण हस्तक्षेप को रोकने के उद्देश्य से अपनाया गया था। बाद में इसे क्योटो प्रोटोकॉल (1997) तथा पेरिस समझौते (2015) के माध्यम से और सुदृढ़ किया गया।
- COP-1 का आयोजन वर्ष 1995 में बर्लिन में हुआ था और COP-30 (2025) तक इसमें 198 देशों की भागीदारी हो चुकी है, जिससे यह संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत सबसे बड़े बहुपक्षीय मंचों में से एक बन गया है।
- COP को कार्यान्वयन हेतु सहायक निकाय (SBI) तथा वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय सलाह हेतु सहायक निकाय (SBSTA) का समर्थन प्राप्त है।
- COP, क्योटो प्रोटोकॉल के लिये CMP तथा पेरिस समझौते के लिये CMA के रूप में भी कार्य करता है।
- क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकारों की बैठक के रूप में कार्यरत पक्षकार सम्मेलन (CMP), क्योटो प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
- पेरिस समझौते के पक्षकारों की बैठक के रूप में कार्यरत पक्षकार सम्मेलन (CMA), पेरिस समझौते के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
- COP की मेज़बानी: COP बैठकों का आयोजन संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित पाँच भौगोलिक क्षेत्रों अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियन तथा पश्चिमी यूरोप एवं अन्य के बीच रोटेशन के आधार पर किया जाता है।
- देश स्वेच्छा से मेज़बानी के लिये प्रस्ताव रखते हैं और यदि एक से अधिक उम्मीदवार सामने आते हैं, तो संबंधित क्षेत्र सर्वसम्मति से एक देश का चयन करता है।
- तुर्की COP-31 (नवंबर 2026) की मेज़बानी करेगा, जबकि इथियोपिया वर्ष 2027 में अदीस अबाबा में COP-32 का आयोजन करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सांता मार्टा जलवायु सम्मेलन क्या है?
यह UNFCCC प्रक्रिया से बाहर जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने हेतु कार्रवाई योग्य रोडमैप विकसित करने वाली "इच्छुक देशों की गठबंधन" की अंतर्राष्ट्रीय पहल है।
2. यह धीमी, आम सहमति आधारित सीओपी वार्ताओं से उत्पन्न हताशा के कारण है, जिन्होंने जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध समाप्ति पर सहमति बनाने में कठिनाई का सामना किया है।
3. जीवाश्म ईंधन गैर-प्रसार संधि प्रस्ताव क्या है?
यह जीवाश्म ईंधन आपूर्ति को सीमित करने और वैश्विक जलवायु शासन में कमियों को दूर करने के लिये बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं की मांग करता है।
4. सांता मार्टा सम्मेलन की एक प्रमुख सीमा क्या है?
अमेरिका, चीन और भारत जैसे प्रमुख उत्सर्जकों की अनुपस्थिति इसकी वैश्विक प्रभावशीलता एवं प्रभाव को कम कर देती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. "मोमेंटम फॉर चेंज: क्लाइमेट न्यूट्रल नाउ" यह पहल किसके द्वारा प्रवर्तित की गई है? (2018)
(a) जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल
(b) UNEP सचिवालय
(c) UNFCCC सचिवालय
(d) विश्व मौसमविज्ञान संगठन
उत्तर: (c)
प्रारंभिक परीक्षा
भारत के श्रमिक आंदोलनों का विकास
चर्चा में क्यों?
भारतीय श्रमिक आंदोलनों का इतिहास औपनिवेशिक "आपराधिक साजिश" के आरोपों से लेकर संवैधानिक संरक्षणों तक के संक्रमण की एक गाथा है, जो वर्तमान में औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नवीन चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भारत में श्रमिक आंदोलन किस प्रकार विकसित हुए हैं?
