डेली न्यूज़ (12 Feb, 2026)



शिक्षा के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समेकन

प्रिलिम्स के लिये: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020, लार्ज लैंग्वेज मॉडल, भाषिणी

मेन्स के लिये: शिक्षा सुधार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 और प्रौद्योगिकी-आधारित शिक्षण पारितंत्र

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि शैक्षणिक संस्थान यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की वास्तविक क्षमता का लाभ उठाना चाहते हैं, तो उन्हें केवल तकनीकी साक्षरता तक सीमित न रहकर अपने पाठ्यक्रम में AI के “थ्री A” फ्रेमवर्क— अपनाना (Adoption), आत्मसात् करना (Absorption) और अनुप्रयोग (Application) — को समाहित करना होगा।

  • यह दृष्टिकोण  राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अनुरूप है, जो एक प्रौद्योगिकी-आधारित शिक्षण पारितंत्र की परिकल्पना करती है, ताकि विद्यार्थियों को ऐसे भविष्य के लिये तैयार किया जा सके जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सर्वव्यापी होगी।

सारांश

  • “थ्री A” फ्रेमवर्क—अपनाना, आत्मसात् करना और अनुप्रयोग— शिक्षा प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को शामिल करने के लिये एक स्पष्ट और संरचित मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह ढाँचा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 की उस दृष्टि के अनुरूप है, जो रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक चेतना और वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान को प्रोत्साहित करने वाले प्रौद्योगिकी-संचालित शिक्षण पारिस्थितिक तंत्र की परिकल्पना करता है।
  • AI का प्रभावी समेकन तभी संभव है जब अवसंरचना की कमी, डेटा संप्रभुता, संज्ञानात्मक निर्भरता, शिक्षकों की दक्षता और परीक्षा प्रणाली से जुड़ी चुनौतियों को संबोधित किया जाए। इसके लिये सॉवरेन AI क्लाउड की स्थापना, AI नागरिकता पाठ्यक्रमों की शुरुआत, प्रक्रिया-आधारित मूल्यांकन व्यवस्था एवं शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार जैसे कदम उठाने आवश्यक हैं।

शिक्षा में AI के लिये थ्री A फ्रेमवर्क क्या है?

  • थ्री A फ्रेमवर्क शैक्षणिक संस्थानों को पारंपरिक रटने की प्रवृत्ति से AI-तैयार शिक्षण पद्धति की ओर स्थानांतरित करने के लिये एक संरचित दृष्टिकोण प्रदान करता है।

अपनाना (Adoption) — आधार चरण

  • परिभाषा: यह शिक्षण पारितंत्र में AI उपकरणों को स्वीकार करने और प्रारंभिक रूप से लागू करने का चरण है। इसमें विद्यार्थियों तथा शिक्षकों को AI इंटरफेस (जैसे- लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs)) एवं डिजिटल टूल्स से परिचित कराना शामिल है।
  • उद्देश्य: “अज्ञात का भय” दूर कर उसकी जगह डिजिटल साक्षरता और सुगमता को स्थापित करना।
  • प्राप्त होने वाले कौशल:
    • AI साक्षरता एवं टूल दक्षता: विभिन्न AI इंटरफेसों [जैसे- जेमिनी/चैटजीपीटी (LLMs), इमेज जनरेटर] का सहज और प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता।
    • बेसिक प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग: AI मॉडल से वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिये प्रश्नों या निर्देशों को प्रभावी ढंग से तैयार करना सीखना।
    • डिजिटल अनुकूलन क्षमता: नए डिजिटल उपकरणों के अनुपालन हेतु मानसिक लचीलापन, बजाय इसके कि उनका विरोध किया जाए (अर्थात “टेक्नोफोबिया” पर काबू पाना)।
    • संसाधन अनुकूलन: यह पहचानने की क्षमता कि किन कार्यों को स्वचालित किया जा सकता है (जैसे- पाठों का सार तैयार करना, ई-मेल का मसौदा बनाना) ताकि समय की बचत हो सके।

