डेली न्यूज़ (27 Jul, 2019)



डिजिटल एवं कैशलेस अर्थव्यवस्था

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय वित्‍त एवं कार्पोरेट कार्य राज्‍यमंत्री ने डिजिटल और नकदी रहित अर्थव्‍यवस्‍था पर एक सम्‍मेलन ‘दॅ फ्यूचर ऑफ इंडियाज़ डिजिटल पेमेंट्स’ (The Future of India’s Digital Payments) को संबोधित किया।

प्रमुख बिंदु

  • वर्तमान में भुगतान संबंधी डिजिटल पेमेंट्स के मामले में सरकार ने ‘चलता है का रवैया’ पीछे छोड़ दिया है और ‘बदल सकता है’ का दृष्टिकोण अपना लिया है। अर्थात् डिजिटल पेमेंट्स के माध्यम से तत्काल एवं त्वरित कार्रवाई करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
  • इस माध्यम से सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में भुगतान व्यवस्था के क्षेत्र में वृद्धि हुई है।
  • इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य डिजिटल इंडिया और डिजिटल भुगतान के संबंध में ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की जनता तक प्रौद्योगिकी का लाभ सुनिश्चित करना था।
  • इस सम्मेलन में मंदिरों में भी डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की बात कही गई।

डिज़िटल और कैश-लेस अर्थव्यवस्था

  • आर्थिक व्यवस्था का वह स्वरूप जिसमें धन का अधिकांश लेन-देन चेक, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, नेट बैंकिग, मोबाइल पेमेंट तथा अन्य डिजिटल माध्यमों से किया जाता है, कैश-लेस अर्थव्यवस्था कहलाती है।
  • इस व्यवस्था में नकदी (कागज़ी नोट या सिक्के) का चलन कम हो जाता है। नकदी-रहित लेन-देन में करेंसी का न्यूनतम इस्तेमाल होता है। इससे व्‍यवसाय स्‍वचालित हो जाते हैं जिसके परिणमास्‍वरूप पारदर्शिता आती है।
  • कैश-लेस अर्थव्यवस्था से गलत तरीके से लेन-देन बंद हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप कालेधन का प्रभाव कम होता है।
  • वर्तमान में देश का लगभग 95 प्रतिशत लेन-देन नकद-आधारित है जिससे एक बहुत बड़ी अनौपचारिक अर्थव्‍यवस्‍था का निर्माण होता है और इसकी वज़ह से सरकार को विभिन्‍न टैक्‍स लगाने और वसूलने में कठिनाई होती है।
  • डिजिटल भुगतान को प्रोत्‍साहित करने के लिये भारत सरकार समय-समय पर विभिन्न उपायों की घोषणा करती रहती है।

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम

  • भारत सरकार ने वर्ष 2015 में भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित करने के उद्देश्य से डिजिटल इंडिया कार्यक्रम शुरू किया था।
  • यह एक विस्तृत एवं समग्र कार्यक्रम है, जिसे सभी राज्य सरकारों ने लागू किया है और इलेक्ट्रॉनिक व सूचना प्रौद्योगिकी विभाग इसका संयोजक है।

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के उद्देश्य

  • इस कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
    • प्रत्येक नागरिक के लिये सुविधा के रूप में बुनियादी ढाँचा
    • गवर्नेंस व मांग आधारित सेवाएँ
    • नागरिकों का डिजिटल सशक्तीकरण

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के प्रमुख लक्ष्य

  • इस कार्यक्रम का लक्ष्य विकास क्षेत्रों के निम्नलिखित स्तंभों के ज़रिये इस बहुप्रतीक्षित आवश्यकता को उपलब्ध कराना है:
    • ब्रॉडबैंड हाइवेज मोबाइल कनेक्टिविटी तक सर्वव्यापी पहुँच
    • पब्लिक इंटरनेट संपर्क कार्यक्रम
    • ई-गवर्नेंस--तकनीक के जरिये सरकारी सुधार
    • ई-क्रांति--सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक आपूर्ति
    • सबके लिये सूचना
    • इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन- सकल शून्य आयात का लक्ष्य
    • रोज़गार के लिये सूचना प्रौद्योगिकी
    • अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम

डिजिटल इंडिया के लक्ष्यों का मौलिक आधार देश का संचार उद्योग है जो केवल लोगों से जुड़ा ही नहीं है, बल्कि रोज़गार का भी सृजन करता है। यह ज्ञान के लिये एक उपकरण तो बन ही गया है, साथ ही राजकोष में योगदान देकर आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन का विस्तार करता है।

अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया

  • भारत को एक ट्रिलियन डॉलर वाली डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने के लिये इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और डेटा संरक्षण नीति में बदलाव सहित कई अन्य नीतियाँ शुरू की जा रही हैं।
  • विमुद्रीकरण के बाद से ही सरकार द्वारा डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में देश में डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस जैसे मिशनों को तेज़ी से लागू किया जा रहा है।
  • इस लक्ष्य को 2025 तक हासिल करने के लिये कार्ययोजना बनाई गई है।
  • अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्तमान में आईटी/आईटीईएस क्षेत्र (350 अरब डॉलर) और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र (300 अरब डॉलर) से अधिकतम योगदान के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था 2025 तक 1 ट्रिलियन डालर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बन सकती है।

स्रोत: PIB


असम की बाढ़ पर उपग्रह डेटा साझा करेंगे चीन, रूस और फ्रांस

चर्चा में क्यों?

