प्रारंभिक परीक्षा
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण
चर्चा में क्यों?
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को दोहराते हुए कर्नाटक को निर्देश दिया है कि वह मई 2026 हेतु तमिलनाडु को निर्धारित समय पर जल उपलब्ध कराना सुनिश्चित करे।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) क्या है?
- परिचय: केंद्र सरकार ने जून 2018 में कावेरी जल प्रबंधन योजना, 2018 के अंतर्गत दो प्रमुख निकायों- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की स्थापना की थी।
- कानूनी आधार: अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 6A के अंतर्गत अधिसूचित कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) एक वैधानिक एवं अर्द्ध-न्यायिक निकाय है। यह 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप संशोधित कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के आदेश के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करता है।
- संरचना एवं गठन: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है तथा यह केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
- अध्यक्ष: केंद्र सरकार द्वारा 5 वर्ष के कार्यकाल के लिये नियुक्त एक वरिष्ठ प्रतिष्ठित अभियंता या IAS अधिकारी (सचिव/अतिरिक्त सचिव स्तर)।
- सदस्य:
- दो पूर्णकालिक सदस्य: जल संसाधन एवं कृषि क्षेत्र से।
- दो अंशकालिक सदस्य: केंद्र सरकार से।
- चार अंशकालिक सदस्य: बेसिन राज्यों- कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- सचिव: केंद्रीय जल अभियांत्रिकी सेवाओं से नियुक्त एक अभियंता।
- मुख्य कार्य: CWMA का प्राथमिक उद्देश्य अंतिम जल-बँटवारे के फार्मूले का ‘अनुपालन सुनिश्चित करना और उसका क्रियान्वयन कराना’ है।
- जल वितरण: यह कावेरी बेसिन में स्थित जलाशयों (जैसे- कर्नाटक में कृष्णराजसागर और काबिनी तथा तमिलनाडु में मेत्तूर) से जल के प्रवाह को नियंत्रित और विनियमित करता है।
- संकट में जल-वितरण: कम वर्षा वाले वर्षों में CWMA यह तय करता है कि ‘संकट’ (जल की कमी) को राज्यों के बीच अनुपातिक रूप से कैसे साझा किया जाएगा।
- निगरानी: यह अपनी अधीनस्थ संस्था CWRC की सहायता से जल स्तर, जल प्रवाह और भंडारण स्थिति से संबंधित दैनिक डेटा एकत्र करता है।
- दक्षता: यह राज्यों को सूक्ष्म सिंचाई और फसल पैटर्न में बदलाव के माध्यम से जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिये सलाह देता है।
- महत्त्व: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन पूर्व के तदर्थ कावेरी नदी प्राधिकरण के स्थान पर जल प्रबंधन के लिये एक स्थायी और स्वतंत्र तंत्र प्रदान करने हेतु किया गया था। इसका उद्देश्य निगरानी तथा निर्णय लेने के लिये एक तकनीकी एवं प्रशासनिक मंच प्रदान करके कर्नाटक व तमिलनाडु के बीच बार-बार होने वाले मुकदमों और राजनीतिक संघर्षों को कम करना है।
कावेरी नदी
- परिचय: कावेरी नदी दक्षिण भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदियों में से एक है, जिसे अक्सर ‘दक्षिण भारत की गंगा’ कहा जाता है। इसके जल को लेकर विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है।
- उद्गम: यह पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि श्रेणी (कर्नाटक के कोडागु ज़िले) में स्थित तालाकावेरी से निकलती है।
- प्रवाह मार्ग: यह लगभग 800 किलोमीटर तक कर्नाटक और तमिलनाडु से होते हुए दक्षिण-पूर्वी दिशा में बहती है, और अंततः पूम्पूहार के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- अपवाह बेसिन: इसका जलग्रहण क्षेत्र कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी के कुछ हिस्सों में विस्तृत है।
- मुख्य सहायक नदियाँ:
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ: हरंगी, हेमावती, शिमशा, अर्कावती।
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ: लक्ष्मण तीर्थ, काबिनी, सुवर्णवती, भवानी, नोय्याल, अमरावती।
- प्रमुख बांध: कर्नाटक में कृष्णराज सागर (KRS) और तमिलनाडु में मेत्तूर बाँध (स्टेनली जलाशय)।
कावेरी नदी विवाद
- औपनिवेशिक जड़ें: यह विवाद दो विवादास्पद समझौतों (1892 और 1924) के साथ शुरू हुआ, जो मैसूर रियासत (अब कर्नाटक) और मद्रास प्रेसीडेंसी (अब तमिलनाडु) के बीच हुए थे। मद्रास, निचले तटीय क्षेत्र वाला राज्य होने के नाते, जिसके पास पहले से ही सिंचाई के स्थापित अधिकार थे, उसने जल के एक बड़े हिस्से पर अधिकार सुरक्षित कर लिया।
- स्वतंत्रता के बाद तनाव: वर्ष 1947 के बाद, कर्नाटक ने तर्क दिया कि ये औपनिवेशिक-कालीन समझौते अनुचित थे और उन्होंने अपने किसानों के लिये सिंचाई विकसित करने की कर्नाटक की क्षमता को सीमित कर दिया।