आत्मसात् करना (Absorption) — अवधारणा

  • परिभाषा: AI को केवल एक “ब्लैक बॉक्स” की तरह उपयोग करने के बजाय यह समझ विकसित करने का चरण है कि वह कैसे कार्य करता है। इसमें AI के आधारभूत तर्क, सीमाओं और नैतिक प्रभावों को समझना शामिल है, साथ ही यह जानना कि कोई AI किसी विशेष परिणाम (आउटपुट) तक क्यों पहुँचा।
  • उद्देश्य: आलोचनात्मक सोच को विकसित करना, ताकि विद्यार्थी AI द्वारा उत्पन्न भ्रमात्मक जानकारी और तथ्यात्मक डेटा के बीच अंतर कर सकें तथा तकनीक के अधीन होने के बजाय उस पर नियंत्रण बनाए रखें।
  • प्राप्त होने वाले कौशल:
    • समालोचनात्मक चिंतन एवं तथ्य-जाँच: AI द्वारा दिये गए आउटपुट की समीक्षा करने और प्राथमिक स्रोतों से तथ्यों का सत्यापन करने की क्षमता।
    • एल्गोरिद्मिक समझ: यह समझ कि AI कैसे सोचता है (संभाव्यता बनाम निश्चितता) और उसकी सीमाएँ क्या हैं।
    • नैतिक तर्कशीलता: AI प्रतिक्रियाओं में मौजूद पक्षपात (लैंगिक, नस्लीय, सांस्कृतिक) की पहचान करने और डेटा गोपनीयता से जुड़े मुद्दों को समझने की क्षमता।
    • संज्ञानात्मक सहारा बनाम निर्भरता: यह जानना कि कब AI से सहायता लेनी है और कब मानव बुद्धि पर निर्भर रहना है, ताकि अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।

अनुप्रयोग (Application) — क्रियान्वयन चरण

  • परिभाषा: AI का वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने और नवाचार करने के लिये व्यावहारिक रूप से उपयोग करना।
  • उद्देश्य: तकनीक के केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि मूल्य निर्माणकर्त्ता और नवप्रवर्तक तैयार करना।
  • प्राप्त होने वाले कौशल:
    • जटिल समस्या समाधान: वास्तविक दुनिया के विशिष्ट क्षेत्रों में AI टूल्स का प्रयोग कर समस्याओं को हल करने की क्षमता (जैसे– भूगोल में मौसम के पैटर्न के पूर्वानुमान हेतु AI का उपयोग)।
    • डिज़ाइन थिंकिंग और नवाचार: नए समाधान या उत्पाद बनाने के लिये AI को सहायक के रूप में प्रयोग करके विचार-विमर्श, प्रोटोटाइप तैयार करना तथा नवाचार करना।
    • डेटा विश्लेषण और व्याख्या: बड़े डेटासेट (जैसे– जनगणना डेटा) को प्रोसेस कर उनसे व्यावहारिक तथा उपयोगी निष्कर्ष निकालने में AI का उपयोग।

पाठ्यक्रम में AI समेकन का क्या महत्त्व है?

  • रटने की प्रवृत्ति से कौशल-आधारित शिक्षा की ओर बदलाव: थ्री A फ्रेमवर्क पाठ्यक्रम को केवल याद करने पर निर्भर रहने से हटाकर आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान क्षमता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर केंद्रित बनाते हैं, क्योंकि ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मानव क्षमता AI से अधिक मूल्यवान है।
  • व्यक्तिगत शिक्षण: AI “व्यक्तिगत शिक्षा का लोकतंत्रीकरण” संभव बनाता है। इसके उपकरण छात्र की सीखने की गति के अनुसार अनुकूलित हो सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सुधारात्मक सहायता या उन्नत चुनौतियाँ प्रदान कर सकते हैं (अनुकूली शिक्षण)।
  • भविष्य के लिये सक्षम कार्यबल: विश्व आर्थिक मंच के फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, वर्ष 2030 तक कर्मचारियों के 39% मुख्य कौशलों में बदलाव होगा। इसलिये AI को व्यावहारिक रूप से लागू करने की क्षमता भविष्य में रोज़गार योग्यता का अनिवार्य मानदंड बन जाएगी।
  • भाषायी अंतर को कम करना: AI आधारित अनुवाद उपकरण (जैसे– भाषिणी) विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में जटिल तकनीकी विचारों को समझने में सक्षम बनाते हैं, जिससे उच्च शिक्षा में “केवल अंग्रेज़ी” की बाधा समाप्त होती है।

