शासन व्यवस्था
RTE अधिनियम, 2009 और सामाजिक समावेशन
प्रिलिम्स के लिये: अनुच्छेद 21A, सकल नामांकन अनुपात, राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद, निपुण भारत, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग
मेन्स के लिये: आरटीई अधिनियम, 2009 – संवैधानिक आधार और प्रावधान, कल्याणकारी कानूनों को सुदृढ़ करने में न्यायपालिका की भूमिका, शिक्षा में सामाजिक समावेशन और समानता
चर्चा में क्यों?
दिनेश बिवाजी अष्टिकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (जनवरी 2026) के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) के संवैधानिक दृष्टिकोण को पुनः स्थापित किया।
- न्यायालय ने निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के लिये 25% आरक्षण का समर्थन करते हुए इसे प्रभावी समानता प्राप्त करने हेतु एक "राष्ट्रीय मिशन" के रूप में वर्णित किया और समावेशी शिक्षा के माध्यम से जाति और वर्ग की गहरी बाधाओं को तोड़ने में इसकी परिवर्तनकारी भूमिका पर बल दिया।
सारांश
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय (2026) ने नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा (आरटीई) अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) को सामाजिक समावेशन के लिये एक "राष्ट्रीय मिशन" के रूप में पुनः स्थापित किया, जो निजी स्कूलों में 25% EWS आरक्षण सुनिश्चित करता है।
- हालाँकि RTE अधिनियम ने पहुँच, बुनियादी ढाँचे और सामाजिक एकीकरण में सुधार किया है, लेकिन फंडिंग में विलंब, सीटों के भरने की कम दर, दस्तावेज़ीकरण संबंधी बाधाएँ और सीखने में अंतराल जैसी चुनौतियाँ इसके पूर्ण प्रभाव में बाधा बनी हुई हैं।
नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 क्या है?
- परिचय: शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 प्रत्येक बच्चे के लिये शिक्षा को एक मौलिक अधिकार बनाता है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A को संचालित करता है, जिसे वर्ष 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा शामिल किया गया था।
- राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों (DPSP) में, अनुच्छेद 45 को प्रतिस्थापित किया गया ताकि 6 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिये प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा प्रदान करने की राज्य की ज़िम्मेदारी पर बल दिया जा सके।
- मुख्य अनिवार्यता: RTE अधिनियम अनिवार्य करता है कि 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच के प्रत्येक बच्चे को पड़ोस के स्कूल में निशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा 1 से 8 तक) का अधिकार है।
- "निशुल्क" का अर्थ है कि कोई भी बच्चा किसी भी प्रकार का शुल्क, प्रभार या खर्च देने के लिये उत्तरदायी नहीं होगा, जो उन्हें प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने और पूरी करने से रोक सकता है।
- "अनिवार्य" से तात्पर्य उचित सरकार और स्थानीय प्राधिकारियों पर इस आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिये प्रारंभिक शिक्षा का प्रवेश, उपस्थिति और समापन सुनिश्चित करने का दायित्व से है।
- प्रमुख विशेषताएँ एवं प्रावधान:
- सामाजिक समावेशन के लिये 25% आरक्षण (धारा 12(1)(c)): सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिये, अधिनियम अनिवार्य करता है कि सभी निजी, अवैतनिक और गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों को अपने पड़ोस के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिये अपनी प्रवेश-स्तर (कक्षा 1 या प्री-प्राइमरी) की कम-से-कम 25% सीटें आरक्षित करनी होंगी। सरकार इन सीटों के लिये स्कूलों को प्रतिपूर्ति करती है।
- यह विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों के बच्चों के लिये साझा, एकीकृत शिक्षण स्थान बनाकर समता सुनिश्चित करने के लिये एक रणनीतिक उपकरण के रूप में कार्य करता है।
- कोई स्क्रीनिंग या कैपिटेशन शुल्क नहीं: यह अधिनियम स्कूलों को किसी भी कैपिटेशन शुल्क (डोनेशन) लेने से सख्ती से रोकता है और बच्चे या उनके माता-पिता के प्रवेश के लिये किसी भी स्क्रीनिंग प्रक्रिया या साक्षात्कार पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाता है।
- उत्पीड़न का निषेध: यह शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न को सख्ती से प्रतिबंधित करके बच्चों के अनुकूल वातावरण की गारंटी देता है।
- स्कूलों के लिये मानदंड और मानक: यह अधिनियम निम्नलिखित के संबंध में सख्त मानदंड निर्धारित करता है:
- शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात (PTR): यह सुनिश्चित करना कि कक्षाएँ अत्यधिक भीड़भाड़ वाली न हों (जैसे- प्राथमिक विद्यालयों के लिये 30:1)।
- आधारभूत संरचना: सभी मौसमों में उपयोगी स्कूल भवन, लड़कों और लड़कियों के लिये अलग कार्यात्मक शौचालय, सुरक्षित पेयजल और खेल के मैदान की अनिवार्यता।
- कार्य दिवस: न्यूनतम स्कूल कार्य दिवस और शिक्षण घंटों का निर्धारण।
- ड्रॉपआउट के लिये विशेष प्रावधान: यदि 6 वर्ष से अधिक आयु का कोई बच्चा कभी स्कूल में नामांकित नहीं हुआ है या अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाया है, तो अधिनियम उसे उसकी आयु के अनुरूप कक्षा में प्रवेश का अधिकार देता है, साथ ही पढ़ाई में पिछड़ापन दूर करने के लिये विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था भी करता है।
- RTE (संशोधन) अधिनियम, 2019: यह राज्यों को कक्षा 5 और 8 के लिये नियमित परीक्षा आयोजित करने की अनुमति देता है, जो अनिवार्य 'नो डिटेंशन पॉलिसी' (अनिवार्य पदोन्नति नीति) की जगह लेती है, जिसने पहले छात्रों को कक्षा 8 तक स्वचालित रूप से अगली कक्षा में भेज दिया था।
- यह अधिनियम त्वरित सुधारात्मक शिक्षण और पुनः परीक्षा सुनिश्चित करते हुए राज्य सरकारों को यह निर्णय लेने का अधिकार देता है कि दूसरी बार असफल होने वाले छात्रों को रोका (डिटेन) जाए या नहीं।
- सामाजिक समावेशन के लिये 25% आरक्षण (धारा 12(1)(c)): सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिये, अधिनियम अनिवार्य करता है कि सभी निजी, अवैतनिक और गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों को अपने पड़ोस के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिये अपनी प्रवेश-स्तर (कक्षा 1 या प्री-प्राइमरी) की कम-से-कम 25% सीटें आरक्षित करनी होंगी। सरकार इन सीटों के लिये स्कूलों को प्रतिपूर्ति करती है।
RTE अधिनियम, 2009 का क्या प्रभाव है?
