डेली न्यूज़ (29 Jul, 2019)



प्रवासियों का शहर बनते जा रहे हैं दिल्ली तथा देश के अन्य महानगर

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली में रहने वाली लगभग 38.5 प्रतिशत आबादी दिल्ली से बाहर जन्मी है।

प्रमुख बिंदु

Migrant magnets

  • इस स्थिति को देखते हुए यदि दिल्ली को प्रवासियों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला चुंबक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
  • दिल्ली की तुलना में चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे राज्यों में राज्य के बाहर जन्मे लोगों की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम थी।
  • देश के अन्य प्रमुख राज्यों, जैसे- मुंबई, बेंगलुरु और पुणे में इस प्रकार की आबादी क्रमशः 27.7, 17.3 और 10.1 प्रतिशत थी।
  • मिलेनियम सिटी के रूप में जाना जाने वाला गुरुग्राम (जो दिल्ली NCR में शामिल है) भी इस सूची में दिल्ली के आस-पास ही दिखाई पड़ता है, जहाँ तक़रीबन 36 प्रतिशत आबादी का जन्म किसी अन्य स्थान पर हुआ था।
  • दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर, जिसमें नोएडा और ग्रेटर नोएडा शामिल हैं, में भी ऐसे प्रवासियों की संख्या लगभग 18.4 प्रतिशत के आस-पास थी।
  • आँकड़ों से पता चलता है कि बड़े शहरों की ओर होने वाला अधिकतर पलायन राज्यगत (Intra-State) होता है न कि अंतर-राज्यीय (inter-State)। ऐसे में इस बात में कोई दम नहीं दिखाई देता कि महानगरों में आने वाले प्रवासी उस क्षेत्र विशेष का रोज़गार छीन रहे हैं।
  • 2011 की जनगणना के आँकड़ों में यह भी पाया गया कि कई बड़े शहरों में होने वाला अंतर-राज्यीय पलायन अधिकतर अंतर-क्षेत्रीय पलायन भी होता था, क्योंकि अधिकांश प्रवासी अपने घर के आस-पास ही रहने को वरीयता देते थे।
  • उदाहरण के लिये चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद में आने वाले अधिकतर प्रवासी उत्तर भारत से न आकर दक्षिण भारत से आए थे और इसी तरह कोलकाता के प्रवासियों की बड़ी संख्या बिहार और झारखंड से थी।
  • भारत के आई.टी. हब, बेंगलुरु की बात करें तो वहाँ की 17.3 प्रतिशत जनसंख्या का जन्म कर्नाटक से बाहर हुआ था तथा इसमें से दो-तिहाई आबादी सिर्फ आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु से आई थी।
  • उपलब्ध आँकड़ों में उपरोक्त तथ्यों के कुछ अपवाद भी मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान से बड़े शहरों में होने वाले प्रवास की वज़ह से देश के लगभग हर बड़े शहर में इन तीन राज्यों के लोगों की मौजूदगी है।
  • उपरोक्त तीन राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान) का अन्य बड़े शहरों जैसे- दिल्ली, गुरुग्राम और मुंबई में आबादी प्रतिशत क्रमशः 26, 19 और 15 है। इसके अतिरिक्त इन राज्यों के लोग पुणे और बेंगलुरु में भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

स्रोत: द हिंदू (बिजनेस लाइन)


घास के मैदान जलाने से अकशेरुकी जीवों को हानि

चर्चा में क्यों?

शोधकर्त्ताओं द्वारा एराविकुलम नेशनल पार्क (Eravikulam National Park- ENP) में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, स्तनपायी (Ungulates) जीवों (विशेष रूप से नीलगिरी ताहर) के संरक्षण के लिये बड़े घास के मैदानों के निर्धारित क्षेत्रों को जलाना अर्थात् उनके लिये स्थान का प्रबंध करना वहाँ मौजूद अकशेरुकी जीवों एवं टिड्डों के लिये बेहद हानिकारक है।

प्रमुख बिंदु

  • घास के मैदान के प्रबंधन के लिये किये जाने वाले प्रयासों में टिड्डे सबसे ज़्यादा संवेदनशील एवं प्रभावित होते हैं।
  • टिड्डे घास के मैदान की गुणवत्ता एवं वृद्धि के सूचक होते हैं।
  • चूँकि टिड्डे घास के मैदानों में एक विशेष प्रकार के घटक से संबंध रखते हैं, ऐसे में घास के मैदान का इस प्रकार प्रबंधन करने से इन पर पड़ने वाले प्रभावों का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
  • स्थानिक और पंखहीन प्राणी/जीव पर्यावरण परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं तथा साथ ही इनके विलुप्त होने का जोखिम सबसे ज़्यादा होता है। इसलिये इस प्रकार के प्रबंधन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अधिक होती है।

घास के मैदान का प्रबंधन

  • परंपरागत रूप से घास के मैदानों का प्रबंधन स्थानीय आदिवासी समुदायों की सहायता से निश्चित समय में कोल्ड बर्निंग (Cold Burning) यानी ठंड के मौसम में इनमें आग लगाकर किया जाता है।
  • उल्लेखनीय है कि नीलगिरि ताहर के आवास क्षेत्र में ऐसा प्रबंधन ब्रिटिश औपनिवेशिक समय से ही किया जा रहा है, हालाँकि अन्य बायोटा पर नीलगिरि ताहर वास के जलने के प्रभाव का कभी भी उल्लेख नहीं किया गया है।

