भारतीय राजव्यवस्था
दल-बदल विरोधी कानून और विलय प्रावधान की संवैधानिक वैधता
प्रिलिम्स के लिये: दसवीं अनुसूची, न्यायिक समीक्षा, सर्वोच्च न्यायालय, अध्यक्ष, विधान सभा के सदस्य
मेन्स के लिये: दल-बदल विरोधी कानून: विकास, प्रावधान एवं चुनौतियाँ, अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका एवं निष्पक्षता से जुड़े मुद्दे, न्यायिक समीक्षा तथा दल-बदल पर प्रमुख निर्णय
चर्चा में क्यों?
आम आदमी पार्टी के सात पूर्व सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं और उन्होंने अयोग्यता से बचने के लिये दल-बदल विरोधी कानून के तहत ‘विलय’ प्रावधान का उल्लेख किया है।
- इसने संवैधानिक प्रश्न उजागर कर दिये हैं कि क्या केवल विधानमंडल दल, मूल राजनीतिक दल की भागीदारी के बिना, वैध विलय का दावा कर सकता है।
सारांश
- दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना है, किंतु ‘विलय’ प्रावधान के दुरुपयोग ने इसकी प्रभावशीलता को लेकर गंभीर संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं।
- मुख्य मुद्दों में सामूहिक दल-बदल को सक्षम बनाने वाली कमियाँ, अध्यक्ष का पक्षपात, निर्णयों में देरी, तथा विधायिका की स्वतंत्रता और लोकतंत्र का कमज़ोर होना शामिल हैं।
दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
- परिचय: दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान में शामिल नियमों का एक समूह है, जिसका उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (संसद सदस्य या राज्य विधानमंडल के सदस्य) को व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक अवसरवाद के लिये अपनी राजनीतिक पार्टी बदलने से रोकना है।
- इसे संसदीय प्रणाली में स्थिरता लाने और 1960 एवं 70 के दशक की कुख्यात ‘आया राम, गया राम’ संस्कृति को रोकने के लिये लागू किया गया था, जिसमें विधायक बार-बार दल बदलते रहते थे, जिससे सरकारें गिर जाया करती थीं।
- 1967 से 1972 के बीच लगभग 2,000 दल-बदल के मामले सामने आए, जिनमें लगभग 50% विधायकों ने राजनीतिक दल बदले और कुछ ने कई बार दल परिवर्तन किया।
- इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में जोड़ा गया, जिसके तहत दसवीं अनुसूची का निर्माण किया गया।
- इस कानून को वर्ष 2003 के 91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा और मज़बूत किया गया, जिसमें ‘विभाजन’ (Split) से संबंधित प्रावधान (जहाँ 1/3 सदस्य दल-बदल कर सकते थे) को हटा दिया गया और केवल ‘विलय’ (Merger) प्रावधान को ही बनाए रखा गया।
- इसे संसदीय प्रणाली में स्थिरता लाने और 1960 एवं 70 के दशक की कुख्यात ‘आया राम, गया राम’ संस्कृति को रोकने के लिये लागू किया गया था, जिसमें विधायक बार-बार दल बदलते रहते थे, जिससे सरकारें गिर जाया करती थीं।
- अयोग्यता के आधार:
- स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना: यदि कोई निर्वाचित सदस्य उस राजनीतिक दल से औपचारिक रूप से त्याग-पत्र दे देता है, जिसके टिकट पर वह चुना गया था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘स्वेच्छा से त्याग’ केवल औपचारिक त्याग-पत्र से ही नहीं, बल्कि सदस्य के आचरण से भी अनुमानित किया जा सकता है।
- पार्टी व्हिप का उल्लंघन: यदि कोई सदस्य अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी निर्देशों के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, बिना पूर्व अनुमति के।
- स्वतंत्र सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- नामित सदस्य: यदि कोई नामित सदस्य (जो निर्वाचित नहीं होता, बल्कि मनोनीत किया जाता है) सदन में अपनी सीट ग्रहण करने के छह माह बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना: यदि कोई निर्वाचित सदस्य उस राजनीतिक दल से औपचारिक रूप से त्याग-पत्र दे देता है, जिसके टिकट पर वह चुना गया था।
- अयोग्यता से छूट:
- ‘विलय’ प्रावधान: यदि कोई राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलय कर लेता है और उस दल के कम-से-कम दो-तिहाई (2/3) विधायक/सांसद उस विलय को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से संरक्षण प्राप्त होता है।
- दल-बदल विरोधी कानून के ‘विलय’ प्रावधान (दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 4) के तहत संरक्षण प्राप्त करने के लिये एक विशिष्ट ‘द्वि-शर्त परीक्षण’ (Twin Test) का कठोरता से पालन आवश्यक होता है। केवल बड़ी संख्या में विधायकों का पक्ष बदल लेना पर्याप्त नहीं होता।
- परीक्षण एक (उत्पत्ति): मूल राजनीतिक दल (व्यापक संगठनात्मक इकाई) का किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ औपचारिक विलय होना चाहिये।
- परीक्षण दो (संख्या): उस पार्टी-स्तरीय विलय के बाद उस विधानमंडल दल (सदन में निर्वाचित सांसद/विधायक) के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य उस विलय को स्वीकार करें और अपनाएँ।
- विलय की प्रक्रिया की शुरुआत स्वयं राजनीतिक दल से होनी चाहिये। केवल निर्वाचित विधायकों का कोई समूह दल-बदल विरोधी कार्रवाई से बचने के लिये स्वतंत्र रूप से विलय की व्यवस्था नहीं कर सकता।
- दल-बदल विरोधी कानून के ‘विलय’ प्रावधान (दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 4) के तहत संरक्षण प्राप्त करने के लिये एक विशिष्ट ‘द्वि-शर्त परीक्षण’ (Twin Test) का कठोरता से पालन आवश्यक होता है। केवल बड़ी संख्या में विधायकों का पक्ष बदल लेना पर्याप्त नहीं होता।
