आपदा प्रबंधन
भारत में औद्योगिक आपदाएँ
प्रिलिम्स के लिये: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता, 2020, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), भोपाल गैस त्रासदी, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC)
मेन्स के लिये: औद्योगिक सुरक्षा एवं श्रम सुधार, भारत में आपदा प्रबंधन ढाँचा, पर्यावरणीय शासन एवं विनियामक तंत्र
चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु के विरुधुनगर स्थित एक पटाखा यूनिट में हुए विस्फोट, जिसमें कई लोगों की मृत्यु हुई, ने एक बार फिर भारत में औद्योगिक आपदाओं की आवर्ती प्रकृति को उजागर किया है। इस घटना ने सुरक्षा अनुपालन, विनियमन और उनके प्रभावी प्रवर्तन में मौजूद कमियों को उजागर किया है।
सारांश
- भारत में औद्योगिक आपदाएँ नियामकीय कमियों, अप्रभावी प्रवर्तन, अनौपचारिक श्रम प्रथाओं तथा खंडित अवसंरचना के कारण उत्पन्न होती हैं, जिससे बार-बार दुर्घटनाएँ और जनहानि होती है।
- इनके व्यापक प्रभाव होते हैं, आर्थिक (FDI में कमी, NPA में वृद्धि), सामाजिक (गरीबी का जाल, स्वास्थ्य समस्याएँ) तथा पर्यावरणीय (विषाक्तता) जो सशक्त सुरक्षा सुधारों और संस्थागत तंत्र की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
भारत में औद्योगिक आपदाओं के कारण क्या हैं?
- ‘इंस्पेक्टर राज’ की भ्रांति: ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (EoDB) बढ़ाने के लिये सरकार ने ‘इंस्पेक्टर राज’ को समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन इससे अनजाने में ‘मॉनिटरिंग वैक्यूम/निगरानी शून्य’ की स्थिति उत्पन्न हो गई।
- कई औद्योगिक राज्यों में 40% से अधिक फैक्ट्री निरीक्षकों के पद रिक्त हैं। अक्सर एक निरीक्षक को हज़ारों इकाइयों की ज़िम्मेदारी सँभालनी पड़ती है, जिससे भौतिक सत्यापन गणितीय रूप से लगभग असंभव हो जाता है।
- भारत में खतरनाक उद्योगों का विनियमन अनेक कानूनों और नियमों में विस्तृत है, जिनके अधिकार-क्षेत्र एक-दूसरे से ओवरलैप करते हैं और कोई एकीकृत रासायनिक सुरक्षा प्राधिकरण नहीं है। इसके परिणामस्वरूप निगरानी प्रभावित रहती है, मानकों में असंगति बनी रहती है और उच्च-जोखिम वाली इकाइयाँ पुराने या अनुपस्थित अनुमोदनों के साथ संचालित होती रहती हैं।
- स्व-प्रमाणीकरण की खामी: ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को प्रोत्साहन प्रदान करने के नाम पर व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता, 2020 में तृतीय-पक्ष ऑडिट और स्व-प्रमाणीकरण को प्रोत्साहित किया गया है।
- अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी MSME क्षेत्र में यह विनियमन-शिथिलीकरण एक निगरानी शून्य उत्पन्न करता है, जहाँ सुरक्षा प्रोटोकॉल को आसानी से फर्ज़ी रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
