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वामपंथी उग्रवादोत्तर भारत

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

31 मार्च, 2026 को केंद्रीय गृहमंत्री ने घोषणा की कि भारत अब माओवादी उग्रवाद से मुक्त हो चुका है, जो वर्ष 2009-10 में देश के सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा जोखिम के रूप में देखी जाने वाली परिस्थिति से एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। 

  • यह परिवर्तन संघर्ष से स्थिरता की ओर संक्रमण का संकेत देता है, जिसमें अब ध्यान पूर्व वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित क्षेत्रों में समावेशी शासन और दीर्घकालिक विकास की ओर केंद्रित हो रहा है।

भारत के LWE से सापेक्ष शांति की ओर संक्रमण का क्या महत्त्व है?

  • रणनीतिक एवं आंतरिक सुरक्षा प्रभाव:
    • राज्य की संप्रभुता की पुनर्स्थापना: इसका सबसे तात्कालिक प्रभाव बल प्रयोग पर राज्य के एकाधिकार की पुनर्स्थापना के रूप में दिखाई देता है।
      • माओवादी समानांतर सरकारों (जनताना सरकार) द्वारा संचालित तथाकथित ‘मुक्त क्षेत्र’ अब समाप्त कर दिये गए हैं, जिससे संवैधानिक अधिकार-क्षेत्र की पुनर्स्थापना हुई है।
      • यह पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के मूल उद्देश्यों को पूरा करने के लिये कार्यात्मक अवसर प्रदान करता है, जिससे राज्य की छवि एक ‘शोषणकारी संप्रभु’ से बदलकर ‘कल्याणकारी संवाहक’ के रूप में परिवर्तित होती है।
    • केंद्रीय बलों की पुनर्तैनाती: दशकों तक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की 100 से अधिक बटालियनें आंतरिक प्रति-विद्रोह अभियानों में तैनात रहीं।
      • LWE जोखिम के निष्प्रभावी होने से राज्य को अपनी रणनीति का पुनर्संतुलन करने और इन विशेषीकृत बलों को अस्थिर अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं या अन्य उभरते आंतरिक सुरक्षा क्षेत्रों में तैनात करने की संभावनाएँ बढ़ी हैं।
  • आर्थिक उन्मुक्ति एवं संसाधन एकीकरण:
    • संसाधन अभिशाप का उलटाव: बस्तर (छत्तीसगढ़) और सारंडा (झारखंड) जैसे LWE-प्रभावित क्षेत्र भारत के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण खनिज भंडार (लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट) से समृद्ध हैं। शांति बहाली के साथ ये क्षेत्र अधिक निवेश आकर्षित कर सकते हैं जिससे अवसंरचना में सुधार होगा और ये क्षेत्र मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़ सकेंगे, साथ ही सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के लिये सुरक्षा जोखिम एवं लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी।
    • क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का एकीकरण: सतत शांति स्थानीय निर्वाह-आधारित वन अर्थव्यवस्था से एक समेकित बाज़ार अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को संभव बनाती है।
    • लघु वनोपज (MFP) का लाभ उठाना: वसूली कर (माओवादी लेवी) के अभाव में राज्य लघु वनोपज (MFP) की खरीद को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर औपचारिक रूप दे सकता है, जिससे संपत्ति का प्रत्यक्ष हस्तांतरण जनजातीय परिवारों तक संभव होगा और स्थानीय कृषि-प्रसंस्करण MSME के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।
  • सामाजिक-राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव:
    • लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण: यह परिवर्तन “गोली से मतपत्र” की ओर प्रतिमान बदलाव को दर्शाता है।
      • पूर्व में अत्यधिक संवेदनशील रहे मतदान केंद्रों में मतदाता सहभागिता में वृद्धि आदिवासी आबादी के लोकतांत्रिक मुख्यधारा में पुनः एकीकरण का संकेत देती है और निर्वाचन प्रक्रिया को वैधता प्रदान करती है।
    • नागरिक अधिकारों की पुनर्स्थापना: उग्रवाद का अंत स्थानीय समुदायों को 'दोहरी मार' से मुक्ति दिलाता है—जहाँ एक तरफ उन्हें सुरक्षा बलों के अभियानों का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ माओवादी जन-अदालतों का भय बना रहता है।
      • यह विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के अंतर्गत वास्तविक संवैधानिक अधिकारों के सुदृढ़ प्रयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।
    • सामाजिक एवं विकासात्मक प्रभाव: शांतिपूर्ण परिस्थितियाँ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पुनर्बहाली, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (EMRS) की स्थापना तथा जनजातीय युवाओं के कौशल उन्नयन कार्यक्रमों (जैसे– रोशनी योजना) के प्रभावी क्रियान्वयन को संभव बनाती हैं।