- पीठासीन अधिकारी: यदि कोई सदस्य सदन के अध्यक्ष या सभापति के रूप में निर्वाचित होता है, तो अपनी भूमिका में निष्पक्षता बनाए रखने के लिये वह अपनी राजनीतिक पार्टी से त्यागपत्र दे सकता है और इसके लिये उसे अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा।
- वह अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद अपनी पार्टी में फिर से शामिल हो सकता है।
- ‘विलय’ प्रावधान: यदि कोई राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलय कर लेता है और उस दल के कम-से-कम दो-तिहाई (2/3) विधायक/सांसद उस विलय को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से संरक्षण प्राप्त होता है।
- पीठासीन अधिकारी की भूमिका: दल-बदल से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेने की शक्ति केवल सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होती है—लोकसभा/विधानसभाओं में अध्यक्ष और राज्यसभा/विधानपरिषदों में सभापति।
दल-बदल विरोधी कानून के संबंध में न्यायिक निर्णय
- पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2025): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दल-बदल मामलों के समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारे को सुनिश्चित करने के लिये संसदीय सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया तथा अध्यक्ष की भूमिका की पुनः समीक्षा करने का सुझाव दिया।
- सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव (2023): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मूल राजनीतिक दल और विधायिका दल दो अलग-अलग इकाइयाँ हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधायिका दल केवल तभी अयोग्यता से संरक्षण का दावा कर सकता है, जब विलय की प्रक्रिया मूल राजनीतिक दल द्वारा प्रारंभ की गई हो, न कि स्वयं विधायिका दल द्वारा।
- कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को अयोग्यता से संबंधित मामलों का निर्णय 3 महीने के भीतर करना चाहिये; अनावश्यक देरी दसवीं अनुसूची के उद्देश्य को विफल कर देती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने निष्पक्षता और त्वरित निर्णय सुनिश्चित करने के लिये एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण की स्थापना का भी सुझाव दिया।
- रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को एक निष्पक्ष निर्णायक के रूप में कार्य करना चाहिये। यदि किसी सांसद/विधायक के आचरण से दल-बदल स्पष्ट होता है, तो उसे औपचारिक इस्तीफा दिये बिना भी अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992): दल-बदल विरोधी कानून के तहत अध्यक्ष के निर्णय 'दुर्भावनापूर्ण इरादे', प्रक्रियात्मक अनियमितता या संवैधानिक उल्लंघन के मामलों में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
दल-बदल विरोधी कानून को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
- विलय का कानूनी छिद्र (थोक दल-बदल): दो-तिहाई बहुमत के आधार पर ‘विलय’ का दावा करने का प्रावधान वास्तव में बड़े पैमाने पर दल-बदल को बिना अयोग्यता के संभव बनाता है।
- इससे ऐसी स्थिति बनती है जिसमें व्यक्तिगत दल-बदल को दंडित किया जाता है, जबकि सामूहिक दल-बदल को संरक्षण मिल जाता है और इस प्रकार राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने का मूल उद्देश्य कमज़ोर पड़ जाता है।
- व्यवहार में विलय संबंधी प्रावधान की व्याख्या प्रायः विधानमंडल में संख्यात्मक बहुमत के आधार पर की जाती है, जहाँ दो-तिहाई समर्थन को औपचारिक पार्टी विलय के बिना भी पर्याप्त माना जाता है। इससे यह प्रक्रिया केवल संख्याओं के खेल में बदल जाती है और दसवीं अनुसूची के मूल उद्देश्य को कमज़ोर कर देती है।
- अध्यक्ष की पक्षपातपूर्ण भूमिका: अयोग्यता का निर्णय करने का अधिकार अध्यक्ष/सभापति के पास होता है, जो अक्सर किसी राजनीतिक दल से संबंधित होता है।
- इससे पक्षपात की आशंका उत्पन्न होती है, क्योंकि निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों के बजाय राजनीतिक विचारों से प्रभावित हो सकते हैं।
- निर्णय प्रक्रिया में अस्पष्टता: अध्यक्ष/सभापति को यह तय करना होता है कि “विलय” अनुच्छेद 4 की शर्तों को पूरा करता है या यह दल-बदल की श्रेणी में आता है। तब तक सांसदों को अपनी मूल पार्टी का सदस्य माना जाता है, जिससे वे किसी अन्य दल का समर्थन तो कर सकते हैं, लेकिन फिर भी अपनी मूल पार्टी के व्हिप के अधीन रहते हैं और अयोग्यता का खतरा बना रहता है।
- निर्णय के लिये कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं: कानून में अयोग्यता के मामलों का निर्णय करने हेतु कोई सख्त समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
- परिणामस्वरूप, कार्यवाहियाँ अक्सर लंबित रहती हैं, जिससे दल-बदल करने वाले विधायकों को पद पर बने रहने या यहाँ तक कि बिना किसी परिणाम का सामना किये अपना कार्यकाल पूरा करने का अवसर मिल जाता है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का सीमांकन: दल-बदल विरोधी कानून व्हिप के माध्यम से कड़े पार्टी अनुशासन को लागू करता है, यहाँ तक कि सामान्य विधायी मामलों में भी।
- इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त करने या अपनी अंतरात्मा के अनुसार मतदान करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- प्रतिनिधि लोकतंत्र का कमज़ोर होना: यह कानून विधायकों की जवाबदेही को उनके मतदाताओं से हटाकर उनकी पार्टी नेतृत्व की ओर स्थानांतरित कर देता है।
- यह उस मूल सिद्धांत को कमज़ोर करता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने मतदाताओं के हित में कार्य करना चाहिये।
- न्यायिक अस्पष्टता: दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 4 की व्याख्या आज भी विवादों में है। बॉम्बे उच्च न्यायालय (2022) के अनुसार, यदि दो-तिहाई विधायक किसी दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं, तो उसे 'विलय' माना जाएगा, भले ही मूल राजनीतिक दल का राष्ट्रीय या संगठनात्मक स्तर पर विलय न हुआ हो।
- इस दृष्टिकोण को अब 'गिरीश चोडनकर बनाम अध्यक्ष, गोवा विधानसभा' (2026) मामले में चुनौती दी गई है। यह दृष्टिकोण पैरा 4(2) को एक स्वतंत्र प्रावधान के रूप में मानता है और दल-बदल को बढ़ावा देने के लिये इसकी आलोचना की जाती है।
दल-बदल विरोधी कानून को और अधिक सुदृढ़ बनाने हेतु कौन-से उपाय लागू किये जा सकते हैं?
- एक स्वतंत्र निर्णायक प्राधिकरण की स्थापना: चुनावी सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) ने सिफारिश की है कि अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय राष्ट्रपति (सांसदों के लिये) या राज्यपाल (विधायकों हेतु) द्वारा चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह के आधार पर लिया जाना चाहिये।
- स्थायी अधिकरण: केशम मेघचंद्र बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर (2020) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुझाव दिया है कि दल-बदल से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिये एक स्थायी, स्वतंत्र अधिकरण का गठन किया जाए, जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाए।
- निर्णयों के लिये कठोर समय-सीमा का निर्धारण: संसद को दसवीं अनुसूची में संशोधन करके यह अनिवार्य करना चाहिये कि निर्णय प्राधिकारी अयोग्यता याचिका पर एक निश्चित अवधि के भीतर, आदर्श रूप से तीन माह में, निर्णय दे, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने केशम मेघचंद्र सिंह (2020) के निर्णय में सुझाव दिया है।
- पार्टी व्हिप के प्रयोग को सीमित करना: भारत के विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट) की अनुशंसा के अनुसार, व्हिप जारी करने को केवल उन परिस्थितियों तक सीमित किया जाना चाहिये, जहाँ सरकार का अस्तित्व दाँव पर हो, जैसे– अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव तथा धन विधेयक या बजट का पारित होना।
- अन्य सभी विधेयकों के संदर्भ में सदस्यों को अयोग्यता के भय के बिना अपनी अंतरात्मा या अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों के अनुरूप मतदान करने की स्वतंत्रता होनी चाहिये।
- ‘विलय’ खंड का पुनर्मूल्यांकन: विधि में स्पष्ट रूप से यह निर्दिष्ट किया जाना चाहिये कि “विलय” के लिये पहले मूल राजनीतिक दल (संगठनात्मक इकाई) का विलय होना आवश्यक है और विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति केवल गौण शर्त है।
- विधायी दल को स्वतंत्र रूप से विलय करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये।
- "त्यागपत्र" की कमियों को दूर करना: सरकारों को गिराने के उद्देश्य से विधायकों द्वारा त्यागपत्र देकर बाद में प्रतिद्वंद्वी दल के टिकट पर उपचुनाव लड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने हेतु अधिक कठोर चुनावी दंड आवश्यक हैं।
- जो विधायक अपने पद से त्यागपत्र देता है, उसे उस विशेष विधानसभा या संसद के शेष कार्यकाल के दौरान किसी भी उपचुनाव में प्रत्याशी बनने से वंचित किया जाना चाहिये।
- पार्टी के भीतर लोकतंत्र को सुदृढ़ करना: दल-बदल प्रायः अत्यधिक केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक दलगत संरचनाओं का लक्षण होता है।
- ऐसे कानून बनाए जाने चाहिये, जो राजनीतिक दलों के भीतर नियमित, पारदर्शी एवं लोकतांत्रिक आंतरिक चुनावों को अनिवार्य करें, जिससे दल के शीर्ष नेतृत्व के तानाशाही नियंत्रण में कमी आए और विधायकों को दल-बदल किये बिना अपनी असहमति व्यक्त करने का वैध मंच प्राप्त हो।
निष्कर्ष
विलय प्रावधान का उद्देश्य लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा करना था, किंतु इसका बढ़ता दुरुपयोग इसे राजनीतिक अवसरवाद का साधन बना देने का जोखिम उत्पन्न करता है। निरंतर न्यायिक परीक्षण विधायी स्वतंत्रता और दलीय स्थिरता के बीच संतुलन पुनः स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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दृष्ट मेन्स प्रश्न: प्रश्न. दसवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘विलय’ खंड पर चर्चा कीजिये। न्यायिक निर्णयों के माध्यम से इसकी व्याख्या किस प्रकार विकसित हुई है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
यह दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985) का भाग है, जिसका उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को रोकना तथा विधायिकाओं में स्थिरता सुनिश्चित करना है।
2. दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत ‘विलय’ प्रावधान क्या है?