बायोटा: किसी स्थान विशेष में रहने वाले सभी जीवित प्राणी, जिनमें जीव-जंतु एवं पेड़-पौधे सभी शामिल होते हैं।

  • इस प्रबंधन के तहत 90 वर्ग किमी. क्षेत्र में पार्क में 50 हेक्टेयर की ग्रिड बनाकर वहाँ वास करने वाले स्तनपायी जीवों के चारे की व्यवस्था की जाती है।
  • ध्यातव्य है कि घास के मैदान जलाने की इस विधि को परम्बिकुलम टाइगर रिजर्व (Parambikulam Tiger Reserve- PKMTR) में भी इस्तेमाल किया गया था, जो नीलगिरि ताहर का एक अन्य वास स्थल है। यहाँ पर छोटे पैमाने पर (10 मीटर × 10 मीटर) पर ऐसा किया गया था।

प्रभाव

  • चूँकि इस प्रबंधन का लक्ष्य स्तनपायी प्रजातियों की स्थिति में सुधार हेतु चारे का प्रबंधन करना है, इसलिये अन्य समूहों, विशेष रूप से अकशेरुकी जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव की उपेक्षा की जाती है।
  • ध्यातव्य है कि केरल में टिड्डों की लगभग 130 प्रकार की प्रजातियाँ पाई गईं हैं, जिनमें से 54 परम्बिकुलम टाइगर रिजर्व में तथा 18 प्रजातियाँ एराविकुलम नेशनल पार्क में पाई गईं।
  • पिछले कई दशकों से पार्क में घास का प्रबंधन अर्थात् घास को जला देना टिड्डों की संख्या में गिरावट का एक प्रमुख कारण है।

परम्बिकुलम टाइगर रिज़र्व

(Parambikulam Tiger Reserve)

  • भारत में दक्षिणी-पश्चिमी घाटों के नेल्लम्पैथी-अनामलाई पहाड़ियों (Nelliampathy -Anamalai Hills) में एक संरक्षित पारिस्थितिक क्षेत्र है।
  • यह केरल के पालक्काड ज़िले में स्थित है।
  • यह जैव विविधता के गर्म स्थानों में से एक है, जिसमें विभिन्न प्रकार के वास स्थलों में रहने वाले जीव पाए जाते हैं।
  • इसे वर्ष 2009 में 643.66 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्रफल के साथ टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया था, जिसमें 390.89 वर्ग किमी. कोर क्षेत्र और 252.77 वर्ग किमी. बफर क्षेत्र शामिल है।
  • अपनी जैविक समृद्धि के मद्देनज़र वन्यजीवों एवं लैंडस्केप सौंदर्य की प्रचुरता के चलते परम्बिकुलम टाइगर रिज़र्व पश्चिमी घाट के पूरे खंड में सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है।

एराविकुलम नेशनल पार्क

(Eravikulam National Park)

  • यह पार्क केरल राज्य के इडुक्की ज़िले के देविकुलम तालुक में दक्षिणी पश्चिमी घाट के हाई रेंज (कन्नन देवन हिल्स) में स्थित है।
  • इसे वर्ष 1971 तक कन्नन देवन हिल प्रोड्यूस कंपनी (Kannan Devan Hill Produce Company) द्वारा एक गेम रिज़र्व के रूप में चलाया जाता था।
  • केरल सरकार ने वर्ष 1975 में इस क्षेत्र को नीलगिरि ताहर और उसके वास की सुरक्षा के लिये 'एराविकुलम-राजमलाई' वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया।
  • यह भारत के अग्रणी जैव विविधता वाले क्षेत्रों के रूप में जाना जाता है जो वन एवं वन्‍यजीव विभाग के प्रशासन के तहत आता है।

निष्कर्ष

  • शोधकर्त्ताओं द्वारा दिये गए सुझाव के अनुसार, घास के मैदान के इस तरह के प्रबंधन में पाँच साल से अधिक का समयांतराल होना चाहिये। जलाने का निर्धारित क्षेत्र केवल 25 मीटर X 25 मीटर या 50 मीटर X 50 मीटर के छोटे भूखंडों में बनाया जाना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


पंचायतों की क्षमता मज़बूत करने के लिये पहल

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय जल मंत्री ने झारखंड की राजधानी राँची में जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग की क्षमता सुदृढ़ीकरण पहल (Capacity Strengthening Initiative) की शुरुआत की।

प्रमुख बिंदु

  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रारंभिक प्रशिक्षणों में 2800 क्षेत्र प्रशिक्षकों का एक समूह बनाया जाएगा जो पूरे देश में लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतों तक पहुँचेंगे।
  • इस पहल का प्रमुख उद्देश्य स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच से मुक्त (Open Defecation Free-ODF) गाँवों की स्थिरता सुनिश्चित करना है।
  • इसके अतिरिक्त यह पहल क्षेत्र प्रशिक्षकों एवं पंचायत राज संस्थान के सदस्यों को ठोस और तरल अपशिष्ट के प्रबंधन के साथ-साथ सुरक्षित एवं पर्याप्त पेयजल आपूर्ति की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने में सहायक होगी।

स्वच्छ भारत मिशन क्या है?