- सार्वभौमिक पहुँच: इस अधिनियम ने प्राथमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) को 100% से अधिक तक पहुँचा दिया है (UDISE+ 2024–25 के आँकड़ों के अनुसार), जो लगभग सार्वभौमिक पहुँच को दर्शाता है।
- सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना: साझा कक्षाएँ सक्रिय रूप से सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रह को कम करती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 दर्शाता है कि एकीकृत कक्षाओं से संपन्न छात्रों के मन में अपने कम आय वाले साथियों के प्रति सामाजिक व्यवहार में 12% की वृद्धि होती है।
- वंचित बच्चों के लिये ये कक्षाएँ नई आकांक्षाओं, सामाजिक पूंजी और सहपाठी नेटवर्क तक पहुँच प्रदान करती हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास तथा महत्त्वाकांक्षा उल्लेखनीय रूप से बढ़ती है।
- संक्रमण दर में वृद्धि: यह अधिनियम सुनिश्चित करता है कि छात्र शिक्षा प्रणाली में अधिक समय तक बने रहें।
- शिक्षा मंत्रालय के 2025 के आँकड़ों के अनुसार, प्राथमिक से उच्च प्राथमिक स्तर पर संक्रमण दर अब 92.2% के प्रभावशाली स्तर तक पहुँच गई है।
- बुनियादी ढाँचे के विकास को गति देना: इस अनिवार्यता ने देशभर में स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं में व्यापक सुधार को प्रेरित किया है।
- उदाहरणतः अब 98.2% स्कूलों में लड़कियों के लिये कार्यशील शौचालय उपलब्ध हैं, जो एक दशक पहले 88.7% थे, जबकि 99.3% स्कूलों में कार्यशील पेयजल सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
- शिक्षा की गुणवत्ता का मानकीकरण: निर्धारित योग्यताओं के साथ शिक्षकों के पेशेवरकरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- भारत के 1 करोड़ से अधिक शिक्षकों में से 95% से अधिक अब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के मानदंडों के अनुसार पेशेवर योग्यता रखते हैं।
- वर्ष 2019 तक, प्राथमिक स्तर पर राष्ट्रीय औसत छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) 26:1 था, जो निर्धारित और स्वीकार्य मानदंडों के भीतर है।
RTE अधिनियम के सामाजिक समावेशन के दृष्टिकोण में बाधा डालने वाली प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- राज्य सरकारों द्वारा शिथिलीकरण: हाल ही में कई राज्यों ने अपने RTE नियमों में संशोधन कर यह प्रावधान किया है कि यदि 1 किमी. के दायरे में कोई सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय उपलब्ध हो, तो निजी विद्यालयों को 25% आरक्षण से छूट दी जा सकती है।
- आलोचकों का तर्क है कि इससे अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है, जो केवल किसी भी स्कूल तक पहुँच सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि निजी विद्यालयों में सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना है।
- भारी वित्तीय बकाया: राज्य सरकारें अक्सर 25% आरक्षण के लिये निजी विद्यालयों को समय पर प्रतिपूर्ति करने में विफल रहती हैं।
- उदाहरणतः अप्रैल 2026 तक महाराष्ट्र पर निजी अनुदान रहित विद्यालयों के लिये लगभग 2,930 करोड़ रुपये की लंबित प्रतिपूर्ति देयता बकाया है।
- कम सीट-भरने की दर: भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ राज्यों में EWS सीटों के भरने की दर 27.5% जितनी कम बनी हुई है, जिसका मुख्य कारण जागरूकता की कमी तथा ऑनलाइन आवेदन प्रक्रियाओं की जटिलताएं हैं।
- गंभीर दस्तावेज़ी बाधाएँ: हाशिए पर रहने वाले परिवारों के पास अक्सर प्रवेश के लिये आवश्यक विशिष्ट दस्तावेज़ नहीं होते। वर्ष 2025 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि दूरस्थ ज़िलों में 40% पात्र बच्चों के पास आवश्यक आय या जाति प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं थे।
- छिपी हुई लागतों का बोझ: यद्यपि ट्यूशन फीस माफ होती है, फिर भी निजी शिक्षा से जुड़ी “छिपी हुई लागतें” जैसे यूनिफॉर्म, महँगी पाठ्यपुस्तकें, शैक्षिक भ्रमण और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ EWS अभिभावकों पर भारी आर्थिक बोझ डालती हैं, जिसके कारण कई बार छात्रों को स्कूल छोड़ना पड़ता है।
- RTE अधिनियम केवल कक्षा 8 (उम्र 14 वर्ष) तक निशुल्क शिक्षा की गारंटी देता है। इसके बाद जब किसी वंचित पृष्ठभूमि का छात्र कक्षा 9 में पहुँचता है, तो उसे अचानक निजी स्कूलों की महँगी फीस का सामना करना पड़ता है, जिससे कई छात्र या तो पढ़ाई छोड़ने या कम संसाधन वाले सरकारी स्कूलों में जाने को मजबूर हो जाते हैं, और उनकी शिक्षा की निरंतरता बाधित हो जाती है।
- लगातार सीखने की खामियाँ: बढ़ी हुई पहुँच के बावजूद गुणवत्ता एक चिंता का विषय बनी हुई है। राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा 5 के लगभग 33% छात्र गणित और भाषा में बुनियादी दक्षता स्तर से नीचे हैं।
भारत, RTE अधिनियम, 2009 के अंतर्गत सामाजिक समावेशन के वादे को किस प्रकार क्रियान्वित कर सकता है?