पाठ्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समेकन की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • अवसंरचनात्मक अभाव: जापान के ‘GIGA स्कूल’ कार्यक्रम (ग्लोबल इनोवेशन गेटवे फॉर ऑल) के विपरीत, जो ‘वन स्टूडेंट, वन डिवाइस’ नीति के अंतर्गत उच्च-प्रसंस्करण क्षमता वाले टैबलेट उपलब्ध कराता है, भारत के सरकारी विद्यालय प्रायः साझा एवं कम क्षमता वाले उपकरणों पर निर्भर रहते हैं।
    • ग्रामीण भारत में उपलब्ध अधिकांश किफायती उपकरणों में ‘स्मॉल लैंग्वेज़ मॉडल्स’ (SLM) को स्थानीय स्तर पर संचालित करने हेतु आवश्यक NPU (न्यूरल प्रोसेसिंग यूनिट) क्षमता का अभाव है।
  • संज्ञानात्मक क्षीणता का जोखिम: जिस प्रकार GPS के व्यापक उपयोग ने मानव की स्थानिक दिशा-ज्ञान क्षमता को कमज़ोर किया, उसी प्रकार ‘संज्ञानात्मक ऑफलोडिंग’ को लेकर भी आशंका व्यक्त की जा रही है।
    • यदि विद्यार्थी केवल अंतिम उत्पाद के स्थान पर संपूर्ण प्रक्रिया (जैसे- कूट लिखना या निबंध की संरचना तैयार करना) के लिये ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भर हो जाते हैं, तो वे आलोचनात्मक चिंतन और तार्किक विश्लेषण हेतु आवश्यक मस्तिष्कीय तंत्रों (न्यूरल पाथवे) का पर्याप्त विकास नहीं कर पाएँगे।
  • मूल्यांकन संकट: वर्तमान परीक्षा प्रणाली मुख्यतः ‘स्मृति’ और ‘आउटपुट’ की जाँच करती है, वे क्षेत्र जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता अत्यंत दक्ष है।
    • ‘प्रक्रिया-आधारित मूल्यांकन’ (जैसे- मौखिक परीक्षाएँ, कक्षा के भीतर समस्या-समाधान) की ओर संक्रमण में विलंब हो रहा है, जबकि यह पद्धति कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भरता को प्रभावी रूप से परखने और सीमित करने में सक्षम है।
  • डेटा संप्रभुता एवं निजता संबंधी चिंताएँ: एक स्वदेशी ‘भारतीय शिक्षा क्लाउड’ के अभाव में विद्यार्थी वर्तमान में वैश्विक बड़े भाषा मॉडलों (LLM) के निःशुल्क संस्करणों का उपयोग कर रहे हैं।
    • इसके परिणामस्वरूप भारतीय विद्यार्थियों से संबंधित संवेदनशील अधिगम डेटा एवं बौद्धिक संपदा विदेशी सर्वरों पर संसाधित होती है, जिससे राष्ट्रीय डेटा संप्रभुता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • प्रशिक्षण डेटा में पूर्वाग्रह: अधिकांश वैश्विक बड़े भाषा मॉडल (LLM) पश्चिमी डेटा-समूहों पर प्रशिक्षित हैं, जिन्हें प्रायः ‘WEIRD’ (Western, Educated, Industrialized, Rich, Democratic) समाजों का प्रतिनिधि माना जाता है।
    • इसके परिणामस्वरूप ‘सांस्कृतिक मतिभ्रम’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में प्रसंगविहीन अथवा सांस्कृतिक रूप से पूर्वाग्रहग्रस्त उत्तर प्रदान करती है।
  • ‘ब्लैक बॉक्स’ शिक्षक दुविधा: ऐसी क्षमता-असंगति के रूप में उभर रही है, जिसमें विद्यार्थी प्रायः कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों के उपयोग में अपने शिक्षकों से अधिक दक्ष होते हैं।
    • यदि शिक्षक स्वयं AI को एक रहस्यमय ‘ब्लैक बॉक्स’ के रूप में देखते हैं, तो वे उसकी सीमाओं, कार्य-तर्क (Logic) तथा संभावित त्रुटियों को प्रभावी ढंग से समझा या समझा नहीं पाते।
    • फलस्वरूप, ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ शिक्षक AI-सहायित असाइनमेंट्स का समुचित परीक्षण, सत्यापन या मूल्यांकन करने में सक्षम नहीं रह जाते।

शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समेकन को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?

  • राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (NETF): राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 में परिकल्पित NETF को शिक्षा क्षेत्र के लिये एक ‘सॉवरेन AI क्लाउड’ के निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिये।
    • यह व्यवस्था ग्रामीण विद्यालयों को लागत वाले हार्डवेयर की आवश्यकता के बिना, कम क्षमता वाले उपकरणों के माध्यम से भी शक्तिशाली AI मॉडलों तक पहुँच प्रदान करेगी, जिससे ‘कंप्यूट विभाजन’ (Compute Divide) को पाटने में सहायता मिलेगी।
  • अनिवार्य ‘AI नागरिकता’ पाठ्यक्रम: कक्षा 8 से ही डेटा गोपनीयता, एल्गोरिद्मिक पूर्वाग्रह तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों पर एक अनिवार्य मूल मॉड्यूल प्रारंभ किया जाना चाहिये। विद्यार्थियों को केवल कोडिंग/कूट दक्षता तक सीमित न रखकर, उन्हें प्रौद्योगिकी के प्रति सजग, उत्तरदायी और नैतिक संरक्षक के रूप में विकसित किया जाना आवश्यक है।
  • सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE): ऐसी प्रारूपिक (Formative) मूल्यांकन पद्धति अपनाई जानी चाहिये, जो केवल अंतिम उत्तर पर केंद्रित न होकर संपूर्ण अधिगम-यात्रा का आकलन करे अर्थात विद्यार्थी किसी उत्तर तक किस प्रकार पहुँचा, उसकी प्रश्न-प्रक्रिया (Query History) क्या रही तथा उसके आलोचनात्मक चिंतन की प्रकृति कैसी थी। इस प्रकार की प्रणाली वास्तविक समझ, तर्क-क्षमता और विश्लेषणात्मक कौशल के विकास को अधिक प्रभावी रूप से मापने में सहायक होगी।
    • यह सीधे तौर पर कॉर्पोरेट वातावरण में प्रचलित आधुनिक भर्ती मानकों का प्रतिबिंब है, जो पारदर्शी, पुनरुत्पाद्य तथा आलोचनात्मक समस्या-समाधान कौशल की मांग करते हैं।
  • शिक्षक प्रशिक्षण 2.0: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षण-पद्धति पर केंद्रित एक राष्ट्रव्यापी ‘ट्रेन द ट्रेनर’ मिशन (NISHTHA के समान) प्रारंभ किया जाना चाहिये, ताकि शिक्षक AI सहायक उपकरणों के साथ सह-शिक्षण (Co-teaching) में सहज और दक्ष हो सकें।

निष्कर्ष

थ्री A’ का एकीकरण मात्र एक प्रौद्योगिकीय उन्नयन नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत अनिवार्यता है। निष्क्रिय अंगीकरण (Adoption) से आगे बढ़कर समालोचनात्मक आत्मसात् (Absorption) और नवोन्मेषी अनुप्रयोग (Application) की दिशा में अग्रसर होकर भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को ‘कंज्यूमर्स ओएफ ग्लोबल टेक’ से ‘क्रिएटर्स ऑफ ग्लोबल सोल्यूशंस’ में रूपांतरित कर सकता है। इस प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मानव बुद्धिमत्ता ही सर्वोच्च नियंता बनी रहे।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 किस प्रकार एक प्रौद्योगिकी-चालित शैक्षिक पारितंत्र की परिकल्पना करती है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रभावी एकीकरण हेतु कौन-से संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शिक्षा में AI का थ्री A फ्रेमवर्क क्या है?
यह एक सुव्यवस्थित मॉडल है, जिसमें अपनाना (AI साक्षरता), आत्मसात् करना (आलोचनात्मक और नैतिक आत्मसात्), और अनुप्रयोग (वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान) को सम्मिलित किया गया है। इसका उद्देश्य रटंत अधिगम से आगे बढ़कर AI-सक्षम शिक्षण-पद्धति की ओर संक्रमण सुनिश्चित करना है।