घर, समाज और देश में स्वच्छता को जीवनशैली का अंग बनाने के लिये, सार्वभौमिक साफ-सफाई का यह अभियान वर्ष 2014 में शुरू किया गया। जिसे 2 अक्तूबर, 2019 (महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती) तक पूरा कर लेना

यह वर्ष 1986 के केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम, वर्ष 1999 के टोटल सेनिटेशन कैंपेन एवं वर्ष 2012 के निर्मल भारत अभियान की तुलना में परिवर्द्धित एवं सुस्पष्ट कार्यक्रम है।

यह मिशन क्यों ज़रूरी है?

  • साफ-सफाई की बुनियादी सुविधा से वंचित, खुले में शौच करने वाले विश्व के लगभग 60 प्रतिशत लोग सिर्फ भारत में हैं। अन्य बीमारियों के साथ ही इस अस्वच्छता के कारण भारत उन देशों की श्रेणी में भी है, जहाँ पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें होती हैं।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि देश के शहरों और कस्बों में प्रतिदिन उत्पादित होने वाला एक-तिहाई कचरा सड़कों पर ही सड़ता है। केवल चार बड़े महानगरों (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता) में प्रतिदिन 16 बिलियन लीटर दूषित जल पैदा होता है।

इस मिशन का उद्देश्य

  • भारत में खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना अर्थात् संपूर्ण देश को खुले में शौच करने से मुक्त (ओ.डी.एफ.) घोषित करना, हर घर में शौचालय का निर्माण, जल की आपूर्ति और ठोस व तरल कचरे का उचित तरीके से प्रबंधन करना है।
  • इस अभियान में सड़कों और फुटपाथों की सफाई, अनधिकृत क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाना, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन करना तथा स्वच्छता से जुड़ी प्रथाओं के बारे में लोगों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना शामिल हैं।

स्रोत: पी.आई.बी.


अकाउंट एग्रीगेटर मॉडल ‘सहमति’

चर्चा में क्यों?

हाल ही में एक अकाउंट एग्रीगेटर मॉडल ‘सहमति’ की शुरुआत हुई। यह नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) की श्रेणी में आता है।

Account Aggregator

प्रमुख बिंदु

  • यह अकाउंट एग्रीगेटर (AA) व्यक्तिओं और छोटे कारोबारियों को उनके डिजिटल फाइनेंशियल डेटा को सुरक्षित तरीके से तीसरे पक्ष के साथ साझा करने में सहायता करेगा।
  • वित्तीय नियोजन सेवाओं की मांग करने वाले उपयोगकर्त्ता म्यूचुअल फंड, बीमा, भविष्य निधि और बैंकिंग विवरण को AA एप के माध्यम से डिजिटल रूप से साझा कर सकेंगे।
  • यह AA कई सेवा प्रदाताओं से डेटा संग्रहीत करेगा और उपयोगकर्त्ता की सहमति के बाद इस डेटा को वित्तीय सूचनाओं के प्रयोगकर्त्ताओं के साथ साझा करेगा।
  • अकाउंट एग्रीगेटर प्रणाली को प्रोत्साहन देने के लिये ‘सहमति’ को गैर-लाभकारी निकाय के रूप में शुरू किया गया है।
  • यह AA नवीन तकनीक एवं संस्थागत अवसंरचना में वित्तीय जानकारी प्रदाता (Financial Information Provider-FIPs) और वित्तीय जानकारी उपयोगकर्त्ताओं (Financial Information Users-FIUs) की संभावनाओं के संबंध में जागरूकता बढ़ाकर फ्रेमवर्क को अपनाने के लिये प्रेरित करेगा।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, बीमा नियामक और विकास एजेंसी तथा भविष्य निधि नियामक और विकास एजेंसी पहले ही संबंधित कंपनियों/संस्थाओं को इन विनियामकों के नियंत्रण के अधीन एवं उपयोगकर्त्ता की सहमति से डेटा साझा करने की अनुमति दे चुके हैं।
  • इस प्रौद्योगिकी फ्रेमवर्क को गैर-लाभकारी प्लेटफार्म iSpirt द्वारा विकसित किया गया है।

अकाउंट एग्रीगेटर (AA) क्या है?

  • अकाउंट एग्रीगेटर (फाइनेंशियल डेटा एग्रीगेटर) एक वेब आधारित अथवा API आधारित प्रणाली है जो विभिन्न प्रकार के अकाउंट, जैसे- बैंक अकाउंट, इन्वेस्टमेंट अकाउंट, क्रेडिट कार्ड अकाउंट आदि की सूचनाओं को संग्रहीत करती है।
  • वर्ष 2016 में रिज़र्व बैंक ने अकाउंट एग्रीगेटर को NBFC की श्रेणी का दर्जा दिया।

iSpirt- Indian Software Product Industry

  • यह एक गैर लाभकारी प्लेटफार्म है जो देश में सॉफ्टवेयर उत्पाद कंपनियों को बढ़ावा देने, सरकारी नीतिओं में सहयोग करने तथा सॉफ्टवेयर में निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • वर्ष 2013 में लगभग 30 उत्पाद कंपनियों और व्यक्तियों ने iSPIRT की शुरुआत की ।

स्रोत: बिज़नेस लाइन


थायराइड के बढ़ते मामले

चर्चा में क्यों? 