- स्वचालित प्रतिपूर्ति लागू करना: राज्यों को समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने हेतु प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) मॉडल अपनाना चाहिये, जिससे निजी विद्यालयों के लंबित भुगतान का निपटान हो तथा संस्थागत सहयोग सुनिश्चित हो।
- डिजिटल साक्षरता अभियान प्रारंभ करना: समग्र शिक्षा योजना जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर हेल्पडेस्क स्थापित करना, ताकि अभिभावकों को ऑनलाइन लॉटरी प्रक्रियाओं को समझने तथा आवश्यक दस्तावेज़ प्राप्त करने में सक्रिय सहायता मिल सके।
- अधिगम पुनर्प्राप्ति को प्राथमिकता देना: NAS 2024 में उजागर दक्षता-अंतराल को कम करने हेतु सरकार को निपुण भारत के अंतर्गत बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (FLN) मिशनों का प्रभावी एवं तीव्र क्रियान्वयन करना चाहिये।
- RTE के अधिदेश का विस्तार: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के दृष्टिकोण के अनुरूप, निःशुल्क शिक्षा के अधिकार को पूर्व-प्राथमिक से कक्षा 12 (आयु 3 से 18 वर्ष) तक विस्तारित करने का ठोस आधार है, जिससे उच्च माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट को रोका जा सके।
- शिकायत निवारण सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की निगरानी प्रणालियों को उन्नत कर अभिभावकों के लिये प्रवेश अस्वीकृति जैसी समस्याओं पर 24×7 हेल्पलाइन उपलब्ध करायी जानी चाहिये।
- प्रशासनिक दक्षता का प्रवर्तन: RTE अधिनियम की वास्तविक परीक्षा इसके क्रियान्वयन में निहित है; राज्यों को प्रच्छन्न लागतों को समाप्त करना, समावेशन मानकों का कठोर पालन सुनिश्चित करना तथा सर्वोच्च न्यायालय की विधिक तात्कालिकता के अनुरूप निर्बाध प्रशासनिक दक्षता स्थापित करनी चाहिये, ताकि संवैधानिक समानता सभी बच्चों के लिये व्यवहारिक वास्तविकता बन सके।
- सरकारी विद्यालयों का पुनरुद्धार: यद्यपि धारा 12(1)(c) महत्त्वपूर्ण है, किंतु सामाजिक समावेशन का स्थायी समाधान सरकारी विद्यालयों (जैसे-पीएम श्री स्कूल) की गुणवत्ता को इस स्तर तक उन्नत करना है कि सभी आर्थिक वर्गों के अभिभावक स्वेच्छा से सार्वजनिक शिक्षा को निजी संस्थानों पर वरीयता दें।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय ने RTE अधिनियम को मात्र एक शिक्षा नीति नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण के अपरिवर्तनीय साधन के रूप में दृढ़तापूर्वक स्थापित किया है। अब विधिक ढाँचा स्पष्ट है—वास्तविक परीक्षा इसके प्रभावी क्रियान्वयन में निहित है। यदि इसे समुचित रूप से लागू किया जाये, तो धारा 12(1)(c) यह सुनिश्चित कर सकती है कि किसी बच्चे का भविष्य जन्म से नहीं, बल्कि अवसरों से निर्धारित हो।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 केवल शिक्षा तक पहुँच तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का भी लक्ष्य रखता है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. RTE अधिनियम, 2009 का उद्देश्य क्या है?
