एडिटोरियल (07 Aug, 2019)



भारत में दूसरी नीली क्रांति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण शामिल है। इस आलेख में नीली क्रांति को बल देने के लिये विभिन्न सुझाव दिये गए हैं तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

कुछ समय पूर्व ही सरकार द्वारा एक स्वतंत्र मत्स्य पालन मंत्रालय का गठन किया गया था। हाल ही में पेश किये गए बजट में मत्स्य क्षेत्र को सशक्त करके एक नई ‘नीली क्रांति’ (Blue Revolution) को जन्म देने की प्रतिबद्धतता को दोहराया गया है। भारत में व्यापक नदी तंत्र तथा समुद्री क्षेत्र मौजूद है जिससे मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि के लिये अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र से लगभग 3.5 मिलियन लोग रोज़गार प्राप्त करते हैं, साथ ही भारत में पोषण स्तर को बनाए रखने के लिये भी इस क्षेत्र को बल देना आवश्यक है। नई नीली क्रांति का आरंभ एक साध्य लक्ष्य है। किंतु यदि वर्ष 1987 से 1997 के बीच घटित पहली नीली क्रांति से प्राप्त सबक से सीख नहीं ली गई तो नई नीली क्रांति अनुत्पादक साबित हो सकती है। द्वितीय नीली क्रांति (Blue Revolution 2.0) तभी सफल होगी जब इसकी प्रगति जलीय कृषि के सतत् (Sustainable) रूप पर केंद्रित हो।

जलीय कृषि

जलीय कृषि के अंतर्गत मछली के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों एवं वनस्पतियों को नियंत्रित पर्यावरण में विकसित किया जाता है। इससे इनकी उत्पादकता एवं उपयोगिता में वृद्धि होती है। 4.7 मिलियन टन प्रतिवर्ष के उत्पादन के साथ भारत वर्तमान में जलीय कृषि उत्पादन के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है, जबकि 60 मिलियन टन प्रतिवर्ष के उत्पादन के साथ चीन इससे बहुत आगे है। यद्यपि भारत में जलीय कृषि क्षेत्र में चीन को पीछे छोड़ देने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं तथा इससे निम्नलिखित लाभ प्राप्त हो सकते हैं-

  • इस प्रक्रिया में वृहत रोज़गार अवसरों का सृजन होगा।
  • निर्यात की मात्रा में वृद्धि आएगी।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी।
  • देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होगी।

लेकिन भारत को इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के दोहन के लिये भारत को एक नई रणनीति अथवा एक तरह के मास्टर प्लान 2030 का निर्माण करना होगा।

नीली क्रांति की संभावनाएँ

निस्संदेह, भारत से दोगुनी तटीय रेखा के साथ चीन एक अंतर्निहित भौगोलिक लाभ की स्थिति रखता है और उसके पास अंतर्देशीय जल संसाधनों एवं जलाशयों के बड़े क्षेत्र भी हैं। लेकिन इससे भारतीय महत्त्वाकांक्षा को बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये क्योंकि भारत के पास विश्व के सबसे बड़े अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone- EEZ) में से एक मौजूद है जो 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र के साथ चीन के 0.88 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से अधिक बड़ा है। इस अनन्य आर्थिक क्षेत्र के विकास के लिये नई प्रणालियों की आवश्यकता है और इसके साथ ही ऐसी प्रजातियाँ जो अधिक मूल्य प्रदान करती हैं, का अपतटीय जलीय कृषि गतिविधियों में व्यापक स्तर पर प्रसार करना होगा। महासागरीय रेंचिंग (Ocean Ranching) एक ऐसा क्षेत्र है जो पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाए बिना उच्च सामाजिक लाभांश प्रदान कर सकता है।