असम में बाढ़ के मानचित्रण हेतु चीन, रूस और फ्राँस ने इसरो के साथ उपग्रह डेटा साझा किया है।

प्रमुख बिंदु:

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुरोध के बाद फ्राँस के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र (National Centre for Space Studies), चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (National Space Administration) और रूस के ROSCOSMOS ने धुबरी, मारीगाँव, बारपेटा, लखीमपुर और धेमाजी जिलों में बाढ़ की स्थिति के उपग्रह चित्र इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर के साथ साझा किए हैं।
  • यह एक सामान्य प्रक्रिया है तथा इसरो भी इस तरह का अनुरोध मिलने पर अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों को जानकारी प्रदान करता है।
  • अगस्त 2014 में चीन के युन्नान प्रांत में आए भूकंप के समय चीन के अनुरोध पर इसरो ने कार्टोसैट के माध्यम से मानचित्रण डेटा साझा किया था ।
  • अंतरिक्ष एवं प्रमुख आपदाओं पर अंतर्राष्ट्रीय चार्टर ( The International Charter Space and Major Disaster ) के लिये हस्ताक्षरकर्त्ता देश आपदा के समय एक-दूसरे से मानचित्रण और उपग्रह डेटा से संबंधित अनुरोध कर सकते हैं।

अंतरिक्ष एवं प्रमुख आपदाओं पर अंतर्राष्ट्रीय चार्टर

The International Charter Space and Major Disaster

  • यह चार्टर एक बहुपक्षीय व्यवस्था है जिसका उद्देश्य प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं से प्रभावित देशों के लिये उपग्रह आधारित डेटा साझा करना है।
  • विभिन्न अंतरिक्ष एजेंसियाँ आपदा की स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया के लिये संसाधनों और विशेषज्ञता को समन्वित करने की अनुमति देती है।
  • इस समय इसमें 17 चार्टर हैं, जो अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपने द्वारा विकसित किये गए संसाधनों का प्रयोग करते हैं। इस समय यह विश्व के 125 देशों को अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहा है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड नियम, 2016 में संशोधन

चर्चा में क्यों?

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (The Insolvency and Bankruptcy Board of India-IBBI) ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट्स के लिये दिवालियापन समाधान प्रक्रिया) नियम, 2016 और भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (ऋण शोधन प्रक्रिया) नियम, 2016 में संशोधन किया है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट्स के लिये दिवालियापन समाधान प्रक्रिया) नियम, 2016 में हुए प्रमुख संशोधन निम्न प्रकार हैं:

  • संशोधन द्वारा ऋणदाताओं की समिति (Committee of Creditors-CoC) के गठन से पूर्व तथा CoC के गठन के पश्चात् आवेदन को वापस लेने की प्रक्रिया को निश्चित किया गया है।
  • संकल्प योजना को मंजूरी देते समय अथवा कॉरपोरेट देनदार के ऋण शोधन का फैसला करते समय CoC परिसमापन लागत (Lliquidation Cost) को पूरा करने में योगदान करने के लिये योजना को मंजूरी दे सकता है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (ऋण शोधन प्रक्रिया) नियम, 2016

  • यह संशोधन कॉरपोरेट कर्ज़दार (corporate debtor) की बिक्री की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है।
  • इसके अतिरिक्त इसमें इस बात की भी व्यवस्था की गई है कि जैसे ही एक बार कॉरपोरेट देनदार की बिक्री होती है, वैसे ही ऋण शोधन की प्रक्रिया को कॉरपोरेट देनदार के विलय के बिना बंद कर दिया जाएगा।
  • संशोधन के तहत यह आवश्यक है कि ऋण शोधन की प्रक्रिया शुरू होने के एक वर्ष के भीतर इसे पूरा कर लिया जाए।
  • संशोधन में ऋणशोधन की प्रक्रिया में प्रत्येक कार्य के लिए एक मॉडल समय-सीमा निर्धारित की गई है। इसमें कंपनी कानून, 2013 की धारा 230 के तहत हितधारकों द्वारा प्रस्तावित किसी समझौते को पूरा करने के लिए ऋणशोधन के आदेश से अधिकतम 90 दिनों का समय निर्दिष्ट करने की व्यवस्था की गई है, जिससे ऋणशोधन की प्रक्रिया जल्द-से-जल्द खत्म होना सुनिश्चित हो सकेगा।
  • संशोधन में एक हितधारकों की परामर्श समिति के गठन का भी प्रावधान किया गया है, जिसमें सुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं, असुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं, कामगारों और कर्मचारियों, सरकार, अन्य परिचालन ऋणदाताओं और शेयरधारकों का प्रतिनिधित्व होगा, जो ऋणशोधन कराने वाले को बिक्री से संबंधित मामलों में सलाह देंगे। हालाँकि, इस समिति की सलाह को मानने के लिए ऋणशोधन कराने वाला बाध्य नहीं है।
  • संशोधन ने एक व्यापक अनुपालन प्रमाण पत्र (Comprehensive Compliance Certificate) प्रस्तुत किया है जिसे अंतिम रिपोर्ट के साथ अधीनस्थ प्राधिकार को प्रस्तुत किया जाना है।

स्रोत: पी.आई.बी.