6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को “निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना और अनुच्छेद 21A को लागू करना।
2. RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) क्या अनिवार्य करती है?
इसके तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को EWS और वंचित समूहों के लिये 25% सीटें आरक्षित करना अनिवार्य है।
3. वर्ष 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में किस बात पर ज़ोर दिया गया?
इसने 25% कोटा को वास्तविक समानता और सामाजिक एकीकरण प्राप्त करने के लिये एक "राष्ट्रीय मिशन" घोषित किया।
4. RTE अधिनियम को लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
विलंबित प्रतिपूर्ति, कम सीट-पूर्ति दर, दस्तावेज़ीकरण संबंधी बाधाएँ, प्रच्छन्न लागतें और अधिगम में अंतराल।
5. भारत में RTE अधिनियम ने शिक्षा के परिणामों को किस प्रकार बेहतर बनाया है?
इसने लगभग सार्वभौमिक नामांकन, बेहतर बुनियादी ढाँचा, बेहतर PTR और बढ़ी हुई सामाजिक समावेशिता प्राप्त की।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से प्रावधान शिक्षा पर प्रभाव डालते हैं? (2012)
- राज्य नीति के निदेशक तत्त्व
- ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
- पाँचवीं अनुसूची
- छठी अनुसूची
- सातवीं अनुसूची
नीचे दिये गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:
(a)केवल 1 और 2
(b)केवल 3, 4 और 5
(c)केवल 1, 2 और 5
(d)1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: (d)
मेंस
प्रश्न. भारत में डिजिटल पहल ने किस प्रकार से देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन में योगदान किया है? विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)
प्रश्न. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों को विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)
मुख्य परीक्षा
SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय SC/ST आरक्षण पर “क्रीमी लेयर” सिद्धांत लागू करने से संबंधित नई याचिकाओं की समीक्षा कर रहा है, जो पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (2024) मामले की गलत व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। यह इस विवादास्पद प्रश्न को पुनः प्रवर्तित करती है कि क्या आर्थिक स्थिति जाति-आधारित सामाजिक वंचना को अधिरोहित कर सकती है।
पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामला, 2024 के प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- परिचय: यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसने अनुसूचित जातियों (SC) एवं अनुसूचित जनजातियों (ST) के भीतर मौजूद आंतरिक विविधता को संबोधित करते हुए भारत में आरक्षण की विधिक व्यवस्था को मौलिक रूप से पुनर्संरचित किया है।
- मुख्य निर्णय: 6:1 के बहुमत से सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राज्य सरकारों को अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है, ताकि प्राथमिकतापूर्ण आरक्षण लाभ प्रदान किये जा सकें।
- निर्णय के प्रमुख बिंदु:
- ई.वी. चिन्नैया (2004) के निर्णय को नामंजूर करना: न्यायालय ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले 2004 में अपने पूर्ववर्ती निर्णय को नामंजूर कर दिया, जिसमें यह माना गया था कि अनुसूचित जातियाँ एक "समरूप" समूह हैं और उन्हें उप-वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।
