डेली न्यूज़ (29 Nov, 2019)



लोकसभा अध्यक्ष और अनियंत्रित सांसद

प्रीलिम्स के लिये:

लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियाँ

मेन्स के लिये:

लोकसभा सदस्यों के निलंबन से संबंधित प्रावधान

चर्चा में क्यों?

हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दो सदस्यों को अनियंत्रित आचरण के कारण सदन से निलंबित किया गया है।

मुख्य बिंदु:

  • लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दो सांसदों का उनके अनियंत्रित आचरण तथा लोकसभा की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करने के कारण निलंबित किये जाने से सांसदों के आचरण संबंधी मुद्दे पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है।
  • लोकसभा अध्यक्ष को यह अधिकार ‘लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम’ (The Rules of Procedure and Conduct of Business) के अंतर्गत प्रदान किया गया है।

क्या हैं नियम?

  • लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के अंतर्गत नियम 378 के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष द्वारा सदन में व्यवस्था बनाई रखी जाएगी तथा उसे अपने निर्णयों को प्रवर्तित करने के लिये सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
  • नियम 373 के अनुसार, यदि लोकसभा अध्यक्ष की राय में किसी सदस्य का व्यवहार अव्यवस्थापूर्ण है तो अध्यक्ष उस सदस्य को लोकसभा से बाहर चले जाने का निर्देश दे सकता है और जिस सदस्य को इस तरह का आदेश दिया जाएगा, वह तुरंत लोकसभा से बाहर चला जाएगा तथा उस दिन की बची हुई बैठक के दौरान वह सदन से बाहर रहेगा।
  • नियम 374 (1), (2) तथा (3) के अनुसार, यदि लोकसभा अध्यक्ष की राय में किसी सदस्य ने अध्यक्ष के प्राधिकारों की उपेक्षा की है या वह जान बूझकर लोकसभा के कार्यों में बाधा डाल रहा है तो लोकसभा अध्यक्ष उस सदस्य का नाम लेकर उसे अवशिष्ट सत्र से निलंबित कर सकता है तथा निलंबित सदस्य तुरंत लोकसभा से बाहर चला जाएगा।
  • नियम 374 (क) (1) के अनुसार, नियम 373 और 374 में अंतर्विष्ट किसी प्रावधान के बावजूद यदि कोई सदस्य लोकसभा अध्यक्ष के आसन के निकट आकर अथवा सभा में नारे लगाकर या अन्य प्रकार से लोकसभा की कार्यवाही में बाधा डालकर जान बूझकर सभा के नियमों का उल्लंघन करते हुए घोर अव्यवस्था उत्पन्न करता है तो लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उसका नाम लिये जाने पर वह लोकसभा की पाँच बैठकों या सत्र की शेष अवधि के लिये (जो भी कम हो) स्वतः निलंबित हो जाएगा।

निलंबन से संबंधित कुछ उदाहरण:

  • जनवरी 2019 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने 45 सांसदों को लगातार कई दिनों तक लोकसभा की कार्यवाही बाधित करने के कारण निलंबित कर दिया था।
  • फरवरी 2014 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अविभाजित आंध्र प्रदेश के 18 सांसदों को निलंबित किया था। ये सांसद तेलंगाना राज्य के निर्माण के निर्णय का समर्थन या विरोध कर रहे थे।
  • दिसंबर 2018 में लोकसभा की नियम समिति ने सदन की वेल (Well) में प्रवेश करने वाले तथा पीठासीन के बार-बार मना करने के बावजूद नारे लगाकर लोकसभा के कार्य में बाधा डालने वाले सदस्यों के स्वतः निलंबन की सिफारिश की थी।

हालाँकि आमतौर पर देखा गया है कि सत्ताधारी दल हमेशा सदन में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने पर जोर देता है तथा विपक्षी दल विरोध करने के अपने अधिकार पर बल देते हैं लेकिन उनकी भूमिकाएँ बदलने के साथ ही उनकी स्थितियाँ भी बदल जाती हैं।

स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस


भूस्खलन जोखिम कटौती तथा स्थिरता पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन- 2019

प्रीलिम्स के लिये:

भूस्खलन जोखिम कटौती तथा स्थिरता पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के तथ्यात्मक पक्ष

मेन्स के लिये:

भारत में भूस्खलन की स्थिति

चर्चा में क्यों?

28 नवंबर, 2019 को राजधानी दिल्ली में भूस्खलन जोखिम कटौती तथा स्थिरता पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (International Conference on Landslides Risk Reduction and Resilience, 2019) का आयोजन किया गया।

प्रमुख बिंदु

  • देश में इस तरह का आयोजन पहली बार किया जा रहा है। सम्मेलन में भूस्खलन जैसी आपदाओं से निपटने के लिये आवश्यक प्रौद्योगिकी तथा नुकसान को कम करने में त्वरित प्रतिक्रिया के लिये आधारभूत संरचना विकसित करने पर बल दिया गया।
  • पिछले कुछ समय से दुनिया भर में भूस्खलन के कारण होने वाले नुकसान के संबंध में चर्चा की जा रही है और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं, संभवतः इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि यह आपदा समुदायों, पशुधन, पर्यावरण तथा जान-माल को क्षति पहुँचाती है।

भूस्खलन क्या है?