लोकसभा में पारित हुआ कंपनी संशोधन विधेयक

चर्चा में क्यों?

लोकसभा ने कंपनी अधिनियम (Companies Act) संशोधन विधेयक पारित कर दिया है।

संशोधन के प्रमुख बिंदु

  • यदि कोई कंपनी अपने द्वारा निर्धारित कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (Corporate Social Responsibility-CSR) फंड की राशि एक निश्चित अवधि में खर्च नहीं करेगी तो वह राशि स्वयं ही एक विशेष खाते में जमा हो जाएगी।
  • भारत ऐसा पहला देश है जिसने देश की सभी कंपनियों के लिये CSR की धनराशि को खर्च करना कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया है।
  • सभी कंपनियों को एक साल में CSR को खर्च करने से संबंधित प्रस्ताव तैयार करना होगा और अगले तीन सालों में उस प्रस्ताव पर धनराशि खर्च करनी होगी।

कंपनी अधिनियम की धारा 135 के अनुसार, निम्नलिखित कंपनियों को अपने तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत हिस्सा CSR पर खर्च करना होगा :

  • जिनका नेटवर्थ 500 करोड़ रुपए या उससे अधिक है।
  • जिनका टर्नओवर 1000 करोड़ या उससे अधिक है।
  • जिनका औसत लाभ 5 करोड़ या उससे अधिक है।
  • इसके अतिरिक्त NCLT के भार को कम करने के लिये यह तय किया गया है कि 25 लाख तक के विवादों का निपटारा क्षेत्रीय स्तर का अधिकारी करेगा।
  • इस संशोधन से पूर्व कुल 81 प्रकार के कानून उल्लंघनों को आपराधिक श्रेणी में शामिल किया जाता था, परंतु संशोधन के पश्चात् इनमें से 16 को सिविल मामलों में शामिल कर दिया गया है।

संशोधन के प्रमुख उद्देश्य :

  • संशोधन का प्रमुख उद्देश्य CSR के नियमों को और अधिक सख्त बनाना है।
  • इसके अतिरिक्त संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal-NCLT) के कार्यभार को कम करने का भी प्रयास किया जाएगा।

कंपनी अधिनियम (Companies Act)

  • कंपनी अधिनियम, 2013 भारत में 30 अगस्त 2013 को लागू हुआ था।
  • यह अधिनियम भारत में कंपनियों के निर्माण से लेकर उनके समापन तक सभी स्थितियों में मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
  • कंपनी अधिनियम के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण की स्थापना हुई है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 ने ही ‘एक व्यक्ति कंपनी’ की अवधारणा की शुरुआत की।

राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण

(National Company Law Tribunal-NCLT)

  • NCLT का गठन कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 18 के तहत किया गया था।
  • NCLT कंपनियों के दिवालिया होने से संबंधित कानून पर जस्टिस इराडी कमेटी की सिफारिश के आधार पर 1 जून, 2016 से काम कर रहा है।
  • NCLT एक अर्द्ध-न्यायिक निकाय है जो भारतीय कंपनियों से संबंधित मुद्दों पर निर्णय देता है।
  • NCLT में कुल ग्यारह पीठ हैं, जिसमें नई दिल्ली में दो (एक प्रमुख) तथा अहमदाबाद, इलाहाबाद, बंगलूरू, चंडीगढ़, चेन्नई, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में एक-एक पीठ है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


लाइटसैल 2

चर्चा में क्यों?

प्लैनेटरी सोसायटी (Planetary Society) ने लाइटसैल प्रोजेक्ट का प्रसार करते हुए लाइटसैल 2 को तैनात किया है, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा के संचालन के माध्यम ब्रह्मांड के पार अंतरिक्ष अभियानों की क्षमता विकसित करना है।

Light sail 2

प्रमुख बिंदु:

  • वर्ष 1600 के आस-पास पहली बार जर्मन खगोल वैज्ञानिक जोहान्स केपलर (Johannes Kepler) द्वारा सूर्य के फोटॉन की ऊर्जा से अंतरिक्ष यात्रा की कल्पना की गई थी।
  • वर्ष 1964 में आर्थर सी. क्लार्क (Arthur C. Clarke) ने भी इस प्रकार की संकल्पना सनजमेर (Sunjammer) नामक एक छोटी-सी कहानी में की थी।
  • इस प्रकार की संकल्पनाओं को मूर्त रूप देने के लिये वर्ष 1970 के आस-पास से लाइटसैल (सौर पाल) के निर्माण के अनुसंधान पर ज़ोर दिया जाने लगा था।
  • लाइटसैल प्रोजेक्ट एक गैर सरकारी संगठन प्लैनेटरी सोसायटी (Planetary Society) के तत्त्वावधान में संचालित है।
  • इस प्रकार के प्रोजेक्टों के सफल होने से अंतरिक्ष अभियानों में ईधन संबंधी समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है क्योंकि अंतरिक्ष में फोटॉन का प्रसार अनवरत रूप से हो रहा है।
  • जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA ने वर्ष 2010 में पहले लाइटसैल (सौर पाल) का प्रयोग शुक्र के अन्वेषण हेतु अंतरिक्ष यान इक्रॉस (Ikaros) में किया था; लेकिन यह अभियान पूर्णतः सफल नहीं हो सका।

लाइटसैल 2:

  • ऐसा अनुमान है कि लाइटसैल 2 अन्य अंतरिक्ष सेटेलाइटों की अपेक्षा ज़्यादा तीव्रता से कार्य करेगा, उदाहरण के लिये यदि नासा के वोयेजर अंतरिक्ष यान (Voyager spacecraft) को लाइट सैल के माध्यम से भेजा गया होता तो यह अपनी 40 वर्ष की यात्रा को आधे समय में ही पूरा कर लेता।

वोयेजर अंतरिक्ष यान (Voyager spacecraft): नासा द्वारा 15 सितंबर,1977 को बाह्य सोलर प्रणाली के अध्ययन के लिये वोयेजर अंतरिक्ष यान को लॉन्च किया गया था।

  • लाइटसैल 2 पृथ्वी के समीप की कक्षा में लॉन्च किया गया पहला लाइटसैल (सौर पाल) है। लाइटसैल 2 बॉक्सिंग रिंग के आकार का है और इसे पतली माइलर (Mylar) सामग्री से बनाया गया है।
  • पृथ्वी पर प्लैनेटरी सोसायटी की इंजीनियरिंग टीम इस लाइटसैल को सूर्य से 90 डिग्री के कोण पर रखेगी।
  • लाइटसैल पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए जब सबसे दूर बिंदु पर पहुँचता है तो इस सबसे दूर के बिंदु को एपोजी (Apogee) कहते हैं।
  • प्राथमिक मिशन लगभग एक महीने तक चलने के बाद लाइटसैल 2 एक वर्ष तक पृथ्वी की परिक्रमा करेगा।
  • लाइटसैल 2 को कभी-कभी पृथ्वी से नग्न आँखों द्वारा भी देखा जा सकेगा।

स्रोत: द न्यूयार्क टाइम्स


सुपरबग्स के लिये ड्रग मॉलिक्यूल

चर्चा में क्यों?

भारतीय वैज्ञानिकों ने सुपरबग को नष्ट करने वाले एक नए एक ड्रग मॉलिक्यूल को विकसित करने की रणनीति बनाई है।

प्रमुख बिंदु:

  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर और लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (Central Drug Research Institute-CDRI) के वैज्ञानिकों ने तेज़ी से विकसित हो रहे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी सुपरबग्स को नष्ट करने की रणनीति बनाई है।
  • वैज्ञानिकों ने अध्ययन में नाक के ऊपरी हिस्से में पाए जाने वाले बैक्टीरिया स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus Aureus) का प्रयोग किया। प्रयोगों के दौरान यह लगभग 30 प्रतिशत लोगों की त्वचा पर पाया गया। इनमें से कई लोग स्वस्थ हैं, लेकिन कम प्रतिरक्षा स्तर वाले लोगों में यह बैक्टीरिया कई संक्रमणों का कारण बनता है, जिनमें से कुछ संक्रमण घातक भी हो सकते हैं।
  • अनुमान है कि ये मल्टीड्रग प्रतिरोधी सुपरबग वर्ष 2050 तक वैश्विक स्तर पर 10 मिलियन से अधिक लोगों की जान ले सकते हैं।
  • मॉलिक्यूल ड्रग की संरचना इस प्रकार विकसित की जाएगी कि यह रोगाणुओं के प्रसार को रोकेगा।
  • इस मॉलिक्यूल ड्रग की नवीनता इसका संरचनात्मक डिज़ाइन है, जिसका प्रयोग कम्प्यूटरीकृत जीव विज्ञान वाले विशेषज्ञता अणु को बनाने में किया जाएगा। इस प्रकार के मॉलिक्यूल ड्रग से बैक्टीरिया के ऊर्जा उत्पादन को 20 मिनट तक रोककर बैक्टीरिया के विभाजन और प्रसार को रोका जा सकेगा।
  • बैक्टीरिया के अस्तित्व और प्रसार के लिए गाइरेस (Gyrase) नामक पदार्थ की आवश्यकता होती है। जीवों में गाइरेस दो प्रकार के होते हैं- गाइरेस A और गाइरेस B। वर्तमान में लगभग सभी जीवाणुरोधी दवाएँ गाइरेस को लक्षित करती हैं, क्योंकि गाइरेस एंटीबायोटिक दवाओं का सुपरबग विकसित करता है।
  • विकसित किया जा रहा मॉलिक्यूल ड्रग, गाइरेस B को लक्षित करता है; जो जीवों में अधिक मात्रा में संरक्षित होता है, इसलिये इसे उत्परिवर्तित करना ज़्यादा मुश्किल है। जब मॉलिक्यूल ड्रग का संयोजन फ़्लोरोक्विनोलोन (Fluoroquinolone) दवाओं के साथ किया गया तो गाइरेस A और गाइरेस B दोनों की प्रभावशीलता में कमी देखने को मिली।
  • प्रयोगशाला में अभी तक इस मॉलिक्यूल ड्रग का बैक्टीरिया एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित नहीं हो पा रहा है।
  • एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध के उभरते खतरे का मुकाबला करने के लिये इस प्रकार के चिकित्सीय हस्तक्षेप और वैकल्पिक तंत्र एक संधारणीय उपाय हो सकते हैं।