यह अयोग्यता से छूट की अनुमति देता है, यदि मूल राजनीतिक दल किसी अन्य दल के साथ विलय कर लेता है और कम-से-कम दो-तिहाई विधायक इसका समर्थन करते हैं।
3. एक वैध विलय के लिये ‘ट्विन टेस्ट’ क्या है?
इसके लिये (i) मूल राजनीतिक दल के विलय और (ii) विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है।
4. सर्वोच्च न्यायालय ने सुबास देसाई मामले (2023) में क्या स्पष्ट किया?
इसमें यह माना गया कि मूल राजनीतिक दल और विधायी दल अलग-अलग हैं और विधायक स्वतंत्र रूप से विलय का दावा नहीं कर सकते।
5. दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?
प्रमुख मुद्दों में विलय खंड का दुरुपयोग, अध्यक्ष का पक्षपात, निर्णयों में विलंब और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारत के संविधान की निम्नलिखित अनुसूचियों में से किसमें दल-बदल विरोधी प्रावधान हैं? (2014)
(a) दूसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) आठवीं अनुसूची
(d) दसवीं अनुसूची
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न. कुछ वर्षों से सांसदों की व्यक्तिगत भूमिका में कमी आई है जिसके फलस्वरूप नीतिगत मामलों में स्वस्थ रचनात्मक बहस प्रायः देखने को नहीं मिलती। दल परिवर्तन विरोधी कानून, जो भिन्न उद्देश्य से बनाया गया था, को कहाँ तक इसके लिये उत्तरदायी माना जा सकता है? (2013)
भारतीय राजव्यवस्था
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 2026
प्रिलिम्स के लिये: 73वाँ संवैधानिक संशोधन, पंचायती राज संस्थाएँ, मॉडल यूथ ग्राम सभा पहल, जन योजना अभियान, पंचायत NIRNAY, 15वाँ वित्त आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग (SEC), सभा सार, स्वामित्व योजना, ई-ग्राम स्वराज, राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA), सतत विकास लक्ष्य (SDGs)
मेन्स के लिये: भारत में विकेंद्रीकरण और ज़मीनी स्तर का लोकतंत्र, 73वाँ संवैधानिक संशोधन: प्रावधान और महत्त्व, ग्रामीण विकास और शासन में पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत ने 24 अप्रैल, 2026 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस (NPRD) मनाया, जो 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के लागू होने की स्मृति में मनाया जाता है। इस अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया था और यह भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में इस महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के 33 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है।
सारांश
- राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 2026 ने 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के 33 वर्ष पूरे होने को चिह्नित किया, जिसने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया और भारत में ज़मीनी स्तर के लोकतंत्र को सशक्त बनाया।
- इस व्यवस्था ने त्रि-स्तरीय संरचना और आरक्षण के माध्यम से सहभागी शासन का विस्तार किया है, लेकिन यह अब भी राजकोषीय निर्भरता, शक्तियों के कमज़ोर हस्तांतरण, क्षमता की कमी तथा समानांतर प्रशासनिक संरचनाओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस क्या है?
