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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

वर्तमान में चल रही आगामी संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चुनाव की प्रक्रिया में उम्मीदवार महासभा के समक्ष अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि वर्तमान महासचिव एंटोनियो गुटेरेस 31 दिसंबर, 2026 को अपना दूसरा कार्यकाल समाप्त करेंगे तथा नया महासचिव जनवरी 2027 में पदभार ग्रहण करेगा।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव कैसे होता है?

  • संवैधानिक प्रावधान: संयुक्त राष्ट्र चार्टर स्पष्ट रूप से बताता है कि महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर महासभा द्वारा की जाती है।
  • P5 की शक्ति: चूँकि सिफारिश सुरक्षा परिषद से आनी चाहिये, इसलिये पाँच स्थायी सदस्य (P5) (चीन, फ्राँस, रूस, UK और अमेरिका) निर्णायक प्रभाव रखते हैं। P5 देशों में से कोई भी किसी उम्मीदवार के विपक्ष में वीटो (veto) का उपयोग कर सकता है।
  • नामांकन और सार्वजनिक संवाद:
    • उम्मीदवारों के लिये संयुक्त आह्वान: यह प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर तब शुरू होती है, जब महासभा और सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष सभी 193 सदस्य देशों को एक संयुक्त पत्र भेजते हैं, जिसमें उन्हें उम्मीदवारों को नामांकित करने के लिये आमंत्रित किया जाता है।
    • दृष्टिकोण विवरण: उम्मीदवारों को एक औपचारिक पाठ्यक्रम विवरण (CV) और एक "दृष्टिकोण विवरण" प्रस्तुत करना होता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के लिये उनकी प्रस्तावित दिशा का विवरण होता है।
      • वर्ष 2016 में शुरू की गई अधिक पारदर्शिता की दिशा में एक कदम के रूप में, उम्मीदवारों को महासभा के साथ "अनौपचारिक, संवादात्मक संवाद" में भाग लेना अनिवार्य है। इन सार्वजनिक रूप से प्रसारित सत्रों के दौरान, वे अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और सदस्य देशों तथा नागरिक समाज के समूहों के प्रश्नों के उत्तर देते हैं।
  • स्ट्रॉ पोल: चयन प्रक्रिया की वास्तविक शक्ति 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद, विशेष रूप से इसके पाँच स्थायी सदस्यों के पास होती है।
    • सुरक्षा परिषद गुप्त मतदान की एक शृंखला आयोजित करती है जिसे "स्ट्रॉ पोल" कहा जाता है। सदस्य प्रत्येक उम्मीदवार के प्रति अपना "करेज", "डिस्करेज" या "नो ओपिनियन" व्यक्त करने के लिये मतदान करते हैं।
    • स्ट्रॉ पोलिंग के बाद के दौर में P5 देशों के मतपत्र अलग रंग के कागज़ पर छापे जाते हैं। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि P5 सदस्य का कोई भी "डिस्करेज" वोट वीटो के रूप में कार्य करता है, जो प्रभावी रूप से उस उम्मीदवार को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर कर देता है।
    • ये पोल तब तक जारी रहते हैं जब तक कि पर्याप्त समर्थन (पंद्रह में से कम-से-कम नौ वोट) और P5 की ओर से शून्य वीटो वाला एक अकेला उम्मीदवार सामने नहीं आ जाता।
  • औपचारिक सिफारिश: एकबारगी सहमति वाले उम्मीदवार का चयन होने पर, सुरक्षा परिषद् बंद कमरे में औपचारिक प्रस्ताव पारित कर उस व्यक्ति की महासभा को आधिकारिक सिफारिश करती है।
  • महासभा द्वारा नियुक्ति: अनुशंसित उम्मीदवार का नाम महासभा को भेज दिया जाता है। महासभा नियुक्ति की पुष्टि के लिये मतदान करती है, जिसके लिये साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।
    • हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से, महासभा बिना किसी औपचारिक मतदान के सर्वसम्मति या जयघोष द्वारा सुरक्षा परिषद की सिफारिश को स्वीकृति प्रदान करती है।