- प्रारंभिक काल (1850–1900): औद्योगीकरण (सूती और जूट मिलों) के इस प्रारंभिक चरण के दौरान, कोई औपचारिक संघ नहीं थे। यह आंदोलन काफी हद तक परोपकारी थे, जिसका नेतृत्व समाज सुधारकों द्वारा किया जाता था।
- प्रथम आंदोलन: वर्ष 1875 में, एस.एस. बंगाली ने बंबई में कारखानों में महिलाओं और बच्चों की खराब स्थितियों को उजागर करने के लिये एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
- पहला श्रम संघ: एन.एम. लोखंडे को भारतीय श्रम आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने बंबई मिल-हैंड्स एसोसिएशन (1890) की स्थापना की। हालाँकि यह एक आधुनिक ट्रेड यूनियन की तुलना में अधिक एक कल्याणकारी समूह था।
- विधायी मील का पत्थर: कारखाना अधिनियम, 1881 पारित किया गया, जिसने बाल श्रम और काम के घंटों को विनियमित किया।
- विकास और आधुनिक संघवाद (1900–1947): प्रथम विश्व युद्ध के आस-पास की अवधि ने आंदोलन को कल्याण-उन्मुख संघों से संगठित राजनीतिक निकायों में बदल दिया।
- पहला आधुनिक संघ: मद्रास लेबर यूनियन (1918), जिसकी स्थापना बी.पी. वाडिया ने की थी, भारत का पहला व्यवस्थित ट्रेड यूनियन माना जाता है।
- AITUC का गठन (1920): ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का गठन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये किया गया था। लाला लाजपत राय इसके पहले अध्यक्ष थे।
- वर्ष 1921 में, बकिंघम और कर्नाटक मिल्स मामले ने कानूनी संरक्षण की कमी को उजागर किया, क्योंकि संघ के नेताओं को श्रमिकों को संगठित करने के लिये दंडित किया गया था, जो सामान्य कानून के तहत संघों को साजिश के रूप में मानता था।
- इसके बाद एन. एम. जोशी ने कानूनी सुरक्षा उपायों का समर्थन किया, जिससे विधायी प्रावधानों के लिये निरंतर दबाव बना।
- कानूनी मान्यता: श्रमिक संघ अधिनियम, 1926 एक निर्णायक उपलब्धि साबित हुआ, जिसने यूनियनों को विधिक मान्यता दी और उनके सदस्यों को दीवानी मुकदमों तथा आपराधिक अभियोजन से सुरक्षा प्रदान की।
- वैधीकरण के बावजूद, औपनिवेशिक अधिकारियों ने मेरठ षडयंत्र केस (1929-1933) जैसे कदमों और व्यापार विवाद अधिनियम, 1929 तथा सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, 1928 जैसे प्रतिबंधात्मक कानूनों के माध्यम से दमनकारी नीतियाँ लागू कीं।
- इससे श्रम अधिकारों के “कानूनी प्रावधान” और “व्यावहारिक वास्तविकता” के बीच विरोधाभास उत्पन्न हो गया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका: श्रमिक आंदोलन राष्ट्रीय संघर्ष से घनिष्ठ रूप से जुड़ गया, जहाँ लाला लाजपत राय और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने श्रमिकों के संगठित होने एवं उनकी सक्रिय भागीदारी का समर्थन किया।
- श्रमिक संघों में वैचारिक आधार (कम्युनिस्ट बनाम राष्ट्रवादी) पर विभाजन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर (IFL) जैसे समूहों का गठन हुआ। इसकी स्थापना वर्ष 1941 में एम.एन. रॉय द्वारा की गई थी, जब वे द्वितीय विश्व युद्ध के संबंध में वैचारिक मतभेदों के कारण AITUC से अलग हो गए थे।
- स्वतंत्रता के बाद (1947–1991): आज़ादी के पश्चात श्रमिक आंदोलन राजनीतिक दलों से जुड़ाव के आधार पर गहराई से विखंडित हो गया। इस दौरान प्रमुख श्रमिक महासंघों का गठन हुआ, जैसे:
- भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) (1947): इसकी स्थापना कांग्रेस पार्टी द्वारा श्रमिक आंदोलन में कम्युनिस्ट (साम्यवादी) प्रभाव का मुकाबला करने के लिये की गई थी।
- हिंद मज़दूर सभा (HMS) (1948): इसकी स्थापना अशोक मेहता, टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता जैसे समाजवादियों द्वारा की गई थी।
- भारतीय मज़दूर संघ (BMS) (1955): इसकी स्थापना आर.एस.एस. (RSS) द्वारा की गई थी और वर्तमान में यह भारत का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है।
- सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) (1970): इसका गठन CPI(M) द्वारा AITUC से अलग होकर (विभाजन के परिणामस्वरूप) किया गया था।
- उदारीकरण के बाद का दौर (1991–वर्तमान): आउटसोर्सिंग और ठेका प्रणाली में वृद्धि ने औपचारिक क्षेत्र में पारंपरिक ट्रेड यूनियनों की शक्ति को कमज़ोर किया है। मार्च 2026 तक भारत (श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय) में 12 मान्यता प्राप्त केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन हैं।
- हाल के वर्षों में सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर 4 श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया है- वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता (2020)।
- व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ावा देने के उद्देश्य के बावजूद, श्रमिक संघों ने हड़ताल के अधिकारों और सामूहिक सौदेबाज़ी में कमी आने पर चिंता व्यक्त की है। उदाहरणतः जहाँ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 में उन्मुक्ति संबंधी प्रावधानों को बनाए रखा गया है, वहीं यह संघ की मान्यता के लिये 51% समर्थन की उच्च सीमा तथा हड़ताल हेतु 60 दिनों की नोटिस अवधि का प्रावधान भी प्रस्तुत करता है।
- वर्ष 2030 तक अनुमानित 2.35 करोड़ प्लेटफॉर्म श्रमिकों की उपस्थिति के बावजूद, नया कोड गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों के संबंध में मौन है। इन्हें ‘स्वतंत्र संविदाकार’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके कारण इन्हें औपचारिक सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
- हाल के वर्षों में सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर 4 श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया है- वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता (2020)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारतीय श्रम आंदोलन का जनक किसे माना जाता है?
एन. एम. लोखंडे को भारतीय श्रम आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने वर्ष 1890 में बॉम्बे मिल-हैंड्स एसोसिएशन की स्थापना की तथा कारखाना अधिनियम, 1881 और साप्ताहिक अवकाश के लिये सफल अभियान चलाया।
2. भारत के प्रथम आधुनिक ट्रेड यूनियन की स्थापना किसने की?
बी. पी. वाडिया ने वर्ष 1918 में मद्रास लेबर यूनियन की स्थापना की, जिसे नियमित सदस्यता एवं राहत कोष के साथ भारत का प्रथम व्यवस्थित आधुनिक ट्रेड यूनियन माना जाता है।
3. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 का कानूनी महत्त्व क्या था?
इस अधिनियम ने पंजीकृत ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता प्रदान की तथा वैध सामूहिक सौदेबाज़ी गतिविधियों के लिये पदाधिकारियों को IPC की धारा 120B के अंतर्गत आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों से संरक्षण दिया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में कौन एक, उन फैक्टरियों में जिनमें कामगार नियुक्त हैं, औद्योगिक विवादों, समापनों, छँटनी और कामबंदी के विषय में सूचनाओं को संकलित करता है? (2022)
(a) केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय
(b) उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग
(c) श्रम ब्यूरो
(d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली
उत्तर:(c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन 1948 में स्थापित ‘हिंद मज़दूर सभा’ के संस्थापक थे? (2018)
(a) बी. कृष्ण पिल्लई, ई.एम.एस. नम्बूदिरिपाद और के.सी. जॉर्ज
(b) जयप्रकाश नारायण, दीन दयाल उपाध्याय और एम.एन. रॉय
(c) सी.पी. रामास्वामी अय्यर, के. कामराज और वीरेशलिंगम पंतुलु
(d) अशोक मेहता, टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता
उत्तर: (d)
रैपिड फायर
सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम
संचार मंत्रालय ने स्वदेशी सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (CBS) लॉन्च किया है। इसकी क्षमता के प्रथम बड़े पैमाने पर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन के माध्यम से भारत के आपदा प्रबंधन ढाँचे को प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय दृष्टिकोण की ओर अग्रसर करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- यह प्रणाली पहले ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में आपदा स्थितियों तथा चारधाम यात्रा जैसे आयोजनों के दौरान उपयोग में लाई जा चुकी है।
- CBS का परिचय: सेल ब्रॉडकास्ट एक ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से किसी निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र के अंतर्गत अनेक मोबाइल फोन पर एक साथ संक्षिप्त संदेश भेजे जाते हैं। इसका विकास 1990 के दशक के प्रारंभ में यूरोपीय दूरसंचार मानक संस्थान द्वारा किया गया था। इसे वैश्विक आपदा न्यूनीकरण मानक बनने से पूर्व पहली बार वर्ष 1997 में पेरिस में प्रदर्शित किया गया था।
- वर्तमान में भारत एक SMS-आधारित अलर्ट प्रणाली का उपयोग कर रहा है, जो सभी 36 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में संचालित है।
- मुख्य कार्य: यह कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (CAP) आधारित सचेत (SACHET) प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत है, जिससे व्यक्तिगत मोबाइल नंबरों या इंटरनेट कनेक्टिविटी की आवश्यकता के बिना मोबाइल उपकरणों पर अलर्ट भेजे जा सकते हैं।
- SACHET भारत की एक एकीकृत चेतावनी प्रणाली (जिसे राष्ट्रीय आपदा अलर्ट प्लेटफॉर्म भी कहा जाता है) है, जिसे आपदाओं और आपात स्थितियों (जैसे- फ्लैश फ्लड, सुनामी या गैस रिसाव) के बारे में वास्तविक समय में चेतावनी प्रसारित करने के लिये विकसित किया गया है।
- स्वदेशी विकास: इसे दूरसंचार विभाग (DoT) के अधीन सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DOT) द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और गृह मंत्रालय (MHA) के साथ साझेदारी में स्वदेशी रूप से विकसित किया गया था।
- अविस्मरणीय अलर्ट: संदेश साइलेंट/डू-नॉट-डिस्टर्ब मोड को भी ओवरराइड करते हैं, इनमें सायरन, कंपन (वाइब्रेशन) और पॉप-अप संदेश शामिल होते हैं तथा ये कई भाषाओं (अंग्रेज़ी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं) में उपलब्ध होते हैं।
- SMS पर तकनीकी श्रेष्ठता: पारंपरिक SMS के विपरीत, सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (CBS) एक 'वन-टू-मेनी' (एक-से-कई) ब्रॉडकास्ट सिस्टम है। यह बिना फोन नंबर, उपयोगकर्त्ता पंजीकरण, ऐप या सब्सक्रिप्शन की आवश्यकता के, कुछ ही सेकंड के भीतर लाखों उपकरणों पर एक साथ भौगोलिक रूप से लक्षित अलर्ट भेजता है।
- यह नेटवर्क भीड़ से प्रभावित नहीं होता, 2G से 5G तक सभी नेटवर्क पर कार्य करता है, रोमिंग उपयोगकर्त्ताओं और अंतिम छोर की आबादी तक कवरेज सुनिश्चित करता है तथा किसी भी व्यक्तिगत डेटा का उपयोग नहीं करता।
- राष्ट्रीय एवं वैश्विक प्रभाव: यह “सतर्क नागरिक, सुरक्षित राष्ट्र” के लक्ष्य का समर्थन करते हुए भारत की प्रारंभिक चेतावनी क्षमता को मज़बूत करता है।
- सी-डॉट (C-DOT) ने मॉरीशस, कंबोडिया, अल साल्वाडोर और श्रीलंका जैसे देशों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (CBS) का सफल प्रदर्शन किया है। यह संयुक्त राष्ट्र की 'सभी के लिये प्रारंभिक चेतावनी' पहल के अनुरूप है।
- भारत इस तकनीक को लागू करने वाले 30 से अधिक देशों में शामिल हो गया है, जिनमें जापान (J-Alert, 2007 में पहला अपनाने वाला देश) और अमेरिका भी शामिल हैं।
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और पढ़ें: आपातकालीन चेतावनी प्रणाली |
रैपिड फायर
प्रवर्तन निदेशालय के 70 वर्ष
प्रवर्तन निदेशालय (ED), जो 1 मई 1956 को स्थापित हुआ, ने 1 मई, 2026 को अपने 70 वर्ष पूरे किये।