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वामपंथी उग्रवादोत्तर भारत में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • प्रशासनिक शून्यता: सुरक्षा-आधारित “क्षेत्र प्रभुत्व” से नियमित शासन-व्यवस्था की ओर संक्रमण अभी भी कमज़ोर है, क्योंकि दूरस्थ एवं संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में सिविल सेवकों, शिक्षकों तथा चिकित्सकों की तैनाती के प्रति अनिच्छा बनी रहती है।
  • “डी-रिस्किंग” का विरोधाभास: उग्रवाद ने कॉर्पोरेट खनन के लिये एक हिंसक निरोधक के रूप में कार्य किया।
    • “शांति” की वापसी पूंजी के जोखिम को कम करती है, जिसके परिणामस्वरूप खनिज-समृद्ध जनजातीय क्षेत्रों में खनन-आधारित उद्योगों का तीव्र आगमन होता है।
    • यह आदिवासी समुदायों के विस्थापन को तेज़ कर सकता है और राज्य-प्रायोजित अलगाव की उन्हीं परिस्थितियों को पुनः उत्पन्न कर सकता है, जिनसे माओवादी आंदोलन का उद्भव हुआ था।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA) का नौकरशाही विघटन: FRA, 2006 वनवासियों के लिये प्रमुख आर्थिक सुरक्षा कवच है।
    • हालाँकि, सामुदायिक वन अधिकार (CFR) दावों की नौकरशाही अस्वीकृति दर अत्यंत उच्च बनी हुई है।
    • संरचनात्मक चुनौती यह है कि राज्य अब भी वनों को सामुदायिक स्वामित्व वाली आर्थिक परिसंपत्तियों के बजाय संप्रभु राजस्व-सृजन के स्रोत के रूप में देखता है।
  • शून्यता का अपराधीकरण: वैचारिक माओवादी नेतृत्व का पतन इस लाभदायक ग्रे इकोनॉमी को समाप्त नहीं करता।
    • इसके विपरीत, यह एक अनियमित शून्यता उत्पन्न करता है, जिसे शीघ्र ही गैर-राजनीतिक संगठित अपराध सिंडिकेटों, लकड़ी माफियाओं तथा स्थानीय कार्टेल द्वारा अपने नियंत्रण में लिया जा रहा है।
    • विद्रोह के बाद के इस शून्य का संगठित अपराध द्वारा शोषण रोकना आवश्यक है, ताकि राजनीतिक विद्रोह विकेंद्रीकृत कार्टेल-आधारित हिंसा में न बदल जाए।
  • न्यायिक अवरोध: हज़ारों जनजातीय युवा विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 जैसे कठोर कानूनों के अंतर्गत ज़िला कारागारों में बंद हैं, जिनमें से अनेक को अभी तक सुनवाई की तिथियाँ भी प्राप्त नहीं हुई हैं।
    • इन दूरस्थ ज़िलों की न्यायिक व्यवस्था इन उत्तर-संघर्षीय मामलों के भारी बोझ का निपटारा करने के लिये पूर्णतः सक्षम नहीं है।
    • यह विधिक अवरोध एक स्थायी रूप से वंचित और गहन असंतोष से ग्रस्त युवाओं के वर्ग का निर्माण करता है, जो भविष्य में उग्रवाद के लिये अनुकूल वातावरण बनाए रखता है।