सुझाव

  • मास्टर प्लान 2030 की मुख्य रणनीति में देश के गहन समुद्र मत्स्य-ग्रहण (Deep Sea Fishing) क्षमता के पूर्ण उपयोग के साथ-साथ अंतर्देशीय मत्स्य पालन में उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ज़ोर देना चाहिये ।
  • भारत को समुद्री मत्स्य पालन पर एकल सार्वभौमिक राष्ट्रीय आँकड़ों की आवश्यकता है क्योंकि प्रामाणिक आँकड़े वास्तविक स्थिति को दर्शाते हैं जिससे भविष्य के लिये कुशल योजना के निर्माण में सहायता मिलती है।
  • मत्स्य पालन के प्रबंधन के लिये कुछ समर्पित कृत्रिम उपग्रहों की सहायता लेना बेहद उपयोगी होगा। उल्लेखनीय है कि चीन ने उत्पादन में वृद्धि और पर्यटन के विकास के लिये अपने अपतटीय जलीय कृषि गतिविधियों में 5G प्रौद्योगिकी का प्रयोग शुरू भी कर दिया है।
  • इसके अतिरिक्त प्राकृतिक पर्यावास की सुरक्षा के लिये कड़े कानून और उनका प्रवर्तन भी मास्टर प्लान 2030 का एक अंग होना चाहिये, जबकि भौगोलिक संकेत (Geographical Indication- GI) का उपयोग करते हुए देश के भौगोलिक क्षेत्र से अद्वितीय रूप से संबद्ध विशिष्ट प्रजातियों के नामों की रक्षा के लिये एक विशिष्ट नीति होनी चाहिये।
  • अंतर्देशीय मत्स्य पालन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को मास्टर प्लान 2030 के साथ संरेखित करने के लिये भी एक गतिशील नीति परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि यह क्षेत्र पारंपरिक मत्स्य पालन अभ्यासों के कारण अल्प-उपयोग और निम्न उत्पादन की समस्या से ग्रस्त है।
  • तटीय, खारे और अंतर्देशीय संसाधनों के बेहतर उपयोग हेतु भारत को पालन योग्य प्रजातियों के विविधीकरण के लिये ब्रूडस्टॉक बैंकों (Broodstock Banks) के निर्माण की आवश्यकता है। ब्रूडस्टॉक का उपयोग जलीय कृषि में उत्पादन को बढ़ाने के लिये किया जाता है। इसे लागत-प्रभावी खुला-जलाशय पुनःपरिसंचरण प्रणाली (Open-pond Re-circulatory System-ORS) और एकीकृत बहु-पोषण, बहु-प्रजाति जलीय कृषि (Integrated Multi-trophic Aquaculture- IMTA) का प्रवेश कराने की भी आवश्यकता है। ORS द्वारा एक बड़े भाग में लंबे समय तक जल की गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायता मिलती है। IMTA के माध्यम से उप-उत्पाद प्राप्त किये जाते हैं जो अन्य मछलियों के पोषण के लिये उपयोगी होते हैं।
  • जैव सुरक्षा (Biosecurity), एक्वामिमिक्री (Aquamimicry) और बायोफ्लॉक (Biofloc) अन्य कुछ नवोन्मेषी जलीय कृषि अभ्यास हैं जिनका उपयोग कम लागत पर अधिक उत्पादन के लिये किया जा सकता है, साथ ही इससे जलीय पारितंत्र को बेहतर भी बनाया जा सकता है जिससे मत्स्य उत्पादन के लिये एक अनुकूल माहौल उपलब्ध हो सके।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता/इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (Artificial Intelligence/Internet Of Things- AI/IOT), मापयंत्रण (इंजीनियरी/अभियंत्रिकी की एक शाखा है) जो मापन एवं नियंत्रण से संबंधित है। सेंसर (Sensors), पानी के नीचे दूरमापी (Underwater Telemetry) यंत्र और उत्पादन के अन्य साइबर-भौतिक प्रणालियों (Cyber-physical Systems) का उपयोग करके जलीय कृषि क्षेत्र का उन्नयन और स्वचालन इस उद्योग के विकास के लिये महत्त्वपूर्ण होगा।
  • भारत को समुद्री शैवाल और सूक्ष्म शैवालों (Macro and Microalgae) की कृषि पर भी विचार करना चाहिये क्योंकि इसके लिये सीमित क्षेत्र की ही आवश्यकता होती है। शैवाल (Algae) स्थलीय पौधों की तुलना में 10 गुना तेज़ी से विकास करते हैं और इनकी परिपक्वता अवधि कम होती है। नतीजतन ये अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त शैवाल में पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में होते हैं, जिसके कारण यह पशु चारे का एक प्रमुख घटक बन सकता है। इससे पशु चारे के उत्पादन के लिये मत्स्य खाद्य पर निर्भरता दूर होगी।
  • कृषि क्षेत्र का विस्तार और उपज में वृद्धि पहली शर्त है, जबकि उत्पाद का विपणन दूसरी शर्त है। कृषि क्षेत्र के विस्तार और उपज में वृद्धि का उस स्थिति में कोई लाभ नहीं होगा यदि उत्पाद बाज़ार तक न पहुँचें। इसलिये हमें खाद्य प्रसंस्करण और मूल्यवर्द्धन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। वर्तमान में भारत कुल मत्स्य उत्पादन के मात्र 10 प्रतिशत का ही मूल्यवर्द्धन (Value Addition) करता है, जबकि शेष मत्स्य उत्पादन सीधा बाज़ार में कच्चे माल के रूप में बेचा जाता है जो बिचौलियों द्वारा प्राथमिक उत्पादकों के शोषण का कारण बनता है।

