मुख्य परीक्षा
भारत का तापीय संकट और विधि का अभाव
चर्चा में क्यों?
भारत में भीषण गर्मी/हीटवेव की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है, जहाँ अब 57% से अधिक ज़िले गर्मी की चपेट में आने वाले के रूप में वर्गीकृत किये गए हैं। नीति विशेषज्ञों का कहना है कि एक मज़बूत कानूनी और नीतिगत ढाँचे के अभाव के कारण अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों की संवेदनशीलता और बढ़ रही है, जिससे लू एक प्रणालीगत सामाजिक-आर्थिक और मानवाधिकार संकट में बदल गई है।
भारत में अत्यधिक गर्मी "तापीय अन्याय" कैसे उत्पन्न करती है?
- जनसांख्यिकीय विभाजन: वर्ष 2025 के ज़िला-स्तरीय मूल्यांकन से पता चलता है कि 57% ज़िले, जिनमें 76% आबादी निवास करती है, अत्यधिक गर्मी के 'उच्च से बहुत उच्च' जोखिम का सामना कर रहे हैं। यह इसके व्यापक प्रभाव और विस्तार को दर्शाता है।
- शहरी क्षेत्रों में, 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव घनी आबादी वाले मोहल्लों में तापमान को और अधिक बढ़ा देता है। यह तापीय अन्याय की स्थिति उत्पन्न करता है, जहाँ गर्मी का बोझ गरीबी, भीड़भाड़, कमज़ोर बुनियादी ढाँचे और अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाओं के कारण कमज़ोर आबादी पर असमान रूप से पड़ता है। इसके प्रभाव वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर स्पष्ट रूप से विभाजित हैं।
- ठंडक का अधिकार: ठंडक तक पहुँच अत्यधिक असमान बनी हुई है। जहाँ संपन्न परिवार एयर कंडीशनिंग (AC), इंसुलेटेड हाउसिंग (ऊष्मारोधी आवास), बैकअप पावर (इनवर्टर/जेनरेटर) और निजी वाहनों पर निर्भर हैं, वहीं गरीब परिवार पंखों, छाया तथा अपर्याप्त सार्वजनिक कूलिंग बुनियादी ढाँचे जैसे सीमित विकल्पों पर निर्भर हैं।
- यह उभरते हुए “शीतलन के अधिकार” को रेखांकित करता है, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि तापीय सुरक्षा निजी क्रय शक्ति पर निर्भर नहीं होनी चाहिये।
- शीतलन स्वायत्तता का अभाव: लगभग 40 करोड़ से 49 करोड़ अनौपचारिक श्रमिक (जैसे– निर्माण श्रमिक, डिलीवरी पार्टनर और रेहड़ी-पटरी वाले) "शून्य शीतलन स्वायत्तता" की स्थिति में हैं।
- असंगठित श्रमिकों के लिये अत्यधिक गर्मी में काम करना केवल असुविधा नहीं है, यह जीवन के अधिकार का एक प्रणालीगत उल्लंघन दर्शाता है।
- निर्माण श्रमिकों को भारी शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है, जिसे स्टील और कंक्रीट से उत्पन्न विकिरणीय गर्मी और भी घातक बना देती है।
- इसी प्रकार सफाईकर्मी और कचरा बीनने वाले बिना सुरक्षात्मक उपकरणों के गर्म कचरे को सँभालते हैं, जिससे उन्हें गंभीर शारीरिक जलन का सामना करना पड़ता है।
- वे अत्यधिक बाहरी गर्मी और ज़हरीले धुएँ (toxic fumes) द्वारा निर्मित खतरनाक सूक्ष्म-जलवायु में काम करते हैं, जहाँ तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में 5% तक अधिक हो सकता है।
- अस्तित्व की दुविधा: अध्ययनों से पता चलता है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी उत्पादकता में भारी गिरावट और उसके परिणामस्वरूप आय की हानि का कारण बनती है। यह स्थिति श्रमिकों को नियमित रूप से जैविक अस्तित्व और आर्थिक अस्तित्व के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करती है।
- रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं पर दोहरा असर पड़ता है—एक तरफ उनकी सेहत तेज़ी से बिगड़ती है, और दूसरी तरफ उनकी रोज़ की कमाई कम हो जाती है, क्योंकि भीषण गर्मी में सामान जल्दी खराब हो जाता है और दोपहर के समय सड़कों पर भीड़ कम हो जाती है, लोग धूप से बचने के लिये बाहर निकलने के बजाय घरों या दफ्तरों में रहना पसंद करते हैं।
- वर्ष 2024 में, भारत ने अत्यधिक गर्मी के कारण 247 अरब श्रम घंटे और लगभग 194 अरब अमेरिकी डॉलर की आय खो दी। यह स्थिति उन श्रमिकों के लिए एक तत्काल आय का झटका (income shock) बन गई जिनके पास बिना वेतन के अवकाश (paid leave) या सामाजिक सुरक्षा (social security) का कोई प्रावधान नहीं है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा: बढ़ती हीटवेव के संपर्क से बीमारियों और मृत्यु का जोखिम बढ़ता है, जिससे स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव पड़ता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बुज़ुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है।
- हालाँकि संदिग्ध हीटस्ट्रोक मामलों और पुष्टि किये गए मृत्यु मामलों के बीच का अंतर कम आकलन एवं कमज़ोर निगरानी प्रणाली की ओर संकेत करता है। यह केवल इस अन्याय को नहीं दर्शाता कि सबसे पहले कौन प्रभावित होता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि किन लोगों की पीड़ा दर्ज ही नहीं होती और उस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
भारत शीतलन कार्ययोजना (ICAP)
- परिचय: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा 2019 में शुरू किया गया इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) भारत को दुनिया का पहला देश बनाता है जिसने सभी क्षेत्रों में शीतलन आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिये एक व्यापक राष्ट्रीय नीति दस्तावेज़ विकसित किया।
- शीतलन की मांग 2037-38 तक आठ गुना बढ़ने का अनुमान है। ICAP वर्ष 2017-18 से 2037-38 तक की 20-वर्षीय दृष्टि प्रदान करता है, ताकि सतत शीतलन की दिशा में परिवर्तन किया जा सके और तापीय आराम की विकासात्मक आवश्यकता के साथ-साथ पृथ्वी को गर्म करने वाले रेफ्रिजरेंट्स को चरणबद्ध तरीके से कम करने के पर्यावरणीय दायित्व को भी संबोधित किया जा सके।
- उद्देश्य: ICAP का लक्ष्य विभिन्न क्षेत्रों में शीतलन की मांग को कम करना, ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) और इको-निवास संहिता जैसे मानकों के माध्यम से भवनों में निष्क्रिय शीतलन को बढ़ावा देना तथा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन के अनुरूप कम ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) वाले रेफ्रिजरेंट्स की ओर संक्रमण को तेज़ करना है।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के तहत भारत 2032 से चार चरणों में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को कम करेगा, जिसमें वर्ष 2032 तक 10% वर्ष 2037 तक 20%, 2042 तक 30% और 2047 तक 85% की संचयी कमी का लक्ष्य है।
- ICAP के मुख्य लक्ष्य: ICAP ने वर्ष 2017-18 को आधार वर्ष मानते हुए स्पष्ट और मापनीय लक्ष्य निर्धारित किये हैं:
- शीतलन मांग में कमी: विभिन्न क्षेत्रों में कुल शीतलन मांग को 20% से 25% तक घटाना।
- ऊर्जा आवश्यकता में कमी: शीतलन के लिये आवश्यक ऊर्जा को 25% से 40% तक कम करना।
- रेफ्रिजरेंट की मांग में कमी: रेफ्रिजरेंट्स की मांग को 25% से 30% तक कम करना।
तापीय संकट/हीट क्राइसिस से निपटने में कानूनी और नीतिगत कमियाँ क्या हैं?