भारत में थायराइड के बढ़ते मामलों को देखते हुए एक सार्वभौमिक थायरॉयड स्क्रीनिंग कार्यक्रम (Universal Thyroid Screening Programme) शुरू करने की बात की जा रही है।

प्रमुख बिंदु: 

  • इंडियन थायरॉइड सोसाइटी के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या में से 8% लोगों को मधुमेह और 10% लोगों को थायराइड की समस्या है।

थायराइड: 

  • थायराइड ग्रंथि, गर्दन के सामने वाले हिस्से में पाई जाती है।
  • प्रत्येक 10वाँ वयस्क हाइपोथायरायडिज्म (Typothyroidism) रोग से ग्रसित है, इस रोग में थायराइड ग्रंथि पर्याप्त थायराइड हारमोंस का उत्पादन नहीं कर पाती है। 
  • थायराइड की वजह से महिलाओं में पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम (Poly Cystic Ovary Syndrome) और बांझपन का अधिक खतरा रहता है।

पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम

(Poly Cystic Ovary Syndrome- PCOS): 

  • पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम प्रजनन आयु की महिलाओं में एक हार्मोनल विकार है।
  • PCOS के कारण महिलाओं में मासिक धर्म की निरंतरता प्रभावित होती है, साथ ही  एंड्रोजन हार्मोन का स्तर भी कम या ज़्यादा हो सकता है। 
  • PCOS में नियमित रूप से अंडाणु भी नही विकसित हो पाते हैं।
  • इंडियन थायरॉइड सोसाइटी और भारत के प्रसूति और स्त्री रोग संबंधी संघ (Federation of Obstetric and Gynaecological Societies of India-FOGSI) चिकित्सा समुदाय एवं लोगों में थायराइड संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिये एक उत्तरदायी संस्थान हैं।
  • हाल ही में दोनों संस्थान, बहुराष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाता कंपनी एबट (Abbott) के साथ मिलकर मेकिंग इंडिया थायराइड (Making India Thyroid) की शुरुआत कर रहे हैं। इस अभियान का उद्देश्य एबट (Abbott) द्वारा थायराइड के लिये बनाई गई दवा थायरोनोर्म (Thyronorm) को बढ़ावा देना है। 
  • भारत में व्यक्तिगत, पेशेवर और घरेलू तनावों के कारण थायराइड के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। थायराइड पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है; इसी लिये जागरूकता अभियान में महिलाओं को विशेष रूप से जागरूक करने का प्रयास किया गया है।

थायराइड और मधुमेह:

  • किसी व्यक्ति को थायरॉयड और मधुमेह दोनों रोग हो सकता है।
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम (Metabolic Syndrome), इंसुलिन प्रतिरोध (Insulin Resistance), टाइप 1 डायबिटीज और टाइप 2 डायबिटीज आदि, थायराइड के जोखिम को दोगुना कर देते हैं। साथ ही थायरॉइड भी मेटाबॉलिक सिंड्रोम और टाइप 2 डायबिटीज की प्रभावित को बढ़ाती है। 
  • अधिक वज़न या मोटापे से ग्रस्त लोगों में इस प्रकार के रोगों के पाए जाने की संभावना सामान्य लोगों की अपेक्षा ज़्यादा होती है।

स्रोत: द हिंदू बिजनेसलाइन


5G के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभाव

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में देश के कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने 5G प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं के लिये स्पेक्ट्रम की नीलामी के पहले सरकार से इसके दुष्प्रभावों के जाँच की माँग रखी है।  

5G अपील (5G Appeal): 

  • भारत में जिस प्रकार वैज्ञानिक समुदाय 5G का विरोध कर रहा है, इसी प्रकार यूरोप में भी 244 वैज्ञानिकों द्वारा 5G का 5G अपील नाम से ऑनलाइन विरोध किया जा रहा है। 
  • ये वैज्ञानिक 5G की शुरुआत को तब तक टालने की माँग कर रहे हैं, जब तक कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके संभावित खतरों की जाँच स्वतंत्र वैज्ञानिकों द्वारा नहीं कर ली जाती।

5G तकनीक और इसका दुष्प्रभाव

  • वायरलेस तकनीक सिग्नल भेजकर काम करती है, जो ऊर्जा तरंगों के रूप में प्रसारित होती है। तरंगों द्वारा प्रति सेकंड उत्पन्न उभार (ऊपर जाने-Crests) और गर्त (नीचे आने-Trough) को इसकी आवृत्ति (Frequency) कहते हैं, आवृत्ति को हर्ट्ज़ (Hertz) के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • वर्ष 1991 में 2G से लेकर वर्ष 2008 तक 4G तकनीकों द्वारा तरंगों की आवृत्तियों में 2.5 गीगाहर्ट्ज़ की बढ़ोत्तरी देखी गई, 
  • इस 5G तकनीक में 90 गीगाहर्ट्ज़ की आवृत्तियों का प्रयोग किया जाएगा। 5G में एक 3D मूवी को 3 मिनट में डाउनलोड किया जा सकेगा।    
  • 3G और 4G के क्रियान्वयन के समय भी वैज्ञानिक समुदाय द्वारा विरोध किया गया था, लेकिन इस बार विरोध के स्वर कुछ ज़्यादा ही तीक्ष्ण हैं।
  • 5G तकनीक का  प्रयोग करने वाले क्षेत्रों में अभी तक कई जानवरों और पक्षियों की मौत हो चुकी है। अभी तक इन मौतों की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नही हुई है, लेकिन इस प्रकार की संभावनाओं से पूर्णतः इंकार भी नही किया जा सकता।
  • विकिरण दो प्रकार के होते हैं- आयनीकृत और गैर-आयनीकृत। गामा किरणें और एक्स किरणें आयनीकृत  हैं और हमारे शरीर में परमाणु विकिरण छोड़ती हैं और जो अंततः कैंसर का कारण बनता है। इसके विपरीत TV सेट्स से निकलने वाली तरंगें तथा प्रकाश तरंगें गैर-आयनीकृत होती हैं, जिनका स्वास्थ्य पर कोई व्यापक दुष्प्रभाव नहीं देखा गया है। 

