एडिटोरियल (26 Aug, 2022)



यूनिवर्सल बेसिक इनकम

यह एडिटोरियल 25/08/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Making out a case for the other UBI in India” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) की संभावनाओं और इसके विकल्पों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी विघटनकारी प्रौद्योगिकियाँ ऐसे उत्पादकता लाभ उत्पन्न कर रही हैं जैसा पहले कभी नहीं रहा था। वे मानव पूंजी की आवश्यकताओं को भी लगातार कम कर रही हैं, नौकरियों को प्रीमियम बना रही हैं।

  • यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) को घटते रोज़गार अवसरों के मंडराते संकट के समाधान और निर्धनता उन्मूलन के एक प्रभावी साधन के रूप में देखा जाता है। UBI के विचार ने हाल के समय में लोकप्रियता हासिल की है, विशेषकर कोविड-19 महामारी के आलोक में पुनः यह चर्चा के केंद्र में है।
  • भारत में राष्ट्रीय बायोमीट्रिक डेटाबेस से लिंक्ड प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के तीव्र विस्तार और बुनियादी आय के साथ किये गए छोटे प्रयोगों ने UBI के संबंध में बहस छेड़ दी है।
  • इसके पक्षकारों का मानना है कि यह ‘नो-स्ट्रिंग-अटैच्ड पेमेंट’ भारत के अपेक्षा से कम प्रदर्शन कर रहे गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों और सब्सिडी की विकृति प्रणाली में मदद कर सकते हैं, लेकिन इसके आलोचक आशंका रखते हैं ये पहले से ही कमज़ोर सामाजिक सुरक्षा प्रणाली को और कमज़ोर कर देंगे, जबकि श्रमिकों को कार्यबल छोड़ने और फिजूलखर्ची के लिये प्रोत्साहित करेंगे।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम क्या है?

  • यूनिवर्सल बेसिक इनकम या सार्वभौमिक बुनियादी आय एक सामाजिक-राजनीतिक वित्तीय हस्तांतरण नीति प्रस्ताव है जिसमें किसी देश के सभी नागरिकों को कानूनी रूप से और एकसमान रूप से निर्धारित वित्तीय अनुदान प्राप्त होता है जो सरकार द्वारा भुगतान किया जाता है।
    • UBI को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।
  • यह एक शर्तरहित भुगतान है। यह मान्यता रखता है कि केवल नागरिक होने के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के लिये अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एक बुनियादी आय का अधिकार होना चाहिये।
  • वर्ष 2016 में UBI का विचार तब सुर्ख़ियों में आया था जब वर्ष 2016-2017 के भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में इस पर 40 पृष्ठों में भारत की गरीबी के लिये एक गंभीर एवं व्यवहार्य समाधान और समग्र रूप से स्वस्थ अर्थव्यवस्था हेतु एक आशा के रूप में विचार किया गया था।
    • भारतीय आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि ‘‘UBI नागरिकों को राज्य के साथ पितृसत्तात्मक और ग्राहकवादी संबंधों से मुक्त करता है।’’
  • UBI के मुख्य रूप से 4 घटक हैं:
    • सार्वभौमिकता: यह प्रकृति में सार्वभौमिक है।
    • आवधिकता: नियमित अंतराल पर भुगतान (एकमुश्त अनुदान नहीं)
    • व्यक्तिपरकता: व्यक्तियों को भुगतान
    • शर्तरहित: नकद हस्तांतरण के साथ कोई पूर्व शर्त संलग्न नहीं है

भारत में UBI पर बहस क्यों बढ़ रही है?

  • भारत समाज के निचले तबके के लोगों की मदद करने के लिये सब्सिडी और हस्तांतरण भुगतान पर निर्भर रहा है।
    • केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न कार्यक्रमों में बजटीय आवंटन का एक बड़ा हिस्सा व्यय होता है।
  • इन कार्यक्रमों की एक बड़ी संख्या खंडित है और प्रशासनिक खामियों से ग्रस्त है। करदाताओं का पैसा प्रायः बिचौलियों की जेब तक पहुँच उद्देश्य खो देता है।
  • इसके अतिरिक्त, खाद्य और ईंधन सहित विभिन्न आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं पर सब्सिडी देना गरीबों को उन वस्तुओं का उपभोग करने के लिये विवश करता है और उनके पास गुणवत्ता या लागत पर विचार करने का विकल्प नहीं होता।
    • भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्थानिक प्रकृति के भ्रष्टाचार और अपव्यय से ग्रस्त है।
  • सब्सिडी को नकद हस्तांतरण के साथ प्रतिस्थापित करने से कम से कम यह सुनिश्चित हो सकेगा कि प्राप्तकर्ताओं को इच्छित मौद्रिक लाभ के साथ-साथ चयन/पसंद की स्वतंत्रता भी मिल रही है।