  • भूस्खलन को सामान्य रूप से शैल, मलबा या ढाल से गिरने वाली मिट्टी के बृहत संचलन के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • यह प्रायः भूकंप, बाढ़ और ज्वालामुखी के साथ घटित होती हैं। लंबे समय तक भारी वर्षा होने से भूस्खलन होता है। यह नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिये अवरुद्ध कर देता है।
  • पहाड़ी भू-भागों में भूस्खलन एक मुख्य और व्यापक प्राकृतिक आपदा है जो प्रायः जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचाती है और चिंता का एक मुख्य विषय है।

भारत में भूस्खलन की स्थिति

अनेक अनुभवों, इसकी बारंबारता और भूस्खलन के प्रभावी कारकों, जैसे - भूविज्ञान, भूआकृतिक कारक, ढ़ाल, भूमि उपयोग, वनस्पति आवरण और मानव क्रियाकलापों के आधार पर भारत को विभिन्न भूस्खलन क्षेत्रों में बाँटा गया है।

  • अत्यधिक सुभेद्यता क्षेत्र
    • ज़्यादा अस्थिर हिमालय की युवा पर्वत शृंखलाएँ, अंडमान और निकोबार, पश्चिमी घाट और नीलगिरि में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, भूकंप प्रभावी क्षेत्र और अत्यधिक मानव क्रियाकलापों वाले क्षेत्र, जिसमें सड़क और बाँध निर्माण इत्यादि शामिल हैं, अत्यधिक भूस्खलन सुभेद्यता क्षेत्रों में रखे जाते हैं।
  • अधिक सुभेद्यता क्षेत्र
    • अधिक भूस्खलन सुभेद्यता क्षेत्रों में भी अत्यधिक सुभेद्यता क्षेत्रों से मिलती-जुलती परिस्थितियाँ होती हैं। लेकिन दोनों में भूस्खलन को नियंत्रण करने वाले कारकों के संयोजन, गहनता और बारंबारता का अंतर है। हिमालय क्षेत्र के सारे राज्य और उत्तर-पूर्वी भाग (असम को छोड़कर) इस क्षेत्र में शामिल हैं।
  • मध्यम और कम सुभेद्यता क्षेत्र
    • पार हिमालय के कम वृष्टि वाले क्षेत्र लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में स्पिती, अरावली पहाड़ियों के कम वर्षा वाले क्षेत्र, पश्चिमी व पूर्वी घाट व दक्कन पठार के वृष्टि छाया क्षेत्र ऐसे इलाके हैं, जहाँ कभी-कभी भूस्खलन होता है।
    • इसके अलावा झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल में खादानों और भूमि धँसने से भूस्खलन होता रहता है।
  • अन्य क्षेत्र
    • भारत के अन्य क्षेत्र विशेषकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिग ज़िले को छोड़कर) असम (कार्बी अनलोंग को छोड़कर) और दक्षिण प्रांतों के तटीय क्षेत्र भूस्खलन युक्त हैं।

भूस्खलनों का परिणाम

  • भूस्खलनों का प्रभाव अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में पाया जाता है तथा स्थानीय होता है। परंतु सड़क मार्ग में अवरोध, रेल पटरियों का टूटना और जल वाहिकाओं में चट्टानें गिरने से पैदा हुई रुकावटों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
  • भूस्खलन की वजह से हुए नदी मार्ग में बदलाव बाढ़ ला सकती है और इससे जान माल का नुकसान हो सकता है। इन क्षेत्रों में आवागमन मुश्किल हो जाता है और विकास कार्यों की गति धीमी पड़ जाती है।

निवारण

  • भूस्खलन से निपटने के उपाय अलग-अलग क्षेत्रों के लिये अलग-अलग होने चाहिये। अधिक भूस्खलन संभावी क्षेत्रों में सड़क और बड़े बाँध बनाने जैसे- निर्माण कार्य तथा विकास कार्य पर प्रतिबंध होना चाहिये।
  • इन क्षेत्रों में कृषि नदी घाटी तथा कम ढाल वाले क्षेत्रों तक सीमित होनी चाहिये तथा बड़ी विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण होना चाहिये।
  • सकारात्मक कार्य जैसे- बृहत स्तर पर वनीकरण को बढ़ावा और जल बहाव को कम करने के लिये बाँध का निर्माण भूस्खलन के उपायों के पूरक हैं। स्थानांतरी कृषि वाले उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिये।

भारत की पहल

  • भारत को आपदा रोधी बनाने तथा भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिये सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को अपनाया है। सभी स्तरों पर हितधारकों की क्षमता को मज़बूत बनाने की यह एक अहम पहल है।
  • भूकंप, सुनामी और ज्वालामुखी की तुलना में चक्रवात के आने के समय एवं स्थान की भविष्यवाणी संभव है। इसके अतिरिक्त आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके चक्रवात की गहनता, दिशा और परिमाण आदि को मॉनीटर करके इससे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। नुकसान को कम करने के लिये चक्रवात शेल्टर, तटबंध, डाइक, जलाशय निर्माण तथा वायुवेग को कम करने के लिये वनीकरण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, फिर भी भारत, बांग्लादेश, म्याँमार इत्यादि देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या की सुभेद्यता अधिक है, इसीलिये यहाँ जान-माल का नुकसान बढ़ रहा है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005

  • इस अधिनियम में आपदा को किसी क्षेत्र में घटित एक महाविपत्ति, दुर्घटना, संकट या गंभीर घटना के रूप में परिभाषित किया गया है, जो प्राकृतिक या मानवकृत कारणों या दुर्घटना या लापरवाही का परिणाम हो और जिससे बड़े स्तर पर जान की क्षति या मानव पीड़ा, पर्यावरण की हानि एवं विनाश हो और जिसकी प्रकृति या परिमाण प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले मानव समुदाय की सहन क्षमता से परे हो।

सामान्यतः भूस्खलन भूकंप, ज्वालामुखी फटने, सुनामी और चक्रवात की तुलना में बड़ी घटना नहीं है, परंतु इसका प्राकृतिक पर्यावरण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अन्य आपदाओं के विपरीत (जो आकस्मिक, अननुमेय तथा बृहत स्तर पर दीर्घ एवं प्रादेशिक कारकों से नियंत्रित हैं), भूस्खलन की स्थिति मुख्य रूप से स्थानीय कारणों से उत्पन्न होती हैं। इसलिये भूस्खलन के बारे में आँकड़े एकत्र करना और इसकी संभावना का अनुमान लगाना न सिर्फ मुश्किल अपितु काफी कठिन है। स्पष्ट है कि इस प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिये अंतर्राष्ट्रीय समुदाय तथा राज्य एवं क्षेत्रीय स्तरों पर लोगों को शामिल करके व्यापक सहयोगी कार्यक्रम बनाए जाने चाहिये। साथ ही वैश्विक स्तर पर भी इस प्रकार के प्रयासों से जागरूकता एवं प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिये।

