एडिटोरियल (10 Sep, 2019)



भारत की चीनी सब्सिडी के खिलाफ आधारहीन मामला

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में भारत पर कथित रूप से उच्च सब्सिडी प्रदान करने के आरोपों पर चर्चा की गई है तथा आवश्यकतानुसार टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ:

एक ऐसे समय में जब भारत का चीनी क्षेत्र गहन संकट में है, विश्व व्यापार संगठन में कुछ देशों (ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और ग्वाटेमाला) ने आरोप लगाया है कि भारत गन्ने के उत्पादन के कुल मूल्य की सीमा तक जाकर सब्सिडी सहायता प्रदान कर रहा है। यह गलत आरोप क्यों लगाया जा रहा है, विश्व व्यापार संगठन में भारत के विरूद्ध मुख्य आरोप क्या हैं और भारत की चीनी सब्सिडी की वास्तविकता क्या है? यह लेख इन्हीं प्रश्नों पर विचार करता है।

  • विश्व व्यापार संगठन में ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और ग्वाटेमाला ने भारत के विरुद्ध विवाद-कार्यवाही (Dispute proceedings) की पहल की है। उनके आरोप का मूल बिंदु यह है कि भारत चीनी से संबंधित अपनी नीतियों के माध्यम से जो घरेलू सब्सिडी प्रदान करता है, वह चीनी के उत्पादन मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक है और यह कृषि पर विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत उत्पाद-विशिष्ट समर्थन की सीमा (10 प्रतिशत) का उल्लंघन है।
  • इन विवादित मुद्दों के समाधान के लिये परामर्श प्रक्रिया (Consultation Process) की असफलता के बाद WTO द्वारा इस वर्ष 15 अगस्त को एक पैनल की स्थापना की गई जो कृषि पर WTO प्रावधानों के प्रति भारत की चीनी नीतियों की संगतता/अनुपालन का परीक्षण करेगा। इस विवाद पर अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करने में WTO पैनल 6-9 माह का समय लेगा। यह विचार करना प्रासंगिक होगा कि भारत की ऐसी कौन-सी आरोपित सब्सिडी योजनाएँ हैं जिनका पैनल द्वारा परीक्षण किया जाएगा?

समर्थनकारी उपाय (Support Measures)

  • कुछ निर्यात सब्सिडी उपायों के अलावा तीनों देशों ने भारत के विभिन्न घरेलू समर्थन उपायों, जैसे उचित एवं लाभकारी मूल्य (Fair and Remunerative Price- FRP), राज्य समर्थित मूल्य (State Advised Price- SAP), ब्याज अनुदान, उत्पादन सब्सिडी, बफर स्टॉक सब्सिडी, चीनी का न्यूनतम घरेलू बिक्री मूल्य और राज्य-स्तरीय उपायों को चुनौती दी है।
  • भारत के घरेलू समर्थन पर ध्यान केंद्रित करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने दावा किया है कि मात्र FRP नीति के ही एक समर्थनकारी उपाय के माध्यम से भारत ने लगभग 74,700 करोड़ रुपए की सब्सिडी प्रदान की है। इसे वर्ष 2015-16 में गन्ने के उत्पादन के मूल्य का 99 प्रतिशत बताते हुए भारत पर आरोप लगाया गया है कि इसने 10 प्रतिशत की अनुमत सीमा का उल्लंघन किया है। इसी प्रकार यदि अन्य समर्थनकारी उपायों के बजटीय समर्थन पर भी विचार किया जाए तो गन्ना क्षेत्र को प्रदत्त समर्थन, उत्पादन के कुल मूल्य से अधिक साबित किया जा सकता है।

भारत में गन्ना किसानों के वर्तमान संकटपूर्ण परिदृश्य के बीच भारत पर कथित रूप से उच्च सब्सिडी प्रदान करने के इन आरोपों को कैसे देखा जाए?

  • इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में गन्ना किसानों को वर्तमान में FRP के संदर्भ में भारी बकाया राशि के कारण गहन संकट का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2018-19 के दौरान, अखिल भारतीय स्तर पर यह बकाया राशि 19,129 करोड़ रुपए थी।
  • भारत का तर्क यह है कि वह FRP नीति के कारण गन्ना क्षेत्र को कोई बाज़ार मूल्य समर्थन प्रदान नहीं करता है।

चीनी सब्सिडी पर तीनों देशों के आरोपों और भारत के दावे के बीच अंतर

  • उत्पाद विशिष्ट समर्थन पर भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच दृष्टिकोण का अंतर मुख्य रूप से दो कारकों के कारण है: पहला, FRP के अंतर्गत समर्थन की प्रकृति; और दूसरा, समर्थन की गणना के लिये उपयोग किया जाने वाला सूत्र या फ़ॉर्मूला। इन कारकों पर विस्तार से विचार करना प्रासंगिक होगा।
  • भारत के अनुसार, गन्ने के लिये FRP की घोषणा सरकार द्वारा की जाती है लेकिन इसका भुगतान चीनी मिलों द्वारा किया जाता है, न कि सरकार द्वारा। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा गन्ने की कोई खरीद नहीं की जाती है। भारत के दृष्टिकोण से ये दोनों कारक दृढ़ता से यह प्रकट करते हैं कि FRP नीति के माध्यम से कोई सब्सिडी प्रदान नहीं की जाती है। विश्व व्यापार संगठन में पाकिस्तान द्वारा भी अपने गन्ना क्षेत्र के समर्थन के संबंध में इसी प्रकार का तर्क दिया गया है।

