दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

डेली न्यूज़

सामाजिक न्याय

भारत में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान संकट

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020, मूलभूत साक्षरता और न्यूमरेसी क्राइसिस, विश्व बैंक, निपुण भारत मिशन

मेन्स के लिये: भारत में शिक्षा क्षेत्र में सुधार , बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) एवं अधिगम निर्धनता, शिक्षा में शासन और जवाबदेही

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के तहत बेहतर स्कूल नामांकन और नीतिगत ज़ोर के बावजूद, जैसा कि वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER) में रेखांकित किया गया है, भारत एक गंभीर शिक्षा संकट का सामना कर रहा है। लाखों बच्चे स्कूल जा रहे हैं, लेकिन उनमें बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) का अभाव है, जो सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने में गंभीरता की कमी को दर्शाता है।

सारांश

  • प्रबल नीतिगत समर्थन (NEP, 2020, निपुण भारत) के बावजूद भारत बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) संकट का सामना कर रहा है। कमज़ोर जवाबदेही, खराब शिक्षण विधियों और ज़मीनी स्तर पर गंभीरता की कमी के कारण स्कूलों में पढ़ने वाले अनेक बच्चों में बुनियादी शिक्षा और गणना करने के कौशल का अभाव है।
  • इस संकट से निपटने के लिये बेहतर शिक्षण पद्धतियों, सामुदायिक जागरूकता और संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करने के माध्यम से ध्यान नामांकन से हटाकर अधिगम के परिणामों पर केंद्रित करने की आवश्यकता है।

भारत में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) की स्थिति क्या है?

  • परिचय: मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता (FLN) से तात्पर्य कक्षा 3 के अंत तक एक बच्चे की सार्थक रूप से सरल वाक्यों को पढ़ने और बुनियादी गणितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता से है।
    • ये प्रवेश से संबंधित महत्त्वपूर्ण कौशल हैं, जो बच्चों को उच्च कक्षाओं में सार्थक रूप से सीखने में मदद करते हैं तथा उन्हें 21वीं सदी के कौशल, जैसे– समालोचनात्मक चिंतन और समस्या-समाधान से सुसज्जित करते हैं, जो दीर्घकालिक सफलता के लिये अनिवार्य हैं।
    • भारत में FLN की स्थिति: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के तहत इसे सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किये जाने के बावज़ूद, प्राथमिक स्तर पर बच्चों का एक बड़ा अनुपात अभी भी बुनियादी अधिगम कौशल से वंचित है।
    • प्रथम फाउंडेशन द्वारा जारी वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER), 2024 के अनुसार, सरकारी स्कूलों में कक्षा 3 के उन छात्रों का अनुपात, जो कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ सकते हैं, वर्ष 2022 में 16.3% से बढ़कर 2024 में केवल 23.4% हुआ है। यह धीमी प्रगति को दर्शाता है और वर्ष 2026–27 तक सार्वभौमिक FLN प्राप्त करने में एक सतत चुनौती को उजागर करता है।
    • विश्व बैंक अधिगम निर्धनता को 10 वर्ष की आयु तक एक साधारण पाठ को पढ़ने और समझने में असमर्थता के रूप में परिभाषित करता है। भारत अधिगम निर्धनता की उच्च दर (लगभग 55%) का सामना करता है, जो कोविड-19 महामारी के कारण और अधिक गंभीर हो गई थी।
    • FLN के लिये नीतिगत ढाँचे
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020: बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) को एक मूलभूत राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्पष्ट रूप से चिह्नित करती है तथा यह अनिवार्य करती है कि प्रत्येक बच्चा कक्षा 3 के अंत तक बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान प्राप्त करे, क्योंकि इसे आगे की सभी सीखने की प्रक्रिया की पूर्वशर्त माना गया है।
    • निपुण भारत मिशन: वर्ष 2021 में विशेष रूप से शुरू किया गया, ताकि देश का प्रत्येक बच्चा 2026-27 तक कक्षा 3 के अंत तक अनिवार्य रूप से बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) प्राप्त कर सके।
    • समग्र शिक्षा अभियान: पूर्व-प्राथमिक से कक्षा 12 तक के स्कूली शिक्षा क्षेत्र के लिये एक व्यापक कार्यक्रम, जिसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है।
    • पीएम श्री (उन्नत भारत के लिये पीएम स्कूल): यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका उद्देश्य 14,500 से अधिक विद्यालयों का उन्नयन और विकास करना है, ताकि वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रदर्शित करें तथा आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित हों।
    • दीक्षा (ज्ञान साझा करने हेतु डिजिटल अवसंरचना): स्कूली शिक्षा के लिये एक राष्ट्रीय मंच, जो शिक्षकों और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण ई-सामग्री उपलब्ध कराता है।