- संवैधानिक तंत्र: अनुच्छेद 262 के तहत, संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 अधिनियमित किया। वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन किया गया था।
- "स्वर्ण नियम" में संघर्ष: संघर्ष आमतौर पर संकट के वर्षों (जब मानसून कमज़ोर हो) में चरम पर होता है। कर्नाटक (ऊपरी तटीय राज्य) प्रायः अपनी पेयजल और सिंचाई आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता है, जबकि तमिलनाडु (निचला तटीय राज्य) अपनी डेल्टा फसलों को बचाने के लिये नदी के जल को छोड़ने की मांग करता है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2018)
फरवरी 2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक अंतिम निर्णय सुनाया, जिसमें वर्ष 2007 के न्यायाधिकरण संबंधी निर्णय में संशोधन किया गया। मुख्य निर्देश इस प्रकार थे:
- राष्ट्रीय संपत्ति: न्यायालय ने घोषणा की कि किसी भी राज्य का किसी नदी पर स्वामित्व का अधिकार नहीं है; यह एक राष्ट्रीय संपत्ति है।
- बंगलूरू के लिये पेयजल: कर्नाटक को अतिरिक्त 14.75 TMC (हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट) जल आवंटित किया गया, विशेष रूप से बंगलूरू की पेयजल आवश्यकताओं को स्वीकार करते हुए।
- संशोधित वार्षिक आवंटन:
- तमिलनाडु: 404.25 TMC (419 TMC से कम)
- कर्नाटक: 284.75 TMC (270 TMC से अधिक)
- केरल: 30 TMC
- पुदुचेरी: 7 TMC
- CWMA का गठन: न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करने के लिये कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन करे कि निर्णय का निष्पक्ष कार्यान्वयन हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. CWMA का वैधानिक आधार क्या है?
CWMA (कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण) का गठन सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के निर्देश के बाद, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 6A के तहत किया गया था।
2. CWMA में अंशकालिक सदस्यों के रूप में किन राज्यों का प्रतिनिधित्व है?
प्रतिनिधित्व वाले चार बेसिन राज्य/केंद्रशासित प्रदेश हैं: कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी।
3. कम वर्षा वाले वर्षों में CWMA कैसे कार्य करता है?
प्राधिकरण एक "संकट साझाकरण सूत्र" लागू करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जल की कमी सभी बेसिन राज्यों के बीच आनुपातिक रूप से साझा की जाए।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन - सा 'संरक्षित क्षेत्र' कावेरी बेसिन में स्थित है? (2020)
- नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान
- पापिकोंडा राष्ट्रीय उद्यान
- सत्यमंगलम बाघ आरक्षित क्षेत्र
- वायनाड वन्यजीव अभयारण्य
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 1, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
रैपिड फायर
अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस 2026 (मई दिवस)
प्रत्येक वर्ष, 1 मई को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसे आमतौर पर मई दिवस या श्रम दिवस के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा दिन है जो श्रमिक आंदोलन और विश्व भर के श्रमिकों द्वारा किये गए ऐतिहासिक संघर्षों, बलिदानों और उसके बाद प्राप्त उपलब्धियों का सम्मान करने के लिये समर्पित है।
- मई दिवस: इसकी उत्पत्ति शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर पर हुई 'हेमार्केट प्रकरण' से संबंधित है, जहाँ आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग को लेकर एक शांतिपूर्ण श्रमिक रैली, एक बम फेंके जाने के बाद हिंसक हो गई थी। यह घटना औद्योगिक क्रांति की कठोर परिस्थितियों के दौरान हुई, जब श्रमिकों को अक्सर असुरक्षित वातावरण में 10-16 घंटे श्रम करने के लिये मज़बूर किया जाता था।
- वर्ष 1889 में द्वितीय इंटरनेशनल ने 'हेमार्केट शहीदों' के सम्मान में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया। यह उचित कार्य के घंटों के लिये वैश्विक संघर्ष का प्रतीक बना, जो 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, और 8 घंटे व्यक्तिगत जीवन के सिद्धांत पर आधारित था।
- वर्ष 2026 की थीम: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की थीम "एक स्वस्थ मनोसामाजिक कार्य वातावरण सुनिश्चित करना" है। यह बढ़ते कार्यस्थल पर तनाव, बर्नआउट और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर प्रकाश डालती है तथा सरकारों और नियोक्ताओं से शारीरिक कल्याण के साथ-साथ मनोसामाजिक जोखिम प्रबंधन को प्राथमिकता देने का आग्रह करती है।
- भारत में पहली बार मनाया गया: मई दिवस पहली बार भारत में 1 मई 1923 को मद्रास (चेन्नई) में औपचारिक रूप से मनाया गया था।
- इस कार्यक्रम का आयोजन मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार द्वारा किया गया था, जो एक साम्यवादी नेता और लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान के संस्थापक थे।