- आपदा ढाँचे से बहिष्कार: बाढ़ या चक्रवातों के विपरीत लू को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत "अधिसूचित आपदा" के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
- यह एक राजकोषीय बाधा उत्पन्न करता है जहाँ राज्य "10% राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) सीमा" तक सीमित हैं, जिससे लू से राहत के लिये केवल एक छोटा-सा हिस्सा आवंटित किया जा सकता है, साथ ही राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) तक पहुँच अवरुद्ध हो जाती है, जिससे बड़े पैमाने पर शमन प्रयास सीमित हो जाते हैं।
- अपर्याप्त और पुराने श्रम कानून: कारखाना अधिनियम, 1948 केवल इनडोर श्रमिकों (घर के अंदर काम करने वाले श्रमिक) के लिये सुरक्षा प्रदान करता है, जो कृषि और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में बाहर काम करने वाले लाखों लोगों को पूरी तरह से अनदेखा करता है।
- व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा (OSHWC) संहिता, 2020 तापीय सुरक्षा मानकों को अनिवार्य न बनाकर ढाँचे को और कमज़ोर करती है, इसे सरकार के विवेक पर छोड़ देती है बिना नियोक्ताओं के लिये प्रवर्तनीय दायित्व स्थापित किये।
- टूथलेस हीट एक्शन प्लान (HAP): हालाँकि कई राज्यों ने हीट एक्शन प्लान तैयार किये हैं, ये बड़े पैमाने पर सलाहकार बने हुए हैं, जो प्रवर्तनीय कार्रवाई के बजाय चेतावनियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- इन योजनाओं में कानूनी समर्थन, समर्पित वित्त पोषण और कार्यान्वयन तंत्र का अभाव है, जो कूलिंग शेल्टर जैसे बुनियादी ढाँचे के निर्माण या सार्वजनिक जल तक पहुँच को सुनिश्चित करने में उनकी प्रभावशीलता को सीमित करता है।
- मज़दूरी संबंधी मुआवज़े का अभाव: अनौपचारिक श्रमिक हीट अलर्ट के दौरान बिना किसी मुआवज़ा तंत्र के अपनी आय खो देते हैं, जिससे उन्हें स्वास्थ्य और आजीविका के बीच चयन करने के लिये मजबूर होना पड़ता है।
- गिग इकॉनमी ब्लाइंड स्पॉट: गिग श्रमिक (विशेष रूप से डिलीवरी पार्टनर) अत्यधिक गर्मी के दौरान भी डिलीवरी समय-सीमा को पूरा करने के लिये एल्गोरिद्म-संचालित दबाव का सामना करते हैं, जिसमें जुर्माना माफी, वेतन का खतरा या अनिवार्य रेस्ट टाइम जैसे कोई कानूनी सुरक्षा उपाय नहीं होते हैं, जिससे उनकी भेद्यता बढ़ जाती है।
- त्रुटिपूर्ण माप मैट्रिक्स: भारत का वर्तमान लू वर्गीकरण मुख्य रूप से शुष्क-बल्ब तापमान पर निर्भर करता है, आर्द्रता को अनदेखा करता है।
- यह एक अंतर उत्पन्न करता है जहाँ उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्र आधिकारिक लू प्रतिक्रियाओं को ट्रिगर किये बगैर गंभीर गर्मी का सामना करते हैं।
हीटवेव के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें: हीटवेव
अत्यधिक हीट से निपटने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा के रूप में अधिसूचित करना: सरकार को वर्ष 2026-31 के लिये अधिसूचित राष्ट्रीय आपदा सूची में हीटवेव और तड़ित/आकाशीय बिजली को शामिल करने की 16वें वित्त आयोग की सिफारिश को औपचारिक रूप से स्वीकार करना चाहिये।
- इससे NDRF खुल जाएगा और शुरुआती चेतावनियाँ ज़िला प्रशासन के लिये बाध्यकारी आदेशों में परिवर्तित हो जाएंगी।