अलिखित नियम और रीति-रिवाज़

  • क्षेत्रीय चक्र: परंपरा के अनुसार वैश्विक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये यह पद संयुक्त राष्ट्र के पाँच क्षेत्रीय समूहों (अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका एवं कैरिबियन तथा पश्चिमी यूरोप और अन्य) के बीच बारी-बारी से घूमता है।
  • कार्यकाल की सीमा: संयुक्त राष्ट्र महासचिव (UNSG) का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। हालाँकि चार्टर के तहत कार्यकाल की संख्या पर कोई तकनीकी सीमा नहीं है, लेकिन दो कार्यकाल की सीमा एक स्थापित परंपरा बन गई है।
  • P5 का अपवर्जन: यह एक अलिखित नियम है कि सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों में से किसी भी देश के नागरिक को महासचिव के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है। इसका उद्देश्य किसी एक देश के हाथों में अत्यधिक शक्ति के केंद्रीकरण को रोकना और एक निष्पक्ष व स्वतंत्र मध्यस्थ सुनिश्चित करना है। 

महासचिव की क्या भूमिका है?

  • मुख्य प्रशासनिक अधिकारी: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 के तहत महासचिव को संगठन का “मुख्य प्रशासनिक अधिकारी” नामित किया गया है। 
    • महासचिव संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों (जैसे- महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद आदि) द्वारा उन्हें सौंपी गई निर्णयों, अधिदेशों और कार्यों को पूरा करने के लिये उत्तरदायी होते हैं।
  • वैश्विक शांति और सुरक्षा के संरक्षक: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 99 महासचिव को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे ऐसे किसी भी मुद्दे को सुरक्षा परिषद के समक्ष रख सकते हैं, जो उनके आकलन में अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिये संभावित खतरा उत्पन्न कर सकता है। यह उन्हें एक स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका प्रदान करता है।
  • निवारक कूटनीति और ‘गुड ऑफिसेज़’: महासचिव अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता का उपयोग करते हुए “गुड ऑफिसेज़” की भूमिका निभाते हैं, जिसके तहत वे अंतर्राष्ट्रीय विवादों को उत्पन्न होने, बढ़ने या फैलने से रोकने के लिये सार्वजनिक एवं निजी दोनों स्तरों पर प्रयास करते हैं। 
  • विशेष दूतों की नियुक्ति: महासचिव के पास विशेष प्रतिनिधियों और व्यक्तिगत दूतों (विशेष प्रतिनिधि और निजी दूत) को नियुक्त करने का अधिकार होता है, जो संघर्षों में मध्यस्थता करते हैं, शांति अभियानों का नेतृत्व करते हैं तथा सीरिया, यमन और सूडान जैसे वैश्विक संकट क्षेत्रों में शांति वार्ताओं को सुगम बनाते हैं। 
  • वैश्विक प्रवक्ता और नैतिक विवेक: महासचिव को अक्सर विश्व का “मुख्य कूटनीतिज्ञ” कहा जाता है। वे संयुक्त राष्ट्र के चेहरे और आवाज़ के रूप में कार्य करते हैं तथा जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार एवं आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर विश्व की नैतिक चेतना (conscience) के रूप में अपनी बात रखते हैं। 
    • महासचिव विश्व की सबसे कमज़ोर आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए मानवाधिकारों की रक्षा, मानवीय सहायता की उपलब्धता तथा सशस्त्र संघर्षों में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये सक्रिय रूप से पहल करते हैं। 
  • “क्रिएटिव टेंशन” का प्रबंधन: महासचिव को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सार्वभौमिक मूल्यों और नैतिक अधिकार को बनाए रखते हुए 193 सदस्य देशों के संप्रभु हितों और तीव्र भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धाओं के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है। विशेषकर सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों (P5), जिनके पास वीटो शक्ति होती है और जो महासचिव की नियुक्ति तथा संयुक्त राष्ट्र के बजट पर प्रभाव रखते हैं, के बीच यह संतुलन बनाना अत्यंत कठिन कार्य होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नियुक्ति कैसे होती है?
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 के अनुसार, महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर महासभा द्वारा की जाती है।

2. चुनाव में P5 की क्या भूमिका होती है?
पाँच स्थायी सदस्य (P5) उम्मीदवारों पर वीटो कर सकते हैं, जिससे उन्हें चयन प्रक्रिया में निर्णायक प्रभाव प्राप्त होता है।

3. संयुक्त राष्ट्र महासचिव का कार्यकाल कितना होता है?
5 वर्ष का कार्यकाल, जो आमतौर पर परिपाटी के अनुसार दो कार्यकालों तक सीमित होता है।

4. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 99 कौन-सी शक्तियाँ प्रदान करता है?
यह महासचिव को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिये उत्पन्न होने वाले खतरों को सुरक्षा परिषद के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार देता है।

5. संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रमुख कार्य क्या हैं?
प्रशासनिक नेतृत्व, निवारक कूटनीति, दूतों की नियुक्ति तथा शांति और मानवाधिकारों के लिये वैश्विक आवाज़ के रूप में कार्य करना।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. ‘‘संयुक्त राष्ट्र प्रत्यय समिति (यूनाईटेड नेशंस क्रेडेंशियल्स कमिटी)’’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)

  1. यह संयुक्त राष्ट्र (UN) सुरक्षा परिषद द्वारा स्थापित समिति है और इसके पर्यवेक्षण के अधीन काम करती है।
  2. पारंपरिक रूप से प्रतिवर्ष मार्च, जून और सितंबर में इसकी बैठक होती है।
  3. यह महासभा को अनुमोदन हेतु रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पूर्व सभी UN सदस्यों के प्रत्ययों का आकलन करती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 3

(b) केवल 1 और 3

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 1 और 2

उत्तर: (a)


प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009)

  1. संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) में 24 सदस्य देश शामिल हैं।
  2. यह 3 वर्ष की अवधि के लिये महासभा के दो-तिहाई बहुमत द्वारा चुनी जाती है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)


रैपिड फायर

वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाना

स्रोत: द हिंदू 

विपक्षी दल मतदान के अधिकार को केवल एक वैधानिक अधिकार से उन्नत कर एक मौलिक अधिकार (संविधान के भाग III के तहत) बना ने के लिये समर्थन कर रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नागरिकों के पास मताधिकार से वंचित किये जाने के विरुद्ध संवैधानिक उपचार उपलब्ध हो।

  • यह मांग विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर चिंताओं के बीच और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है, जिसमें मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोप लगे हैं, जो चुनावी समावेशिता के लिये जोखिम उत्पन्न करते हैं।
  • इसे मौलिक अधिकार का दर्जा देने से यह पूरी तरह से वाद-योग्य हो जाएगा, जिससे नागरिक राज्य द्वारा मनमाने ढंग से मताधिकार से वंचित किये जाने के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) तक पहुँच सकेंगे।
  • यह मांग प्रारूप समिति, विशेष रूप से डॉ. बी.आर. अंबेडकर की ऐतिहासिक दूरदर्शिता के अनुरूप है, जिन्होंने चेतावनी दी थी कि भविष्य की सरकारें लोकतांत्रिक भागीदारी को दबाने के लिये चुनावी पहुँच में हेरफेर कर सकती हैं।

मतदान का अधिकार

  • वर्तमान में, भारत में मतदान का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत पर आधारित है।
  • मतदान की स्वतंत्रता: हालाँकि मतदान की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
    • इसमें किसी उम्मीदवार का चयन करके या नोटा (NOTA - इनमें से कोई नहीं) का विकल्प चुनकर अपनी पसंद व्यक्त करने की मतदाता की क्षमता शामिल है, हालाँकि इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग केवल वास्तविक चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही किया जाता है।

मतदान के अधिकार की न्यायिक व्याख्या

मामला

न्यायिक व्याख्या

एन.पी. पोन्नुस्वामी (1952)

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मतदान का अधिकार वैधानिक है और इस पर कानून द्वारा लगाई गई सीमाएँ लागू होती हैं।

ज्योति बसु (1982)

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि मतदान न तो मौलिक अधिकार है और न ही सामान्य कानून के तहत मिलने वाला अधिकार है, बल्कि यह एक साधारण वैधानिक अधिकार है।

कुलदीप नैयर (2006)

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मतदान का अधिकार वैधानिक है।

और पढ़ें: मताधिकार एवं मतदान की स्वतंत्रता में अंतर


रैपिड फायर

MTP अधिनियम सुधारों पर सर्वोच्च न्यायालय

स्रोत: द हिंदू

सर्वोच्च न्यायालय ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी की है कि गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 में संशोधन किया जा सकता है, ताकि नाबालिग दुष्कर्म पीड़ितों के गर्भपात के लिये निर्धारित वैधानिक समय-सीमा को हटाया जा सके। 