सुपरबग (Superbugs)

  • सुपरबग एक ऐसा सूक्ष्मजीव है, जिस पर एंटी-माइक्रोबियल ड्रग्स का प्रभाव नहीं पड़ता। एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध विकसित करने वाले सूक्ष्मजीवों को ‘सुपरबग’ के नाम से जाना जाता है।
  • एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग बहुतायत में किये जाने के कारण बैक्टीरिया में इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गई है जिससे उन पर दवाओं का असर न के बराबर हो रहा है।
  • यही प्रभाव अन्य सूक्ष्मजीवियों (Micro-Organism) के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, जैसे एंटीफंगल (Antifungal), एंटीवायरल (Antiviral) और एंटीमलेरियल (Antimalarial) दवाओं का असर भी कम होने लगा है।

स्रोत: द हिंदू बिजनेसलाइन


रीम (चीन-कंबोडिया संधि)

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में चीन-कंबोडिया के मध्य एक नौसैनिक समझौता हुआ, जिसमें चीन को कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे (Ream Naval Base) का इस्तेमाल करने का अधिकार प्राप्त हो गया है। हालाँकि दोनों देशों ने इस समझौते को सार्वजनिक नहीं किया है।

china & cambodia

प्रमुख बिंदु

  • चीन इस नौसैनिक अड्डे का प्रयोग 30 वर्षों के लिये कर सकेगा और इसके बाद प्रत्येक 10 वर्षों के लिए इस समझौते का स्वतः ही नवीकरण हो जाएगा।
  • समझौते के प्रारूप के अनुसार चीन इस नौसैनिक अड्डे का प्रयोग अपने नौसैनिको की तैनाती, हथियारों का भण्डारण और नौसैनिक जहाजों का लंगर डालने के लिये करेगा।
  • इस समझौते से चीन की सैन्य पहुँच थाईलैंड की खाड़ी तक हो जाएगी। इससे चीन को नौसैनिक व हवाई अड्डों के एक साथ इस्तेमाल की सुविधा मिल जाएगी तथा दक्षिण चीन सागर में इसके आर्थिक हितों व क्षेत्रीय दावों को मज़बूती मिलेगी।
  • साथ ही अमेरिका व उसके सहयोगियों के लिये भी यह एक चुनौती होगी तथा रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण मल्लका जलडमरूमध्य क्षेत्र में भी चीन के प्रभाव में वृद्धि होगी।
  • यह दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन का पहला समर्पित नौसैनिक अड्डा होगा और वैश्विक नेटवर्क की दृष्टि से यह चीन का दूसरा प्रमुख अड्डा होगा जिसका उपयोग सैन्य व असैन्य उद्देश्यों के लिये किया जा सकेगा है।
  • इस समझौते में चीन के लोगों को हथियार और कंबोडियन पासपोर्ट ले जाने की सुविधा होगी, जबकि कंबोडियाई लोगों को रीम के 62 एकड़ चीनी भाग में प्रवेश करने के लिये चीन की अनुमति लेनी होगी।
  • अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता का एक अन्य कारण रीम से मात्र 40 मील की दुरी पर चीन की कंपनी द्वारा दारा सकोर (Dara Sakor) हवाई अड्डे का निर्माण किया जाना है जो विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र है और चीनी कंपनी ने इसे 99 साल की लीज़ पर लिया है। इस हवाईअड्डे का इस्तेमाल चीनी युद्धक विमान थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर तथा आसपास के क्षेत्र पर हमले के लिये कर सकते हैं।