वामपंथी उग्रवादोत्तर भारत की सफलता को सुनिश्चित करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

AIEEEE रूपरेखा

  • उपाय: केंद्र और राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से क्रियान्वित एक क्षेत्र-विशिष्ट, परिणाम-आधारित रूपांतरण योजना लागू की जाए।
    • प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने तथा केवल नीतियों की संख्या बढ़ाने से बचने के लिये AIEEEE रूपरेखा (जवाबदेही, नवाचार, साक्ष्य, समानता, समानुभूति और दक्षता) के माध्यम से विद्यमान योजनाओं के अभिसरण को प्रोत्साहित किया जाए।
  • अनुभवजन्य केस स्टडी: दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)
    • अनुप्रयोग: ज़िले ने राज्य के ज़िला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) तथा केंद्र के आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (ADP) के कोषों का समेकन कर पृथक्-पृथक् वित्तपोषण व्यवस्था को समाप्त किया।
      • लक्षित स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के लिये वास्तविक समय मोबाइल डेटा का उपयोग किया गया, समानता सुनिश्चित करने हेतु सामुदायिक वन अधिकार (CFR) को त्वरित किया गया, तथा “शिक्षा केंद्रों” की स्थापना कर सैन्य उपस्थिति की छवि को समानुभूतिपूर्ण शासन में रूपांतरित किया गया।
    • प्रभाव: संरचनात्मक अभिसरण सुनिश्चित कर प्रशासन ने छिटपुट प्रति-उग्रवाद रणनीति से हटकर पूर्वानुमेय, डेटा-आधारित और अधिकार-सम्मत शासन की ओर संक्रमण किया।
      • जवाबदेही को केवल वित्तीय व्यय के बजाय सत्यापन योग्य मानव विकास परिणामों (जैसे– मातृ मृत्यु दर में कमी) से सफलतापूर्वक जोड़ा गया।

PESA और वन अधिकार अधिनियम का कड़ाई से पालन

  • उपाय: राज्य को केवल बुनियादी भूमि अधिकार देने से आगे बढ़ना चाहिये। वर्ष 2014 की वर्जीनियस खाखा समिति की सिफारिश के अनुसार, वास्तविक जनजातीय सशक्तीकरण के लिये लघु वन उपज (MFP) पर गुणात्मक स्वामित्व प्रदान करना आवश्यक है तथा PESA अधिनियम, 1996 के तहत ग्राम सभा को स्थानीय शासन की मूलभूत और सर्वोच्च इकाई के रूप में स्थापित करना चाहिये।
  • प्रायोगिक अध्ययन: बस्तर क्रय मॉडल (छत्तीसगढ़)
    • अनुप्रयोग: बस्तर ने राज्य के एकाधिकार आधारित शोषणकारी व्यवस्था से हटकर विकेंद्रीकृत धन सृजन की प्रणाली अपनाई।
      • राज्य सरकार ने तेंदू पत्ता और महुआ जैसे महत्त्वपूर्ण वन उत्पादों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में अधिकाधिक वृद्धि की।
      • इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि उसने वन धन विकास केंद्र स्थापित किये, जिससे स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और ग्राम सभाओं को इन वन उत्पादों की स्थानीय स्तर पर खरीद तथा प्रसंस्करण का अधिकार और सशक्तीकरण मिला।
    • प्रभाव: लघु वन उपज (MFP) पर ग्राम सभा के आर्थिक अधिकार को कानूनी मान्यता देकर राज्य ने सीधे तौर पर जनजातीय परिवारों में पूंजी का हस्तांतरण किया।
      • इस संरचनात्मक परिवर्तन ने स्थानीय आबादी की माओवादी “ग्रे अर्थव्यवस्था” पर आर्थिक निर्भरता को समाप्त कर दिया और विद्रोही संगठनों की लेवी (जबरन वसूली) आधारित नेटवर्क को प्रभावी रूप से कमज़ोर कर दिया।