  • यह टिप्पणी 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने के खिलाफ दायर एक उपचारात्मक याचिका को खारिज करते हुए की गई थी। न्यायालय ने 'प्रजनन स्वायत्तता' के सिद्धांत को सुदृढ़ किया और व्यवस्था दी कि गर्भपात का निर्णय लेने का अधिकार नाबालिग तथा उसके माता-पिता का है—न कि राज्य का।

गर्भ का चिकित्सकीय समापन (MTP) अधिनियम, 1971

  • परिचय: यह एक ऐतिहासिक कानून है, जिसने भारत में गर्भपात सेवाओं को वैध और विनियमित किया। इस अधिनियम को शांतिलाल शाह समिति (1964) की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था, जिसका उद्देश्य असुरक्षित और अवैध गर्भपात के कारण होने वाली उच्च मातृ मृत्यु दर को कम करना था। 
  • 1971 अधिनियम के प्रमुख प्रावधान: मूल 1971 अधिनियम में निर्धारित परिस्थितियों के अंतर्गत किसी पंजीकृत चिकित्सक द्वारा गर्भावस्था की समाप्ति की अनुमति दी गई थी।
    • समय-सीमा: गर्भपात 20 सप्ताह तक कराया जा सकता था।
    • समापन की शर्तें: गर्भवती महिला के जीवन को बचाने हेतु बलात्कार या अनाचार (incest) के मामलों में, गर्भनिरोधक की विफलता (केवल विवाहित महिलाओं के लिये) आदि।
  • 2021 संशोधन:
    • गर्भावधि सीमा में वृद्धि: विशेष श्रेणी की महिलाओं (जैसे- बलात्कार पीड़ित, अनाचार पीड़ित, नाबालिग और दिव्यांग महिलाएँ) के लिये गर्भावस्था समाप्ति की अधिकतम सीमा 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दी गई। 
    • अविवाहित महिलाओं को शामिल करना: गर्भनिरोधक विफलता से संबंधित प्रावधान को अविवाहित महिलाओं तक विस्तारित किया गया, जिससे उन्हें भी विवाहित महिलाओं के समान सुरक्षित गर्भपात का कानूनी अधिकार प्राप्त हो सके। 
    • भ्रूण असामान्यताओं के लिये कोई सीमा नहीं: यदि चिकित्सा बोर्ड द्वारा भ्रूण में गंभीर/महत्त्वपूर्ण असामान्यताओं का निदान किया जाता है, तो 24 सप्ताह के बाद भी गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है।  
    • मत की आवश्यकता: इस अधिनियम के अनुसार 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था समाप्ति के लिये एक डॉक्टर की राय आवश्यक होती है, जबकि 20 से 24 सप्ताह के बीच गर्भावस्था समाप्त करने के लिये दो डॉक्टरों की राय आवश्यक होती है।
  • महत्त्व: गर्भपात को एक आवश्यक स्वास्थ्य सेवा के रूप में मान्यता देकर तथा यह सुनिश्चित करके कि यह प्रक्रिया योग्य चिकित्सकों द्वारा की जाए, MTP अधिनियम, 1971 महिलाओं की स्वायत्तता और सुरक्षित चिकित्सा परिस्थितियों को प्राथमिकता देता है।   

और पढ़ें: भारत में गर्भपात संबंधी जटिलताएँ


प्रारंभिक परीक्षा

कोमागाटा मारू घटना

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

कोमागाटा मारू घटना (1914) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वैश्विक इतिहास में एक निर्णायक घटना थी, जिसने कनाडा (जो उस समय एक ब्रिटिश डोमिनियन था) में भारतीय प्रवासियों के प्रति नस्लीय भेदभाव और उसके परिणामस्वरूप गदर आंदोलन की क्रांतिकारी गतिविधियों को तीव्र करने में उत्प्रेरक का कार्य किया।

कोमागाटा मारू घटना क्या थी?