स्रोत: pib


वैश्विक प्रवास रिपोर्ट 2020

प्रीलिम्स के लिये

वैश्विक प्रवास रिपोर्ट 2020 क्या है, जारीकर्त्ता

मेन्स के लिये

वैश्वीकरण के युग में देशों की आर्थिक संवृद्धि में प्रवासियों की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) के अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी संगठन (International Organisation for Migration-IOM) द्वारा वैश्विक प्रवास रिपोर्ट 2020 (Global Migration Report 2020) जारी की गई। इसके अनुसार विश्व में भारतीय प्रवासियों की संख्या सर्वाधिक है।

मुख्य बिंदु:

  • रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 17.5 मिलियन (1 करोड़ 75 लाख) प्रवासी दुनिया के विभिन्न देशों में रह रहे हैं।
  • विदेशों में रह रहे इन प्रवासियों द्वारा प्रेषित धन (Remittance) प्राप्त करने के मामले में भारत (78.6 बिलियन डॉलर) विश्व में पहले स्थान पर है।
  • भारत के बाद इस सूची में दूसरे स्थान पर चीन (67.4 बिलियन डॉलर) तथा तीसरे स्थान पर मैक्सिको (35.7 बिलियन डॉलर) है।
  • प्रवासियों के माध्यम से धन प्रेषण करने वाले देशों में पहले स्थान पर अमेरिका (68 बिलियन डॉलर), दूसरे स्थान पर संयुक्त अरब अमीरात (44.4 बिलियन डॉलर) तथा तीसरे स्थान पर सऊदी अरब (36.1 बिलियन डॉलर) है।
  • IOM के अनुसार, वर्तमान में विश्व के अनेक हिस्सों में रह रहे कुल प्रवासियों की संख्या लगभग 270 मिलियन (27 करोड़) है जो कि विश्व की कुल जनसंख्या का 3.5 प्रतिशत है।
  • IOM की पिछली रिपोर्ट, जो वर्ष 2018 में आई थी, के अनुसार प्रवासियों की कुल संख्या में 0.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

International Migrants

  • रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में विश्व प्रवासी जनसंख्या में लगातार वृद्धि हुई है लेकिन कुल जनसंख्या में वृद्धि होने से यह अनुपात लगभग स्थिर बना हुआ है।
  • विदेशों में रह रहे इन प्रवासियों का अधिकांश हिस्सा यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में रहता है।
  • गरीब या विकासशील देशों के अधिकांश प्रवासी अमेरिका के अलावा फ्राँस, रूस, संयुक्त अरब अमीरात तथा सऊदी अरब आदि देशों में जाते हैं।
  • मध्य-पूर्व (Middle-East) में हुए सर्वेक्षण के मुताबिक, अस्थायी प्रवासी मज़दूरों की संख्या खाड़ी देशों में सर्वाधिक है। संयुक्त अरब अमीरात में प्रवासी मज़दूर वहाँ की जनसंख्या के 80 प्रतिशत तथा कार्यबल के 90 प्रतिशत हैं।
  • इस रिपोर्ट में बताया गया कि केंद्रीय अफ्रीकी गणराज्य, कांगो, म्याँमार, दक्षिणी सूडान, सीरिया तथा यमन में चल रहे आतंरिक संघर्ष एवं हिंसा के कारण पिछले दो वर्षों में लगभग 4 करोड़ 13 लाख लोग अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।
  • देश में आतंरिक रूप से विस्थापित हुए लोगों में पहले स्थान पर सीरिया (61 लाख), दूसरे स्थान पर कोलंबिया (58 लाख) तथा तीसरे स्थान पर कांगो (31 लाख) है।
  • विश्व में लगभग 2 करोड़ 60 लाख की आबादी शरणार्थी के रूप में रह रही है। इसमें पहले स्थान पर सीरिया (लगभग 60 लाख) तथा दूसरे स्थान पर अफगानिस्तान (25 लाख) है।
  • रिपोर्ट में जलवायु एवं मौसम संबंधी आपदाओं के कारण हुए प्रवास के बारे में चर्चा की गई है। वर्ष 2018 के अंत में फिलिपींस में आए मांगखुत चक्रवात (Mangkhut Cyclone) की वजह से लगभग 38 लाख लोग विस्थापित हुए।

स्रोत: द हिंदू


रक्षा अधिग्रहण परिषद

प्रीलिम्स के लिये

रक्षा अधिग्रहण परिषद

मेन्स के लिये:

रक्षा अधिग्रहण परिषद से संबंधित विभिन्न तथ्यात्मक पक्ष

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) में तीनों सेनाओं के लिये 22,800 करोड़ रुपए से अधिक मूल्‍य के पूंजीगत सामान की खरीद को मंज़ूरी दी है।

प्रमुख बिंदु

  • ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिये DAC ने असॉल्‍ट राइफलों हेतु ‘थर्मल इमेजिंग नाइट साइट्स’ के स्‍वदेशी डिज़ाइन, विकास एवं विनिर्माण के लिये मंज़ूरी दी।

‘थर्मल इमेजिंग नाइट साइट्स’

Thermal Imaging Night Sights

  • ‘थर्मल इमेजिंग नाइट साइट्स’ का विनिर्माण भारत के निजी उद्योग द्वारा किया जाएगा और इनका उपयोग अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों द्वारा किया जाएगा।
  • ‘थर्मल इमेजिंग नाइट साइट्स’ से सैनिकों को अंधेरे के साथ-साथ हर तरह के मौसम में लम्‍बी दूरी से सटीक निशाना लगाने में मदद मिलेगी, जिससे रात्रि में भी बड़ी तत्‍परता के साथ जंग करने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