- हीट इंडेक्स में परिवर्तन: श्रम मंत्रालय और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) को हीटवेव घोषित करने के लिये प्राथमिक कानूनी ट्रिगर के रूप में हीट इंडेक्स (तापमान और सापेक्ष आर्द्रता को मिलाने वाला मीट्रिक) का उपयोग करना चाहिये, जिससे तटीय क्षेत्रों को पर्याप्त रूप से संरक्षित किया जा सके।
- बाध्यकारी सुरक्षा नियम लागू करना: OSHWC संहिता की धारा 23 के तहत सरकार को संरक्षित वर्क-रेस्ट सायकल को अनिवार्य करना चाहिये और विशेष व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE), जैसे– इंसुलेटेड फ्लास्क का प्रावधान कर एक गैर-परक्राम्य नियोक्ता दायित्व अपनाना चाहिये।
- गिग इकॉनमी को संरक्षित करना: डिजिटल प्लेटफॉर्मों को कानूनी रूप से हीट अलर्ट के दौरान गिग श्रमिकों पर डिलीवरी टाइम पेनल्टी लगाने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिये, इससे उनके 'कॉन्ट्रैक्ट वर्क' होने की स्थिति भले ही कुछ हो, वैधानिक ताप सुरक्षा कवच सुनिश्चित होगा।
- 'राइट टू कूल' को मान्यता देना: एम.के. रणजीतसिंह एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2024) के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षा अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।
- 'राइट टू कूल' की अवधारणा के तहत शहरी स्थानीय निकायों को जीवन के अधिकार के रूप में कूलिंग शेल्टर और मुफ्त सार्वजनिक जल सुविधाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी।
- वित्तीय मुआवज़ा प्रदान करना: सरकार को अत्यधिक गर्मी वाले दिनों में खोई हुई आय को कवर करने के लिये वित्तीय मुआवज़े का प्रावधान करना चाहिये।
- नवीन मॉडल, जैसे– स्व-रोज़गार महिला संघ (सेवा) द्वारा पैरामीट्रिक हीट इंश्योरेंस योजना इस परिवर्तन के लिये एक ब्लूप्रिंट के रूप में काम कर सकते हैं।
हीट इंडेक्स
- हीट इंडेक्स "महसूस होने वाला" तापमान है, जिसकी गणना हवा के तापमान और सापेक्ष आर्द्रता को मिलाकर की जाती है।
- उच्च आर्द्रता पसीने के वाष्पीकरण को कम करती है, जिससे शरीर वास्तविक तापमान से अधिक गर्म महसूस करता है, जबकि कम आर्द्रता तेज़ी से ठंडक की अनुमति देती है, जिससे यह ठंडा महसूस होता है।
- जैसे-जैसे तापमान और आर्द्रता बढ़ती है, हीट इंडेक्स बढ़ता है, जिससे हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गर्मी से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
निष्कर्ष
जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तेज़ होता है, भारत को अपने आपदा प्रबंधन दृष्टिकोण को केवल मृत्यु दर की रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करने से बदलकर आजीविका संरक्षण सुनिश्चित करने की ओर स्थानांतरित करना चाहिये। विधायी शून्यता को पाटने के लिये गर्मी को श्रम अधिकार और संवैधानिक मुद्दे के रूप में मानने की आवश्यकता है, जहाँ तापीय सुरक्षा सामाजिक अनुबंध का एक गैर-परक्राम्य घटक बन जाती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत में हीटवेव अब केवल पर्यावरणीय घटनाएँ नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संकट बन गई हैं।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वर्तमान आपदा कानूनों के तहत हीटवेव का प्रभावी ढंग से प्रबंधन क्यों नहीं किया जाता है?
हीटवेव को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत अधिसूचित आपदा के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, जिससे NDRF तक पहुँच सीमित हो जाती है और SDRF के उपयोग पर प्रतिबंध लग जाता है।
2. 'थर्मल इनजस्टिस' क्या है?
