कृषि
कपास उत्पादकता मिशन
प्रिलिम्स के लिये: कपास उत्पादकता मिशन, केंद्रीय बजट 2025-26, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), उच्च उपज देने वाली किस्म, कस्तूरी कॉटन भारत, पिंक बॉलवर्म, सफेद मक्खी
मेन्स के लिये: भारत के वस्त्र उद्योग के लिये कपास उत्पादकता मिशन का महत्त्व, भारत में कपास की खेती की चुनौतियाँ, कृषि उत्पादकता में प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिये ‘कपास उत्पादकता मिशन’ हेतु ₹5,659 करोड़ के व्यय को मंज़ूरी दी है।
- यह पहल स्थिर बनी हुई उपज की समस्या को दूर करने, कीट-जनित चुनौतियों के प्रभाव को कम करने, गुणवत्ता में सुधार करने तथा भारत को कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिये तैयार की गई है, साथ ही वैश्विक वस्त्र बाज़ारों में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने का भी उद्देश्य रखती है।
सारांश
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2026-31 के लिये ₹5,659 करोड़ के ‘कपास उत्पादकता मिशन’ को मंज़ूरी दी है, जिसका उद्देश्य जलवायु-प्रतिरोधी बीजों, आधुनिक कृषि तकनीकों, यंत्रीकरण एवं मूल्य शृंखला सुधारों के माध्यम से कपास की उपज, गुणवत्ता और किसानों की आय में वृद्धि करना है। यह पहल भारत के ‘खेत से विदेश तक/Farm to Foreign’ 5F विज़न को भी प्रोत्साहित करती है।
- यद्यपि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है, फिर भी यह कम उत्पादकता, कीट संक्रमण, जलवायु संवेदनशीलता, छोटे एवं खंडित खेतों तथा कमज़ोर प्रसंस्करण अवसंरचना जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। अतः सिंचाई सुधार, यंत्रीकरण, विस्तार सेवाओं एवं सतत कृषि पद्धतियों में सुधार आवश्यक है।
कपास उत्पादकता मिशन क्या है?
- परिचय: केंद्रीय बजट 2025-26 में कपास की उत्पादकता, गुणवत्ता में सुधार तथा वस्त्र मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करने हेतु पाँच वर्षीय ‘कपास उत्पादकता मिशन’ की घोषणा की गई है।
- यह मिशन अनुसंधान, विस्तार गतिविधियों तथा जलवायु-स्मार्ट, कीट-प्रतिरोधी एवं उच्च उपज देने वाली कपास किस्मों के विकास पर केंद्रित है, जिसमें उन्नत प्रजनन तकनीकों एवं जैव-प्रौद्योगिकी उपकरणों के माध्यम से एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास भी शामिल है।
- क्रियान्वयन एजेंसियाँ: यह मिशन संयुक्त रूप से कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा वस्त्र मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित किया जाएगा, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 10 संस्थानों तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) का सहयोग प्राप्त होगा।
- कवरेज: अपने प्रारंभिक चरण में यह मिशन 14 प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों के 140 ज़िलों पर केंद्रित होगा, जिसका उद्देश्य आधुनिक कृषि तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाना है।
- 5F विज़न के साथ संरेखण: यह मिशन सरकार के वस्त्र क्षेत्र के समेकित दृष्टिकोण ‘खेत से रेशे तक, फैक्टरी से फैशन तक और फिर विदेश तक/Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign’ के साथ पूर्णतः संरेखित है, जिसका लक्ष्य एक सतत एवं सुदृढ़ मूल्य शृंखला का निर्माण करना है।
- लक्षित परिणाम (2031 तक):
- उत्पादन: कुल कपास उत्पादन को वर्तमान स्तर से बढ़ाकर 498 लाख गाँठ तक पहुँचाना।
- उपज: रेशे की उत्पादकता को स्थिर 440 किग्रा/हेक्टेयर से बढ़ाकर 755 किग्रा/हेक्टेयर करना।
- लाभार्थी: देशभर के लगभग 32 लाख कपास किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में प्रत्यक्ष सुधार करना।
नोट: एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास, मुख्यतः गॉसिपियम बारबाडेंस (जिसे मिस्री या पिमा कपास भी कहा जाता है) से प्राप्त होता है। इसे वस्त्र निर्माण में ‘स्वर्ण मानक’ माना जाता है, क्योंकि इसकी रेशा गुणवत्ता उत्कृष्ट होती है तथा इसकी रेशा लंबाई 30 मिमी. या उससे अधिक होती है।
भारत के लिये कपास उत्पादकता मिशन की आवश्यकता क्या है?