कम्बोडिया में चीन के सैन्य अड्डे के रणनीतिक प्रभाव

  • कम्बोडिया में चीन के सैन्य अड्डे की मौजूदगी इस क्षेत्र के और विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
  • चीन दक्षिण-पूर्व एशिया में वार्ताओं तथा युद्ध अभ्यासों द्वारा अपने क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे को निरंतर मज़बूत कर रहा है जो इस क्षेत्र की स्थिरता के लिये चिंता का कारण बन सकता है।
  • इस समझौते से दक्षिण-पूर्व एशिया की मुख्य भूमि (Main Land) पर भी तनाव व संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि थाईलैंड और वियतनाम, जो कि इस भू-भाग के प्रमुख देश हैं, इस क्षेत्र में चीन की मौजूदगी को लेकर चिंतित हैं। वियतनाम पूर्व में भी मेकोंग उपक्षेत्र में चीन के विकास कार्यो के प्रति चिंता जाहिर कर चुका है।
  • वर्ष 2017 में चीन ने अपना पहला सैन्य अड्डा पूर्वी अफ्रीकी देश जिबूती में बनाया था, जो उसे हिंद महासागर और अफ्रीका में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की सुविधा प्रदान करता है। इसके साथ ही चीन ने दक्षिण चीन सागर में सात कृत्रिम द्वीपोँ का निर्माण किया है, जिनमें से तीन में हवाई पट्टियाँ भी बनाई गई हैं।

स्रौत : द वाल स्ट्रीट जर्नल


भारत में संसदीय समितियाँ

चर्चा में क्यों?

17वीं लोकसभा का गठन हुए लगभग दो महीने बीत चुके हैं, परंतु अभी तक संसदीय स्थायी समितियों का गठन नहीं किया गया है, जिसके कारण संसद के वर्तमान सत्र में पेश किये गए सभी विधेयकों को बिना स्थायी समितियों की जाँच के ही पारित करना पड़ा है। स्थायी समितियों के गठन के संदर्भ में पार्टियों के बीच विचार-विमर्श का दौर अभी भी जारी है।

क्या होती हैं संसदीय समितियाँ?

संसदीय लोकतंत्र में संसद के मुख्यतः दो कार्य होते हैं, पहला कानून बनाना और दूसरा सरकार की कार्यात्मक शाखा का निरीक्षण करना। संसद के इन्ही कार्यों को प्रभावी ढंग से संपन्न करने के लिये संसदीय समितियों को एक माध्यम के तौर पर प्रयोग किया जाता है। सैद्धांतिक तौर पर धारणा यह है कि संसदीय स्थायी समितियों में अलग-अलग दलों के सांसदों के छोटे-छोटे समूह होते हैं जिन्हें उनकी व्यक्तिगत रुचि और विशेषता के आधार पर बाँटा जाता है ताकि वे किसी विशिष्ट विषय पर विचार-विमर्श कर सकें।

कहाँ से आया संसदीय समितियों के गठन का विचार?

भारतीय संसदीय प्रणाली की अधिकतर प्रथाएँ ब्रिटिश संसद की देन हैं और संसदीय समितियों के गठन का विचार भी वहीं से आया है। विश्व की पहली संसदीय समिति का गठन वर्ष 1571 में ब्रिटेन में किया गया था। भारत की बात करें तो यहाँ पहली लोक लेखा समिति का गठन अप्रैल 1950 में किया गया था।

क्यों होती है संसदीय समितियों की आवश्यकता?

संसद में कार्य की बेहद अधिकता को देखते हुए वहाँ प्रस्तुत सभी विधेयकों पर विस्तृत चर्चा करना संभव नहीं हो पाता, अतः संसदीय समितियों का एक मंच के रूप में प्रयोग किया जाता है, जहाँ प्रस्तावित कानूनों पर चर्चा की जाती है। समितियों की चर्चाएँ ‘बंद दरवाज़ों के भीतर’ होती हैं और उसके सदस्य अपने दल के सिद्धांतों से भी बंधे नहीं होते, जिसके कारण वे किसी विषय विशेष पर खुलकर अपने विचार रख सकते हैं।

आधुनिक युग के विस्तार के साथ नीति-निर्माण की प्रक्रिया भी काफी जटिल हो गई है और सभी नीति-निर्माताओं के लिये इन जटिलताओं की बराबरी करना तथा समस्त मानवीय क्षेत्रों तक अपने ज्ञान को विस्तारित करना संभव नहीं है। इसीलिये सांसदों को उनकी विशेषज्ञता और रुचि के अनुसार अलग-अलग समितियों में रखा जाता है ताकि उस विशिष्ट क्षेत्र में एक विस्तृत और बेहतर नीति का निर्माण संभव हो सके।

संसदीय समितियों के प्रकार

आमतौर पर संसदीय समितियाँ दो प्रकार की होती हैं:

1. स्थायी समितियाँ

2. अस्थायी समितियाँ या तदर्थ समितियाँ

1. स्थायी समिति

  • स्थायी समितियाँ अनवरत प्रकृति की होती हैं अर्थात् इनका कार्य सामान्यतः निरंतर चलता रहता है। इस प्रकार की समितियों का पुनर्गठन वार्षिक आधार पर किया जाता है। इनमें शामिल कुछ प्रमुख समितियाँ इस प्रकार हैं :
    • लोक लेखा समिति
    • प्राक्कलन समिति
    • सार्वजनिक उपक्रम समिति
    • एस.सी. व एस.टी. समुदाय के कल्याण संबंधी समिति
    • कार्यमंत्रणा समिति
    • विशेषाधिकार समिति
    • विभागीय समिति