- स्थानीय राजनीतिक प्रभाव अक्सर नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों को संरक्षण प्रदान करता है। गंभीर सुरक्षा उल्लंघनों के लिये चिह्नित फैक्ट्रियाँ अक्सर नए शेल नामों के तहत पुनः संचालन शुरू कर देती हैं, जिससे पूर्ण दायित्व के सिद्धांत को दरकिनार किया जाता है।
- पूर्ण दायित्व का सिद्धांत, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987, ओलियम गैस रिसाव मामले) में स्थापित किया, उन उद्यमों को पूरी तरह से उत्तरदायी मानता है जो खतरनाक या स्वाभाविक रूप से खतरनाक गतिविधियों में संलग्न हैं, किसी भी हानि के लिये मुआवज़ा देने के लिये, बिना किसी अपवाद के।
- उच्च-जोखिम क्षेत्रों में अकुशल श्रम: रासायनिक टैंकों की सफाई या बॉयलर संचालन जैसे उच्च-जोखिम वाले कार्यों का लगभग 50-70% हिस्सा दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले संविदाकारों को सौंप दिया जाता है।
- इन श्रमिकों को कभी भी मटेरियल सेफ्टी डेटा शीट (MSDS) के संबंध में जानकारी नहीं दी जाती। वे वस्तुतः “मानव सेंसर” की तरह होते हैं; उनकी चोट या मृत्यु ही अक्सर वह पहला ‘अलार्म’ होती है जिसे व्यवस्था पहचानती है।
- चूँकि वे औपचारिक कर्मचारी सूची में शामिल नहीं होते, इसलिये कंपनियाँ प्रायः ‘एक्स-ग्रेशिया’ भुगतान के माध्यम से मामलों का निपटारा कर पूर्ण दायित्व के सिद्धांत से बच जाती हैं और सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम, 1991 के तहत न्यायिक जाँच को दरकिनार कर देती हैं।
- बफर ज़ोन का समाप्त होना: नोएडा और मानेसर जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में अनियोजित शहरी अतिक्रमण के कारण खतरनाक कारखानों और आवासीय क्षेत्रों के बीच आवश्यक स्थानिक बफर ज़ोन समाप्त हो गए हैं।
- एक स्थानीय अग्नि तुरंत एक विशाल सामुदायिक आपदा में बदल जाती है।
- पुरानी ‘ब्राउनफील्ड’ परिसंपत्तियाँ: अधिकांश रासायनिक और विनिर्माण रिसाव पुराने संयंत्रों में होते हैं।
- प्रबंधन इन पुरानी सुविधाओं को आधुनिक प्रेशर सेंसर या स्वचालित फेल-सेफ तंत्र से उन्नत करने को ‘निष्प्रभावी निवेश’ (डेड इंवेस्टमेंट) मानता है और इसके बजाय उपकरणों को घातक क्षय की स्थिति की सीमा तक चलाना अधिक उचित समझता है।
- आपूर्ति शृंखला में अस्थिरता: पश्चिम एशिया ऊर्जा संकट जैसे वैश्विक आघात कच्चे माल की गुणवत्ता और उपलब्धता में गंभीर उतार-चढ़ाव उत्पन्न करते हैं।
- उत्पादन लाइनों को बनाए रखने के लिये कारखाने अक्सर अप्रमाणित रसायनों का उपयोग करते हैं या मानक स्थिरीकरण अवधि को दरकिनार कर देते हैं, जिससे उपकरणों में अस्थिर विफलताएँ उत्पन्न होती हैं।
औद्योगिक आपदाओं के क्या प्रभाव हैं?