- वर्ष 1923 का यह आयोजन ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह लाल झंडा (जो श्रम और कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रतीक है) को भारत में पहली बार फहराए जाने का प्रतीक बना।
भारत में श्रमिकों के लिये संवैधानिक प्रावधान
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वर्ग |
अनुच्छेद |
प्रावधान / मुख्य विशेषता |
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मौलिक अधिकार (भाग III) |
अनुच्छेद 19(1)(c) |
संघ या ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार |
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अनुच्छेद 23 |
मानव तस्करी और बलात श्रम (बेगार) पर रोक लगाता है। |
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अनुच्छेद 24 |
खतरनाक कार्यों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम करवाने पर रोक लगाता है। |
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नीति के निदेशक सिद्धांत (भाग IV) |
अनुच्छेद 39(e) |
श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति को शोषण से बचाता है |
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अनुच्छेद 41 |
काम करने, शिक्षा प्राप्त करने और सार्वजनिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार |
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अनुच्छेद 42 |
न्यायसंगत और मानवीय कार्य परिस्थितियाँ तथा मातृत्व अवकाश |
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अनुच्छेद 43 |
जीवन निर्वाह योग्य वेतन, सम्मानजनक जीवन स्तर, सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर |
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अनुच्छेद 43A |
प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) |
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और पढ़ें: अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस |
प्रारंभिक परीक्षा
राजस्व घाटे वाले राज्य और राजकोषीय स्थिरता की चुनौती
चर्चा में क्यों?
वित्त मंत्रालय की मासिक आर्थिक समीक्षा (अप्रैल 2026) ने रेखांकित किया है कि राजस्व घाटे और उच्च ऋण भार वाले राज्यों को राजकोषीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे झटकों का सामना करने में उनकी लचीलापन क्षमता सीमित हो सकती है और वे राजकोषीय वित्तपोषण के ‘गोल्डन रूल’ का उल्लंघन करने के जोखिम में आ सकते हैं।
भारत के राजकोषीय परिदृश्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
संघ
- केंद्रीय स्थिरता: केंद्र सरकार सतर्क राजकोषीय मार्ग बनाए हुए है, जिसे कर-उछाल के संयमित अनुमान (0.8) और नव-स्थापित आर्थिक स्थिरीकरण कोष का समर्थन प्राप्त है, जो बाहरी झटकों के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करता है, बिना राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को प्रभावित किये।
राज्य
- राज्य-स्तरीय राजस्व घाटा: 18 बड़े राज्यों में से 9 राज्य राजस्व घाटे में हैं, जिनमें हिमाचल प्रदेश (-2.4%), पंजाब (-2.2%), केरल (-2.1%), आंध्र प्रदेश (-1.1%), राजस्थान (-1.1%), हरियाणा (-0.9%), कर्नाटक (-0.7%), महाराष्ट्र (-0.7%) और छत्तीसगढ़ (-0.3%) शामिल हैं।
- ब्याज भुगतान का बोझ: उच्च ऋण-सेवा के कारण दबावग्रस्त राज्यों की ‘निर्णय लेने की स्वतंत्रता’ सीमित हो जाती है, पंजाब सबसे अधिक दबाव में है, जहाँ अपनी राजस्व प्राप्तियों का 22.8% ब्याज भुगतान पर खर्च किया जाता है।
- राजकोषीय घाटा उल्लंघन बनाम जानबूझकर निवेश: जहाँ 13 राज्य अपने राजकोषीय घाटे को GSDP के 3% या उससे अधिक पर निर्धारित कर रहे हैं, वहीं ओडिशा जैसे कुछ मामलों (3.5% राजकोषीय घाटा लेकिन 3% राजस्व अधिशेष) को राजकोषीय दबाव नहीं, बल्कि सोची-समझी पूंजीगत व्यय (GSDP का 6.5%) के रूप में देखा जाना चाहिये।
- राजस्व अधिशेष वाले राज्य: 8 राज्यों में राजस्व अधिशेष का अनुमान है, जिनमें प्रमुख रूप से ओडिशा (3%), झारखंड (2.5%), उत्तर प्रदेश (1.6%), गोवा (1.3%), गुजरात (0.8%), उत्तराखंड (0.6%), तेलंगाना (0.3%) और बिहार (0.1%) शामिल हैं।
- 16वें वित्त आयोग (FC) का प्रभाव: वित्त वर्ष 2026–27, 16वें वित्त आयोग की अवधि का पहला वर्ष है, जिसमें कर-वितरण के हिस्सों में संभावित बदलाव और राजस्व घाटा अनुदानों की अनुपस्थिति से जुड़े जोखिम सामने आते हैं।
- ऋण जोखिम: सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 35–45% तक कुल राज्य देनदारियाँ पहुँचने के साथ, दबावग्रस्त राज्य अधिक केंद्रीय हस्तांतरण की मांग कर सकते हैं, जिससे केंद्र के अपने राजकोषीय समेकन मार्ग जटिल हो सकते हैं।
भारत के राजकोषीय परिदृश्य से जुड़ी क्या चिंताएँ हैं?