2. अस्थायी समितियाँ या तदर्थ समितियाँ

  • अस्थायी समितियों का गठन किसी एक विशेष उद्देश्य के लिये किया जाता है, उदाहरण के लिये, यदि किसी एक विशिष्ट विधेयक पर चर्चा करने के लिये कोई समिति गठित की जाती है तो उसे अस्थायी समिति कहा जाएगा। उद्देश्य की पूर्ति हो जाने के पश्चात् संबंधित अस्थायी समिति को भी समाप्त कर दिया जाता है। इस प्रकार की समितियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
    • जाँच समितियाँ: इनका निर्माण किसी तत्कालीन घटना की जाँच करने के लिये किया जाता है।
    • सलाहकार समितियाँ: इनका निर्माण किसी विशेष विधेयक पर चर्चा करने के लिये किया जाता है।

उपरोक्त के अतिरिक्त 24 विभागीय समितियाँ भी होती हैं जिनका कार्य विभाग से संबंधित विषयों पर कार्य करना होता है। प्रत्येक विभागीय समिति में अधिकतम 31 सदस्य होते हैं, जिसमें से 21 सदस्यों का मनोनयन स्पीकर द्वारा एवं 10 सदस्यों का मनोनयन राज्यसभा के सभापति द्वारा किया जा सकता है। कुल 24 समितियों में से 16 लोकसभा के अंतर्गत व 8 समितियाँ राज्यसभा के अंतर्गत कार्य करती हैं। इन समितियों का मुख्य कार्य अनुदान संबंधी मांगों की जाँच करना एवं उन मांगों के संबंध में अपनी रिपोर्ट सौंपना होता है।

स्रोत: द हिंदू


केरल में हाथियों की संख्या में वृद्धि

चर्चा में क्यों?

लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में हाथियों की नवीनतम जनगणना में केरल में लगभग 2,700 हाथियों के गणना में शामिल न होने की की संभावना जताई गई है।

Mammoth count

प्रमुख बिंदु

  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2017 में देश में लगभग 23 राज्यों से लिये गए आँकड़ों के अनुसार औसतन 27,312 हाथी थे, जबकि वर्ष 2012 में औसतन 29,576 हाथियों की संख्या दर्ज़ की गई थी।
  • उल्लेखनीय है कि प्रोजेक्ट एलीफैंट के तहत पाँच साल में एक बार हाथियों की जनगणना करवाई जाती है।
  • वर्ष 2017 के आँकड़ों के अनुसार, केरल में केवल 3,054 हाथी थे जबकि हाल ही में दिये गए आँकड़ों में हाथियों की संख्या 5,706 है।
  • अंडमान एवं निकोबार द्वीप एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहाँ हाथियों की संख्या 2017 के अनुमान से कम रही। (25 से कम होकर 19)
  • संख्या में इस तरह की विसंगति का कारण हाथियों की गिनती करने में प्रत्यक्ष गणना विधि का प्रयोग करना है।
  • ध्यातव्य है कि जंगली जानवरों को देखना कठिन होता है इसलिये वर्षों से शोधकर्त्ताओं द्वारा इनकी आबादी का अनुमान लगाने के लिये कई तकनीकों के साथ-साथ सांख्यिकीय तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है।
  • ‘अप्रत्यक्ष गणना’ विधि के तहत हाथियों का गोबर देखे जाने के आधार पर किसी क्षेत्र में आबादी का अनुमान लगाया जाता है।

स्रोत: PIB


Rapid Fire करेंट अफेयर्स (27 July)