प्रवर्तन निदेशालय
- परिचय: प्रवर्तन निदेशालय (ED) भारत की एक प्रमुख वित्तीय जाँच एजेंसी है। यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन कार्य करता है और इसका प्राथमिक कार्य आर्थिक कानूनों को लागू करना और वित्तीय अपराधों से बचना है।
- यह एक कार्यकारी निकाय (गैर-वैधानिक और गैर-संवैधानिक) है जिसका क्षेत्राधिकार संपूर्ण भारत में है। यह मुख्य रूप से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) और फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करता है, साथ ही फ्यूज़िटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट, 2018 जैसे पूरक कानून भी।
- प्रमुख अधिदेश (कोर मैंडेट्स): प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (PMLA) के तहत ईडी को "अपराध की आय" (proceeds of crime) की जाँच करने, अवैध गतिविधियों से प्राप्त मानी जाने वाली संपत्ति को कुर्क और ज़ब्त करने का अधिकार है।
- फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट, 1999 (FEMA) के तहत: ईडी विदेशी मुद्रा कानूनों और विनियमों के उल्लंघन, जैसे अवैध विदेशी मुद्रा लेन-देन, हवाला आदि की जाँच करता है।
- भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (FEOA) के तहत: ED उन आर्थिक अपराधियों (जैसे- हाई-प्रोफाइल ऋण चूककर्त्ता) की संपत्ति ज़ब्त कर सकता है जो अभियोजन से बचने के लिये देश छोड़ गए हैं।
- संगठनात्मक संरचना: ED का नेतृत्व एक निदेशक करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। ED के 10 क्षेत्रीय कार्यालय (जैसे- चेन्नई, कोलकाता, चंडीगढ़ आदि) हैं, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक उप निदेशक (Deputy Director) करता है और 11 उप-क्षेत्रीय कार्यालय (जैसे- जयपुर, जालंधर, श्रीनगर आदि) हैं, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक सहायक निदेशक करता है।
- अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा (IRS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और एजेंसी के अपने कैडर से लिये जाते हैं।
ED बनाम CBI:
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विशेषता |
प्रवर्तन निदेशालय (ED) |
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) |
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केंद्र |
वित्तीय अपराध (मनी लॉन्ड्रिंग/विदेशी मुद्रा) |
भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराध, विशेष अपराध |
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संबंधित मंत्रालय |
वित्त मंत्रालय |
कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय |
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प्राथमिक कानून |
PMLA और FEMA |
दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 |
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कुर्की करने की शक्ति |
जाँच के दौरान संपत्ति ज़ब्त की जा सकती है |
कुर्की के लिये आमतौर पर न्यायालय के आदेश की आवश्यकता होती है। |
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और पढ़ें: प्रवर्तन निदेशालय |
चर्चित स्थान
कान्हा टाइगर रिज़र्व में बाघों की मौत
कान्हा टाइगर रिज़र्व में एक बाघिन और उसके चार शावकों की मृत्यु हो गई है, वन्यजीव अधिकारियों को इसका कारण कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) का घातक प्रकोप गया है, जो फेफड़ों के संक्रमण से जुड़ा हुआ है।
- कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) एक संक्रामक वायरल रोग है जो मांसाहारी जानवरों को प्रभावित करता है। यह श्वसन, जठरांत्र और तंत्रिका संबंधी लक्षण उत्पन्न करता है। यह वायरस प्रत्यक्ष संपर्क या दूषित पदार्थों के माध्यम से फैलता है और अक्सर घरेलू कुत्तों या आवारा कुत्तों से वन्यजीवों में स्थानांतरित हो जाता है।
कान्हा टाइगर रिज़र्व