‘एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल’

Airborne Warning and Control System (AWACS)

  • सफल स्‍वदेशी ‘एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल’ कार्यक्रम के बाद DAC ने अतिरिक्‍त एयरबॉर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्‍टम (AWACS) इंडिया एयरक्राफ्ट की खरीद के लिये आवश्‍यकता की स्‍वीकार्यता को दोबारा सत्यापित किया।
  • इन विमानों के लिये रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा मिशन प्रणालियों और उप-प्रणालियों की स्‍वदेश में ही डिज़ाइनिंग की जाएगी और फिर इनका विकास किया जाएगा तथा बाद में मुख्‍य प्‍लेटफॉर्म पर इन्‍हें एकीकृत किया जाएगा।
  • ये प्‍लेटफॉर्म विमान पर ही कमांड एवं कंट्रोल तथा ‘पूर्व चेतावनी’ सुलभ कराएंगे, जिससे भारतीय वायु सेना (IAF) को हवाई क्षेत्र में कम से कम समय में प्रभावकारी वर्चस्‍व सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
  • इन प्रणालियों को शामिल करने से हमारे देश की सीमाओं पर कवरेज बढ़ जाएगी और इससे भारतीय वायु सेना की हवाई रक्षा तथा आक्रामक क्षमता दोनों को ही काफी हद तक बढ़ाने में मदद मिलेगी।

‘पनडुब्बी-रोधी युद्ध पी8 I’

P8I long range patrol aircraft

  • DAC ने नौसेना के लिये मध्‍यम दूरी वाले ‘पनडुब्बी-रोधी युद्ध पी8 I’ विमान की खरीद को भी मंज़ूरी दे दी है।
  • इन विमानों से समुद्री तटों की निगरानी, पनडुब्‍बी-रोधी युद्ध (ASW) और एंटी-सरफेस वेसल (ASV) से हमले करने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

‘ट्विन इंजन हैवी हेलिकॉप्टर’

Twin Engine Heavy Helicopters (TEHH)

  • DAC ने भारतीय तटरक्षक के लिये ‘ट्विन इंजन हैवी हेलिकॉप्टर’ की खरीद को भी स्‍वीकृति दे दी है।
  • इन विमानों से तटरक्षक को समुद्र में आतंकवाद की रोकथाम करने और समुद्री मार्गों के ज़रिये आतंकवादियों की घुसपैठ रोकने के साथ-साथ तलाशी एवं बचाव अभियान चलाने के मिशन शुरू करने में मदद मिलेगी।

रक्षा अधिग्रहण परिषद

(Defence Acquisition Council-DAC)

  • सशस्त्र बलों की स्वीकृत आवश्यकताओं की शीघ्र ख़रीद सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 में रक्षा अधिग्रहण परिषद की स्थापना की गई थी।
  • DAC की अध्यक्षता रक्षा मंत्री द्वारा की जाती है।
  • उल्लेखनीय है कि DAC अधिग्रहण संबंधी मामलों पर निर्णय लेने वाली रक्षा मंत्रालय की सर्वोच्च संस्था है।

स्रोत: द हिंदू


रक्षा औद्योगिक गलियारा

प्रीलिम्स के लिये

तथ्यात्मक बिंदु

मेन्स के लिये

भारत की रक्षा स्थिति (संदर्भ के रूप में) 

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किये हैं।

प्रमुख बिंदु

  • ये रक्षा गलियारे एक सुनियोजित और कुशल औद्योगिक आधार की सुविधा प्रदान करेंगे जिससे देश में रक्षा क्षेत्र में उत्पादन बढ़ेगा।
  • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2012-2018 के बीच भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (13% के साथ) बनकर उभरा है।

उद्देश्य

  • रक्षा औद्योगिक गलियारे की स्थापना का उद्देश्य विभिन्न रक्षा औद्योगिक इकाइयों के बीच संपर्क सुनिश्चित करना है।

नोट:

  • उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे में 6 शहर शामिल हैं: लखनऊ, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, चित्रकूट और झांसी।
  • तमिलनाडु डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में 5 शहर शामिल हैं: चेन्नई, होसुर, सलेम, कोयंबटूर और तिरुचिरापल्ली।

पृष्ठभूमि

फरवरी, 2018 में अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने यह घोषणा की थी कि घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिये देश में दो रक्षा औद्योगिक उत्पादन गलियारे स्थापित किए जाएंगे। इसमें सरकार ने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में गलियारों के निर्माण की परिकल्पना की थी।

स्रोत: pib


ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को संसद की मंज़ूरी

प्रीलिम्स के लिये:

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, 2019

मेन्स के लिये:

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक सशक्तीकरण के लिये एक विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 [Transgender Persons (Protection of Rights) Bill, 2019] पारित कर दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • इस विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक सशक्तीकरण के लिये एक कार्य प्रणाली उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है ।
  • इस विधेयक से हाशिये पर खड़े इस वर्ग के विरूद्ध लांछन, भेदभाव और दुर्व्यवहार कम होने तथा इन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने से अनेक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को लाभ पहुँचेगा।
  • इससे समग्रता को बढ़ावा मिलेगा और ट्रांसजेंडर व्यक्ति समाज के उपयोगी सदस्य बन जाएंगे।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक बहिष्कार से लेकर भेदभाव, शिक्षा सुविधाओं की कमी, बेरोज़गारी, चिकित्सा सुविधाओं की कमी, जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, 2019 एक प्रगतिशील विधेयक है क्योंकि यह ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनाएगा।

स्रोत: द हिंदू


भारत में एक्सलेरेटर प्रयोगशाला

प्रीलिम्स के लिये:

एक्सलेरेटर प्रयोगशाला, UNDP, ‘डेट फॉर डेवलेपमेंट, अटल नवाचार मिशन

मेन्स के लिये:

एक्सलेरेटर प्रयोगशाला का महत्त्व और आवश्यकता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत (दिल्ली) में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nation Development Program- UNDP) ने एक एक्सलेरेटर प्रयोगशाला (Accelerator Lab) की स्थापना की है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस प्रयोगशाला की स्थापना UNDP तथा भारत सरकार के अटल नवाचार मिशन (Atal Innovation Mission) के आपसी समन्वय से की गई है।
  • एक्सलेरेटर प्रयोगशाला की स्थापना के बाद UNDP और भारत ने ‘डेट फॉर डेवलेपमेंट’ (#DateForDevelopment), जो एक तरह का "मैचमेकिंग प्लेटफॉर्म (Matchmaking Platform) है का भी आयोजन किया।
    • इसका लक्ष्य स्थानीय नवाचारियों को अनुभवी और विकसित नवाचारियों से जोड़ना है।

UNDP

उद्देश्य:

  • यह प्रयोगशाला कुछ प्रमुख मुद्दों, जैसे- वायु प्रदूषण, सतत् जल प्रबंधन जैसी समस्याओं का समाधान नवाचारों के माध्यम से करने की कोशिश करेगी।
  • इसके अलावा नवाचारी देश के सामने आने वाली आम समस्याओं के समाधान के लिये ज़मीनी स्तर के ऊर्जा/नवाचारों को एक साथ लाने की कोशिश कर सकेंगे।
  • इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये तेज़ी से प्रगति करना है।

एक्सलेरेटर प्रयोगशाला क्या है?

  • एक्सलेरेटर प्रयोगशाला UNDP, जर्मनी और कतर द्वारा 21वीं सदी की जटिल नई चुनौतियों का हल खोजने के लिये शुरू की गई एक नई पहल है।
  • भारत की एक्सीलरेटर प्रयोगशाला 60 वैश्विक प्रयोगशालाओं के एक नेटवर्क का हिस्सा होगी जो जलवायु परिवर्तन और असमानता जैसी वैश्विक चुनौतियों के नए समाधानों का परीक्षण और पैमाना करेगी।
  • एक्सलेरेटर प्रयोगशाला विभिन्न देशों जैसे- इराक, जॉर्डन, अर्जेंटीना, कोलंबिया, सर्बिया, नेपाल, मैक्सिको और वियतनाम आदि में स्थित हैं।

लाभ:

  • इस प्रयोगशाला से जुड़े लोगों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में पेश किए गए अभिनव समाधानों से न केवल भारत बल्कि कई अन्य देश भी लाभान्वित होंगे।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम

(United Nation Development Program- UNDP)

  • UNDP संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक विकास का एक नेटवर्क है।
  • इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क में अवस्थित है
  • UNDP गरीबी उन्मूलन, असमानता और बहिष्कार को कम करने हेतु लगभग 70 देशों में कार्य करता है।
  • इसके अलावा देश के विकास को बढ़ावा देने के लिये नीतियों, नेतृत्व कौशल, साझेदारी क्षमताओं, संस्थागत क्षमताओं को विकसित करने और लचीलापन बनाने में मदद करता है।

स्रोत: द हिंदू


अमेरिका ने घटाया अपना नाटो बजट

प्रीलिम्स के लिये

नाटो

मेन्स के लिये

वर्तमान समय में नाटो स्थिति, महत्ता

चर्चा में क्यों?

अमेरिका नाटो के संचालन बजट में अपने योगदान को कम करेगा जबकि जर्मनी अपनी हिस्सेदारी में इज़ाफा करेगा। अमेरिका द्वारा यह कदम संगठन के यूरोपीय सदस्यों की बार-बार आलोचना के बाद उठाया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • नए फार्मूले के तहत यूरोपीय देश और कनाडा का योगदान बढ़ेगा तथा अमेरिका बजट में अपने हिस्से को कमी करेगा।
  • अमेरिका फिलहाल नाटो बजट में 22.1% का योगदान देता है, जबकि जर्मनी की हिस्सेदारी 14.8% है। यह प्रत्येक देश की सकल राष्ट्रीय आय के आधार तय किये गए फार्मूले के तहत होता है।
  • नए समझौते के तहत, अमेरिका कुल बजट में अपना योगदान कम करके 16.35% करेगा जबकि जर्मनी और अन्य सदस्य देश अपने योगदान में वृद्धि करेंगे।
  • हालाँकि फ्राँस ने नए समझौतों को मानने से इनकार किया है, वह अपनी हिस्सेदारी को 10.5% पर ही बनाए रखेगा।

पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2014 के वेल्स शिखर सम्मेलन में नाटो के सहयोगी सदस्य देशों ने 10 वर्षों के भीतर रक्षा क्षेत्र में जीडीपी का 2% खर्च करने पर सहमति व्यक्त की थी। जबकि अमेरिका ने ब्रुसेल्स में नाटो शिखर सम्मेलन के सदस्यों से रक्षा क्षेत्र में जीडीपी का 4% तक खर्च बढ़ाने की मांग रखी। अमेरिका की मांग नाटो के रक्षा क्षेत्र में मौजूदा योगदान को 2% के लक्ष्य से बढ़ाकर दोगुना करने की थी।
  • अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय नाटो के सदस्य देशों की आलोचना करता रहा है कि वे नाटो के लिये पर्याप्त भुगतान नहीं करते हैं।
  • 2019 तक नाटो के 29 सदस्यों में से केवल आठ सदस्य अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2% रक्षा पर खर्च करने में सक्षम हैं। जर्मनी इस लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहा है।
  • उत्तरी सीरिया में कुर्द के खिलाफ यूरोप एवं अमेरिकी और तुर्की के सैन्य अभियान के बीच खराब समन्वय ने नाटो की बिगड़ती स्थिति को बढ़ावा दिया है, इसप्रकार यह नाटो की सक्रियता को पुन: परिभाषित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन

(North Atlantic Treaty Organization-NATO)

  • नाटो एक अंतर्सरकारी सैन्य गठबंधन है जिसकी स्थापना 4 अप्रैल, 1949 में हुई थी।
  • इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में है।
  • 1949 में इसके 12 संस्थापक सदस्य थे जिसमें बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्राँस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं।
  • अन्य सदस्य देशों में ग्रीस और तुर्की(1952), जर्मनी (1955), स्पेन(1982), चेक गणराज्य, हंगरी और पोलैंड(1999), बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया व स्लोवेनिया(2004), अल्बानिया एवं क्रोएशिया(2009) तथा मॉन्टेनेग्रो(2017) शामिल हैं।
  • वर्तमान में इस संगठन में 29 सदस्य देश शामिल हैं।

प्रमुख प्रावधान

  • संधि के एक प्रमुख प्रावधान (तथाकथित अनुच्छेद 5) में कहा गया है कि यदि यूरोप या उत्तरी अमेरिका में संगठन के एक सदस्य पर हमला किया जाता है, तो इसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसने प्रभावी रूप से पश्चिमी यूरोप को अमेरिका के "परमाणु छत्र" के तहत रखा है।
  • नाटो ने केवल 12 सितंबर, 2001 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के हमलों के बाद अनुच्छेद 5 को एक बार लागू किया था।
  • नाटो का संरक्षण सदस्यों के गृह युद्ध या आंतरिक तख्तापलट तक सीमित नहीं है।
  • वर्ष 1966 में फ्राँस नाटो की एकीकृत सैन्य कमान से हट गया लेकिन संगठन का सदस्य बना रहा। हालाँकि इसने वर्ष 2009 में NATO की सैन्य कमान में फिर से अपना स्थान बना लिया।

स्रोत: द हिंदू


भोपाल गैस त्रासदी

प्रीलिम्स के लिये:

भोपाल गैस त्रासदी, मिथाइल आइसोसाइनाइट

मेन्स के लिये:

भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में एक विशेषज्ञ समिति द्वारा भोपाल गैस त्रासदी पर किया गया शोध विवादों में रहा है।

मुख्य बिंदु:

  • इस विशेषज्ञ समिति में ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ (All India Institute of Medical Sciences-AIIMS), राष्ट्रीय पर्यावरणीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान (National Institute for Research in Environmental Health- NIREH) तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council for Medical Research- ICMR) के वैज्ञानिक शामिल थे।
  • भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित पीड़ितों के लिये कार्य कर रहे कुछ संगठनों ने ICMR पर यह आरोप लगाया है कि इस समिति द्वारा किये गए शोध में कुछ गलतियाँ थीं फिर भी इन्हें समिति द्वारा अनुमोदित किया गया तथा प्रकाशित नहीं किया गया।
  • इस शोध से संबंधित रिपोर्ट को भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित लोगों के लिये कार्य करने वाल कार्यकर्त्ताओं के एक संघ द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत प्राप्त किया गया है।
  • इस समिति द्वारा तकरीबन 48 लाख रुपए की लागत किये गए शोध की कार्यप्रणाली में बहुत खामियाँ थीं तथा इसे गलत तरीके से गठित किये जाने के कारण इसके निष्कर्ष भी अनिर्णायक रहे।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में एक पुनर्विचार याचिका स्वीकार की है जिसमें इस घटना से प्रभावित लोगों के लिये अधिक मुआवज़े की मांग की गई है
  • इस मामले में बच्चों में जन्मजात विकृतियों से संबंधित आँकड़े पीड़ितों को मुआवज़ा दिलाने के लिये महत्वपूर्ण हैं।

शोध से संबंधित अन्य तथ्य:

  • विशेषज्ञ समिति द्वारा किये गए इस शोध में यह बात सामने आई है कि सामान्य गर्भवती महिलाओं की तुलना में वर्ष 1984 के भोपाल गैस त्रासदी से पीड़ित माताओं और उनसे जन्म लेने बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य कमियाँ पाई गईं तथा इन बच्चों में अधिकतर ‘जन्मजात विकृति’ से प्रभावित थे।
  • इस शोध के अनुसार, भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित गर्भवती महिलाओं से जन्मे 1048 बच्चों में से 9 प्रतिशत में कई जन्मजात स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ विद्यमान थीं। इसके विपरीत 1247 सामान्य गर्भवती महिलाओं से जन्मे बच्चों में यह समस्याएँ केवल 1.3 प्रतिशत में पाई गई।
  • इन विकृतियों से प्रभावित होने बच्चों में भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित गर्भवती महिलाओं की अगली पीढ़ी के भी बच्चे थे।

भोपाल गैस त्रासदी

(Bhopal Gas Tragedy):

  • 2-3 दिसंबर, 1984 की रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड (Union Carbide) [परिवर्तित नाम- डाउ केमिकल्स (Dow Chemicals)] कंपनी के प्लांट से मिथाइल आइसोसाइनाइट (Methyl Isocyanate) गैस का रिसाव हुआ था।
  • इस घटना में हज़ारों लोगों की मौत हो गई थीं और लाखों लोग इससे प्रभावित हुए थे।
  • रिसाव की घटना पूरी तरह से कंपनी की लापरवाही के कारण हुई थी, पहले भी कई बार रिसाव की घटनाएँ हुई थीं लेकिन कंपनी ने सुरक्षा के समुचित उपाय नहीं किये थे।

स्रोत- द हिंदू


चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019

प्रीलिम्स के लिये

चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019 के प्रावधान

मेन्स के लिये

वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करने में चिट फंड की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संसद में चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019 [Chit Fund (Amendment) Bill 2019] पारित किया गया। इसके द्वारा पहले से चले आ रहे चिट फंड अधिनियम, 1982 में महत्त्वपूर्ण बदलाव किये गए।