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 शिक्षा में AI एकीकरण का समर्थन किस प्रकार करती है?
NEP 2020 एक प्रौद्योगिकी-चालित शैक्षिक पारितंत्र की परिकल्पना करती है तथा डिजिटल और AI-आधारित सुधारों के मार्गदर्शन हेतु राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (NETF) जैसे संस्थागत तंत्रों का प्रस्ताव करती है।

3. AI-सक्षम शिक्षा में डेटा संप्रभुता को लेकर क्या चिंता है?
वैश्विक बड़े भाषा मॉडलों (LLM) के उपयोग से विद्यार्थियों का डेटा विदेशी सर्वरों पर संसाधित होता है, जिससे राष्ट्रीय डेटा संप्रभुता, गोपनीयता तथा बौद्धिक संपदा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

4. AI युग में प्रक्रिया-आधारित मूल्यांकन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
चूँकि AI अंतिम उत्पाद/आउटपुट सृजन में दक्ष है, इसलिये मूल्यांकन प्रणाली को प्रारूपिक एवं प्रक्रिया-आधारित विधियों, जैसे– मौखिक परीक्षाएँ और कक्षा-आधारित समस्या-समाधान की ओर स्थानांतरित करना आवश्यक है, ताकि आलोचनात्मक चिंतन का समुचित आकलन किया जा सके।

5. AI-आधारित अधिगम में ‘संज्ञानात्मक ऑफलोडिंग’ का क्या जोखिम है?
यदि विद्यार्थी निबंध लेखन या कोडिंग/कूट-तर्क जैसी प्रक्रियाओं के लिये अत्यधिक रूप से AI पर निर्भर हो जाते हैं, तो तर्कशक्ति, आलोचनात्मक चिंतन एवं स्वतंत्र विश्लेषण से संबंधित मस्तिष्कीय क्षमताओं का विकास बाधित हो सकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

मेन्स 

प्रश्न. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 धारणीय विकास लक्ष्य 4 (2030) के साथ अनुरूपता में है। उसका ध्येय भारत में शिक्षा प्रणाली की पुनःसंरचना और पुनःस्थापना है। इस कथन का समालोचनात्मक निरीक्षण कीजिये। (2020)


भारत का विमानन क्षेत्र

प्रिलिम्स के लिये: नागर विमानन महानिदेशालय, UDAN योजना, विमानन टरबाइन ईंधन

मेन्स के लिये: भारत के विमानन क्षेत्र की संरचनात्मक चुनौतियाँ, विनियामक क्षमता एवं सुरक्षा पर्यवेक्षण, अवसंरचना तथा कौशल संबंधी अवरोध।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2025 में भारत के नागर विमानन क्षेत्र ने बार-बार परिचालन व्यवधानों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का अनुभव किया है, साथ ही प्रमुख विमानन कंपनियों की लाभप्रदता में गिरावट दर्ज की गई है। क्षेत्रीय स्तर पर नए संचालकों के बाज़ार में प्रवेश के साथ ही इस क्षेत्र की संरचनात्मक कमज़ोरियों को लेकर प्रश्न उठने लगे हैं।