यह कूलिंग तक पहुँच की कमी के कारण अनौपचारिक श्रमिकों पर गर्मी के तनाव को संदर्भित करता है, जो वर्ग, जाति और व्यावसायिक असमानताओं को दर्शाता है।
3. गर्मी के संबंध में OSHWC संहिता, 2020 की सीमाएँ क्या हैं?
इसमें अनिवार्य हीट सुरक्षा मानकों का अभाव है, जिससे विनियमन विवेकाधीन रह जाता है और बाहरी श्रमिकों को सुरक्षा से बाहर रखा जाता है।
4. हीट एक्शन प्लान (HAP) को निष्प्रभावी क्यों माना जाता है?
इनमें कानूनी प्रवर्तन क्षमता, वित्तपोषण और कार्यान्वयन तंत्र का अभाव होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. वर्तमान में और निकट भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में भारत की संभावित सीमाएँ क्या हैं? (2010)
- उपयुक्त वैकल्पिक प्रौद्योगिकियाँ पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
- भारत अनुसंधान और विकास में भारी धनराशि का निवेश नहीं कर सकता।
- कई विकसित देशों ने पहले ही भारत में अपने प्रदूषणकारी उद्योग स्थापित कर लिये हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न: संसार के शहरी निवास स्थानों में 'ताप द्वीपों' के निर्माण के कारण बताइये।(2013)

चर्चित स्थान
उमियम झील
पर्यावरणविदों और स्थानीय समूहों के तीव्र विरोध के बाद मेघालय सरकार ने मानव-निर्मित उमियम झील में स्थित सुंदर लुंपोंगडेंग द्वीप को प्रस्तावित लक्ज़री रिसॉर्ट परियोजना से बाहर करने का निर्णय लिया है।
- उमियम झील: इसे लोकप्रिय रूप से बारापानी के नाम से जाना जाता है, उमियम झील (स्थानीय रूप से डैम साइट) मेघालय में शिलांग से लगभग 15 किमी. उत्तर में स्थित एक सुंदर जलाशय है। यह 1960 के दशक की शुरुआत में उमियम नदी पर बांध बनाकर उमियम-उमत्रु जलविद्युत परियोजना के तहत निर्मित की गई थी।
- इसे जलविद्युत उत्पादन के लिये असम राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा विकसित किया गया था, जिसमें उमियम स्टेज-I पावरहाउस (4×9 मेगावाट) का संचालन वर्ष 1965 (यह पूर्वोत्तर भारत की पहली जलाशय-आधारित जलविद्युत परियोजना थी) में शुरू हुआ था।
- गुवाहाटी-शिलांग मार्ग पर पूर्वी खासी पहाड़ियों से घिरी यह झील अब जलक्रीड़ा और पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है।
- उमियम झील (Umiam Lake) और उमंगोट नदी (राष्ट्रीय जलमार्ग-106) पर अंतर्देशीय जल परिवहन (IWT) बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिये विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जा रही है, जो इन्हें राज्य के पहले राष्ट्रीय जलमार्गों के रूप में चिह्नित करती है।
पूर्वोत्तर भारत की अद्भुत झीलें
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झील |
राज्य |
प्रमुख विशेषताएँ |
प्रमुख विशेषताएँ |
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सांगेत्सर झील (माधुरी झील) |
अरुणाचल प्रदेश |
तवांग में ऊँचाई पर स्थित झील। |
बर्फ से ढके पहाड़ों और अनोखे नज़ारों से घिरा हुआ। |
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पलक झील (पलक दिल) |
मिज़ोरम |
मिज़ोरम की सबसे बड़ी झील, जो पलक वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित है। |
भारत-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा, जहाँ समृद्ध वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं। |
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लोकटक झील |
मणिपुर |
पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील। |
फुमडी (तैरते द्वीपों) के लिये प्रसिद्ध, यहाँ केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान (NP) स्थित है (जो दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है)। |
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चांदुबी झील |
असम |
गारो पहाड़ियों के पास स्थित। |
यह प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती है और चारों ओर वन एवं चाय बागानों से घिरी हुई है। |