- सारभूत समानता: SC/ST श्रेणियाँ एकरूप नहीं हैं; कुछ उप-समूह “अधिक पिछड़े” हैं और अन्य की तुलना में आरक्षण का लाभ कम प्राप्त कर सके हैं। अतः उप-वर्गीकरण को “सर्वाधिक वंचितों” के लिये सारभूत समानता सुनिश्चित करने का साधन माना गया है।
- अनुभवजन्य आँकड़ों की आवश्यकता: न्यायालय ने अधिदेशित किया कि किसी भी उप-वर्गीकरण का आधार अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और सापेक्ष पिछड़ेपन को दर्शाने वाले मात्रात्मक और अनुभवजन्य आँकड़े होने चाहिये। यह राजनीतिक स्वेच्छाचारिता के आधार पर नहीं किया जा सकता है।
- “क्रीमी लेयर” विमर्श: 7 में से 4 न्यायाधीशों ने यह मत व्यक्त किया कि “क्रीमी लेयर” सिद्धांत (अर्थात् अपेक्षाकृत समृद्ध/उन्नत वर्गों को आरक्षण से अपवर्जित करना) को SC/ST पर भी लागू किया जाना चाहिये, ताकि लाभ वास्तव में वंचित वर्गों तक पहुँच सके।
- विधायी क्षमता: न्यायालय ने सुस्पष्ट किया कि यद्यपि केवल राष्ट्रपति (अनुच्छेद 341 के अंतर्गत) यह निर्धारित कर सकते हैं कि किन जातियों को SC सूची में शामिल किया जाये, तथापि राज्य सरकारों को अनुच्छेद 15(4) तथा अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत इन चिन्हित की गई जातियों के बीच आरक्षण लाभों के वितरण का अधिकार प्राप्त है।
क्रीमी लेयर सिद्धांत
- परिचय: क्रीमी लेयर का सिद्धांत (The Creamy Layer Principle) भारत में उपयोग की जाने वाली एक कानूनी अवधारणा है, जिसका उद्देश्य पिछड़े समुदाय के अपेक्षाकृत समृद्ध और शिक्षित सदस्यों की पहचान करना और उन्हें आरक्षण (सकारात्मक कार्रवाई) के लाभों से बाहर करना है।
- उत्पत्ति: इस सिद्धांत को औपचारिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐतिहासिक इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले (1992) में पेश किया गया था।
- यद्यपि न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिये 27% आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन इसने यह आदेश भी दिया कि "क्रीमी लेयर" को इससे बाहर रखा जाना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ (संपन्न) लोगों तक ही सीमित न रह जाए।
- यह "सापेक्ष समानता" के विचार पर आधारित है—असमानों के साथ समान व्यवहार करना (जैसे एक ही जाति के भीतर एक धनी व्यक्ति बनाम एक गरीब व्यक्ति) समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
- वर्तमान मानदंड (OBC): सरकार वर्तमान में "क्रीमी लेयर" की पहचान करने के लिये दो मुख्य फिल्टर (मानदंडों) का उपयोग करती है:
- पद/स्थिति आधारित फिल्टर: संवैधानिक पदों (जैसे- राष्ट्रपति, न्यायाधीश आदि) पर आसीन व्यक्तियों की संतानें, या सरकार में ग्रुप A/क्लास I और ग्रुप B/क्लास II के अधिकारियों के बच्चों को स्वतः ही बाहर रखा जाता है, चाहे उनकी वास्तविक आय कुछ भी हो।
- आय आधारित फिल्टर: सरकारी सेवा में नहीं रहने वाले लोगों के लिये एक आय सीमा तय की गई है। वर्तमान में, यदि माता-पिता की वार्षिक आय (वेतन और कृषि आय को छोड़कर) लगातार तीन वर्षों तक ₹8 लाख से अधिक रहती है, तो उम्मीदवार "क्रीमी लेयर" के अंतर्गत आता है।
SC/ST आरक्षणों पर 'क्रीमी लेयर' सिद्धांत लागू करने से संबंधित चिंताएँ क्या हैं?