केंद्र सरकार की राजकोषीय चिंताएँ
- राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का उल्लंघन: यद्यपि 2026–27 के बजट में राजकोषीय घाटा 4.3% अनुमानित किया गया है, कुछ शोध संस्थाएँ जैसे BMI का मानना है कि आपातकालीन व्यय बढ़ने के कारण यह बढ़कर 4.5% तक पहुँच सकता है।
- GDP वृद्धि पर दबाव: वित्त वर्ष 2026–27 के लिये केंद्र का प्रारंभिक 7–7.4% वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान दबाव में है। संभावित मंदी सीधे कर आधार को सीमित करती है, जिससे राजस्व संग्रह के लक्ष्यों को बनाए रखना कठिन हो जाता है। उदाहरणतः IMF ने 2026–27 के लिये भारत की वृद्धि दर केवल 6.5% और CPI मुद्रास्फीति 4.7% रहने का अनुमान लगाया है।
- ऊर्जा और सब्सिडी बिल: इंडियन क्रूड बास्केट के लगभग USD 113–115 प्रति बैरल के स्तर पर रहने के कारण, केंद्र को भारी आयात बिलों का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे तेल की ऊँची वैश्विक कीमतें केंद्र को उपभोक्ताओं को बचाने के लिये उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के माध्यम से लागतों को वहन करने के लिये मजबूर करती हैं, जिससे सीधे तौर पर आर्थिक स्थिरीकरण कोष की निकासी होती है।
- लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति और मांग संपीड़न: होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्त्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में व्यवधान ने माल ढुलाई और बीमा लागतों को बढ़ा दिया है। इसके कारण थोक मुद्रास्फीति बढ़कर 3.88% हो गई है, जिससे व्यवसाय आगत लागतों को उपभोक्ताओं पर डालने पर मज़बूर हो रहे हैं, जो मांग में कमी (घटता हुआ उपभोक्ता व्यय) बढ़ाता है।
राज्य सरकारों की राजकोषीय चिंताएँ
- राजस्व में अस्थिरता: बढ़ती तेल की कीमतों (ब्रेंट क्रूड USD 120/बैरल से अधिक) के साथ, राज्य उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करने के लिये वैट दरों में कटौती करने का भारी दबाव महसूस कर रहे हैं।
- उच्च "लागत-जन्य" मुद्रास्फीति विवेकाधीन खर्च (discretionary spending) को संपीड़ित करने की धमकी दे रही है। यदि उपभोक्ता गैर-आवश्यक वस्तुओं पर खर्च कम करते हैं, तो राज्य GST (SGST) की वृद्धि दर धीमी होने की संभावना है।
- वित्तीय वित्तपोषण के "स्वर्ण नियम" का उल्लंघन: सबसे महत्त्वपूर्ण खतरा राज्यों का स्वर्ण नियम — शून्य राजस्व घाटा बनाए रखने में विफल होना है। विश्लेषण किये गए 18 प्रमुख राज्यों में से नौ (जिनमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब और केरल शामिल हैं) राजस्व घाटे में चल रहे हैं, जिसका अर्थ है कि वे संपत्ति सृजन के बजाय आवर्ती उपभोग (वेतन, सब्सिडी) के वित्तपोषण के लिये उधार ले रहे हैं।
- केंद्र पर बेलआउट का दबाव: संकुचित राजकोषीय स्थान वाले तनावग्रस्त राज्यों में ठीक उस समय उच्च केंद्रीय हस्तांतरण या ऋण सीमा में सुस्तता की मांग करने की संभावना बढ़ जाती है, जब केंद्र अपने स्वयं के राजकोषीय समेकन का प्रयास कर रहा होता है।
राजकोषीय वित्तपोषण का स्वर्ण नियम
- परिचय: वित्तीय वित्तपोषण का 'स्वर्ण नियम' सार्वजनिक वित्त का एक सिद्धांत है, जो कहता है कि सरकार को केवल पूंजीगत परियोजनाओं में निवेश करने के लिये ऋण लेना चाहिये, न कि अपने दैनिक व्यय को निधिबद्ध करने के लिये।
- अनिवार्यतः यह निर्देश देता है कि एक आर्थिक चक्र पर, सरकार को अपने वर्तमान बजट को संतुलित करना चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि वर्तमान करदाता उन सेवाओं के लिये भुगतान करें जिनका वे आज उपभोग करते हैं, जबकि दीर्घकालिक परिसंपत्तियों की लागत भविष्य की पीढ़ियों के साथ साझा की जाती है जो उनसे लाभान्वित होंगी।
- स्वर्ण नियम की आवश्यकता:
- अंतर-पीढ़ीगत न्याय: वर्तमान उपभोग (जैसे वेतन) के लिये ऋण लेना भविष्य की पीढ़ियों पर अनुचित रूप से बोझ डालता है, जबकि पुलों/सेतुओं जैसे दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे के लिये ऋण उचित है, क्योंकि वे भविष्य के नागरिक उन परिसंपत्तियों से लाभान्वित होते हैं जिन्हें वे चुकाने में सहायता करते हैं।
- आर्थिक विकास: बुनियादी ढाँचे में निवेश से आमतौर पर उच्च राजकोषीय गुणक होता है, जिसका अर्थ है कि यह रोज़गार उत्पन्न करता है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को बढ़ावा देता है, जिससे सरकार के लिये भविष्य में ऋण चुकाना आसान हो जाता है।
- राजकोषीय अनुशासन: यह सरकारों को लोकप्रिय लेकिन अस्थायी सामाजिक योजनाओं या सब्सिडी को निधिबद्ध करने के लिये पैसे उधार लेने के "आसान रास्ते" से रोकता है, जो अस्थिर ऋण स्तरों और मुद्रास्फीति को जन्म दे सकता है।
भारत के राजकोषीय परिदृश्य को सुदृढ़ करने के लिये किन कदमों की आवश्यकता है?