  • परिचय: कोमागाटा मारू घटना वर्ष 1914 में जापानी स्टीमशिप कोमागाटा मारू (जिसे गुरु नानक जहाज़ के नाम से भी जाना जाता है) की यात्रा को संदर्भित करती है, जो कनाडा में व्यवस्थित नस्लवाद और बहिष्करणवादी आप्रवासन नीति का प्रतीक बन गई।
    • गुरदित सिंह संधू द्वारा किराये पर लिया गया यह जहाज़ हाॅन्गकाॅन्ग से वैंकूवर के लिये रवाना हुआ, जिसमें ब्रिटिश भारत के पंजाब से 376 यात्री सवार थे। 
  • उद्देश्य: इस अभियान का मुख्य लक्ष्य कनाडाई कानून "निरंतर यात्रा विनियमन 1908" को चुनौती देना था। यह प्रावधान अनिवार्य करता था कि प्रवासियों को केवल अपने जन्म या नागरिकता वाले राष्ट्र से सीधी यात्रा के ज़रिये ही प्रवेश मिलेगा, अथवा उनके पास प्रस्थान से पूर्व खरीदे गए सीधे टिकट होने चाहिये।
    • यह नीति दक्षिण एशियाई लोगों को लक्षित करके बनाई गई थी, क्योंकि भारत से कनाडा के लिये बिना रुके यात्रा करना असंभव था और यह भारतीय आप्रवासन पर एक ‘अप्रत्यक्ष’ प्रतिबंध के रूप में कार्य करती थी।
  • वैंकूवर में प्रतिरोध: मई 1914 में जब जहाज़ वैंकूवर तट पर पहुँचा, तो कनाडाई अधिकारियों ने उसे डॉक करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। केवल उन 24 यात्रियों को तट पर उतरने दिया गया जो कानूनी रूप से अपना पूर्व कनाडाई निवास सिद्ध कर सकते थे।
    • स्थानीय भारतीय समुदाय ने कानूनी कार्रवाई करने के लिये एक ‘तटीय समिति’ का गठन किया, लेकिन न्यायालय ने बहिष्कारवादी कानून को बरकरार रखा। 
    • अधिकारियों ने आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा दिया और अंततः जुलाई 1914 में नौसैनिक पहरे के बीच जहाज़ को कनाडाई जलक्षेत्र से प्रस्थान हेतु विवश किया गया।
  • बजबज उपद्रव (1914): सितंबर 1914 में जब कोमागाटा मारू जहाज़ भारत वापस आया तथा कोलकाता के समीप बजबज बंदरगाह पर रुकने के बाद परिस्थितियाँ बेहद दुखद हो गईं। यात्रियों द्वारा पंजाब जाने वाली विशेष ट्रेन में सवार होने से इनकार करने और कलकत्ता की ओर पैदल मार्च शुरू करने के कारण ब्रिटिश पुलिस ने उन पर गोलियाँ चला दीं।
    • इस घटना के परिणामस्वरूप 20 यात्रियों की जान चली गई और कई अन्य को हिरासत में ले लिया गया। बाबा गुरदित सिंह अगले कुछ वर्षों तक अधिकारियों को चकमा देने में सफल रहे, लेकिन वर्ष 1920 में महात्मा गांधी की सलाह पर उन्होंने पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया, जिसके बाद उन्हें 5 वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिये कई प्रकार से एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है:
    • गदर आंदोलन: इसने गदर पार्टी को बड़े पैमाने पर भर्ती में बढ़ावा दिया। इसने कई प्रवासी भारतीयों को यह विश्वास दिलाया कि “ब्रिटिश प्रजा” के रूप में उन्हें कोई अधिकार नहीं है और सम्मान प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग सशस्त्र क्रांति ही है।
    • औपनिवेशिक पाखंड का उजागर होना: इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरोधाभास को उजागर किया अर्थात जहाँ एक ओर प्रथम विश्व युद्ध (जो जहाज़ के लौटने के तुरंत बाद शुरू हुआ) में भारतीयों से ब्रिटेन के लिये लड़ने की अपेक्षा की जाती थी, वहीं दूसरी ओर उन्हें अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में प्रवेश से वंचित रखा जाता था।
    • अंतर्राष्ट्रीय संबंध: यह घटना भारत-कनाडा इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण क्षण मानी जाती है। वर्ष 2016 में कनाडा के प्रधानमंत्री ने हाउस ऑफ कॉमन्स में इस त्रासदी के लिये औपचारिक रूप से माफी मांगी। 