भारत में UBI के पक्ष में तर्क

  • सामाजिक न्याय: कोई भी समाज तब तक न्यायसंगत या स्थिर नहीं हो सकता जब तक वह समाज के सभी सदस्यों को एक हिस्सेदारी प्रदान नहीं करता। यूनिवर्सल बेसिक इनकम समाज के कई बुनियादी मूल्यों को बढ़ावा देती है जो सभी व्यक्तियों को स्वतंत्र और एकसमान मानती है।
    • UBI सामाजिक न्याय और उत्पादक अर्थव्यवस्था दोनों के संबंध में दृष्टिकोण में एक आमूलचूल परिवर्तन को इंगित करती है।
  • प्रशासनिक दक्षता: UBI अलग-अलग कई सरकारी योजनाओं और उनके कार्यान्वयन के प्रशासनिक भार के वित्तपोषण के बोझ को कम करेगी।
    • UBI, अपनी अभिकल्पना में, भ्रष्ट तरीके से आवंटन एवं लीकेज संबंधी मुद्दों से प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकेगी क्योंकि हस्तांतरण प्रत्यक्षतः लाभार्थियों के बैंक खातों में निर्देशित होंगे।
    • इसके साथ ही, लीकेज का अवसर कम होने के कारण अन्य योजनाओं की तुलना में UBI की निगरानी करना अधिक आसान होगा।
  • रोज़गार: UBI एक न्यूनतम जीवन स्तर प्रदान करने की गारंटी देने (भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43) के सरकार के कर्तव्य की पुष्टि है जो अनिश्चित रोज़गार सृजन के वर्तमान समय में और भी आवश्यक है।
    • इसके अलावा, UBI श्रम बाज़ार के लिये नई संभावनाओं के द्वार भी खोल सकती है।
    • वे अधिक गैर-शोषक सौदेबाजी की अनुमति देते हैं क्योंकि व्यक्तियों को केवल निर्वाह के लिये किसी भी कार्य स्थिति को स्वीकार करने के लिये विवश नहीं किया जा सकेगा।
  • आघातों के विरुद्ध बीमा: गरीब परिवारों को प्रायः खराब स्वास्थ्य, नौकरी छूटने अथवा झटके जैसे फसल का नुकसान, जलजनित रोग, संपत्ति की हानि और प्राकृतिक आपदाओं जैसे आघात सहने होते हैं।
    • UBI स्वास्थ्य, आय और अन्य आघातों के विरुद्ध एक सुरक्षा जाल प्रदान करेगी।
  • चयन की स्वतंत्रता: UBI लाभार्थियों को एजेंट के रूप में देखती है और नागरिकों को अपने विवेक से कल्याणकारी व्यय का उपयोग करने की ज़िम्मेदारी सौंपती है।
  • वित्तीय समावेशन में सुधार: भुगतान हस्तांतरण बैंक खातों के अधिकाधिक उपयोग को प्रोत्साहित करेगा, जिससे बैंकिंग कोरेस्पोंडेंट (BC) के लिये उच्च लाभ उत्पन्न करेगा और वित्तीय समावेशन में एक अंतर्जात सुधार होगा।
    • क्रेडिट से बढ़ी हुई आय निम्न आय स्तर वाले लोगों के लिये क्रेडिट तक पहुँच की बाधाओं को दूर करेगी।
  • महिला सशक्तिकरण: वर्ष 2011 में मध्य प्रदेश के 8 गाँवों में 18 माह तक यूनिवर्सल बेसिक इनकम का प्रायोगिक अध्ययन किया गया।
    • भारत में UBI परीक्षण (2013-2014) की समीक्षा करते हुए ‘सेवा भारत’ और यूनिसेफ ने निष्कर्ष दिया कि ‘‘महिला सशक्तिकरण इस प्रयोग के महत्त्वपूर्ण परिणामों में से एक था।’’
      • UBI प्राप्त करने वाली महिलाओं को घरेलू निर्णय लेने में अधिक भागीदारी प्राप्त हुई और वे भोजन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा तक बेहतर पहुँच से लाभान्वित हुईं।