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह दिवस भारत में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से पंचायती राज व्यवस्था के संस्थागत रूप से स्थापित होने की स्मृति में मनाया जाता है।
- यह अधिनियम 24 अप्रैल, 1993 को प्रभावी हुआ, जिसने भारत में विकेंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति के इतिहास में एक निर्णायक क्षण को चिह्नित किया।
- प्रथम उत्सव: पहला राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में मनाया गया।
- उद्देश्य: ग्रामीण विकेंद्रीकरण की प्रगति का आकलन करना, ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित करना तथा ग्रामीण विकास में उनके उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देना।
- राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस (NPRD) 2026 की थीम: ‘सशक्त पंचायत, सर्वांगीण विकास’ है। यह थीम सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के स्थानीयकरण तथा ई-ग्राम स्वराज के माध्यम से डिजिटल शासन को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है, ताकि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के दृष्टिकोण को प्राप्त किया जा सके।
73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (1992) के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
- संविधान में संरचनात्मक परिवर्तन: 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (CAA) ने भारत की संघीय संरचना को मूल रूप से बदल दिया। इसने इसे दो-स्तरीय व्यवस्था (केंद्र और राज्य) से बहु-स्तरीय विकेंद्रीकृत ढाँचे में परिवर्तित किया तथा अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत) को व्यावहारिक रूप प्रदान किया।
- भाग IX: इसमें अनुच्छेद 243 से 243-O तक जोड़े गए, जिनमें ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की कार्यप्रणाली को स्पष्ट रूप से विस्तार से वर्णित किया गया।
- ग्यारहवीं अनुसूची: इसमें 29 कार्यात्मक विषयों (जैसे– भूमि सुधार, लघु सिंचाई, ग्रामीण विद्युतीकरण) को जोड़ा गया, जिन्हें अनुच्छेद 243G के तहत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को हस्तांतरित करने के लिये निर्धारित किया गया।
- सहभागी लोकतंत्र का संस्थानीकरण: भारत में 2.5 लाख से अधिक पंचायतें और 24.04 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। उल्लेखनीय रूप से इनमें महिलाओं की भागीदारी 49.75% है।
- ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A): इसे आधारभूत इकाई के रूप में स्थापित किया गया। निर्वाचित पंचायत के विपरीत ग्राम सभा में गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं, जिससे यह भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष और सहभागी लोकतंत्र का एकमात्र मंच बन जाती है।
- त्रि-स्तरीय संरचना (अनुच्छेद 243B एवं 243C): इसमें एक समान त्रि-स्तरीय व्यवस्था को अनिवार्य किया गया—ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर (ब्लॉक/मंडल) और ज़िला स्तर।
- जनसांख्यिकीय अपवाद: 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों को मध्यवर्ती स्तर (इंटरमीडिएट टियर) स्थापित करने से छूट दी गई है, जिससे छोटे राज्यों में अनावश्यक प्रशासनिक विस्तार को रोका जा सके।
- निर्वाचन व्यवस्था: तीनों स्तरों पर सभी सदस्यों का चयन प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से किया जाता है।
- हालाँकि, संरचनात्मक एकरूपता बनाए रखने के लिए मध्यवर्ती और ज़िला स्तर पर अध्यक्षों का चुनाव निर्वाचित सदस्यों में से अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
- जनसांख्यिकीय समानता एवं आरक्षण (अनुच्छेद 243D):
- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST): तीनों स्तरों पर पंचायत क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।
- महिला आरक्षण: सभी सीटों तथा अध्यक्ष पदों में महिलाओं के लिये न्यूनतम 33% (एक-तिहाई) आरक्षण अनिवार्य रूप से निर्धारित किया गया है।
- इसमें SC/ST के लिये आरक्षित सीटों के भीतर एक-तिहाई का उप-कोटा शामिल है।
- कार्यकाल सुरक्षा और विघटन संबंधी सुरक्षा प्रावधान (अनुच्छेद 243E): इसमें पाँच वर्ष का निश्चित और स्थिर कार्यकाल निर्धारित किया गया है।
- यदि किसी पंचायत को समयपूर्व भंग कर दिया जाता है, तो छह महीने की अवधि समाप्त होने से पहले चुनाव कराना अनिवार्य है।
- पुनर्गठित पंचायत केवल भंग की गई पंचायत के शेष बचे कार्यकाल तक ही कार्य करती है, जिससे राज्य सरकारें विघटन का उपयोग कर चुनाव चक्र को पुनः निर्धारित नहीं कर सकतीं।
- यदि शेष अवधि छह महीने से कम है, तो चुनाव अनिवार्य नहीं है।
- स्वतंत्र राज्य-स्तरीय निगरानी संस्थाओं का गठन
- राज्य निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 243K): इसे मतदाता सूचियों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण तथा पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के चुनावों के संचालन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। इसकी स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये राज्य निर्वाचन आयुक्त को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान कार्यकाल सुरक्षा प्रदान की गई है।
- राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243-I): इसे प्रत्येक पाँच वर्ष में पंचायती राज संस्थाओं (PRI) की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने, राज्य और पंचायतों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करने तथा अनुदान-सहायता निर्धारित करने का दायित्व दिया गया है, जिससे वित्तीय विकेंद्रीकरण को संस्थागत रूप दिया गया है।
पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ हैं?