निष्कर्षतः

वैज्ञानिकों की  माँगों को नज़रअंदाज़ नही किया जाना चाहिए, अन्यथा 5G के दुष्परिणाम भविष्य में विनाशकारी भी हो सकते हैं। इसलिये एक सरकार को रोडमैप बनाकर ही स्पेक्ट्रम की नीलामी शुरू करनी चाहिये।    

स्रोत: द हिंदू बिज़नेस लाइन


वाहनों में होगा माइक्रोडॉट्स का अनिवार्य उपयोग

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में सड़क परिवहन मंत्रालय ने अपने मसौदा नियमों के तहत वाहन निर्माताओं को माइक्रोडॉट्स तकनीक अपनाने के लिये कहा है। अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में इस तकनीकी का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है।

प्रमुख बिंदु 

  • यह मसौदा नियम, केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 (Central Motor Vehicles Rules, 1989) में संशोधन करता है और माइक्रोडॉट्स तकनीक के प्रयोग की बात करता है। 
  • माइक्रोडॉट्स तकनीक में मोटर वाहनों और उसके विभिन्न पुर्जों  पर स्थायी और लगभग अदृश्य डॉट्स को चिपका दिया जाता है। ]
  • इन माइक्रोडॉट्स को सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से ही पढ़ा जा सकता है और पराबैंगनी प्रकाश में ही पहचाना जा सकता है।
  • माइक्रोडॉट्स, मोटरवाहन उद्योग मानक-155 (Automotive Industry Standard- 155) की आवश्यकताओं के अनुरूप है।
  • ये मानक ऑटोमोटिव उद्योग मानक समिति के द्वारा बनाए जाते हैं। इस समिति की स्थापना सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा केंद्रीय मोटर वाहन नियम- तकनीकी स्थायी समिति (Central Motor Vehicles Rules - Technical Standing Committee: CMVR-TSC) के तहत की गई है। 

माइक्रोडॉट्स (Microdots) क्या होते हैं? 

  • माइक्रोडॉट तकनीक में वाहनों में एक विशिष्ट पहचान बनाने के लिये उन पर हजारों सूक्ष्म डॉट्स का छिड़काव कर दिया जाता है।
  • माइक्रोडॉट वाहन के पंजीकृत मालिक की पहचान को निर्धारित करता है, लेकिन इन्हें  नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता।
  • ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बनने वाली मशीनों और कलपुर्जों में मौलिकता (Originality) सुनिश्चित करने के लिये माइक्रोडॉट्स एक लोकप्रिय तकनीक है।
  • दक्षिण अफ्रीका ने सितंबर 2012 से ही बेचे जाने वाले सभी नए वाहनों में इस तकनीक के प्रयोग को अनिवार्य कर दिया है।

माइक्रोडॉट्स (Microdots) की आवश्यकता क्यों? 

  • इसका उद्देश्य भारत में वाहन चोरी और कल-पुर्जों की चोरी को रोकना है।
  • वर्ष 2016 में देशभर में लगभग 2.14 लाख वाहन चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थीं।  दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र वाहन चोरी की मामलों में शीर्ष तीन राज्य हैं, जहाँ क्रमशः 38,644, 34,480 तथा  22,435 वाहन चोरी के मामले दर्ज किये गए। 
  • माइक्रोडॉट्स के माध्यम से चोरी किये गए वाहन की पहचान कर पाना आसान होगा क्योंकि इन्हें  बिना तोड़-फोड़ किये मिटा पाना लगभग असंभव है।      

स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया


भारत में कम हो रही हैं शार्क

चर्चा में क्यों?

भारत, दुनिया के सबसे बड़े शार्क मछली पकड़ने वाले देशों में से एक है और देश के दो बड़े राज्य महाराष्ट्र और गुजरात इसमें लगभग 50 प्रतिशत योगदान देते हैं। परंतु हालिया समय में शार्क की संख्या में कम हुई है जिसके कारण मत्स्य क्षेत्र पर काफी प्रभाव पड़ा है।

क्या विलुप्ति का सामना कर रही है शार्क?

  • प्रकृति संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ (The International Union for Conservation of Nature-IUCN) द्वारा वर्ष 2014 में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, दुनियाभर की कुल शार्कों में से एक चौथाई पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है।
  • बीते वर्ष 15 से अधिक देशों के शोधकर्त्ताओं द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में भी कहा गया कि अरब सागर में लगभग 50 प्रतिशत शार्क और उपास्थिदार मछलियाँ (Cartilaginous Fishes) IUCN की खतरे की श्रेणी में पाई गई हैं।

क्या कारण हैं इस विलुप्ति के?

  • सीमा से अधिक मछली पकड़ना : मई 2019 में प्रकाशित हुए एक अध्ययन के अनुसार, भारत में शार्क के मांस का एक व्यापक बाज़ार उपलब्ध है जिसके कारण शार्क की घरेलू मांग काफी अधिक है। 
  • अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता के अनुसार, “इस अध्ययन ने यह धारणा तोड़ने में काफी मदद की है कि भारत में सामान्यतः शार्क को निर्यात करने के लिये ही पकड़ा जाता है।”
  • कई अन्य अध्ययनों में आधुनिक फिशिंग गियर और गहरे पानी में मछली पकड़ने को भी विलुप्ति के कारणों में शामिल किया गया है।

क्या किया गया है?