भारत में UBI के विपक्ष में तर्क

  • उच्च सरकारी व्यय: यदि UBI सार्वभौमिक रूप से लागू होगी (यानी वित्तीय सक्षमता पर विचार किये बिना सभी नागरिक डिफ़ॉल्ट रूप से लाभार्थी होंगे) तो भारत में मौजूदा अमीर-गरीब अंतराल और बढ़ जाएगा।
    • एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण अपनाने के परिणामस्वरूप उच्च सरकारी व्यय की स्थिति बनेगी क्योंकि यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी नागरिक इससे बाहर न हो।
    • एक बार UBI की शुरुआत कर देने के बाद विफलता की स्थिति में फिर सरकार के लिये इसे वापस लेना कठिन हो सकता है।
  • सुप्रकट व्यय: UBI प्राप्तकर्ताओं के व्यवहार से आबद्ध नहीं है और वे अपनी इच्छानुसार व्यय करने के लिये स्वतंत्र हैं। वित्तीय प्रबंधन के बारे में जागरूकता की कमी से कई परिवार फिजूलखर्ची की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
    • इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि प्रदान किये गए धन को उत्पादक गतिविधियों, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च किया जाएगा। इसे तंबाकू, शराब, ड्रग्स और अन्य विलासिता की वस्तुओं पर खर्च किया जा सकता है।
  • श्रम शक्ति में कमी: न्यूनतम गारंटीकृत आय लोगों को आलसी बना सकती है और वे श्रम बाज़ार से बाहर निकल सकते हैं।
    • किसी भी पारस्परिक आदान-प्रदान की अनुपस्थिति में, भारत में UBI आसानी से एक ऐसी योजना में बदल सकती है जो कामकाजी उम्र के वयस्कों को याचक या आश्रित में बदल देगी जिनके जीवन में कोई भी वास्तविक उद्देश्य या दिशा नहीं होगी।
  • मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि: खाद्य कार्यक्रमोंआदि को UBI से प्रतिस्थापित करने से लोग अधिक बाज़ार जोखिम और मुद्रास्फीति का शिकार हो सकते हैं।
    • कीमतों में उतार-चढ़ाव उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को प्रभावित करेगा।
  • सरकार और लाभार्थियों के बीच कनेक्टिविटी चैनल का अभाव: भारत में निर्धनतम लोग अधिकांशतः दूरदराज के इलाकों में रहते हैं और बैंकिंग एवं मोबाइल फोन जैसी सुविधाओं से वंचित हैं।
    • देश के सभी क्षेत्र बैंकिंग सुविधा से संपन्न नहीं हैं और बैंकिंग सेवाओं को भौतिक रूप से प्राप्त करने में बहुत समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।
  • संघीय चुनौती: कार्यक्रम के लिये लागत साझा करने के प्रश्न पर केंद्र-राज्य के बीच सहमति कायम होने तक इसके कार्यान्वयन में देरी हो सकती है।
    • चूँकि भारतीय राज्य विकास के विभिन्न स्तरों पर हैं, एक समान वित्तीय हस्तांतरण बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।

आगे की राह

  • ‘फ़ूड फ़ॉर थॉट’: UBI एक प्रभावशाली विचार है, जो अभी भले ही कार्यान्वयन के लिये उपयुक्त नहीं हो, लेकिन गंभीर चर्चा के लिये परिपक्व विषय है।
    • मध्य प्रदेश सहित दुनिया भर में UBI की विभिन्न पायलट परियोजनाओं ने सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं और गरीब लोगों के कल्याण में सुधार के मामले में प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण के लाभों को उजागर किया है।
      • किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले यह परीक्षण का विषय होना चाहिए।
  • अर्द्ध-सार्वभौमिक बुनियादी आय (Quasi-Universal Basic Income): मध्यम मार्ग अपनाना अधिक विवेकपूर्ण होगा। सरकार को मौजूदा नकदी-रहित ऐसे कार्यक्रमों को बनाए रखना चाहिये जो खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता और शिक्षा जैसे आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं।
    • समय के साथ जब आय हस्तांतरण के लिये एक स्थिर प्रणाली का निर्माण कर लिया जाए, तब UBI पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
  • विश्व भर में UBI का भविष्य: UBI ने एक असंबद्ध सामाजिक सुरक्षा जाल की परिकल्पना की है जो सभी के लिये एक सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। यह ऐसी अवधारणा है जो वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और स्वचालन से प्रभावित वैश्विक अर्थव्यवस्था में कर्षण प्राप्त कर सकती है।
  • यूनिवर्सल बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर/बीमा: UBI में तुरंत कूद पड़ने के बजाय बुनियादी ढाँचे में सुधार और बीमा तक पहुँच पर ध्यान दिया जाना चाहिये।
    • कहा गया है कि “यदि आप किसी व्यक्ति को एक मछली देते हैं तो आप एक दिन के लिये उसका पेट भरते हैं। यदि आप एक आदमी को मछली पकड़ना सिखा देते हैं तो आप जीवन भर के लिये उसे पेट भरना सीखा देते हैं"। प्रभावी शिक्षा प्रणाली कुशल युवाओं का उत्पादन करेगी और UBI की आवश्यकता को ही समाप्त कर देगी।

अभ्यास प्रश्न: क्या भारत से गरीबी उन्मूलन के लिये यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) एक प्रभावी साधन हो सकती है? समालोचनात्मक विश्लेषण करें।