भारत में FLN संकट के क्या कारण हैं?

  • 'प्रमुखता' का अभाव: तंत्र केवल इसलिये नहीं सुधरते क्योंकि नीतियाँ अच्छी तरह तैयार की गई हैं या धन आवंटित किया गया है। वे तब बदलते हैं जब समाज सामूहिक रूप से किसी समस्या को पहचानता है और कार्रवाई की मांग करता है—इस अवधारणा को 'सेलिएंस' (प्रमुखता) के रूप में जाना जाता है।
    • वियतनाम जैसे देश बेहतर अवसंरचना न होने के बावजूद शैक्षिक परिणामों में समृद्ध देशों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि वहाँ सीखने की प्रक्रिया को उच्च 'प्रमुखता' दी जाती है, वे वास्तव में चाहते हैं कि उनके छात्र सीखें।
    • भारत में यह सामूहिक पहचान ज़मीनी स्तर पर गंभीर रूप से कमज़ोर है।
  • ज़मीनी स्तर पर प्राथमिकताओं का भटकाव: जबकि NEP, 2020 और निपुण (NIPUN) भारत मिशन कागज़ों पर FLN (बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान) को एक तत्काल प्राथमिकता के रूप में स्थापित करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर ऐसी कोई तत्परता दिखाई नहीं देती।
    • स्कूल प्रबंधन समितियाँ और अभिभावक-शिक्षक बैठकें केवल ठोस इनपुट्स (भवन, शौचालय तथा कर्मचारियों की रिक्तियाँ) पर ही टिकी रहती हैं एवं इस संज्ञानात्मक आपदा को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देती हैं कि क्या बच्चे वास्तव में बुनियादी पाठ पढ़ या समझ पा रहे हैं।
  • कमज़ोर जवाबदेही: शिक्षा प्रणाली में शक्ति की विषमता बच्चों को आवाज़हीन और माता-पिता को मूल्यांकन उपकरणों के बिना छोड़ देती है, जबकि केंद्रीकृत नियंत्रण और सामुदायिक दबाव में कमी जवाबदेही को कमज़ोर करती है।
    • सीखने को अक्सर बच्चे या परिवार की ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, न कि एक प्रणालीगत समस्या के रूप में, जिससे शिक्षण-पद्धति, पाठ्यक्रम और संस्थागत सुधारों पर ध्यान कमज़ोर पड़ जाता है।
    • बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) के संकट को स्वीकार करना संस्थानों तथा राजनीतिक पक्षों के लिये कठिन होता है, क्योंकि यह नामांकन एवं पहुँच में पूर्व उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
  • शैक्षणिक और संरचनात्मक मुद्दे: शिक्षक समझ विकसित करने के बजाय पाठ्यक्रम पूरा करने को प्राथमिकता देते हैं, जिससे कमज़ोर छात्र पीछे छूट जाते हैं।
    • बहु-स्तरीय कक्षाएँ और अत्यधिक गैर-शैक्षणिक कार्य प्रभावी शिक्षण तथा व्यक्तिगत अधिगम को तथा कम कर देते हैं।
  • संज्ञानात्मक और भाषायी बाधाएँ: बच्चों को अक्सर मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाता है, जिससे प्रारंभिक अधिगम कठिन हो जाता है।
    • साथ ही, कुपोषण और एनीमिया संज्ञानात्मक विकास को बाधित करते हैं, जिससे ध्यान केंद्रित करने और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।
  • सामाजिक-आर्थिक असमानता (‘वर्गीय अलगाव’): भारत में बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रथम-पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं, जिन्हें घर पर शैक्षणिक सहयोग नहीं मिलता, जबकि सरकारी स्कूलों से मध्यम वर्ग के बाहर निकलने से जवाबदेही कमज़ोर होती है, जिससे व्यवस्थागत उपेक्षा बढ़ती है।