लॉजिस्टिक्स की भूमिका

लॉजिस्टिक्स के अभाव में खाद्य प्रसंस्करण और विपणन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं नहीं की जा सकती। मज़बूत लॉजिस्टिक्स समर्थन के लिये शीतगृह और भंडारगृह (Cold Chain and Storage) जैसे पूरक अवसंरचनात्मक सुविधाओं की आवश्यकता होगी जो उच्च उत्पादन का भंडारण कर सके। शीत गृहों का निर्माण उत्पादों के सड़ने-गलने से होने वाली हानि को कम करेगा जो अभी 30-35 प्रतिशत के स्तर पर है। विपणन अवसंरचना और क्लाउड-आधारित बाज़ार सूचना तंत्र के निर्माण की भी आवश्यकता है। इसके साथ ही भारत को विश्व भर के मत्स्य उत्पादन से संबंधित हितधारकों के सशक्तीकरण में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिये इसके साथ ही मत्स्य पालन के तरीके, चारा और मत्स्य-ग्रहण व प्रसंस्करण के तरीके पर जानकारी पाने का अवसर प्राप्त हो। इसका अभिप्राय है कि वैश्विक स्तर पर स्वीकृत खाद्य प्रबंधन अभ्यासों को समुद्री और अंतर्देशीय दोनों क्षेत्रों के लिये धारणीयता और सूचनीयता (Traceability) के दोहरे घटकों को संलग्न करते हुए गुणवत्ता प्रमाणीकरण के माध्यम से प्रमाणिक ठहराना।

निष्कर्ष

धारणीयता मास्टर प्लान 2030 का केंद्रीय तत्त्व है, कृषकों की आय में वृद्धि के लिये जलीय कृषि और कृषि को एकीकृत करने के प्रयास भी होने चाहिये। कोई भी मास्टर प्लान तब तक सार्थक नहीं माना जाएगा जब तक यह निर्धनों और वंचितों की स्थिति में सुधार न करे। खाद्य असुरक्षा को कम करने के लिये एक सतत्, वैकल्पिक प्रोटीन (Sustainable, Alternative Protein) के उत्पादन का लक्ष्य हमारी पहुँच में है। इस उद्देश्य की ओर बढ़ते हुए सतत् विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखकर वर्ष 2030 तक 8.6 बिलियन लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है, साथ ही इससे वैश्विक समुदाय के अन्य उद्देश्यों की भी पूर्ति होगी। हालाँकि, इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अनुसंधान एवं विकास तथा प्रौद्योगिकी के उन्नयन में दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होगी। भारत ने वर्ष 2017-18 में 45,000 करोड़ रुपए मूल्य का मत्स्य निर्यात किया और उसमें इस आँकड़े को 4,50,000 करोड़ रुपए तक ले जाने की क्षमता है। विश्व की मत्स्य और मत्स्य उत्पाद संबंधी भूख भी लगातार बढ़ रही है और 232 बिलियन डॉलर मूल्य का यह उद्योग (वैश्विक स्तर पर) 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से विकास कर रहा है। किंतु एक निश्चित कार्ययोजना, एक उपयुक्त दिशा और व्यापक नवोन्मेषी विचारों के साथ ही भारत नई नीली क्रांति के अपने लक्ष्य को पूरा कर सकेगा।

प्रश्न: भारत में नीली क्रांति के लिये अपार संभावनाएँ होने के बावजूद अब तक इस क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकी है। आपके विचार में ऐसे कौन से प्रयास किये जा सकते हैं जिनसे मत्स्य पालन की गति को तीव्र किया जा सके?