गदर आंदोलन

  • परिचय: गदर आंदोलन उत्तरी अमेरिका में प्रवासी भारतीयों (मुख्य रूप से पंजाबियों) द्वारा स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन था, जिसका लक्ष्य सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था।"
    • “गदर” शब्द का शाब्दिक अर्थ विद्रोह या बगावत है, जिसे 1857 के विद्रोह की भावना को जागृत करने के लिये चुना गया था।
  • स्थापना: इसकी औपचारिक स्थापना वर्ष 1913 में संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में “पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन” के रूप में की गई थी। 
  • प्रमुख व्यक्तित्व: लाला हरदयाल (आंदोलन के बौद्धिक और वैचारिक आधार), सोहन सिंह भकना (गदर पार्टी के प्रथम अध्यक्ष), तारकनाथ दास ('फ्री हिंदुस्तान' पत्रिका के संस्थापक) और करतार सिंह सराभा (एक युवा क्रांतिकारी जो एक महान शहीद बने)।
  • विचारधारा: यह आंदोलन पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष था, जिसने सिख, हिंदू और मुस्लिमों को भारतीय राष्ट्रवाद के साझा मंच पर एकजुट किया। उन्होंने “गदर” नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र प्रकाशित किया, जिसके शीर्ष पर प्रसिद्ध रूप से “अंग्रेज़ी राज का दुश्मन” लिखा होता था। 
  • गदर विद्रोह (1915): 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के फैलने को एक 'ईश्वर-प्रदत्त अवसर' (God-sent opportunity) के रूप में देखा गया, क्योंकि ब्रिटिश सेना यूरोप के युद्ध क्षेत्र में व्यस्त थी।
    • हज़ारों की संख्या में गदरकारी भारतीय सैनिकों के बीच विद्रोह भड़काने के लिये भारत लौटे। उन्होंने 21 फरवरी, 1915 को पंजाब और सेना की छावनियों में एक व्यापक विद्रोह की तारीख तय की।
    • ब्रिटिश सरकार ने जासूसों (विशेष रूप से किर्पाल सिंह) के माध्यम से इस आंदोलन में घुसपैठ की। इस साजिश का भंडाफोड़ हो गया, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ, फाँसियाँ हुईं तथा भारत रक्षा अधिनियम, 1915 लागू किया गया। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वर्ष 1914 में गठित 'शोर कमेटी' (तटीय समिति) का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
हुसैन रहीम जैसे कार्यकर्त्ताओं के नेतृत्व में यह समिति वैंकुवर में कोमागाटामारू के यात्रियों को कानूनी सहायता, भोजन और जल उपलब्ध कराने एवं कनाडाई न्यायालयों में उनके निर्वासन को चुनौती देने के लिये बनाई गई थी।

2. 'सतत यात्रा विनियमन' ने नस्लीय बहिष्कार के एक उपकरण के रूप में कैसे कार्य किया?
इसने यह अनिवार्य कर दिया कि प्रवासियों को उनके जन्म के देश से 'नॉन-स्टॉप' यात्रा के माध्यम से आना चाहिये; चूँकि उस समय कोई भी शिपिंग लाइन भारत से कनाडा के लिये सीधे मार्ग का अनुसरण नहीं करता था, इसलिये इसने प्रभावी रूप से भारतीय आप्रवासन पर प्रतिबंध लगा दिया।

3. गदर पार्टी के प्रमुख संस्थापक नेता कौन थे?
पार्टी की स्थापना वर्ष 1913 में सैन फ्राँसिस्को में लाला हरदयाल (विचारक), सोहन सिंह भकना (अध्यक्ष) और तारकनाथ दास द्वारा सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से की गई थी।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. गदर क्या था? (2014)

(a) सैन फ्राँसिस्को में मुख्यालय में भारतीयों का क्रांतिकारी संघ

(b) सिंगापुर से संचालित होने वाला राष्ट्रवादी संगठन

(c) बर्लिन में मुख्यालय के साथ आतंकवादी संगठन

(d) ताशकंद में मुख्यालय के साथ भारत की स्वतंत्रता के लिये कम्युनिस्ट आंदोलन

उत्तर: (a)


रैपिड फायर

कर्नाटक: गिग वर्कर्स के लिये शिकायत निवारण प्रणाली शुरू करने वाला पहला राज्य

स्रोत: द हिंदू

प्लेटफॉर्म-आधारित गिग श्रमिकों के अधिकारों और उनके कल्याण की रक्षा करने की दिशा में कर्नाटक ने भारत की अपनी तरह की पहली विशिष्ट शिकायत निवारण प्रणाली का आधिकारिक रूप से शुरुआत किया है।