- कान्हा टाइगर रिज़र्व मध्य प्रदेश में स्थित है और यह भारत के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में से एक है। इसे वर्ष 1955 में एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में स्थापित किया गया था और वर्ष 1973 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किया गया था।
- यह सतपुड़ा पहाड़ियों की मैकल श्रेणी में स्थित है और मध्य भारतीय उच्च भूमि का एक हिस्सा है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिये जाना जाता है।
- इस रिज़र्व में पेंच टाइगर रिज़र्व और अचानकमार टाइगर रिज़र्व से जोड़ने वाले महत्त्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे हैं, जो परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण का समर्थन करते हैं।
- यह बाघ, तेंदुआ, बारहसिंघा (हार्ड-ग्राउंड दलदली हिरण), सुस्त भालू और जंगली कुत्तों जैसी प्रमुख प्रजातियों का घर है। यह रिज़र्व बारहसिंघा के सफल संरक्षण के लिये जाना जाता है, जो कभी विलुप्त होने के कगार पर था।
- यहाँ की वनस्पति में साल के वन, बाँस के वन, घास के मैदान और आर्द्रभूमियाँ शामिल हैं, जो इसे एक महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक केंद्र बनाते हैं।
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रैपिड फायर
बच्चों में मधुमेह मेलिटस पर मार्गदर्शन दस्तावेज़
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने “बच्चों में मधुमेह मेलिटस पर मार्गदर्शन दस्तावेज़” को राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण में सर्वोत्तम प्रथाओं पर राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान जारी किया।
- मधुमेह मेलिटस: यह एक पुरानी चयापचय संबंधी बीमारी है, जिसकी मुख्य विशेषता रक्त में शर्करा का उच्च स्तर (हाइपरग्लाइसीमिया) होना है। यह या तो इंसुलिन के अपर्याप्त उत्पादन (टाइप 1) के कारण होता है या शरीर द्वारा इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग न कर पाने (टाइप 2) के कारण होता है।
- यह नसों और रक्त वाहिकाओं को गंभीर एवं दीर्घकालिक क्षति पहुँचाता है, जिसके लिये जीवनशैली में बदलाव और दवाओं की आवश्यकता होती है।
- इसके लक्षणों में बार-बार यूरिन की समस्या, अत्यधिक प्यास लगना और बिना कारण वज़न कम होना शामिल हैं।
- टाइप 1 मधुमेह प्रायः बच्चों और युवाओं में पाया जाता है तथा इसका संबंध मुख्यतः आनुवंशिक कारणों से होता है, जबकि टाइप 2 मधुमेह मुख्यतः जीवनशैली से जुड़े कारकों—जैसे मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता और असंतुलित आहार—के साथ-साथ बढ़ती उम्र एवं पारिवारिक इतिहास से प्रभावित होता है।
- “बच्चों में डायबिटीज़ मेलिटस पर मार्गदर्शन दस्तावेज़”: यह एक राष्ट्रीय स्तर का संरचित दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य बच्चों में मधुमेह की शीघ्र पहचान, सही निदान, प्रभावी उपचार और आजीवन प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
- यह 0–18 वर्ष आयु वर्ग के लिये सार्वभौमिक स्क्रीनिंग पर ज़ोर देता है और सामुदायिक स्तर पर पहचान को ज़िला अस्पतालों में उपचार तथा मेडिकल कॉलेजों में उन्नत देखभाल से प्रभावी रूप से जोड़ता है।
- यह टाइप 1 मधुमेह के शुरुआती चेतावनी संकेतों के प्रति जागरूकता बढ़ाता है: बार-बार शौचालय जाना (Toilet), अधिक प्यास लगना (Thirsty), अत्यधिक थकान (Tired) और वज़न कम होना (Thinner)।
- यह ढाँचा निशुल्क और व्यापक देखभाल पैकेज भी प्रदान करता है, जिसमें इंसुलिन थेरेपी, जाँच सेवाएँ तथा निगरानी उपकरण शामिल हैं, जिससे उपचार सुलभ एवं किफायती बनता है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर देखभाल को एकीकृत करके यह निरंतर फॉलो-अप सुनिश्चित करता है, जटिलताओं को रोकता है और बच्चों में गैर-संचारी रोगों (NCDs) के प्रबंधन की भारत की क्षमता को मज़बूत करता है।
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