- जाति-आधारित असमानता केवल गरीबी का परिणाम नहीं है, बल्कि सामाजिक बहिष्कार का भी परिणाम है। वर्ग (Class) के विपरीत, जो परिवर्तनशील होता है, जाति एक “बंद” (Enclosed) व्यवस्था है। आय में वृद्धि होने से स्वतः सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं होता और न ही अस्पृश्यता जैसी प्रथाएँ समाप्त हो जाती हैं।
- यहाँ तक कि संपन्न अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) के व्यक्तियों के पास भी अक्सर वह “सामाजिक पूंजी” या नेटवर्किंग शक्ति नहीं होती, जो सामान्य वर्ग के उनके समकक्षों के पास होती है।
- क्रीमी लेयर का जाल: इसमें एक बड़ा जोखिम यह है कि क्रीमी लेयर के लिये आय की सीमा बहुत कम तय कर दी जाती है, जिससे इन समुदायों के भीतर उभरते मध्यम वर्ग के लिये एक "जाल" (ट्रैप) की स्थिति पैदा हो जाती है।
- जैसा कि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले, 2026 में देखा गया है, माता-पिता के वेतन को एकमात्र अयोग्यता कारक मानना इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि पहली पीढ़ी का अधिकारी अभी भी ऐतिहासिक सामाजिक अधीनता का बोझ उठाता है।
- अभिजात्य कब्ज़े का मिथक: शोध से पता चलता है कि आरक्षण नीति का सकारात्मक प्रभाव वास्तव में कम शिक्षित अनुसूचित जाति (SC) के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में सबसे अधिक केंद्रित है, जो यह संकेत देता है कि वर्तमान प्रणाली अपने लक्षित वर्ग तक प्रभावी रूप से पहुँच रही है।
- संवैधानिक और कानूनी प्रावधान: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल होना (अनुच्छेद 341 और 342 के तहत) कभी भी गरीबी पर आधारित नहीं था, यह ऐतिहासिक ‘अस्पृश्यता’ (SCs के लिये) तथा भौगोलिक अलगाव/आदिवासी विशेषताओं (STs हेतु) पर आधारित था।
- कानूनी विशेषज्ञों को चिंता है कि इंद्रा साहनी निर्णय का तर्क, जो मूल रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिये था, उसे अनुचित रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) पर लागू किया जा रहा है, जबकि इन वर्गों को एक विशिष्ट प्रकार के संरचनात्मक और प्रणालीगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
- प्रतिनिधित्वात्मक विविधता का क्षरण: भारत में आरक्षण का उद्देश्य केवल गरीबी उन्मूलन नहीं, बल्कि सत्ता के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना भी है। “क्रीमी लेयर” (शिक्षित और अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग) को बाहर रखने से राज्य संभवतः समुदाय के सबसे सशक्त तथा प्रभावशाली प्रतिनिधियों को प्रशासन एवं अकादमिक क्षेत्र से दूर कर सकता है, जिससे उस समुदाय का समग्र प्रभाव कमजोर हो सकता है।
आरक्षण में SC/ST के बेहतर प्रतिनिधित्व के लिये कौन-से कदम उठाने की आवश्यकता है?
- लक्षित वितरण: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणियों को एकल ब्लॉक के रूप में मानने के बजाय, राज्य को यह सुनिश्चित करने के लिये इनका उप-वर्गीकरण करना चाहिये कि सबसे उपेक्षित उप-समूहों को समर्पित कोटा मिले। यह कुछ उन्नत उप-समूहों द्वारा लाभ की "जमाखोरी" को रोकेगा और श्रेणी के भीतर समानता को प्राप्त करेगा।
- बैकलॉग रिक्तियों को भरना: विशेष रूप से बैकलॉग रिक्तियों को भरने के लिये नियमित रूप से अभियान चलाना (जो 81वें संविधान संशोधन, 2000 के तहत 50% की सीमा से छूट प्राप्त हैं)।
- यह सुनिश्चित करना कि आरक्षित सीटें किसी विशेष वर्ष में न भरे जाने पर सामान्य श्रेणी में "लैप्स" (समाप्त) न हों, बल्कि एक उपयुक्त उम्मीदवार मिलने तक अनिश्चित काल तक आगे बढ़ाई जाती रहें।