भारत में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) को मज़बूत करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • अभिभावकों के लिये अधिगम को स्पष्ट बनाना: समुदाय स्तर पर सरल और आसानी से समझ में आने वाले मानक विकसित किये जाएँ, ताकि अभिभावक अपने बच्चों की सीखने की स्थिति को परख सकें और स्कूलों तथा पंचायतों से बेहतर अधिगम परिणामों की मांग कर सकें।
  • पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय दक्षता पर ध्यान देना: शिक्षकों पर अक्सर ‘पाठ्यक्रम समाप्त करने’ का दबाव होता है।
    • ध्यान को ‘उचित स्तर पर शिक्षण’ (TaRL) की ओर स्थानांतरित करना चाहिये, ताकि बच्चे जटिल अवधारणाओं की ओर बढ़ने से पहले आधारभूत अवधारणाओं में दक्षता प्राप्त कर सकें।
    • भाषिणी जैसे उपकरणों का उपयोग उच्च-गुणवत्ता वाले शिक्षण-अधिगम सामग्री (TLMs) को अत्यंत स्थानीय बोलियों में तैयार करने के लिये किया जाना चाहिये, जिससे राज्य-निर्धारित पाठ्यक्रम और स्थानीय समझ के बीच की दूरी तुरंत कम की जा सके।
  • खेल-आधारित अधिगम की ओर संक्रमण: कठोर, पाठ्यपुस्तक-केंद्रित रटंत याददाश्त से दूर रहना आवश्यक है। जादुई पिटारा (खेल-आधारित शिक्षण सामग्री का संग्रह) जैसे संसाधनों का व्यापक स्तर पर विस्तार किया जाना चाहिये, ताकि प्रारंभिक शिक्षा को सहज और रोचक बनाया जा सके तथा भय के स्थान पर जिज्ञासा-आधारित संज्ञानात्मक विकास को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • शिक्षकों का सशक्तीकरण एवं प्रशिक्षण: शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक दायित्वों (जैसे– चुनावी कार्य) से मुक्त किया जाना चाहिये तथा उन्हें सतत एवं आधुनिक शिक्षण-प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिये।
  • सतत एवं प्रारूपिक मूल्यांकन: उच्च-दबाव वाले समेकित (समेटिव) परीक्षाओं से हटकर कम दबाव वाले, सतत प्रारूपिक मूल्यांकन को अपनाया जाए, ताकि सीखने की कमियों की समय रहते पहचान कर सुधारात्मक सहायता प्रदान की जा सके।
  • ज़मीनी स्तर पर ‘प्राथमिकता’ का सृजन: स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) और स्थानीय पंचायतों को पुनः प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, ताकि वे विद्यालयों का मूल्यांकन भवन की गुणवत्ता के बजाय FLN मानकों के आधार पर करें।
    • जब अभिभावक और पंचायत  पठन-दक्षता को एक बुनियादी अधिकार के रूप में मांगने लगते हैं, तब संस्थागत उदासीनता स्वतः समाप्त होने लगती है।