  • वर्ष 2013 में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा शार्क की फिनिंग (पंख काट देना) रोकने के उद्देश्य से ‘फिंस नैचुरली अटैच्ड’ (Fins Naturally Attached) नाम की एक योजना शुरू की थी, परंतु इसका कुछ अधिक प्रभाव शार्क की स्थिति पर देखने को नहीं मिला। 
  • इसके अतिरिक्त वन्य जीव अधिनियम, 1972 भी इन प्रजातियों की रक्षा करने में अपर्याप्त साबित हुआ है।

क्या किया जा सकता है?

  • आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हमें इस संदर्भ में कुछ नए और कड़े नियमों की आवश्यकता है ताकि शार्क को जल्द-से-जल्द विलुप्ति की स्थिति से बाहर निकाला जा सके।
  • सरकार को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिये जहाँ शार्क बड़ी मात्रा में एकत्र होती हैं ताकि उन क्षेत्रों को हानिकरक मछली पकड़ने की तकनीक से सुरक्षा प्रदान की जा सके।
  • अन्य मछलियों की तरह शार्क ढेर सारे अंडे न देकर सामान्यतः 7 या 8 अंडे देती हैं।  इसके अतिरिक्त कुछ प्रजातियाँ (स्तनपायी) तो सीधे बच्चों को जन्म देती हैं और इन्हीं  कारणों से इनकी रक्षा करना काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
  • इसके अतिरिक्त भारतीय वन्यजीव अधिनियम में भी संशोधन किया जाना चाहिये ताकि जल में गंभीर रूप से संकटग्रस्त सभी प्रजातियों पर आवश्यक ध्यान दिया जा सके।

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ

(The International Union for Conservation of Nature)

  • IUCN सरकारों तथा नागरिकों दोनों से मिलकर बना एक सदस्यता संघ है।
  • यह दुनिया की प्राकृतिक स्थिति को संरक्षित रखने के लिये एक वैश्विक प्राधिकरण है जिसकी स्थापना वर्ष 1948 में की गई थी।
  • इसका मुख्यालय स्विटज़रलैंड में स्थित है।
  • IUCN द्वारा जारी की जाने वाली रेड लिस्ट दुनिया की सबसे व्यापक सूची है, जिसमें पौधों और जानवरों की प्रजातियों की वैश्विक संरक्षण की स्थिति को दर्शाया जाता है।
    • IUCN प्रजातियों के विलुप्त होने के जोखिम का मूल्यांकन करने के लिये कुछ विशेष मापदंडों का उपयोग करता है। ये मानदंड दुनिया की अधिकांश प्रजातियों के लिये प्रासंगिक हैं।
    • इसे जैविक विविधता की स्थिति जानने के लिये सबसे उत्तम स्रोत माना जाता है।

स्रोत: द हिंदू


चीन का पहला वाणिज्यिक रॉकेट

चर्चा में क्यों?

हाल ही में चीन की एक प्रमुख स्टार्टअप कंपनी आई स्पेस (iSpace) ने चीन का पहला वाणिज्यिक रॉकेट लॉन्च किया जो उपग्रह को कक्षा में ले जाने में सक्षम है।

प्रमुख बिंदु

  • चीन का यह कदम अंतरिक्ष के निजी उपयोग के संदर्भ में बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकता है। 
  • उल्लेखनीय है कि  iSpace ने 6 जुलाई, 2019 को हाइपरबोला-1 (Hyperbola-1) के सफल प्रक्षेपण की घोषणा की थी। हाइपरबोला-1 को दो उपग्रहों और पेलोड के साथ जियुकान सैटेलाइट लॉन्च सेंटर (Jiuquan Satellite Launch Centre) से एक पूर्व निर्धारित कक्षा में भेजा गया। 
  • इससे पहले वर्ष 2018 चीन की रॉकेट निर्माता कंपनियों लैंडस्पेस (LandSpace) और वनस्पेस (OneSpace) ने इस तरह के प्रयास किये थे, लेकिन ये दोनों ही रॉकेट पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करने में असफल रहे।

हाइपरबोला-1 मिशन

(Hyperbola-1 Mission)

  • iSpace के अनुसार, हाइपरबोला-1 रॉकेट की ऊँचाई लगभग 68 फीट (20.8 मीटर) तथा अधिकतम व्यास लगभग 4.6 फीट (1.4 मीटर) है।
  • हाइपरबोला-1 का टेकऑफ वज़न लगभग 68 हज़ार पाउंड (31 मीट्रिक टन) है।
  • iSpace  के अनुसार, यह रॉकेट 573 पाउंड नीतभार/पेलोड द्रव्यमान को 310 मील की ऊँचाई पर सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbit) तक पहुँचाने में सक्षम है।
  • हाइपरबोला-1 के साथ CAS-7B क्यूबसैट (माइक्रोसेटेलाइट) भेजा गया है। यह एक Amateur Radio Mission है जिसे बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Beijing Institute of Technology) द्वारा विकसित किया गया है।
  • हाइपरबोला-1 के साथ एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्पेस इंजीनियरिंग डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड (Aerospace Science and Technology Space Engineering Development Co. Ltd) का एक उपग्रह भी भेजा गया है।

माइक्रोसैटेलाइट (Microsatellite) क्या है?