राजकोषीय दमन: “निर्भरता जाल”
- निराशाजनक स्वयं के राजस्व स्रोत (OSR): भारतीय रिज़र्व बैंक की वर्ष 2024 की ‘पंचायती राज संस्थाओं के वित्त’ संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, पंचायती राज संस्थाएँ अपने कुल राजस्व का मात्र 1.1% ही स्थानीय करों एवं शुल्कों से अर्जित करती हैं।
- पंचायती राज मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति के आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि पंचायतों द्वारा प्रति व्यक्ति एकत्रित OSR का राष्ट्रीय औसत केवल ₹59 वार्षिक है, जो अत्यंत नगण्य है।
- अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता: पंचायतों के कुल राजस्व का लगभग 95% उच्चतर सरकारों से प्राप्त होता है, जिसमें लगभग 80% केंद्रीय अनुदान तथा 15% राज्य अनुदान शामिल हैं।
- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे कम OSR वाले राज्यों में यह निर्भरता 95% से भी अधिक हो जाती है।
- “बंधित निधियों” की बाध्यता: 15वें वित्त आयोग द्वारा ग्रामीण स्थानीय निकायों को पर्याप्त धनराशि आवंटित किये जाने के बावजूद, इनमें से 60% “बंधित अनुदान” हैं, जिन्हें स्वच्छता, पेयजल आदि विशिष्ट मदों पर ही व्यय करना अनिवार्य है।
- यह व्यवस्था ग्राम पंचायतों की स्थानीय एवं संदर्भ-विशिष्ट विकासात्मक प्राथमिकताओं को निर्धारित करने की स्वायत्तता को सीमित कर देती है।
- कराधान में अनिच्छा एवं अस्पष्टता: विधिक अधिकार होने के बावजूद, पंचायतें मतदाताओं के निकट होने के कारण (राजनीतिक प्रतिघात के भय से) संपत्ति कर या जल कर लगाने में संकोच करती हैं।
- इसके अतिरिक्त, राज्य कानूनों में संपत्ति मूल्यांकन, दर संशोधन तथा कराधान की परिभाषाओं के संबंध में स्पष्टता का अभाव रहता है, जो OSR संग्रहण को गंभीर रूप से बाधित करता है।
प्रशासनिक एवं कार्यात्मक क्षरण
- अपूर्ण गतिविधि मानचित्रण: राज्य सरकारें प्रायः विषयों का हस्तांतरण केवल कागज़ों पर करती हैं, जबकि वास्तविक बजटीय एवं परिचालन ढाँचे पर अपना नियंत्रण बनाए रखती हैं।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पेयजल जैसी आवश्यक सेवाएँ राज्य के संबंधित विभागों द्वारा संचालित की जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पंचायती राज संस्थाएँ इन सेवाओं पर उपयोगकर्त्ता शुल्क आरोपित नहीं कर पातीं।
- समानांतर निकायों का प्रसार: राज्य सरकारें योजनाओं (जैसे– ग्रामीण अवसंरचना परियोजनाओं) के क्रियान्वयन हेतु विशेष प्रयोजन वाहन (SPV), अर्द्ध-सरकारी निकायों अथवा लाइन-विभाग समितियों का गठन कर प्रायः पंचायती राज संस्थाओं को दरकिनार कर देती हैं।
- इससे स्थानीय शासन व्यवस्था खंडित होती है तथा ग्राम पंचायत के संवैधानिक अधिकार का क्षरण होता है।
- CPR पर संसाधनों का अभाव: वन, चरागाह भूमि तथा स्थानीय जल निकाय जैसे साझा संपत्ति संसाधन (CPR) मुख्यतः राज्य के संबंधित विभागों के नियंत्रण में रहते हैं, जिससे ग्राम पंचायतों के लिये संभावित महत्त्वपूर्ण राजस्व स्रोत सीमित हो जाता है।
संस्थागत एवं संरचनात्मक अवरोध
- निष्क्रिय राज्य वित्त आयोग (SFC): अनुच्छेद 243-I के अनुसार, राज्य एवं पंचायती राज संस्थाओं के बीच राजस्व साझेदारी को औपचारिक रूप देने हेतु प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोगों का गठन अनिवार्य है।
- हालाँकि, SFC का गठन नियमित रूप से विलंबित होता है, ये संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत सीमित रहते हैं तथा उनकी सिफारिशों को राज्य विधानमंडलों द्वारा अक्सर अस्वीकार या उपेक्षित कर दिया जाता है।
- मानव संसाधन एवं क्षमता का अभाव: पंचायती राज संस्थाएँ तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मियों (जैसे– लेखाकार, इंजीनियर) की गंभीर कमी से जूझ रही हैं।
- अत्यधिक कार्यभार से ग्रस्त पंचायत अधिकारी कर निर्धारण, स्थानिक नियोजन तथा eGramSwaraj के माध्यम से डिजिटल लेखा-परीक्षण जैसे जटिल कार्यों के लिये आवश्यक प्रशिक्षण से वंचित रहते हैं।
- सामाजिक एवं प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व: व्यापक रूप से प्रचलित “सरपंच पति” प्रवृत्ति—जिसमें निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष परिजन वास्तविक कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करते हैं—अनुच्छेद 243D के अंतर्गत 33% आरक्षण के उद्देश्य को कमज़ोर करती है तथा ज़मीनी स्तर पर वास्तविक लैंगिक सशक्तीकरण को बाधित करती है।
पंचायती राज संस्थाओं (PRI) से संबंधित भारत की पहलें