केंद्र सरकार के लिये रणनीतियाँ
- आक्रामक ऊर्जा कूटनीति: राजकोषीय दृष्टिकोण को सुदृढ़ करने के लिये गैर-पश्चिम एशियाई ऊर्जा उत्पादकों (जैसे रूस, ब्राज़ील और गुयाना) के साथ सरकार-से-सरकार (G2G) समझौतों की ओर केंद्रित प्रयास की आवश्यकता है। इससे कच्चे तेल और LNG के लिये भुगतान किये जाने वाले "प्रीमियम संबंधी जोखिम" में कमी आती है, जो प्रत्यक्ष रूप से केंद्र के आयात बिल को कम करता है और व्यापार संतुलन की रक्षा करता है।
- पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता: 7% की विकास दर बनाए रखने के लिये, केंद्र को ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर जैसे उच्च-गुणक (हाई-मल्टीप्लायर) क्षेत्रों के लिये अपने पूंजीगत व्यय बजट की रक्षा करनी चाहिये।
- मौद्रिक-राजकोषीय समन्वय: वित्त मंत्रालय को विनिमय दर प्रबंधन के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के साथ मिलकर कार्य करना चाहिये। एक स्थिर रुपया "आयातित मुद्रास्फीति" को सरकारी ऋण और आवश्यक आयातों की लागत को बढ़ाने से रोकने के लिये आवश्यक है।
राज्य सरकारों के लिये रणनीतियाँ
- राजस्व स्रोतों का विविधीकरण: राज्यों को पेट्रोलियम उत्पादों पर VAT से होने वाली अत्यधिक निर्भरता कम करनी चाहिये, क्योंकि संघर्ष की स्थितियों में यह राजस्व अत्यधिक अस्थिर हो सकता है। डिजिटलीकरण के माध्यम से राज्य उत्पाद शुल्क एवं स्टाम्प शुल्क से संग्रहण को सुदृढ़ कर अधिक स्थिर राजकोषीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
- हरित ऊर्जा उपायों को अपनाना: सार्वजनिक परिवहन एवं सरकारी परिचालन के लिए ईंधन लागत में उतार-चढ़ाव से राज्य बजट को सुरक्षित रखने हेतु राज्यों को इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) तथा सिंचाई के लिए विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा (सोलर पंप) की ओर संक्रमण में तेज़ी लानी चाहिये। इससे समय के साथ राज्य स्तर पर ईंधन सब्सिडी का बोझ कम होगा।
- विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन: राज्यों को FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन) लक्ष्यों का पालन करते हुए राजकोषीय घाटे को GSDP के 3% के भीतर बनाए रखना चाहिये तथा ऑफ-बजट उधारी को समाप्त करना चाहिये।
- संघर्षजनित उच्च ब्याज दरों के दौर में राज्यों को उत्पादक उधारी (Productive Borrowing) को प्राथमिकता देनी चाहिये अर्थात केवल ऐसे परियोजनाओं में निवेश करना चाहिये जो त्वरित रोज़गार या राजस्व सृजन करें, न कि राजस्व घाटे की पूर्ति के लिये ऋण पर निर्भर रहें।
- प्रदर्शन को प्रोत्साहन: 16वें वित्त आयोग ने अनुपालन-आधारित अनुदानों (20% प्रदर्शन-आधारित) की व्यवस्था की है। इन निधियों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिये राज्यों को संपत्ति कर सुधारों तथा प्रशासनिक दक्षता पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया संघर्ष बढ़ती ऊर्जा लागत तथा उप-राष्ट्रीय राजकोषीय दबाव की दोहरी चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि केंद्र का आर्थिक स्थिरीकरण कोष अल्पकालिक राहत प्रदान कर सकता है, किंतु दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य ‘वित्तपोषण के स्वर्णिम सिद्धांत’ का पालन करें तथा सुदृढ़ संघीय विकास को सुनिश्चित करने हेतु उत्पादक पूंजीगत व्यय की दिशा में संक्रमण करें।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न: ‘राजकोषीय वित्तपोषण का ‘स्वर्णिम नियम’ उप-राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता के लिये अनिवार्य है।’ भारतीय राज्यों के मध्य वर्तमान राजकोषीय असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में शून्य राजस्व घाटा प्राप्त करने की चुनौतियों का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. राजकोषीय वित्तपोषण का "स्वर्णिम नियम" क्या है?