पुरातन पद्धति

  • FRP एक मूल्य-समर्थन उपाय है। इसके अलावा सब्सिडी की गणना वर्तमान प्रशासित मूल्य और तथाकथित बाह्य संदर्भ मूल्य (External Reference Price- ERP) (जो वर्ष 1986-88 के दौरान गन्ने के अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों पर आधारित है) के बीच तुलना के आधार पर की जानी चाहिये।
  • यद्यपि WTO के नियमों में मूल्य-आधारित आकलन के आधार पर सब्सिडी की गणना करने की पद्धति निर्दिष्ट की गई है, यह स्पष्ट रूप से कम-से-कम दो प्रकार से सब्सिडी प्रदान करने वाले देशों के प्रति पक्षपातपूर्ण है। पहला, वर्तमान मूल्यों (2,750 रुपए प्रति टन) की तुलना तीन दशक पहले के मूल्यों (156.16 रुपए प्रति टन) से करना अनुपयुक्त है। दूसरा, अतीत के WTO विवाद (कोरिया द्वारा बीफ का आयात) के निष्कर्षों के आधार पर शिकायतकर्त्ता देशों ने सब्सिडी की गणना के लिये कुल चीनी उत्पादन का उपयोग किया है। यह गलत दृष्टिकोण है क्योंकि कोरिया द्वारा बीफ आयात के मामलों के निष्कर्ष सब्सिडी की अन्य सभी स्थितियों पर स्वतः लागू नहीं हो सकते। भारत के प्रत्युत्तर को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है जिसने विवाद निपटान निकाय (Dispute Settlement Body) की बैठक में तर्क दिया था कि विश्व व्यापार संगठन के पैनल और अपीलीय निकाय की रिपोर्टें कोई पूर्ववर्ती मूल्य नहीं रखती हैं, अर्थात् भविष्य के मामलों पर लागू नहीं हो सकतीं। यह परिदृश्य बाज़ार मूल्य समर्थन पद्धति के बाधाकारी प्रावधानों को उजागर करता है और इसलिये इसमें सुधार लाने की आवश्यकता है।
  • पैनलों और अपीलीय निकाय द्वारा प्रतिकूल निर्णय आने की स्थिति में भारत को उन सभी समर्थनकारी उपायों को संशोधित करना होगा जो विश्व व्यापार संगठन के नियमों के साथ असंगत पाए जाते हैं। वर्तमान कार्यान्वित नीतियों के अभाव में गन्ना क्षेत्र, जो 50 मिलियन से अधिक किसानों को रोज़गार देता है, एक आसन्न पतन का सामना कर सकता है।

अन्य विकल्प

  • यहीं प्रासंगिक प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत के लिये बाज़ार मूल्य समर्थन पद्धति का उपयोग करने के बजाय FRP/SAP नीति के कारण वास्तविक बजटीय समर्थन को अधिसूचित करने हेतु कृषि पर विश्व व्यापार संगठन समझौते (Agreement on Agriculture- AoA) के अन्य प्रावधानों पर विचार करना व्यवहार्य होगा? AoA के अंतर्गत एक वैकल्पिक पद्धति का उपयोग संभव है, बशर्ते कि FRP/SAP मूल्य अंतर पर आधारित हो।
  • इस दृष्टिकोण का लाभ यह है कि यह चीनी क्षेत्र को समर्थन के वास्तविक स्तर को दर्शाता है जो कि शिकायतकर्त्ता देशों द्वारा लगाए गए अतिशय आरोपों से विपरीत स्थिति है। इसके अतिरिक्त यह दृष्टिकोण 10 प्रतिशत की सीमा को भंग किये बिना चीनी क्षेत्र के लिये वृहत् नीतिगत अवसर प्रदान करेगा। उदाहरण के लिये वर्ष 2015-16 में चीनी क्षेत्र के लिये कुल बजटीय घरेलू समर्थन चीनी के कुल मूल्य का केवल 0.98 प्रतिशत था, जबकि आरोप में यह कथित समर्थन गन्ने के मूल्य का 99 प्रतिशत बताया गया। हमारे नीति निर्माताओं को इस दृष्टिकोण पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और ग्वाटेमाला भारत के विशाल घरेलू बाज़ार में प्रवेश करने के लिये विश्व व्यापार संगठन के विवाद तंत्र का उपयोग कर रहे हैं। इन शिकायतकर्त्ता सदस्यों ने हाल के वर्षों में अपने चीनी उत्पादनों का 70 प्रतिशत से अधिक निर्यात किया है। वर्ष 2017-18 में इन तीन देशों का संयुक्त चीनी निर्यात कुल वैश्विक निर्यात का लगभग 53 प्रतिशत था। निश्चय ही भारत विश्व व्यापार संगठन में अपने हितों का सफलतापूर्वक बचाव करेगा, लेकिन नीति निर्माताओं को एक आकस्मिक योजना के साथ भी तैयार रहना चाहिये ताकि देश किसी प्रतिकूल निर्णय का सफलतापूर्वक सामना कर सके।

प्रश्न: विश्व व्यापार संगठन में कुछ देशों ने आरोप लगाया है कि भारत गन्ने के उत्पादन के कुल मूल्य की सीमा तक जाकर सब्सिडी सहायता प्रदान कर रहा है। भारत में गन्ना किसानों के वर्तमान संकटपूर्ण परिदृश्य के बीच भारत पर लगे इन आरोपों को किस रूप में देखा जाना चाहिये?