- समष्टि-आर्थिक और भू-राजनीतिक निहितार्थ:
- “चीन प्लस वन” की विफलता: कठोर पर्यावरण, सामाजिक और शासन संबंधी अनुपालन से प्रेरित वैश्विक पूंजी ऐसे देश में प्रवाहित नहीं होती, जिसे नियामकीय अराजकता वाला माना जाता है।
- बार-बार होने वाली आपदाएँ उच्च-मूल्य वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को, विशेषकर सेमीकंडक्टर और विशेष रसायन क्षेत्रों में, हतोत्साहित करती हैं।
- “मृत परिसंपत्ति” का बोझ: आपदाएँ पूंजी-गहन ब्राउनफील्ड परियोजनाओं को एक ही आघात में फँसी हुई परिसंपत्तियों में बदल देती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर ऋण चूक होती है और अंततः घरेलू बैंकिंग क्षेत्र पर दबाव बढ़ता है, जिससे गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ बढ़ती हैं।
- “चीन प्लस वन” की विफलता: कठोर पर्यावरण, सामाजिक और शासन संबंधी अनुपालन से प्रेरित वैश्विक पूंजी ऐसे देश में प्रवाहित नहीं होती, जिसे नियामकीय अराजकता वाला माना जाता है।
- शासन और आंतरिक सुरक्षा:
- राज्य की वैधता का क्षरण: जब राज्य सुरक्षा मानकों को लागू करने या पर्याप्त मुआवज़ा सुनिश्चित करने में विफल रहता है (जैसा कि भोपाल गैस त्रासदी से संबंधित दीर्घकालिक मुकदमों में देखा गया), तो यह गहरा अविश्वास उत्पन्न करता है और स्थानीय प्रशासन पर कॉर्पोरेट हितों के प्रभाव को उजागर करता है।
- नागरिक अशांति और उग्रवाद: औद्योगिक लापरवाही सीधे जन-आक्रोश को बढ़ावा देती है।
- जैसा कि तूतीकोरिन (स्टरलाइट) विरोध प्रदर्शनों (2018) में देखा गया, स्थानीय पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी शिकायतें शीघ्र ही व्यापक नागरिक अशांति में परिवर्तित हो सकती हैं।
- बार-बार होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाएँ उद्योग और राज्य दोनों के प्रति विश्वास को कम करती हैं, दीर्घकालिक विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देती हैं तथा विकास और सुरक्षा के बीच संघर्ष को तीव्र करती हैं।
- सामाजिक-जनसांख्यिकीय निहितार्थ:
- “गरीबी का जाल”: चूँकि 50-70% खतरनाक कार्य दैनिक वेतनभोगी या संविदा श्रमिकों द्वारा किया जाता है, इसलिये किसी आपदा की स्थिति में अक्सर हाशिये पर स्थित परिवार का एकमात्र आजीविका कमाने वाला व्यक्ति समाप्त हो जाता है।
- पीढ़ीगत स्वास्थ्य घाटा: रासायनिक और विकिरणीय आपदाएँ आसपास की जनसंख्या में जन्मजात विकृतियों, दीर्घकालिक श्वसन रोगों तथा औसत आयु में कमी की विरासत छोड़ जाती हैं।
- इस प्रकार, यह स्थानीय जनसांख्यिकीय लाभांश को जनसांख्यिकीय दायित्व में परिवर्तित कर देता है।
- पारिस्थितिक और पर्यावरणीय निहितार्थ:
- अपरिवर्तनीय संसाधन विषाक्तता: वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOC) या भारी धातुओं का रिसाव भूजल भंडारों तथा स्थानीय मृदा को स्थायी रूप से प्रदूषित कर देता है।
- यह आसपास के क्षेत्र की कृषि योग्य क्षमता को नष्ट कर देता है और लोगों को विवश होकर पलायन करने पर मजबूर करता है।
- “नेटेक” (Natech) गुणक प्रभाव: औद्योगिक आपदाएँ प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को और अधिक बढ़ा देती हैं।
- यदि कोई चक्रवात अनियंत्रित तटीय रासायनिक क्षेत्र से टकराता है, तो उससे उत्पन्न विषाक्त रिसाव समुद्री जैव विविधता को नष्ट कर देता है और स्थानीय मत्स्यजीवी समुदायों की आजीविका को दशकों तक प्रभावित करता है।
- भारत में औद्योगिक दुर्घटनाओं (2010–2020) पर एक दशक-दीर्घ अध्ययन में 560 ऐसी घटनाएँ दर्ज की गईं, जिन्होंने पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाई। इनमें वायु और जल प्रदूषण सबसे सामान्य प्रभाव रहे तथा कई मामलों के कम दर्ज होने की संभावना भी व्यक्त की गई।