- क्षमता निर्माण: यदि उम्मीदवार उच्च स्तरीय पदों के लिये मानदंडों को पूरा करने में विफल रहते हैं तो प्रतिनिधित्व विफल हो जाता है। सॉफ्ट स्किल्स, साक्षात्कार हेतु शिष्टाचार और व्यावसायिक संचार में केंद्रित प्रशिक्षण उस "सांस्कृतिक अंतराल" को समाप्त करने के लिये है, जो प्रायः व्यक्तित्व परीक्षण के दौरान उम्मीदवारों को रोकता है। उदाहरण के लिये SC/ST के लिये राष्ट्रीय करियर सेवा केंद्र (NCSC) साक्षात्कार के लिये आत्मविश्वास निर्माण कार्यक्रम, व्यक्तित्व विकास और व्यावसायिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
- साक्षात्कार बोर्डों का संवेदीकरण: साक्षात्कार बोर्डों (यूपीएससी/राज्य पीएससी) में विविधता को सुदृढ़ करना महत्त्वपूर्ण है। बोर्डों को योग्यता और विशेषाधिकार के बीच अंतर करने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिये (उदाहरण के लिये एक उम्मीदवार की "अंग्रेज़ी भाषा के प्रवाह" को उसकी "बौद्धिक गहराई" से अलग करना)।
- पदोन्नति में आरक्षण: एम. नागराज (2006) और जरनैल सिंह (2018) के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए, राज्यों को उच्च श्रेणी में "प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता" पर डेटा एकत्र करना चाहिये ताकि पदोन्नति में आरक्षण को अनुवर्ती वरिष्ठता के साथ उचित ठहराया जाए कार्यान्वित किया जा सके। वर्ष 2026 तक बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक सहित कई राज्यों ने उप-वर्गीकरण और आरक्षण संबंधी नीतियों के लिये अनुभवजन्य डेटा एकत्र करने के लिये जातिगत जनगणना की है।
निष्कर्ष
SC/ST आरक्षण में "क्रीमी लेयर" पर विवाद आर्थिक प्रगति और लगातार सामाजिक पूर्वाग्रह के मध्य संघर्ष को उजागर करता है। जबकि उप-वर्गीकरण आंतरिक समानता सुनिश्चित करता है, आय-आधारित बहिष्कार से वास्तविक समानता के मूल उद्देश्य का ह्रास होने का खतरा है क्योंकि जाति-आधारित पिछड़ापन आर्थिक स्थिति से परे जाकर प्रणालीगत सामाजिक प्रतिनिधित्व का मामला बना हुआ है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. "आरक्षण गरीबी उन्मूलन की योजना नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक साधन है।" इस संदर्भ में SC/ST के लिये आय-आधारित निस्यंदन से संबंधित चिंताओं का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कौन-सा संवैधानिक संशोधन बैकलॉग रिक्तियों को 50% की सीमा से सुरक्षा प्रदान करता है?
81वाँ संविधान संशोधन (2000) ने अनुच्छेद 16(4B) जोड़ा, जो बैकलॉग रिक्तियों को एक अलग वर्ग के रूप में मानने की अनुमति देता है जो 50% की सीमा के अधीन नहीं हैं।
2. ई.वी. चिन्नैया (2004) से दविंदर सिंह (2024) के बीच प्राथमिक बदलाव क्या था?
न्यायालय ने SC को एक "समरूप इकाई" (होमोजीनियस यूनिट) के रूप में देखने से परे आंतरिक विविधता को मान्यता देने की ओर रुख किया, जिससे राज्यों को उनके भीतर उप-वर्गीकरण और पूर्वगामी उपचार की अनुमति मिल गई।
3. SC/ST समुदायों को किन आधारों पर राष्ट्रपति द्वारा सूची में शामिल किया जाता है?
समावेशन आर्थिक गरीबी के बजाय ऐतिहासिक अस्पृश्यता (SC के लिये) और भौगोलिक भिन्नता या आदिम लक्षणों (ST के लिये) पर आधारित है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत के निम्नलिखित संगठनों/निकायों पर विचार कीजिये: (2023)
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
- राष्ट्रीय विधि आयोग
- राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
उपर्युक्त में से कितने संवैधानिक निकाय हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) केवल तीन
(d) सभी चार
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. क्या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एन० सी० एस० सी०) धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुसूचित जातियों के लिये संवैधानिक आरक्षण के क्रियान्वयन का प्रवर्तन करा सकता है? परीक्षण कीजिये। (2018)
प्रश्न. स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एस.टी.) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये, राज्य द्वारा की गई दो मुख्य विधिक पहलें क्या हैं? (2017)