- स्वामित्व योजना (SVAMITVA): अप्रैल 2021 में प्रारंभ की गई इस योजना में ड्रोन तथा भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) का उपयोग कर आबाद ग्रामीण क्षेत्रों का मानचित्रण किया जाता है और संपत्ति कार्ड जारी किये जाते हैं।
- मार्च 2026 तक 3.29 लाख गाँवों का सर्वेक्षण पूर्ण हो चुका है तथा 2.65 करोड़ संपत्ति कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।
- सभासार: यह एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण है, जिसे भाषिणी के साथ एकीकृत किया गया है। यह ग्राम सभा बैठकों के मिनट्स को 23 क्षेत्रीय भाषाओं में स्वतः लिप्यंतरित एवं संरचित करता है। वर्तमान में इसका उपयोग 1 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों द्वारा किया जा रहा है।
- ई-ग्राम स्वराज: यह 22 भाषाओं में उपलब्ध एक पोर्टल है, जो योजना निर्माण, वित्तीय प्रबंधन तथा वास्तविक समय में भुगतान की सुविधा प्रदान करता है और यह सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली से संबद्ध है।
- ग्राम ऊर्जा स्वराज: यह एक डैशबोर्ड है, जो नवीकरणीय ऊर्जा परिसंपत्तियों की वास्तविक समय में निगरानी करता है। यह 2,080 ग्राम पंचायतों में सौर, जलविद्युत, पवन तथा बायोगैस उपयोग की स्थिति का आकलन करता है।
- मेरी पंचायत ऐप: यह NIC द्वारा विकसित एक मोबाइल शासन मंच है, जिसका उद्देश्य नागरिक सहभागिता एवं जवाबदेही को सुदृढ़ करना है। यह सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप कार्य करता है।
- राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA): यह एक योजना है, जिसका उद्देश्य सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु पंचायतों में नेतृत्व एवं शासन क्षमता का विकास करना है।
- आदर्श महिला-अनुकूल आदर्श ग्राम पंचायत (MWFGP): यह सतत विकास लक्ष्य 9 के अंतर्गत एक पहल है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक ज़िले में एक आदर्श महिला-अनुकूल आदर्श पंचायत का विकास करना है, जिसमें सुरक्षा, अधिकार एवं समावेशी शासन पर विशेष बल दिया जाता है।
- सशक्त पंचायत–नेत्री अभियान: यह एक विशेष संवादात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम है, जिसके माध्यम से लगभग 1.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को नेतृत्व, संप्रेषण एवं वार्त्ता कौशल में सुदृढ़ किया गया है।
- आदर्श युवा ग्राम सभा (MYGS): यह एक कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत जवाहर नवोदय विद्यालयों एवं एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थियों को मॉक ग्राम सभाओं के माध्यम से सहभागी लोकतंत्र की समझ विकसित कराई जाती है।
- वित्तीय अनुदानों में वृद्धि: ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिये वित्त पोषण 15वें वित्त आयोग (2021–26) के अंतर्गत ₹2.36 लाख करोड़ से बढ़कर 16वें वित्त आयोग (2026–31) के अंतर्गत लगभग ₹4.35 लाख करोड़ हो गया है।
- अनुदानों को “अबंधित” (स्थानीय आवश्यकताओं हेतु) तथा “बंधित” (जल एवं स्वच्छता जैसी मूलभूत सेवाओं हेतु) श्रेणियों में विभाजित किया गया है, ताकि स्वायत्तता एवं उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
- ग्रामीण विकास के लिये केंद्रीय बजट आवंटन में पिछले एक दशक में 211% से अधिक की वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2026–27 के लिये ₹2.73 लाख करोड़ तक पहुँच गया है।
- निधियों का सफलतापूर्वक समेकन विकसित भारत–G RAM G अधिनियम, 2025, जल जीवन मिशन तथा स्वच्छ भारत मिशन जैसी प्रमुख पहलों के साथ किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण अवसंरचना में व्यापक सुधार हो रहा है।
पंचायती राज संस्थाओं (PRI) को सशक्त बनाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- सूक्ष्म गतिविधि मानचित्रण: 11वीं अनुसूची के 29 विषयों के व्यापक और अस्पष्ट हस्तांतरण के स्थान पर सख्त एवं सूक्ष्म ‘गतिविधि मानचित्रण’ (Activity Mapping) को लागू किया जाए।
- ग्राम, प्रखंड और ज़िला स्तरों के बीच यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाए कि कौन-से विशिष्ट कार्य (जैसे– प्राथमिक विद्यालय का रख-रखाव बनाम शिक्षकों की नियुक्ति) किस स्तर के अंतर्गत आते हैं, ताकि राज्य विभागों के साथ होने वाले कार्यों के अतिव्यापन को समाप्त किया जा सके।