सारांश

  • भारत का विमानन क्षेत्र आकार में बड़ा है, किंतु संरचनात्मक रूप से अतिविस्तृत है, जहाँ मांग में वृद्धि संस्थागत क्षमता से आगे निकल रही है।
  • लगभग 90 प्रतिशत बाज़ार पर नियंत्रण रखने वाली द्वयाधिकार संरचना प्रणालीगत जोखिम को बढ़ाती है तथा क्षेत्र की सहनशीलता क्षमता को सीमित करती है।
  • पायलटों की कमी, विनियामक अंतराल तथा ईंधन मूल्यों की अस्थिरता इस क्षेत्र की प्रमुख संरचनात्मक बाधाएँ हैं।
  • समन्वित सुधारों के अभाव में तीव्र विस्तार विकास को आवर्ती परिचालन संकटों में परिवर्तित कर सकता है।

भारत के विमानन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • वैश्विक रैंकिंग: भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तृतीय सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है। यह वैश्विक हवाई यातायात का लगभग 4.2 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। भारतीय विमान बेड़ा विश्व के कुल विमान बेड़े का लगभग 2.4 प्रतिशत है। एयरलाइनों के विस्तार तथा नए विमानों के आदेशों के कारण बेड़े के आकार में तीव्र वृद्धि हुई है।
  • यात्री यातायात में वृद्धि: वर्ष 2030 तक घरेलू यात्री मांग लगभग 715 मिलियन तक पहुँचने की अपेक्षा है। वर्ष 2040 तक यात्री यातायात में लगभग छह गुना वृद्धि होकर इसके लगभग 1.1 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
  • हवाई अड्डा अवसंरचना का विस्तार: परिचालित हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 से बढ़कर 2025 में 163 हो गई है। वर्ष 2047 तक भारत का लक्ष्य 350–400 हवाई अड्डों तक विस्तार करने का है, जिसमें ग्रीनफील्ड परियोजनाओं तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी आधारित विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है।
  • आर्थिक योगदान: वर्ष 2025 तक विमानन क्षेत्र 7.7 मिलियन से अधिक रोज़गार का समर्थन करता है तथा भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1.5 प्रतिशत का योगदान देता है।
  • भारतीय नागर विमानन विनियमन:
    • यह विमानन विनिर्माण में मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को प्रोत्साहित करता है, लाइसेंसिंग तथा विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाता है, एक संरचित अपील तंत्र प्रदान करता है तथा भारत के समग्र विमानन शासन ढाँचे का आधुनिकीकरण करता है।
    • एयर कॉर्पोरेशन अधिनियम, 1953: इस अधिनियम के माध्यम से नौ विमानन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया गया। मध्य 1990 के दशक तक सरकारी स्वामित्व वाली विमानन कंपनियों का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व रहा।
    • ओपन स्काई पॉलिसी (1990–94): इस नीति के तहत निजी एयर टैक्सी संचालकों को अनुमति प्रदान की गई। इससे इंडियन एयरलाइंस (IA) और एयर इंडिया (AI) के एकाधिकार का अंत हुआ।
    • भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024: यह अधिनियम औपनिवेशिक कालीन विमान अधिनियम, 1934 का स्थान लेता है तथा भारत के विमानन कानूनों को अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन के मानकों और शिकागो अभिसमय के अनुरूप बनाता है।