निष्कर्ष 

FLN संकट का समाधान भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का अंतिम मानक है। इस संज्ञानात्मक आधार को स्थापित किये बिना उच्च शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में किये गए सभी आगामी निवेश सबसे वंचित जनसंख्या को औपचारिक अर्थव्यवस्था में समाहित करने में विफल रहेंगे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को प्राप्त करने में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) के महत्त्व पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (FLN) क्या है?
यह कक्षा 3 तक समझदारी से पढ़ने और बुनियादी गणितीय क्रियाएँ करने की क्षमता को दर्शाता है, जो भविष्य के सभी अधिगम का आधार बनाती है।

2. निपुण भारत मिशन का उद्देश्य क्या है?
वर्ष 2026-27 तक सभी बच्चों में कक्षा 3 तक FLN सुनिश्चित करना, जो नई शिक्षा नीति, 2020 (NEP, 2020) के लक्ष्यों के अनुरूप है। 

3. विश्व बैंक के अनुसार ‘लर्निंग पॉवर्टी’ क्या है?
यह 10 वर्ष की आयु तक किसी बच्चे की सरल पाठ को पढ़ने और समझने में असमर्थता को दर्शाता है। 

4. नो डिटेंशन नीति का अधिगम परिणामों पर क्या प्रभाव पड़ा?
इससे बिना मूल्यांकन के स्वतः प्रोन्नति हुई, जिसके कारण आधारभूत कौशल प्रभावित हुए। 

5. ‘टीचिंग एट द राइट लेवल’ (TaRL) क्या है?
यह एक शिक्षण दृष्टिकोण है, जिसमें बच्चों को आयु या कक्षा के बजाय उनके अधिगम स्तर के आधार पर समूहित किया जाता है, ताकि आधारभूत कौशल में सुधार किया जा सके। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. 'उन्नत भारत अभियान' कार्यक्रम का ध्येय क्या है? (2017)

(a) स्वैच्छिक संगठनों और सरकारी शिक्षा तंत्र तथा स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग का प्रोन्नयन कर 100% साक्षरता प्राप्त करना।

(b) उच्च शिक्षा संस्थाओं को स्थानीय समुदायों से जोड़ना जिससे समुचित प्रौद्योगिकी के माध्यम से विकास की चुनौतियों का सामना किया जा सके।

(c) भारत को वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक शक्ति बनाने के लिये भारत की वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थाओं को सशक्त करना।

(d) ग्रामीण और नगरीय निर्धन व्यक्तियों के स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा के लिये विशेष निधियों का विनिधान कर मानव पूंजी विकसित करना और उनके लिये कौशल विकास कार्यक्रम तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण आयोजित करना।

उत्तर: (b)


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के अनुसार, किसी राज्य में शिक्षक के रूप में नियुक्त होने हेतु अर्ह होने के लिये किसी व्यक्ति में संबंधित राज्य अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता का होना आवश्यक है।
  2. आरटीई अधिनियम के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षण हेतु किसी अभ्यर्थी के लिये राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के दिशा-निर्देशों के अनुरूप लिये गए अध्यापक अर्हता परीक्षण में उत्तीर्ण होना आवश्यक है।
  3. भारत में 90% से अधिक अध्यापक शिक्षा संस्थान प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकारों के अधीन हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2   

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3   

(d) केवल 3

उत्तर: (b)


मेन्स 

प्रश्न. ‘व्यावसायिक शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण को सार्थक बनाने के लिये 'सीखते हुए कमाना (अर्न व्हाइल यू लर्न) की योजना को सशक्त करने की आवश्यकता है।’ टिप्पणी कीजिये। (2021) 

प्रश्न. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 धारणीय विकास लक्ष्य 4 (2030) के साथ अनुरूपता में है। उसका ध्येय भारत में शिक्षा प्रणाली की पुनःसंरचना और पुनःस्थापना है। इस कथन का समालोचनात्मक निरीक्षण कीजिये। (2020) 


close
Share Page
images-2
images-2