विकास-सुरक्षा तालमेल

  • उपाय: आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (ADP) का वामपंथी उग्रवाद (LWE) के बाद के स्थिरीकरण के साथ गहरा एकीकरण तथा पीएम-जनमन (PM-JANMAN) और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DAJGUA) जैसे जनजाति-केंद्रित मिशनों के साथ मिलकर शासन की खामियों को प्रभावी रूप से समाप्त किया जा सकता है।
    • साथ ही आदि कर्मयोगी जैसी क्षमता निर्माण पहलें ज़मीनी स्तर के प्रशासन को सुदृढ़ कर सकती हैं और पंचायत स्तर पर अंतिम छोर तक सेवाओं की बेहतर डिलीवरी सुनिश्चित कर सकती हैं।
  • प्रायोगिक अध्ययन: स्वाभिमान अंचल (मलकानगिरि, ओडिशा) में ‘सेतु’ (SETU) ढाँचा
    • अनुप्रयोग: दशकों तक, मलकानगिरि के ‘कट-ऑफ क्षेत्र’ (विच्छेदित क्षेत्र) के 151 गाँव अपनी भौगोलिक अलगाव की स्थिति के कारण माओवादियों के लिये सुरक्षित पनाहगाह बने रहे, जहाँ उनका लगभग एक प्रकार का साॅवरेन शासन स्थापित था।
      • निर्णायक मोड़ केवल गुरुप्रिय ब्रिज (गतिशील सुरक्षा) के निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके साथ ही तुरंत और समन्वित रूप से ‘सेतु’ (SETU—सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन एवं उत्थान) पहल की शुरुआत भी हुई थी।
    • प्रभाव: राज्य ने सुरक्षा प्रभुत्व को केवल विकास के व्यापक प्रसार के एक माध्यम के रूप में देखा।
      • USOF (सार्वभौमिक सेवा दायित्व कोष) द्वारा वित्तपोषित मोबाइल टावर, बस मार्ग और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गुरुप्रिय ब्रिज के माध्यम से तेज़ी से इस क्षेत्र में स्थापित किये गए।
      • बजट आवंटन के बजाय वास्तविक समय सेवा वितरण संकेतकों को ट्रैक करके राज्य ने क्षेत्र के वैचारिक अलगाव को तेज़ी से समाप्त कर दिया और यह सिद्ध किया कि अवसंरचना विद्रोह-रोधी रणनीति का सबसे प्रभावी साधन है।

स्मार्ट पुलिसिंग की ओर परिवर्तन

  • उपाय: एक विश्वसनीय राज्य को मानवीय पुलिस व्यवस्था, समय पर न्याय और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली सुनिश्चित करनी चाहिये।
    • विचाराधीन कैदियों के मामलों का त्वरित निपटारा, विशेष रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) समुदायों हेतु तथा विधिक सहायता का विस्तार न्याय व्यवस्था में विश्वास पुनर्स्थापित करने के लिये आवश्यक है।
    • नागरिक क्षेत्रों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) को धीरे-धीरे हटाया जाना चाहिये। शेष खुफिया जानकारी एकत्र करने और स्थानीय विश्वास बनाए रखने के लिये विशेषीकृत, स्थानीय रूप से भर्ती तथा सांस्कृतिक रूप से समेकित राज्य पुलिस बलों पर निर्भरता बढ़ाई जानी चाहिये।
    • “पुलिस-थाना-एक-विकास-केंद्र” मॉडल विकसित किया जाना चाहिये, जिसके अंतर्गत स्थानीय पुलिस थाना केवल प्रवर्तन इकाई न होकर शिकायत निवारण और कल्याणकारी सेवाओं के सुगमकर्त्ता के रूप में कार्य करे।
  • प्रायोगिक अध्ययन: राज्य-नेतृत्व वाले  निष्क्रियकरण ग्रिड (आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना)
    • अनुप्रयोग: CAPF बटालियनों की भारी तैनाती पर अनिश्चितकाल तक निर्भर रहने के बजाय राज्य ने अपना एक अत्यधिक विशिष्ट ढाँचा संस्थागत किया— सटीक सामरिक अभियानों के लिये ग्रेहाउंड्स और सूचना प्रभुत्व के लिये राज्य खुफिया शाखा (SIB)।
    • प्रभाव: इस मॉडल ने सिद्ध कर दिया कि एक छोटी, स्थानीय स्तर पर भर्ती की गई टुकड़ी, जो क्षेत्रीय बोली, भूभाग और जनजातीय संस्कृति में पूर्णतः दक्ष होती है, बड़ी और अलग-थलग रहने वाली केंद्रीय सेनाओं की तुलना में कहीं अधिक सशक्त होती है। 
      • जैसे ही ग्रेहाउंड्स ने बढ़ते खतरे को निष्प्रभावी किया, स्टैंडर्ड सिविक पुलिसिंग सहजता के साथ पुनः शुरू हो सकी, जो नागरिक कार्यक्रमों तथा समुदाय के विश्वास को पुनर्स्थापित करने पर केंद्रित रही—बिना सैन्य कब्ज़े के दृश्य प्रभाव के।