यह उस सिद्धांत को संदर्भित करता है, जिसके अनुसार सरकारों को केवल पूंजीगत व्यय (संपत्ति सृजन) के वित्तपोषण हेतु ही उधार लेना चाहिये तथा शून्य राजस्व घाटा बनाए रखना चाहिये, ताकि उधारी का उपयोग दैनिक उपभोग संबंधी व्यय के लिये न हो।
2. वैश्विक संकटों के दौरान आर्थिक स्थिरीकरण कोष केंद्र सरकार की कैसे सहायता करता है?
आर्थिक स्थिरीकरण कोष लोक लेखा (Public Account) में एक राजकोषीय सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जिससे केंद्र सरकार उच्च कच्चे तेल की कीमतों जैसे अल्पकालिक ‘आपूर्ति आघात’ को अपने राजकोषीय घाटा लक्ष्यों से तत्काल विचलित हुए बिना वहन कर सकती है।
3. लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति वर्तमान राजकोषीय परिदृश्य में ‘मांग संकुचन’ को किस प्रकार उत्पन्न करती है?
बढ़ती माल-परिवहन और ऊर्जा लागत व्यवसायों को अतिरिक्त व्यय उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित करने के लिये बाध्य करती है, जिससे थोक मुद्रास्फीति बढ़ती है, विवेकाधीन व्यय घटता है तथा राज्य GST (SGST) संग्रह की गति प्रभावित हो जाती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित में से किस एक का अपने प्रभाव में सर्वाधिक स्फीतिकारी होने की संभावना है? (2013)
(a) लोक ऋण की चुकौती
(b) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये जनता से ऋणादान
(c) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये बैंकों से ऋणादान
(d) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये नई मुद्रा का सृजन
उत्तर: (d)
प्रश्न. शासन के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अंतर्वाह को प्रोत्साहित करना
- उच्च शिक्षण संस्थानों का निजीकरण
- नौकरशाही का आकार कम करना
- सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों की बिक्री/ऑफलोडिंग
भारत में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के उपायों के रूप में उपर्युक्त में से किनका उपयोग किया जा सकता है?
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. पूंजी बजट और राजस्व बजट के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये। इन दोनों बजटों के संघटकों को समझाइये। (2021)
प्रश्न. उदारीकरण के बाद की अवधि के दौरान बजट बनाने के संदर्भ में सार्वजनिक व्यय प्रबंधन भारत सरकार के लिये एक चुनौती है। स्पष्ट कीजिये। (2019)
रैपिड फायर
बाँदीपुर राष्ट्रीय उद्यान में वन कर्मचारियों की हड़ताल
बाँदीपुर नेशनल पार्क में अस्थायी वन कर्मचारियों ने आउटसोर्सिंग व्यवस्था को समाप्त करने और वन विभाग से सीधे वेतन भुगतान की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है।
बाँदीपुर टाइगर रिज़र्व
- स्थान: बाँदीपुर टाइगर रिज़र्व कर्नाटक में स्थित है और इसे वर्ष 1974 में एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में स्थापित किया गया था, बाद में यह प्रोजेक्ट टाइगर का एक हिस्सा बन गया।
- भू-दृश्य: यह पश्चिमी घाट के भू-दृश्य में स्थित है, जो विश्व की लगभग एक-आठवीं बाघ आबादी का समर्थन करता है और नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व का एक हिस्सा बनाता है, जो भारत का पहला बायोस्फीयर रिज़र्व (1986) है।
- यह अभयारण्य मैसूर एलीफेंट रिजर्व का भी हिस्सा है, जो एशियाई हाथियों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर है।
- कनेक्टिविटी: यह रिज़र्व नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान, मुदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान और वायनाड वन्यजीव अभयारण्य के साथ सीमाएँ साझा करता है, जो कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में बाँदीपुर-नागरहोल-वायनाड-मुदुमलाई-सत्यमंगलम भू-दृश्य में एक निरंतर आवास का निर्माण करता है।
- जीव-जंतु: रिज़र्व में बाघ, हाथी, तेंदुए, गौर (जंगली भैंसा) और विभिन्न हिरण प्रजातियों सहित समृद्ध वन्यजीव हैं, जो इसे एक जैवविविधता हॉटस्पॉट बनाते हैं।
- वनस्पति: वनस्पति में मुख्य रूप से शुष्क पर्णपाती वन, आर्द्र पर्णपाती वन और झाड़ीदार भूमि शामिल हैं, जो उच्च पारिस्थितिक विविधता में योगदान करते हैं।
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रैपिड फायर
लोक लेखा समिति
के.सी. वेणुगोपाल को संसद की लोक लेखा समिति (PAC) के 2026-27 कार्यकाल के लिये पुनः अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