विधेयक के मुख्य प्रावधान:

  • इस विधेयक में चिट फंड के लिये अनेक वैकल्पिक नामों के सुझाव दिये गए हैं जिससे इसके प्रति लोगों में एक नया भाव तथा विश्वास पैदा हो सके। जैसे- बंधुत्त्व कोष (Fraternity Fund), आवृत्ति बचत तथा ऋण संस्थान (Rotating Savings and Credit Institutions) आदि।
  • इस विधेयक में चिट फंड अधिनियम, 1982 में परिभाषित कुछ शब्दावलियों को बदला गया है। जो इस प्रकार हैं-
    • चिट राशि (chit amount) - वह राशि जो चिट फंड के सभी भागीदारों को जमा करनी होती है।
    • लाभांश (Dividend) - चिट फंड के संचालन के लिये अलग रखी गई राशि में भागीदारों का हिस्सा।
    • पुरस्कार राशि (Prize Amount) - चिट राशि तथा लाभांश का अंतर।
    • इस विधेयक के तहत इन तीनों को क्रमशः सकल चिट राशि (Gross Chit Amount), छूट की हिस्सेदारी (Share of Discount), निवल चिट राशि (Net Chit Amount) नाम दिया गया है।
  • विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि चिट निकालते समय कम-से-कम दो सदस्यों का मौजूद होना अनिवार्य होगा। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि इसके सदस्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा भी जुड़ सकते हैं।
  • इस विधेयक में फोरमैन के लिये कमीशन की राशि को 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त यह विधेयक सबस्क्राइबर्स के क्रेडिट बैलेंस पर फोरमैन के वैध अधिकार की अनुमति देता है।
  • चिट फंड अधिनियम, 1982 द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि एक व्यक्ति या चार व्यक्तियों के सहयोग से चलने वाले चिट फंड में जमा करने की अधिकतम राशि 1 लाख रुपए होगी इसे बढ़ाकर अब 3 लाख रुपए कर दिया गया है।
  • चार व्यक्तियों से अधिक या किसी फर्म द्वारा चलाए जा रहे चिट फंड में जमा करने की अधिकतम सीमा 6 लाख रुपए थी जिसे बढ़ाकर अब 18 लाख रुपए कर दिया गया है।
  • चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019 के अधिनियम बनने के बाद इसके लागू होने की शर्तें भी उल्लिखित की गई हैं। इसके अंतर्गत कहा गया है कि यह अधिनियम निम्नलिखित चिट फंड पर नहीं लागू होगा:
    • वे चिट फंड जिन्हें अधिनियम लागू होने से पहले शुरू किया गया है।
    • वे चिट फंड (या एक ही फोरमैन द्वारा चलाए जाने वाले कई चिट्स) जिनकी राशि 100 रुपए से कम है।
  • यह विधेयक चिट फंड के लिये 100 रुपए की धनराशि की सीमा को समाप्त करता है तथा राज्य सरकारों को आधार राशि तय करने की अनुमति देता है जिससे अधिक की रकम होने पर एक्ट के प्रावधान लागू होंगे।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू


भारत : स्वर्ण तस्करी का हब

प्रीलिम्स के लिये

IMPACT संगठन, अफ़्रीकी ग्रेट लेक्स

मेन्स के लिये

स्वर्ण तस्करी का मुद्दा

चर्चा में क्यों?

अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन IMPACT ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि भारत दुनिया में सोने की सबसे अधिक तस्करी करने वाले देश के रूप में उभरा है।

मुख्य बिंदु:

  • रिपोर्ट में बताया गया है कि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के जिन क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और मानव अधिकारों का हनन हो रहा है, वहाँ से आने वाला स्वर्ण भारत के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रवेश कर रहा है।
  • एनजीओ ने खुलासा किया है कि भारत प्रतिवर्ष लगभग 1,000 टन सोने का आयात करता है जो आधिकारिक आँकड़ों से एक-चौथाई अधिक है।

कारण:

  • भारत में स्वर्ण उद्योग से संबंधित एजेंसियाँ विनियामकीय जाँच करने में विफल रही है।
  • एजेंसियाँ यह पता नही लगा पाती हैं कि स्वर्ण से प्राप्त होने वाला वित्त अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी देशों में संघर्ष और मानवाधिकारों के उल्लंघन को बढ़ावा तो नहीं देता है।
  • रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया का एक तिहाई स्वर्ण भारतीय बाज़ारों से होकर गुजरता है, जिसकी तस्करी के लिये तीन प्राथमिक कारकों की पहचान की गई है:

1) कर में रियायत

2) मूल दस्तावेज़ों को गलत बताकर

3) सह अपराधी दल

  • भारत के स्वर्ण रिफाइनरी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिये सरकार ने वर्ष 2013 में अपरिष्कृत सोने के लिये करों में रियायत देने की शुरुआत की थी जिसके कारण व्यापारियों ने कम करों का लाभ उठाने के लिये दस्तावेज़ों में हेर-फेर कर दावों को गलत साबित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपरिष्कृत सोने का आयात वर्ष 2012 के 23 टन से बढ़कर वर्ष 2015 में 229 टन हो गया।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अन्य देशों से अधिक सोने के आयात की घोषणा की है, क्योंकि वे उत्पादन करने में सक्षम हैं, उदाहरण के लिये वर्ष 2014 और 2017 के बीच डोमिनिकन रिपब्लिक से 100.63 टन अपरिष्कृत स्वर्ण का भारत में आयात किया गया था।
  • रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात, भारत में सोने की तस्करी का सबसे बड़ा स्रोत है। संयुक्त अरब अमीरात एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता है और यह अवैध तरीके से अपरिष्कृत सोने का आयात करता है फिर इसे परिष्कृत कर भारत को निर्यात किया जाता है। जबकि अफ्रीका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र में भारत से संबंधित प्रमुख व्यापारियों और रिफाइनरों की संलिप्तता अवैध सोने के व्यापार के रूप में पाई गई है।

अफ्रीकी ग्रेट लेक्स :

  • अफ्रीकी ग्रेट लेक्स झीलों की एक शृंखला है जो East African Rift और उसके आसपास रिफ्ट वैली झीलों का हिस्सा है।
  • इसमें मुख्य रूप से विक्टोरिया झील (दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताज़े पानी की झील), तंगानिका झील (विश्व की दूसरी सबसे गहरी झील), मलावी झील (भ्रंश घाटी में स्थित अफ्रीका की तीसरी बड़ी झील) शामिल है।
  • अफ्रीका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र में बुरुंडी, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, केन्या, मलावी, रवांडा, तंजानिया और युगांडा देश आते है।

क्या किया जा सकता है?