  • माइक्रोसैटेलाइट आकार में सामान्यतः जूते के डिब्बे जैसा होता है। यह पारंपरिक रूप से बड़े उपग्रहों का छोटा संस्करण है।
  • ये मौसम प्रणाली, फसलों और आपदा स्थलों आदि की निगरानी में कंपनी या संगठन की मदद करते हैं। 
  • इनका उपयोग अनुसंधान उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भी किया जा सकता है। 
  • अधिकांश कंपनियाँ माइक्रोसैटेलाइट्स का चयन इसलिये कर रही हैं क्योंकि इनकी निर्माण लगत कम होती है और इन्हें अंतरिक्ष में भेजना अपेक्षाकृत आसान होता है। 
  • वर्तमान में माइक्रोसैटेलाइट्स के मामले में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का प्रभुत्त्व है।

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स


सब्जियों में विषाक्त धातुओं की मौजूदगी

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (National Environmental Engineering Research Institute- NEERI) द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार, यमुना के बाढ़ के मैदानों में उगाई जाने वाली सब्जियों में सीसा (Lead) की मात्रा काफी अधिक पाई गई है, जिसका लंबे समय तक उपभोग किये जाने से कैंसर जैसी कई प्रकार की बीमारियाँ हो सकती हैं। 

अध्ययन के निष्कर्ष 

  • NEERI के अध्ययन के अनुसार, सात तरह की सब्जियों- पत्तागोभी, फूलगोभी, मूली, बैंगन, धनिया, मेथी और पालक में धातु की सांद्रता की मौजूदगी का पता लगाने के लिये पूर्वी दिल्ली के तीन स्थानों से नमूने एकत्र किये गए।
  • सीसे का सबसे अधिक संदूषण पूर्वी दिल्ली से एकत्र किये गए हरे धनिये (Green Coriander) में पाया गया।
  • विक्रेताओं से एकत्र की गई सभी सब्जियों (पत्तागोभी को छोड़कर) में सीसे का स्तर मानक से अधिक पाया गया। पालक में सीसे का स्तर सबसे अधिक (14.1 मिलीग्राम/किग्रा.) पाया गया। सीसे के संभावित स्रोत ऑटोमोबाइल, बैटरी, पेंट, पॉलिथीन, कीटनाशक और सीसा प्रसंस्करण इकाई हैं।
  • यद्यपि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India- FSSAI) द्वारा सब्जियों में सीसे की सुरक्षित सीमा 2.5 मिलीग्राम/किग्रा. निर्धारित की गई है, लेकिन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से एकत्र किये गए सब्जियों के नमूनों में सीसे का स्तर 2.8 मिलीग्राम/किग्रा. से 13.8 मिलीग्राम/किग्रा. तक पाया गया है। 
  • रिपोर्ट के अनुसार, सब्जियों में कैडमियम, मरकरी और निकल जैसी अन्य धातुएँ FSSAI के मानकों से कम पाई गई।
  • NEERI द्वारा यह अध्ययन फ़रवरी 2019 में किया गया था। इसके निष्कर्ष मई 2019 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) के समक्ष प्रस्तुत किये गए।

पृष्ठभूमि

  • यद्यपि यमुना नदी का केवल 2% हिस्सा दिल्ली से होकर गुजरता है तथापि राजधानी के प्रदूषित जल का 70% इस नदी में गिरता है। 
  • वर्ष 2015 में NGT ने यह कहते हुए यमुना नदी के किनारे फ्लड प्लेन में सब्जियों और चारे की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि इन क्षेत्रों की सब्जियाँ अत्यधिक संदूषित थीं। लेकिन NGT के प्रतिबंध के बावजूद इन क्षेत्रों में सब्जियों आदि की खेती जारी है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव 

  • भारी धातुओं की मौजूदगी वाले खाद्य पदार्थ लंबे समय तक खाने से मानव शरीर में कई जैविक और जैव रासायनिक प्रक्रियाएँ बाधित हो सकती हैं।
  • भारी धातुओं की विषाक्तता ऊर्जा का स्तर कम कर सकती है और मस्तिष्क, फेफड़े, किडनी और यकृत संबंधी  विकार उत्पन्न कर सकती है।
  • यह रक्त  बनने की प्रक्रिया और अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं। 
  • लंबे समय तक ये मिलावटी खाद्य पदार्थ खाने से कैंसर भी हो सकता है।
  • सीसे की विषाक्तता (Lead Poisoning) से बच्चों में मानसिक विकलांगता आ सकती है।

राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग और अनुसंधान संस्थान (NEERI)

National Environmental Engineering Research Institute (NEERI)

  • NEERI वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific & Industrial Research-CSIR) की 38 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में से एक है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही हैं।
  • इसका उद्देश्य देश में जल आपूर्ति, सीवेज निपटान, संचारी रोगों और औद्योगिक प्रदूषण एवं व्यावसायिक रोगों पर ध्यान केंद्रित करना है। 
  • इसका लक्ष्य सतत् पोषणीय विकास के लिये पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करना  है।
  • CSIR भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त निकाय है। 

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया


Rapid Fire करेंट अफेयर्स (29 July)