- परिचय: भारत की संसदीय व्यवस्था में लोक लेखा समिति (PAC) सरकारी व्यय एवं वित्तीय प्रबंधन की समीक्षा करके कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- उत्पत्ति एवं विकास: लोक लेखा समिति (PAC) की स्थापना वर्ष 1921 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के पश्चात की गई थी तथा 1950 में संविधान लागू होने के बाद यह एक पूर्ण विकसित संसदीय समिति के रूप में विकसित हुई।
- वर्ष 1967 से भारतीय संसद में यह स्थापित परंपरा रही है कि लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष की नियुक्ति विपक्षी दल से की जाती है, जिससे जवाबदेही और अधिक सुदृढ़ होती है।
- संरचना: लोक लेखा समिति (PAC) में कुल 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 सदस्य लोकसभा तथा 7 सदस्य राज्यसभा से होते हैं। इनका निर्वाचन प्रतिवर्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से किया जाता है।
- मंत्रियों को समिति का सदस्य बनने के लिये पात्र नहीं माना जाता, जिससे इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है, तथा सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
- समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
- मुख्य कार्य: लोक लेखा समिति (PAC) विनियोग लेखों (Appropriation Accounts), वित्त लेखों (Finance Accounts) तथा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों की जांच करती है।
- यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक धन का उपयोग विधिसम्मत, दक्षतापूर्वक तथा संसद द्वारा अनुमोदित उद्देश्यों के लिये ही किया जाए, जिससे वित्तीय अनुशासन बना रहे।
- जाँच का दायरा: लोक लेखा समिति (PAC केवल व्यय की वैधानिकता की जाँच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सरकारी व्यय की दक्षता, मितव्ययिता और औचित्य का भी मूल्यांकन करती है।
- यह वित्तीय अनियमितताओं, अपव्यय तथा हानियों के मामलों की पहचान करती है और उनकी पुनरावृत्ति को रोकने हेतु सुधारात्मक एवं अनुशासनात्मक उपायों की अनुशंसा करती है।
- अतिरिक्त व्यय में भूमिका: जब सरकारी व्यय संसद द्वारा स्वीकृत राशि से अधिक हो जाता है, तब लोक लेखा समिति (PAC) उसके कारणों की जाँच करती है तथा अपनी अनुशंसाएँ प्रस्तुत करती है।
- ऐसे अतिरिक्त व्ययों को बाद में संविधान के अनुच्छेद 115 के अंतर्गत नियमित किया जाता है, जिससे वित्तीय मामलों पर संसदीय नियंत्रण सुनिश्चित होता है।
- महत्त्व: लोक लेखा समिति (PAC) संसद के वित्तीय प्रहरी के रूप में कार्य करती है तथा सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और विवेकपूर्ण प्रबंधन को बढ़ावा देती है। यह आधुनिक प्रशासनिक राज्य में वित्तीय निगरानी की जटिलता को नियंत्रित करने में संसद की सहायता करती है।
- CAG से संबंध: लोक लेखा समिति (PAC) का कार्य नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसकी कार्यवाही का आधार CAG की ऑडिट रिपोर्टें होती हैं।
- CAG विभिन्न प्रकार के लेखा-परीक्षण करता है, जिनमें वैधता, नियमितता, औचित्य और निष्पादन से संबंधित ऑडिट शामिल हैं और उसे समिति का ‘मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक’ माना जाता है।
- PAC अपनी अनुशंसाओं पर सरकार से सामान्यतः छह माह के भीतर एक्शन टेकन नोट्स/रिपोर्ट्स (ATN/ATR) प्रस्तुत करने की अपेक्षा करती है। इसके अतिरिक्त, ऑडिट पैरा मॉनिटरिंग सिस्टम (APMS) जैसे तंत्र लागू किये गए हैं, जो ATN/ATR की निगरानी करते हैं और लंबित मामलों को कम करने में सहायता करते हैं।
रैपिड फायर
केरल के पवित्र उपवनों का जीर्णोद्धार
केरल ने स्थानीय भागीदारी के माध्यम से सांस्कृतिक परंपरा को वैज्ञानिक जैव विविधता प्रबंधन के साथ जोड़ते हुए, पवित्र उपवनों (कावू) के पुनर्स्थापन और संरक्षण के लिये एक रणनीतिक पायलट कार्यक्रम शुरू किया है।
- कावू नर्सरी: यह स्थानीय पवित्र उपवन की पादप प्रजातियों के प्रवर्द्धन के लिये नर्सरी स्थापित करने की एक विशेष पहल है, जो जीर्णोद्धार हेतु स्थानिक और औषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
- आक्रामक प्रजाति प्रबंधन: यह उन आक्रामक प्रजातियों और प्लास्टिक अपशिष्ट की व्यवस्थित पहचान और हटाने पर केंद्रित है, जो इन सूक्ष्म पारिस्थितिक तंत्रों के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को खतरे में डालते हैं।
- पारिस्थितिक पुनर्स्थापन गतिविधियाँ: इनमें जैव विविधता का आकलन, देशी पौधों का उपयोग करके जैव-घेरा (bio-fencing) बनाना, तथा गर्मियों के दौरान वन्यजीवों के समर्थन के लिए संबंधित तालाबों का पुनर्जीवन शामिल है।
पवित्र उपवन