  • भारत और चीन के बीच वार्षिक रूप से आयोजित होने वाला हैंड-इन-हैंड सैन्याभ्यास इस वर्ष दिसंबर के दूसरे सप्ताह में मेघालय में शिलांग के निकट उमरोई में 14 दिन तक चलेगा। एक-दूसरे की रणनीति को साझा करने के लिये दोनों देशों के लगभग 240 सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा लेंगे। ज्ञातव्य है कि वर्ष 2017 में डोकलाम विवाद के चलते इस अभ्यास को रद्द किया गया था, लेकिन उसके बाद वर्ष 2018 में यह अभ्यास 11 से 23 दिसंबर तक चीन के सिचुआन प्रांत के चेंगदू में हुआ था। इस सैन्याभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच मजबूत संबंध बनाना और उन्हें बढ़ावा देना है। संयुक्त अभ्यास कमांडर की क्षमता में बढ़ोतरी करना भी इस अभ्यास का लक्ष्य है ताकि दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियाँ कमान के अंतर्गत काम कर सकें। इस अभ्यास के दौरान संयुक्त राष्ट्र के आदेश के तहत किसी देश में विघटनकारी/ आतंकवादी गतिविधियों के मुकाबले के लिये कार्रवाइयों का प्रशिक्षण भी शामिल होता है। विदित हो कि कि वर्ष 2008 में पहली बार दोनों देशों की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने के उद्देश्य से हैंड-इन-हैंड अभ्यास की शुरुआत हुई थी। हर साल यह सैन्याभ्यास बारी-बारी से चीन और भारत में आयोजित किया जाता है।
  • ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों की एक टीम ने क्वांटम कंप्यूटर का एक सुपरफास्ट वर्ज़न तैयार किया है। यह कंप्यूटर सामान्य कंप्यूटर के मुकाबले 200 गुना तेज़ी से जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखता है। क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग ऐसी गणना करने के लिये किया जाता है, जिसे सैद्धांतिक या भौतिक रूप से लागू किया जा सके। मौजूदा कंप्यूटरों के विपरीत क्वांटम कंप्यूटर अधिक जटिल गणनाओं को आसानी से हल कर सकते हैं। क्वांटम तकनीक के आने से रसायन विज्ञान, खगोल, भौतिकी, चिकित्सा, सुरक्षा और संचार सहित लगभग हर वैज्ञानिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने सिलिकॉन में एटम क्यूबिट के बीच में पहला टू-क्यूबिट गेट तैयार किया है। यह एक ऐसी तकनीक है जो किसी काम को 200 गुना तेज़ी से करने में सक्षम है। अभी कंप्यूटर द्वारा किसी काम को करने की स्पीड 0.8 नैनो सेकेंड की है। एक क्यूबिट ही क्वांटम बिट होता है, जो सूचना की सबसे छोटी इकाई है। क्यूबिट 0 या 1 में से एक या दोनों हो सकते हैं। चूंकि 0 और 1 के संयोजनों की संख्या क्यूबिट में अधिक होती है, इसलिये यह ‘बिट’ की तुलना में बहुत तेज़ी से समस्याओं को हल कर सकते हैं।
  • भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के सरीसृप शोधकर्त्ताओं (Herpetologist) ने पश्चिमी घाट में सांपों का अध्ययन और वर्गीकरण करने के दौरान 26 मिलियन वर्ष पुरानी वाइन स्नेक की एक प्रजाति का पता लगाया है। इसे उन्होंने Proahaetulla Antiqua नाम दिया है। पेड़ों, बेलों और लताओं पर पाए जाने वाले पतले हरे रंग के साँप को वाइन स्नेक कहा जाता है। यह साँप पश्च्चिमी घाट के दक्षिणी हिस्से में स्थित तमिलनाडु के कलक्काड मुंडनथुराई टाइगर रिज़र्व (Kalakkad Mundanthurai Tiger Reserve) तथा केरल के शेंदुरनी वन्यजीव अभयारण्य (Shendurney Wildlife Sanctuary) के संरक्षित क्षेत्रों में पाया गया है और सुरक्षा की दृष्टि से इसे फिलहाल कोई खतरा नहीं है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में भी वाइन स्नेक जैसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं तथा एशियाई वाइन स्नेक पूरे एशिया में पाए जाते हैं।
  • वर्ष 2020 में जापान की राजधानी टोक्यो में होने वाले 32वें ओलंपिक खेलों के लिये बनाए गए पदकों का अनावरण हाल ही में किया गया। टोक्यो ओलंपिक के लिये बने ये मेडल्स अपने आप में अलग और खास हैं, क्योंकि इन्हें पूरी तरह पुनर्चक्रित (Recycled) उपभोक्ता उपकरणों से बनाया गया है। साथ ही इनका डिज़ाइन भी एक प्रतियोगिता के ज़रिये चुना गया है, जिनमें जापान के 400 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था। अंत में ओसाका डिज़ाइन सोसाइटी के निदेशक जुनिची कावानिशी (Junichi Kawanishi) का डिज़ाइन चुना गया। आयोजकों के अनुसार पहली बार इको-फ्रेंडली मेडल्स बनाए गए हैं और इन्हें बनाने में बड़ी संख्या में मोबाइल फोनों का इस्तेमाल किया गया है। जापान के लोगों ने दो सालों में करीब 6.2 करोड़ मोबाइल फोन दान किये, जिनमें से 32 किलोग्राम सोना निकला गया गया। इसके अलावा पाँच हज़ार ओलंपिक और पैरालंपिक मैडल बनाने के लिये 3.5 टन चाँदी और 2.2 टन कांसा भी इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों (मोबाइल फोन, डिजिटल कैमरा, हैंडहेल्ड गेम्स और लैपटॉप) से निकाला गया। इन मेडल्स को बनाने के लिये टोक्यो ओलंपिक आयोजन समिति ने Tokyo 2020 मेडल प्रोजेक्ट के नाम से एक मुहिम शुरू की थी जिसमें जापान के लोगों से छोटे इलेक्ट्रिक उपकरण इकट्ठे किये गए थे। इसके अलावा पोडियम, मशाल रिले के लिये वर्दी जैसी अन्य चीज़ों को इको-फ्रेंडली वस्तुओं से तैयार किया गया है।