  • 29 जुलाई से सातवीं आर्थिक गणना के क्षेत्र कार्य (Area Work) की शुरुआत त्रिपुरा से हुई तथा इसके बाद यह कार्य पुद्दुचेरी में किया जाएगा। अन्य राज्यों/संघशासित प्रदेशों में क्षेत्र कार्य अगस्त/सितंबर, 2019 में शुरू होगा। आँकड़े एकत्र करने संबंधी कानून यानी सांख्यिकी संग्रहण अधिनियम, 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रत्येक परिवार के घर जाकर और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से आँकड़े एकत्र किये जाएंगे। परिवारों और प्रतिष्ठानों से एकत्र किये गए आँकड़ों को गोपनीय रखा जाएगा और उनका इस्तेमाल केवल राज्य/संघशासित प्रदेशों की सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा विकास संबंधी योजनाओं के लिये किया जाएगा। आँकड़ों के संग्रहण और प्रोसेसिंग का काम पूरा हो जाने के बाद 7वीं आर्थिक गणना के परिणाम जारी किये जाएंगे। गौरतलब है कि सातवीं आर्थिक गणना सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा कराई जा रही है। इसमें आँकड़े जुटाने, उनके प्रमाणीकरण, रिपोर्ट तैयार करने और इनके प्रसार के लिये IT आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा। इस आर्थिक गणना में परिवारों के उद्यमों, गैर-जोत कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में वस्तुओं/सेवाओं (स्वयं के उपभोग के अलावा) के उत्पादन एवं वितरण की गणना की जाएगी।
  • 29 जुलाई को दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस का आयोजन किया गया। बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है तथा इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में देशभर के टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या पर रिपोर्ट जारी की। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन 2018 नामक इस रिपोर्ट से पता चलता है कि 2014 के मुकाबले बाघों की संख्या 741 बढ़ी है। देश में अब बाघों की संख्या 2967 हो गई है। ज्ञातव्य है कि वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुए बाघ सम्मेलन में 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था। इस सम्मेलन में 13 देशों ने भाग लिया था और उन्होंने वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या में दोगुनी बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा था। इससे पहले वर्ष 2006, वर्ष 2010 और वर्ष 2014 में रिपोर्ट जारी हो चुकी है, जिसमें क्रमश: 1411, 1706 और 2226 बाघ होने की पुष्टि की गई थी। वर्ष 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट बनने के बाद जिम कॉर्बेट पार्क में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 7 अप्रैल 1973 को हुई थी।
  • 28 जुलाई को दुनियाभर में विश्व हेपेटाइटिस दिवस का आयोजन किया जाता है। हेपेटाइटिस के बारे में जागरूकता पैदा करने और वर्ष 2030 तक (वर्ष 2015 आधाररेखा की तुलना में नए संक्रमणों को 90 प्रतिशत और मृत्यु दर को 65 प्रतिशत तक कम करना) वैश्विक उन्मूलन के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु व्यक्तियों, हितधारकों और जनता द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिये यह दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इस वर्ष विश्व हेपेटाइटिस दिवस की थीम हेपेटाइटिस उन्मूलन के लिये निवेश करें (Invest in Eliminating Hepatitis) रखी गई है। इसमें सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज़ के संदर्भ में वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर स्वीकृत हेपेटाइटिस उन्मूलन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये आवश्यक निवेश के नए अनुमान शामिल हैं। लीवर (यकृत) में शोथ को हेपेटाइटिस कहते हैं। हेपेटाइटिस का वायरस पाँच प्रकार का पाया जाता है- हेपेटाइटिस-A, B, C, D और E। इनमें से हेपेटाइटिस E विश्व में हेपेटाइटिस का सबसे सामान्य प्रकार है। हेपेटाइटिस B और C दीर्घकालिक संक्रमण हैं, जिनमें लंबे समय तक कभी-कभी वर्षों या दशकों तक लक्षण प्रकट नहीं होते और यह लीवर कैंसर का मूल कारण है। वैश्विक हेपेटाइटिस रिपोर्ट 2017 के अनुसार वायरल हेपेटाइटिस B और C प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जो कि वैश्विक स्तर पर 325 मिलियन लोगों को प्रभावित करती है तथा इससे प्रतिवर्ष 1.34 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संसद परिसर में मटका थिम्बक पद्धति से पौधारोपण कर हरित अभियान की शुरुआत की। इस पद्धति से पौधों की जड़ों तक पानी पहुँचाया जाता है और पौधे सूखकर खराब नहीं होते। गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी ने इस पद्धति को बढ़ावा देने की पहल की थी। इस पद्धति से पौधों को पानी देने में पानी और समय के साथ मेहनत भी कम लगती है। पौधारोपण के समय से ही इसका इस्तेमाल करने से पौधे के बड़े होने तक लगातार इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके लिये आवश्यक सामग्री जैसे पुराना मटका और जूट की रस्सी गाँवों-देहात में आसानी से मिल जाती है। दरअसल, पौधा रोपते समय जो गड्ढा खोदा जाता है, उसी गड्ढे में कुछ दूरी पर कोई पुराना मटका रख देते हैं और मटके की तली में छिद्र किया जाता है। इस छिद्र से होकर जूट की रस्सी पौधे की जड़ों तक पहुँचाई जाती है। पौधा रोपने के बाद मटके के निचले हिस्से को भी पौधे की जड़ों की तरह खोदी गई मिट्टी से ढँक दिया जाता है। गड्ढा भरने के लिये मिट्टी, बालू (रेत) आदि का इस्तेमाल होने की वज़ह से इसमें लगातार और यथोचित रूप से जड़ों को पर्याप्त पानी मिलता रहता है, जिससे पौधों का समुचित विकास होता है।