- विवरण: पवित्र उपवन ऐसे अविकृत वन या प्राकृतिक वनस्पति के क्षेत्र होते हैं जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा परंपरागत रूप से संरक्षित किया जाता है। ये प्रायः किसी स्थानीय देवता या पूर्वज आत्माओं को समर्पित होते हैं।
- इन उपवनों में सभी प्रकार की वनस्पति और वन्यजीवों को ‘पवित्र’ माना जाता है। वृक्षों की कटाई, शिकार करना या यहाँ तक कि गिरी हुई पत्तियों को हटाना भी स्थानीय परंपराओं और धार्मिक निषेधों के कारण सख्ती से प्रतिबंधित होता है। यह एक इन-सीटू संरक्षण विधि है।
भारत में पवित्र उपवन
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क्षेत्र |
स्थानीय नाम |
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बिहार और झारखंड |
सरना |
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राजस्थान |
ओरान |
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महाराष्ट्रा |
देवराई |
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मेघालय |
लॉ क्यंतांग |
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केरल |
कावू |
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कर्नाटक |
देवरा काडू |
सुरक्षा के लिये कानूनी और संस्थागत ढाँचा
- जैव विविधता अधिनियम, 2002: यह स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) के माध्यम से इन पवित्र उपवनों के संरक्षण का प्रावधान करता है।
- वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2002: इसमें ‘सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र’ की श्रेणी शामिल की गई, जिससे सरकार स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ पवित्र उपवनों को कानूनी संरक्षण प्रदान कर सकती है।
- जन जैव विविधता रजिस्टर (PBR): जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) को इन उपवनों में पाए जाने वाले पारंपरिक ज्ञान और प्रजातियों का दस्तावेजीकरण करने का कार्य सौंपा जाता है।
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रैपिड फायर
भारत का पहला ग्रीन मेथनॉल उत्पादन संयंत्र
आक्रामक झाड़ी प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा, जिसने लंबे समय से कच्छ के बन्नी घास के मैदानों में जैवविविधता को खतरा पहुँचाया है, का उपयोग अब भारत के पहले ग्रीन मेथनॉल उत्पादन संयंत्र के लिये फीडस्टॉक (कच्चे माल) के रूप में किया जाएगा।
- परिचय: गुजरात के दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण में स्थित इस संयंत्र की प्रारंभिक क्षमता 5 टन प्रति दिन होगी और यह गैसीकरण तकनीक (gasification technology) का उपयोग करके बायोमास को सिनगैस (H₂, CO, CO₂) में परिवर्तित करेगा, जिसे पुनः मेथनॉल में संसाधित किया जाएगा।
- यह एक निष्पादन परियोजना है, जिसका भविष्य में 100–500 टन प्रति दिन तक विस्तार करने की योजना है।
- महत्त्व: यह परियोजना भारत के हरित बंदरगाहों और स्वच्छ शिपिंग ईंधन के प्रयासों का समर्थन करती है, आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करती है और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन के वर्ष 2050 तक अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग में शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य के अनुरूप है, जिससे मेथनॉल जैसे हरित ईंधनों को अपनाने को बढ़ावा मिलता है।
ग्रीन मेथनॉल
- ग्रीन मेथनॉल (हरित मेथनॉल) एक न्यून-कार्बन, नवीकरणीय तरल ईंधन और रासायनिक फीडस्टॉक है, जो बायोमास (बायो-मेथनॉल) या हरित हाइड्रोजन से निर्मित होता है।
- यह पारंपरिक जीवाश्म-आधारित मेथनॉल का एक सतत, शुद्ध-शून्य (नेट-ज़ीरो) विकल्प है, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 60–95% तक कम करने में सक्षम है।
प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा
- प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा एक मैक्सिकन मूल की आक्रामक झाड़ी है, जिसे वर्ष 1920 के दशक के दौरान भारत में पेश किया गया था और बाद में वर्ष 1961 में मरुस्थलीकरण की जाँच के लिये गुजरात में इसे बड़े पैमाने पर फैलाया गया था।
- यह विभिन्न स्थानीय नामों से जानी जाती है, जैसे गांडो बावल (गुजरात), विलायती कीकर (उत्तर भारत), और वेलिकथन (तमिलनाडु)।
- समय के साथ, यह बन्नी घास के मैदानों में आक्रामक रूप से फैल गया है, जिससे देशी घास खत्म हो रही है, जैवविविधता कम हो रही है और कमज़ोर पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण हो रहा है।
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