  • इस रिपोर्ट में भारत में सोने की तस्करी के मुद्दे को हल करने के लिये दो सिफारिशें की गई हैं:
    • करों का सामंजस्य
    • नकली दस्तावेज़ों की जाँच करने के लिये सीमा पर एक संवर्द्धित विनियामकीय प्रणाली
  • अधिकारियों को सोने की तस्करी को हतोत्साहित करने के लिये कार्रवाई करनी चाहिये और सुनिश्चित करना चाहिये कि स्वर्ण उद्योग भी इसमें सहयोग दे।
  • एक प्रमुख वैश्विक स्वर्ण विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी भूमिका के साथ भारत को अपनी सोने की आपूर्ति श्रृंखला (Supply chains) में कमज़ोरियों को दूर करने के लिये उचित कार्रवाई करनी चाहिये।

IMPACT:

IMPACT (पूर्व में इसे “Partnership Africa Canada” के रूप में जाना जाता था) एक गैर-सरकारी संगठन है, जो यह बताता है कि “ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कैसे किया जाता है, जहाँ सुरक्षा और मानव अधिकारों का 30 से अधिक वर्षों से हनन हो रहा है।

स्रोत- द हिंदू


RAPID FIRE करेंट अफेयर्स (29 नवंबर)

47वाँ अखिल भारतीय पुलिस विज्ञान सम्मेलन

47वाँ अखिल भारतीय पुलिस विज्ञान सम्मेलन लखनऊ में 27-28 नवंबर, 2019 को आयोजित हुआ। विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस अधीक्षक से लेकर महानिदेशक स्तर के पुलिस अधिकारियों ने इस वार्षिक सम्मेलन में भाग लिया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में छह विषय चर्चा के लिये रखे गए थे। इनमें पुलिस सुधार, फॉरेंसिक विज्ञान और जाँच तथा महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, कट्टरपंथ से निपटने में सोशल मीडिया की भूमिका, पुलिस कर्मियों के समुचित दृष्टिकोण और एकीकृत आपराधिक न्याय प्रणाली जैसे विषय शामिल थे। इस सम्‍मेलन का आयोजन उत्‍तर प्रदेश पुसिल ने गृह मंत्रालय और पुलिस अनुसंधान तथा विकास ब्‍यूरो के सहयोग से किया।


उद्धव ठाकरे

लगभग डेढ़ महीने तक चले अभूतपूर्व राजनीतिक ड्रामे के बाद शिवसेना अध्‍यक्ष और महाराष्‍ट्र विकास अघाड़ी नेता उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर, 2019 महाराष्‍ट्र के नए मुख्‍यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्‍यपाल भगत सिंह कोश्‍यारी उन्हें मध्‍य मुंबई में शिवाजी पार्क में आयोजित समारोह में शपथ दिलाई। 288 सदस्‍यीय विधानसभा में शिवसेना के 56, राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 54 और कांग्रेस पार्टी के 44 विधायक हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि ठाकरे परिवार के किसी व्यक्ति ने मुख्मंत्री पद की शपथ ली।


दीपिका कुमारी

भारत की तीरंदाज दीपिका कुमारी ने बैंकॉक में 21वीं एशियाई तीरंदाजी प्रतियोगिता में महिलाओं के व्यक्तिगत रिकर्व मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता, जबकि अंकिता भगत को रजत पदक मिला। इससे पहले दीपिका और अंकिता ने सेमीफाइनल में पहुँचकर व्यक्तिगत ओलंपिक कोटा हासिल कर लिया था। इस 21वीं एशियाई तीरंदाजी चैम्पियनशिप के अंतिम दिन अभिषेक वर्मा और ज्योति सुरेखा वेन्नाम की जोड़ी ने मिक्‍स्‍ड डबल्‍स की कंपाउंड स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया। फाइनल में वर्मा और ज्योति को जोड़ी ने चीनी ताइपै की यि-ह्सुआन चेन और चीह-लुह चेन की जोड़ी को हराया। भारत ने चैंपियनशिप में एक स्वर्ण, दो रजत और चार कांस्य पदक सहित कुल सात पदक जीते।


जनरल बाजवा (Follow-up of 27 नवंबर)

19 अगस्त, 2019 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने जनरल कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल को अगले तीन वर्षों के लिये बढ़ा दिया था। लेकिन कुछ दिन पहले पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तानी सेना के 16वें सेना प्रमुख जनरल बाजवा के कार्यकाल विस्तार की अधिसूचना को निलंबित कर दिया था, जो पाकिस्तान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद कैबिनेट ने सेना नियम एवं नियमन की धारा, 255 में संशोधन किया और नियम में कानूनी खामी को दूर करने के लिये 'कार्यकाल में विस्तार' शब्द शामिल किया। इसे राष्ट्रपति आरिफ अल्वी के पास मंज़ूरी के लिये भेजा गया जिन्होंने इस नई अधिसूचना को मंज़ूरी दे दी। इसके बाद 28 नवंबर, 2019 को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने जनरल बाजवा का कार्यकाल 6 महीने बढ़ाने की सशर्त मंज़ूरी दे दी।