- समानांतर निकायों का उन्मूलन: राज्य सरकारों को उन अर्द्ध-सरकारी निकायों (Parastatals) और विशेष प्रयोजन वाहनों (SPV) को समाप्त करना चाहिये, जो ग्रामीण अवसंरचना परियोजनाओं का क्रियान्वयन करते हैं। ग्रामीण विकास से संबंधित सभी धनराशि और कार्मिकों को विशेष रूप से केवल पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के माध्यम से ही संचालित किया जाना चाहिये।
- पंचायत प्रबंधन कैडर का गठन: पंचायत विकास अधिकारियों (PDO), लेखाकारों और ग्रामीण अभियंताओं का एक समर्पित, पेशेवर कैडर स्थापित किया जाए। यह कैडर सीधे ग्राम पंचायत के प्रति उत्तरदायी हो, न कि राज्य की नौकरशाही (जैसे– ब्लॉक विकास अधिकारियों) के प्रति।
- डिजिटल एकीकरण एवं ई-गवर्नेंस: सभी पंचायत लेन-देन हेतु eGramSwaraj और पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) के एंड-टू-एंड उपयोग को अनिवार्य किया जाए। इससे रियल-टाइम ऑडिटिंग सुनिश्चित होती है, लीकेज कम होता है तथा स्थानीय वित्तीय प्रबंधन में राज्य और केंद्र का विश्वास सुदृढ़ होता है।
- संस्थागत सामाजिक अंकेक्षण: मेघालय मॉडल को अपनाते हुए एक स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण निदेशालय की स्थापना की जाए। सभी प्रमुख योजनाओं (जैसे– PMAY-G) के लिये सामाजिक अंकेक्षण प्रशिक्षित स्थानीय सुगमकर्त्ताओं द्वारा कराया जाए, जो पंचायत प्रशासन से स्वतंत्र हों।
- प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व (‘सरपंच पति’) पर नियंत्रण: निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष परिजनों द्वारा प्रॉक्सी के रूप में कार्य करने पर सख्त अयोग्यता प्रावधान लागू किये जाएँ। इसके साथ ही निर्वाचित महिलाओं तथा SC/ST प्रतिनिधियों के लिये विशेष नेतृत्व और प्रशासनिक प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
पंचायती राज संस्थाएँ भारत में ज़मीनी स्तर के लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप सहभागी और समावेशी शासन को सक्षम बनाती हैं। इन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में जवाबदेही और संवेदनशीलता को सुदृढ़ किया है, यह दर्शाते हुए कि राष्ट्रीय विकास सशक्त गाँवों पर निर्भर करता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: ‘पंचायती राज की सफलता संवैधानिक प्रावधानों की अपेक्षा अधिक विकेंद्रीकरण पर निर्भर करती है।’ समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस क्या है?
यह 24 अप्रैल को मनाया जाता है, जो 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के लागू होने की स्मृति में मनाया जाता है और विकेंद्रीकृत शासन को बढ़ावा देता है।
2. संविधान का भाग IX किससे संबंधित है?
यह पंचायती राज संस्थाओं (अनुच्छेद 243 से 243O) से संबंधित है, जिसमें उनकी संरचना, शक्तियाँ और चुनावों का प्रावधान किया गया है।
3. राज्य वित्त आयोग (SFC) की क्या भूमिका है?
अनुच्छेद 243-I के तहत प्रत्येक 5 वर्ष में गठित यह आयोग पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय विकेंद्रीकरण और अनुदानों के संबंध में अनुशंसा करता है।
4. पंचायती राज संस्थाओं की प्रमुख वित्तीय चुनौती क्या है?
इनका स्वयं का राजस्व (OSR) बहुत कम होने के कारण ये अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं (लगभग 95%)।
5. ‘सरपंच पति’ समस्या क्या है?
यह प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व को दर्शाता है, जिसमें निर्वाचित महिलाओं की ओर से उनके पुरुष परिजन सत्ता का प्रयोग करते हैं, जिससे अनुच्छेद 243D की भावना प्रभावित होती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. स्थानीय स्वशासन की सर्वोत्तम व्याख्या यह की जा सकती है कि यह एक प्रयोग है: (2017)
(a) संघवाद का
(b) लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का
(c) प्रशासकीय प्रत्यायोजन का
(d) प्रत्यक्ष लोकतंत्र का
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य क्या सुनिश्चित करना है? (2015)
- विकास में जन-भागीदारी
- राजनीतिक जवाबदेही
- लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण
- वित्तीय संग्रहण (फाइनेंशियल मोबिलाइज़ेशन)
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2 और 4
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. भारत में स्थानीय शासन के एक भाग के रूप में पंचायत प्रणाली के महत्त्व का आकलन कीजिये। विकास परियोजनाओं के वित्तीयन के लिये पंचायतें सरकारी अनुदानों के अलावा और किन स्रोतों को खोज सकती हैं? (2018)
प्रश्न 2. आपकी राय में भारत में शक्ति के विकेंद्रीकरण ने ज़मीनी स्तर पर शासन परिदृश्य को किस सीमा तक परिवर्तित किया है? (2022)