निष्कर्ष

भारत के वामपंथी उग्रवाद के संक्रमण का अंतिम चरण मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक दोनों है, जिसमें निरंतर विश्वास-निर्माण तथा समावेशी शासन की आवश्यकता है। विद्रोह को रोकने में सहयोगी, विकास-प्रधान परिवर्तन की ओर बढ़ना इन क्षेत्रों को संघर्ष क्षेत्रों से राष्ट्रीय विकास के अभिन्न इंजन में बदल देगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. “वामपंथी उग्रवाद का अंत किसी समाप्ति का नहीं, बल्कि शासन-संबंधी चुनौतियों की ओर एक संक्रमण का संकेत है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: भारत के LWE (नक्सलवाद) से मुक्त घोषित होने का क्या महत्त्व है?
उत्तर: यह राज्य के अधिकार की बहाली, विद्रोह में कमी और जनजातीय क्षेत्रों में शासन-प्रेरित विकास की ओर बदलाव को दर्शाता है।

प्रश्न: वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006, LWE क्षेत्रों में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर: यह भूमि और सामुदायिक वन अधिकार प्रदान करता है, जिससे जनजातीय अलगाव दूर होता है और वामपंथ में कमी आती है।

प्रश्न: LWE के बाद के शासन में PESA अधिनियम, 1996 की क्या भूमिका है?
उत्तर: यह अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त बनाता है, जिससे स्थानीय स्वशासन और जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित होती है।

प्रश्न: आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (ADP) क्या है?
उत्तर: यह NITI आयोग की एक पहल है जो पिछड़े ज़िलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे के परिणामों को बेहतर बनाने पर केंद्रित है।

प्रश्न: LWE के बाद के परिवर्तन में AIEEEE ढाँचा क्या है?
उत्तर: यह प्रभावी शासन वितरण के लिये जवाबदेही, नवाचार, साक्ष्य, समानता, सहानुभूति और दक्षता पर केंद्रित है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न. भारत के पूर्वी भाग में वामपंथी उग्रवाद के निर्धारक क्या हैं? प्रभावित क्षेत्रों में खतरों के प्रतिकारार्थ भारत सरकार, नागरिक प्रशासन एवं सुरक्षा बलों को किस सामरिकी को अपनाना चाहिये? (2020)

प्रश्न. पिछड़े क्षेत्रों में बड़े उद्योगों का विकास करने के सरकार के लगातार अभियानों का परिणाम जनजातीय जनता और किसानों, जिनको अनेक विस्थापनों का सामना करना पड़ता है, का विलगन (अलग करना) है। मल्कानगिरि और नक्सलबाड़ी पर ध्यान केंद्रित करते हुए, वामपंथी उग्रवादी विचारधारा से प्रभावित नागरिकों को सामाजिक और आर्थिक संवृद्धि की मुख्यधारा में फिर से लाने की सुधारक रणनीतियों पर चर्चा कीजिये। (2015)


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