  • एकीकृत पोर्टल: कर्मचारी एकीकृत सार्वजनिक शिकायत निवारण प्रणाली (IPGRS) के माध्यम से  वेतन, कार्य स्थितियों और प्लेटफॉर्म विवादों के संबंध में शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।
  • अनिवार्य IDRC और कल्याण अंशदान: "कर्नाटक प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025 के अनुसार, एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स के लिये एक 'आंतरिक विवाद समाधान समिति' (IDRC) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, इन प्लेटफॉर्म्स को निर्धारित सीमा के भीतर 1% कल्याण अंशदान देने का उत्तरदायित्व भी सौंपा गया है।
    • शिकायतों को स्वचालित रूप से IDRC को भेज दिया जाता है और सरकारी निगरानी में एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर उनका समाधान किया जाना चाहिये।

गिग वर्कर्स:

  • परिचय: एक 'गिग वर्कर' वह व्यक्ति होता है, जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी अनुबंधों के दायरे से बाहर स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और विभिन्न कार्य व्यवस्थाओं के माध्यम से आय अर्जित करता है।
    • वर्तमान स्थिति: वर्ष 2024-25 तक, गिग वर्कफोर्स (gig workforce) की संख्या लगभग 1.2 करोड़ (12 मिलियन) होने का अनुमान है, जिसके वर्ष 2029-30 तक लगभग दोगुना होकर 2.35 करोड़ (23.5 मिलियन) तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया है।
  • गिग वर्क की मुख्य विशेषताएँ:

और पढ़ें: गिग वर्कर्स: अदृश्य कार्यबल


रैपिड फायर

नागरिकता (संशोधन) नियम, 2026 की अधिसूचना

स्रोत: IE

केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने आधिकारिक तौर पर नागरिकता (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित कर दिया है, जिसका उद्देश्य 'ओवरसीज़ सिटीजन ऑफ इंडिया' (OCI) ढाँचे को डिजिटल बनाना तथा नाबालिगों को एक साथ दो पासपोर्ट रखने से रोकने के लिये कड़े नियम लागू करना है।

  • दोहरे पासपोर्ट पर प्रतिबंध: नागरिकता नियम, 2009 के तीसरे नियम में एक नया उपबंध जोड़ा गया है। इसके तहत अब यह अनिवार्य कर दिया गया है कि भारतीय पासपोर्ट धारक कोई भी नाबालिग किसी अन्य देश का पासपोर्ट नहीं रख सकेगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य दोहरी नागरिकता के संभावित गलत इस्तेमाल और उससे जुड़ी कानूनी बाधाओं को पूरी तरह समाप्त करना है।
  • e-OCI की शुरुआत: ये नियम इलेक्ट्रॉनिक OCI (e-OCI) कार्डों को प्रस्तुत करके कागज़ रहित पहचान का मार्ग प्रशस्त करते हैं, जो पारंपरिक रूप से भौतिक कार्डों के साथ कार्य करेंगे।
  • पूर्णतः डिजिटलीकृत पंजीकरण: धारा 7A के तहत OCI पंजीकरण के लिये आवेदन अब केवल फॉर्म XXVIII के माध्यम से ऑनलाइन ही दाखिल किये जाने चाहिये, जिससे भौतिक रूप से दोबारा जमा करने की आवश्यकता समाप्त हो गई है।
  • बायोमेट्रिक एकीकरण: आवेदकों को अब फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन प्रोग्राम के साथ एकीकरण के लिये बायोमेट्रिक डेटा साझा करने की सहमति देनी होगी, जिससे भविष्य में स्वचालित नामांकन की सुविधा मिल सकती है।
  • केंद्रीकृत रजिस्ट्री: OCI कार्डधारकों का एक केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस (Form XXX के अंतर्गत) इलेक्ट्रॉनिक रूप से संधारित किया जाएगा।
  • ऑनलाइन परित्याग और रद्द करना: "नियम 34 और 35 के तहत OCI कार्ड का परित्याग या रद्द करने की प्रक्रिया अब पूरी तरह डिजिटल हो गई है। नए प्रावधानों में अपील की सुविधा के साथ-साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर OCI कार्ड स्वतः अमान्य हो जाएगा।

भारत के प्रवासी नागरिक (OCI)