- भोपाल त्रासदी के परिणामस्वरूप पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा खतरनाक रसायनों से संबंधित नियम बनाए गए, जबकि विशाखापट्टनम स्टाइरीन रिसाव जैसी घटनाओं ने कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने, बेहतर डेटा तंत्र विकसित करने तथा श्रम, प्रदूषण और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के बीच समन्वय सुधारने की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया है।
- अपरिवर्तनीय संसाधन विषाक्तता: वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOC) या भारी धातुओं का रिसाव भूजल भंडारों तथा स्थानीय मृदा को स्थायी रूप से प्रदूषित कर देता है।
रासायनिक/औद्योगिक आपदाओं के विरुद्ध विधिक संरक्षण
- व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियाँ संहिता, 2020: यह 13 विभिन्न श्रम कानूनों का एकीकरण करती है ताकि अनुपालन को सरल बनाया जा सके तथा प्रतिष्ठानों में द्विपक्षीय सुरक्षा समितियों के गठन को अनिवार्य करती है।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (EPA), 1986: यह केंद्र सरकार को उत्सर्जन और अपशिष्ट निर्वहन के मानक निर्धारित करने, औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण करने तथा पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम हेतु आवश्यक उपाय करने का अधिकार प्रदान करता है।
- लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991: यह खतरनाक पदार्थों से संबंधित उद्योगों के लिये बीमा लेना अनिवार्य करता है, ताकि औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों को त्वरित राहत प्रदान की जा सके।
- खतरनाक रसायनों के निर्माण, भंडारण और आयात (MSIHC) नियम, 1989: यह उद्योगों को प्रमुख दुर्घटना जोखिमों की पहचान करने, स्थल-आधारित आपातकालीन योजनाएँ तैयार करने तथा संबंधित प्राधिकरणों को सूचना देने के लिये बाध्य करता है।
- रसायन दुर्घटनाओं (आपातकालीन योजना, तैयारी और प्रतिक्रिया) (CAEPPR) नियम, 1996: रासायनिक आपात स्थितियों से निपटने के लिये राष्ट्र, राज्य और स्थानीय स्तरों पर संकटकारी समूहों की स्थापना का निर्देश देता है।
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: सक्रिय आपदा रोकथाम, शमन और प्रतिक्रिया के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें NDMA के विशेष दिशानिर्देश शामिल हैं।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) अधिनियम, 2010: पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरणीय क्षति के लिये मुआवज़ा और पीड़ितों के पुनर्वास हेतु त्वरित कानूनी कार्रवाई की सुविधा प्रदान करता है।
- भोपाल गैस रिसाव त्रासदी (दावों का प्रसंस्करण) अधिनियम, 1985: त्वरित और न्यायसंगत मुआवज़ा सुनिश्चित करने के लिये सरकार को पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम बनाया।
औद्योगिक आपदाओं को रोकने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- राष्ट्रीय औद्योगिक सुरक्षा प्राधिकरण (NISA) की स्थापना: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की तर्ज़ पर एक स्वतंत्र, वैधानिक नियामक निकाय बनाया जाए, जो औद्योगिक सुरक्षा प्रवर्तन को श्रम मंत्रालय से अलग रखे।
- राष्ट्रीय रासायनिक/औद्योगिक सुरक्षा ढाँचा तैयार करना (कारखाना अधिनियम, EPA, NDMA दिशानिर्देशों को एकीकृत करते हुए), जिसमें प्रमुख खतरनाक उद्योगों का डेटा, अधिक निरीक्षक और उल्लंघनों के लिये सख्त, निश्चित दंड शामिल हैं।