Key_Government_Initiatives_for_the_Aviation_Sector_in_India

भारत के विमानन क्षेत्र में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • प्रशिक्षण एवं कौशल संबंधी अवरोध: सिम्युलेटरों की कमी, प्रशिक्षकों की सीमित उपलब्धता, उच्च प्रशिक्षण लागत तथा टाइप-रेटिंग संबंधी प्रतिबंधों के कारण पायलट आपूर्ति अपेक्षाकृत अल्प-लोचशील बनी हुई है। वर्ष 2025 में लगभग 236 अस्थायी विदेशी पायलट अनुमतियाँ जारी की गईं, जो उच्च लागत वाले अस्थायी (Stopgap) उपायों पर निर्भरता को दर्शाती हैं।
  • उच्च बाज़ार एकाग्रता एवं प्रणालीगत जोखिम: इंडिगो (63-65%) और एयर इंडिया समूह (27-28%) मिलकर घरेलू यात्री यातायात का लगभग 90% नियंत्रित करते हैं। इंडिगो लगभग 60% मार्गों पर एकमात्र परिचालक (Sole Carrier) के रूप में कार्य करता है, जिससे किसी भी व्यवधान की स्थिति में यात्रियों के पुनर्वितरण के स्थान पर सीधे संपर्क-विच्छेद (Connectivity Loss) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • न्यून आघात-अवशोषण क्षमता: वैश्विक स्तर पर एयरलाइंस परिचालनगत आघातों (ऑपरेशनल शॉक) से निपटने हेतु प्रायः 20-25% अतिरिक्त चालक दल (Spare Crew) क्षमता बनाए रखती हैं, जबकि भारतीय विमानन कंपनियाँ लगभग पूर्ण उपयोग (Near-total Utilisation) पर संचालित होती हैं। फलस्वरूप, मामूली व्यवधान भी क्रमिक रूप से बढ़ते हुए संपूर्ण नेटवर्क में विफलताओं का कारण बन सकते हैं।
  • अप्रभावी नियामक क्षमता: नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) के स्वीकृत तकनीकी पदों में से लगभग आधे रिक्त हैं। परिचालन संबंधी व्यवधानों का समाधान प्रायः सख्त प्रवर्तन के स्थान पर समय-सारणी संबंधी छूट के माध्यम से किया गया है, जो तदर्थ संकट-प्रबंधन की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  • उच्च परिचालन लागत एवं ईंधन मूल्य अस्थिरता: विमानन कंपनियाँ वैश्विक कच्चे तेल बाज़ार तथा अमेरिकी डॉलर से संबद्ध एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की मूल्य अस्थिरता के कारण वित्तीय दबाव का सामना करती हैं, जिससे लागत संरचना में अनिश्चितता और अस्थिरता बढ़ती है।
  • पुनरावर्ती एयरलाइन विफलताएँ: इस क्षेत्र में किंगफिशर एयरलाइंस (2012), जेट एयरवेज़ (2019), गो फर्स्ट (2023) सहित अनेक एयरलाइनों का पतन देखा गया है, जो निरंतर बनी वित्तीय एवं संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है।
  • विमानन सुरक्षा संबंधी जोखिम: बढ़ते यातायात दबाव, बार-बार होने वाले परिचालन व्यवधान तथा वर्ष 2025 में नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा जारी 19 सुरक्षा उल्लंघन नोटिस, सुरक्षा अनुपालन और प्रणालीगत प्रत्यास्थता (Systemic Resilience) को लेकर बढ़ती चिंताओं की ओर संकेत करते हैं।

नई क्षेत्रीय एयरलाइंस एवं संपर्कता पहल

  • नए क्षेत्रीय वाहकों का प्रवेश: दिसंबर 2025 में नागरिक विमानन मंत्रालय ने शंख एयर, अल हिंद एयर तथा फ्लाईएक्सप्रेस को क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार करने और बाज़ार एकाग्रता को कम करने हेतु अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रदान किये।
  • टियर-2 एवं टियर-3 शहरों पर ध्यान: ये एयरलाइंस नोएडा अंतर्र्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोच्चि तथा तेलंगाना जैसे उभरते केंद्रों से परिचालन की योजना बना रही हैं, जिससे उपेक्षित क्षेत्रीय मार्गों को लक्षित कर अंतिम चरण हवाई संपर्क में सुधार किया जा सके।
  • उड़ान (UDAN) के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क सुदृढ़ीकरण: उड़ान योजना के अंतर्गत वर्ष 2025 तक 625 मार्गों और 85 हवाई अड्डों को परिचालित किया जा चुका है, जिनमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के 100 से अधिक मार्ग शामिल हैं, जिससे समावेशी हवाई यात्रा को प्रोत्साहन मिला है।