  • परिचय: भारत सरकार किसी व्यक्ति को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत OCI के रूप में पंजीकृत कर सकती है यदि वह विदेशी नागरिक है जो 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद भारतीय नागरिक था, या ऐसे क्षेत्र से संबंधित था जो 15 अगस्त, 1947 के बाद भारत का हिस्सा बना, या उस समय भारतीय नागरिकता के लिये पात्र था।  
    • पात्रता उनके बच्चों, पोते-पोतियों और परपोते-परपोतियों के साथ-साथ कम-से-कम एक भारतीय माता-पिता वाले नाबालिग बच्चों एवं भारतीय नागरिकों या OCI धारकों के जीवनसाथियों (कम-से-कम दो वर्ष के पंजीकृत विवाह के अधीन) तक भी विस्तारित है। 
  • अपवाद: वह व्यक्ति, जिसके माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-परदादी में से कोई एक पाकिस्तान या बांग्लादेश का नागरिक है या रह चुका है, OCI पंजीकरण के लिये पूरी तरह से अपात्र है।
  • लाभ: OCI कार्डधारकों को भारत आने के लिये बहु-प्रवेश वाला, आजीवन वीज़ा दिया जाता है, वे  आर्थिक, वित्तीय और शैक्षिक मामलों में अनिवासी भारतीयों (NRI) के समान अधिकारों का आनंद लेते हैं, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता है। 

और पढ़ें: नागरिकता संशोधन अधिनियम: अनपैक्ड 


रैपिड फायर

लद्दाख में तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेषों का प्रदर्शन

स्रोत: पीआईबी 

तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेषों का 'प्रदर्शन', जो लद्दाख (1-14 मई 2026) में आयोजित किया जा रहा है, एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहल है। यह वैश्विक शांति और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ बौद्ध विरासत के संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करता है।

  • यह प्रदर्शन "संघर्ष के समय में शांति" विषय के तहत आयोजित किया जा रहा है और यह 2569वीं बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर हो रहा है।
  • आध्यात्मिक महत्त्व: इन अवशेषों को 'शरीर-धातु' (Sarira-Dhatu) के रूप में जाना जाता है, जो गौतम बुद्ध (तथागत) की आध्यात्मिक उपस्थिति के प्रतीक हैं—वह ऐसे 'महापुरुष' जिन्होंने जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त की थी।
  • पुरातत्त्व संबंधी जड़ें: ये अवशेष पिपरहवा से प्राप्त हुए हैं। विलियम क्लैक्सटन पेप्पे (1898) और के.एम. श्रीवास्तव (1971-77) द्वारा की गई खुदाई ने प्राचीन कपिलवस्तु के साथ इसकी पहचान को पुख्ता किया।
  • अवशेष विवरण: खोजों में मौर्यकालीन ब्राह्मी-लिपियुक्त सोपस्टोन (साबुन का पत्थर), एक स्फटिक और बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद निर्मित मूल स्तूप से संबंधित अस्थि अवशेष, राख एवं कीमती वस्तुएँ शामिल हैं।  
  • सांस्कृतिक कूटनीति: संस्कृति मंत्रालय इन प्रदर्शनों का उपयोग "जन-जन के बीच संबंधों" को मज़बूत करने के लिये करता है। हाल ही में ये अवशेष थाईलैंड (2024), वियतनाम (2025) और श्रीलंका (2026) की यात्रा पर ले जाए गए हैं।

तथागत बुद्ध

  • तथागत गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म के संस्थापक) द्वारा स्वयं को संबोधित करने के लिये उपयोग की जाने वाली एक उपाधि है। पालि कैनन में, वे अपने प्रबुद्ध स्वरूप के बारे में बात करते समय प्रायः "मैं" या "मुझे" के स्थान पर इसी शब्द का उपयोग करते हैं।
  • यह शब्द संस्कृत और पाली का एक यौगिक है जिसे दो तरीकों से समझा जा सकता है:
    • तथा-गत: "वह जो इस प्रकार गया है" — यह उस व्यक्ति का प्रतीक है जो जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्त हो चुका है।
    • तथा-आगत: "वह जो इस प्रकार आया है" — यह उस व्यक्ति का प्रतीक है जो परम सत्य या वास्तविकता (धर्म) तक पहुँच गया है।

और पढ़ें: बुद्ध पूर्णिमा


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