- AI-आधारित प्रिडिक्टिव मेंटेनेंस को अनिवार्य बनाना: उच्च जोखिम वाली प्रमुख एक्सीडेंट हैजार्ड (MAH) यूनिट के लिये इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर एकीकृत करना अनिवार्य हो, जो दाब और ताप का डेटा सीधे केंद्रीय सर्वरों को भेजे, जिससे स्थानीय प्रबंधन द्वारा छोटी घटनाओं को छिपाने की क्षमता समाप्त हो जाए।
- बीमा-आधारित सुरक्षा स्कोर लागू करना: कॉर्पोरेट बीमा प्रीमियम और विद्युत शुल्क को सीधे वास्तविक समय के सुरक्षा ऑडिट स्कोर से जोड़ा जाए, जिससे सुरक्षा को प्रभावी रूप से एक वित्तीय अनिवार्यता बना दिया जाए।
- संचयी प्रभाव आकलन लागू करना: उन औद्योगिक समूहों में नए परमिट जारी करने पर रोक लगाई जाए जो अपनी वहन क्षमता तक पहुँच चुके हैं, ताकि एक ही भौगोलिक क्षेत्र में खतरनाक सामग्रियों के अत्यधिक जमाव को रोका जा सके।
- आपातकालीन योजनाएँ: यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी प्रमुख एक्सीडेंट हैजार्ड (MAH) यूनिट के पास डिस्ट्रिक्ट सिस्टम के साथ एकीकृत परीक्षित आपातकालीन योजनाएँ हों, साथ ही स्पष्ट चेतावनी, निकासी प्रोटोकॉल और नियमित सामुदायिक ड्रिल एवं सूचनाओं का प्रकटीकरण सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष
भारत औद्योगिक विकास के लिये "ट्रायल एंड एरर" की प्रयोगशाला बनने का जोखिम नहीं उठा सकता। "भोपाल से विरुधुनगर" तक के सफर में जो मानवीय कीमत चुकाई गई है, वह यह सिद्ध करती है कि प्रशासनिक शक्ति के बगैर विधायी मंशा केवल आपदा का मार्ग प्रशस्त करती है। “व्यवसाय करने की वास्तविक सुगमता” में "सुरक्षा की निश्चितता" अनिवार्य रूप से शामिल होनी चाहिये।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "व्यापार करने में सुगमता से सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिये।" भारत में हुई औद्योगिक आपदाओं के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. OSH कोड, 2020 क्या है?
यह 13 श्रम कानूनों को समेकित करता है और प्रतिष्ठानों में सुरक्षा मानकों, कार्य स्थितियों और सुरक्षा समितियों को अनिवार्य बनाता है।
2. पूर्ण उत्तरदायित्व का सिद्धांत क्या है?
एम.सी. मेहता मामले में विकसित यह सिद्धांत खतरनाक गतिविधियों में शामिल उद्योगों को बिना किसी अपवाद के होने वाले नुकसान से उत्तरदायी ठहराता है।
3. सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 की क्या भूमिका है?
यह खतरनाक उद्योगों द्वारा अनिवार्य बीमा के माध्यम से औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत सुनिश्चित करता है।
4. "नेटेक" (Natech) डिजास्टर क्या हैं?
ये वे आपदाएँ हैं, जहाँ प्राकृतिक खतरे (जैसे– चक्रवात) औद्योगिक दुर्घटनाओं को जन्म देते हैं, जिससे पर्यावरणीय क्षति और अधिक गंभीर हो जाती है।
5. भारत में औद्योगिक आपदाएँ क्यों बनी रहती हैं?
नियामक संबंधी कमियों, निरीक्षकों की कमी, स्व-प्रमाणन की खामियों, अनौपचारिक श्रम और खराब प्रवर्तन के कारण।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. भारत में, क्यों कुछ परमाणु रिएक्टर "आईएईए सुरक्षा उपायों" के अधीन रखे जाते हैं जबकि अन्य इस सुरक्षा के अधीन नहीं रखे जाते? (2020)
(a) कुछ यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य थोरियम का
(b) कुछ आयातित यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य घरेलू आपूर्ति का
(c) कुछ विदेशी उद्यमों द्वारा संचालित होते हैं और अन्य घरेलू उद्यमों द्वारा
(d) कुछ सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं और अन्य निजी स्वामित्व वाले
उत्तर: (b)
मेन्स:
प्रश्न 1. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिये। (2018)