भारत के विमानन क्षेत्र को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • संकट-प्रबंधन से संरचनात्मक सुधार की ओर संक्रमण: तदर्थ समय-सारणी छूट पर निर्भरता समाप्त कर दीर्घकालिक संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर बल दिया जाना चाहिये, ताकि वर्ष 2030 तक अनुमानित 715 मिलियन यात्री मांग के परिप्रेक्ष्य में प्रणालीगत प्रत्यास्थता सुनिश्चित की जा सके।
  • नियामक पर्यवेक्षण क्षमता का सुदृढ़ीकरण: नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) के रिक्त तकनीकी पदों को शीघ्र भरा जाए तथा नियम-आधारित और जोखिम-आधारित पर्यवेक्षण तंत्र अपनाए जाने चाहिये, जिससे सुरक्षा अनुपालन में सुधार हो तथा प्रवर्तन की विश्वसनीयता सुदृढ़ हो।
  • पायलट प्रशिक्षण पारिस्थितिक तंत्र का विस्तार: सिम्युलेटर क्षमता बढ़ाना, घरेलू प्रशिक्षण संस्थानों का विस्तार करना, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सरल बनाना और टाइप-रेटिंग की बाधाओं को दूर करना ताकि अनुमानित पायलट मांग को पूरा किया जा सके और अस्थायी विदेशी अनुमोदनों पर निर्भरता कम हो।
  • रिज़र्व क्षमता मानकों को संस्थागत बनाना: न्यूनतम अतिरिक्त क्रू की सीमा को वैश्विक मानकों (20–25%) के करीब स्थापित करना, ताकि पीक यात्रा मौसम और संचालन में अचानक व्यवधान के दौरान शृंखला-प्रभाव वाले व्यवधानों को रोका जा सके।
  • सक्षम क्षेत्रीय एयरलाइन का समर्थन: केवल NOC देने तक सीमित न रहकर UDAN सब्सिडी का प्रभावी कार्यान्वयन, भीड़-भाड़ वाले हवाई अड्डों पर प्राथमिक स्लॉट आवंटन और टियर-2 एवं टियर-3 हवाई अड्डों के समन्वित विकास को सुनिश्चित करना, ताकि प्रमुख एयरलाइन पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
  • ईंधन नीति को तर्कसंगत बनाना: एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF)  पर कर नीतियों का समायोजन करने पर विचार करना और ईंधन हेजिंग तंत्र को अपनाना, ताकि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा डॉलर-आधारित अस्थिरता से उत्पन्न जोखिम को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत का विमानन क्षेत्र भले ही बड़े पैमाने पर विकसित हो चुका है, फिर भी यह संरचनात्मक रूप से कमज़ोर है। पायलट की कमी, नियामक अंतराल, उच्च बाज़ार एकाग्रता और लागत में उतार-चढ़ाव दीर्घकालिक स्थिरता के लिये गंभीर खतरा हैं। सुरक्षित, प्रतिस्पर्द्धी तथा लचीले विमानन विकास हेतु केवल आपातकालीन प्रबंधन पर भरोसा करने के बजाय संरचनात्मक सुधारों को लागू करना आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. भारत के विमानन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का विश्लेषण और सतत एवं लचीले विकास के उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में DGCA की क्या भूमिका है?
नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA): भारत का सर्वोच्च नागरिक विमानन नियामक संस्थान, जो नागरिक विमानन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। यह संस्था हवाई सुरक्षा, लाइसेंसिंग, विमान की उड़ान-योग्यता, उड़ान नियमावली का पालन और ICAO के साथ समन्वय के लिये ज़िम्मेदार है।

2. नागरिक विमानन में भारत की अभी वैश्विक स्थिति क्या है?
भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है और यह 7.7 मिलियन से अधिक रोज़गार प्रदान करता है।

3. भारत का विमानन क्षेत्र संरचनात्मक रूप से संवेदनशील क्यों है?
तेज़ी से वृद्धि, पायलट की कमी, कमज़ोर नियामक क्षमता और उच्च बाज़ार एकाग्रता इसे प्रणालीगत व्यवधानों के प्रति प्रवण बनाते हैं।

4. UDAN विमानन क्षेत्र को कैसे मज़बूत बनाती है?
UDAN क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ाकर अविकसित मार्गों और हवाई अड्डों तक पहुँच का विस्तार करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स

प्रश्न. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के अधीन संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से भारत में विमान पत्तनों के विकास का परीक्षण कीजिये। इस संबंध में प्राधिकरणों के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ हैं? (2017)