- स्थिर उत्पादकता: विश्व में सर्वाधिक क्षेत्रफल (~11.4 मिलियन हेक्टेयर, जो वैश्विक उत्पादन का 21% से अधिक है) होने के बावजूद भारत की रेशे की उत्पादकता लगभग 440 किग्रा/हेक्टेयर पर स्थिर बनी हुई है, जो वैश्विक औसत ~770 किग्रा/हेक्टेयर से काफी कम है।
- कीट संवेदनशीलता: बार-बार होने वाले कीट संक्रमण, विशेष रूप से गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) और सफेद मक्खी (Whitefly), ने फसल उपज को गंभीर रूप से प्रभावित किया है तथा किसानों की उत्पादन लागत को बढ़ा दिया है।
- गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ: पारंपरिक रूप से प्रसंस्कृत भारतीय कपास में उच्च स्तर की अशुद्धियाँ एवं अपशिष्ट होने के कारण अंतर्राष्ट्रीय प्रीमियम बाज़ारों में इसकी प्राप्ति मूल्य ऐतिहासिक रूप से कम रही है।
- आयात निर्भरता: उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों के लिये आवश्यक एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास हेतु घरेलू वस्त्र उद्योग मुख्यतः मिस्र एवं अमेरिका जैसे देशों से आयात पर निर्भर है।
- जलवायु दाब: भारत की लगभग 65% कपास खेती वर्षा-आधारित अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों जैसे विदर्भ, मराठवाड़ा और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में होती है, जिससे यह फसल अनियमित मानसून एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
भारत में कपास की खेती की स्थिति
- कपास, जिसे लोकप्रिय रूप से "व्हाइट गोल्ड" कहा जाता है, भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक फसल है, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग एक-चौथाई योगदान देती है।
- भारत चीन के बाद कपास का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, जिसके पास विश्व स्तर पर खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र है, हालाँकि उत्पादकता के मामले में इसका स्थान काफी नीचे है एवं यह वैश्विक कपास उत्पादन में लगभग 20% का योगदान देता है।
- कपास लगभग 60 लाख किसानों का सहारा है और प्रसंस्करण तथा व्यापार से जुड़े लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करता है। साथ ही यह निर्यात और विदेशी मुद्रा आय में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
- उत्पादन की परिस्थितियाँ: यह एक उपोष्णकटिबंधीय फसल है, जिसे गर्म, धूपयुक्त, पाला-रहित जलवायु और पर्याप्त आर्द्रता की आवश्यकता होती है।
- यह गहरी जलोढ़ मिट्टी (उत्तरी भारत), काली चिकनी मिट्टी (मध्य भारत) तथा लाल-काली मिश्रित मिट्टी (दक्षिणी भारत) में अच्छी तरह उगती है।
- यद्यपि यह कुछ हद तक लवणता सहन कर सकती है, लेकिन जलभराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती है, इसलिये उचित जल निकास बहुत महत्त्वपूर्ण है।
- कपास मुख्यतः खरीफ फसल है, जिसकी बुवाई उत्तरी भारत में अप्रैल–मई की शुरुआत में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में मानसून के दौरान की जाती है।
- कपास उत्पादक राज्य: वर्ष 2024-25 के अनुमानों के अनुसार, भारत में सबसे बड़े कपास उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और कर्नाटक हैं।
- भारत में कपास का अधिकांश उत्पादन 9 प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों से होता है, जिन्हें तीन भिन्न कृषि-जलवायु (एग्रो-इकोलॉजिकल) क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है, जो इस प्रकार हैं:
- उत्तरी क्षेत्र – पंजाब, हरियाणा और राजस्थान
- मध्य क्षेत्र – गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
- दक्षिणी क्षेत्र – तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक
- उपरोक्त के अतिरिक्त, कपास की खेती ओडिशा और तमिलनाडु राज्यों में भी की जाती है।
- भारत में कपास का अधिकांश उत्पादन 9 प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों से होता है, जिन्हें तीन भिन्न कृषि-जलवायु (एग्रो-इकोलॉजिकल) क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है, जो इस प्रकार हैं:
- हाइब्रिड और Bt कपास: हाइब्रिड कपास दो अलग-अलग विशेषताओं वाली मूल किस्मों को आपस में संकरण करके तैयार की जाती है, जो अक्सर पर-परागण के माध्यम से होती है।
- Bt कपास एक आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) किस्म है, जो सामान्य कीटों, विशेषकर बॉलवर्म के प्रति प्रतिरोधी होती है।
- GM शाकनाशी-सहिष्णु कपास को भारत में अभी तक व्यावसायिक खेती के लिये स्वीकृति नहीं मिली है।
कपास उद्योग को समर्थन देने के लिये भारत की पहल
- NFSM के अंतर्गत कपास विकास कार्यक्रम (2014–15)
- राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (2020)
- मेगा निवेश वस्त्र पार्क (MITRA)
- कॉट-एली मोबाइल ऐप
- कपास संवर्द्धन और उपभोग समिति (COCPC)
- भारतीय कपास निगम (CCI): इसकी स्थापना वर्ष 1970 में वस्त्र मंत्रालय के तहत कंपनी अधिनियम 1956 के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) के रूप में की गई थी।
- इसका उद्देश्य किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करना, बाज़ार के उतार-चढ़ाव को स्थिर करना और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कार्यों को लागू करना है।
कपास उत्पादकता मिशन के समक्ष कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं?
- कृषि और जलवायु संबंधी संवेदनशीलताएँ: मिशन द्वारा 'हाई-डेनसिटी प्लांटिंग सिस्टम' (HDPS) और 'क्लोज़र स्पेसिंग' (CS) पर दिया जा रहा जोर काफी हद तक सुनिश्चित नमी (निश्चित सिंचाई या वर्षा) पर निर्भर करता है।
- बिना गारंटीड सूक्ष्म-सिंचाई के, ये तकनीकें सूखे के दौर या अनियमित मानसून के दौरान विफल हो सकती हैं।
- मृदा क्षरण: दशकों से चली आ रही एक-फसल कृषि और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने पारंपरिक कपास बेल्ट में मिट्टी के कार्बनिक कार्बन को गंभीर रूप से कम कर दिया है, जिससे नई उच्च उपज वाली किस्म (HYV) के बीजों की संभावित प्रभावकारिता सीमित हो गई है।
- जैविक खतरे: बीटी कॉटन की शुरुआती सफलता अब कम हो गई है क्योंकि कीटों, विशेष रूप से गुलाबी सुंडी और सफेद मक्खी ने इसके प्रति गंभीर प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।
- वास्तव में कीट-प्रतिरोधी बीजों को विकसित करना, जो विकसित होते जैविक खतरों का सामना कर सकें, एक बड़ी वैज्ञानिक और जमीनी चुनौती बनी हुई है।
- खंडित भू-जोत: अधिकांश भारतीय कपास किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है।
- आधुनिक हस्तक्षेप जैसे कि HDPS और मशीनीकृत कटाई अत्यधिक पूंजी-गहन हैं एवं इन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिये आम तौर पर बड़े और निरंतर भूमि क्षेत्रों (चक) की आवश्यकता होती है।
- मशीनीकृत कटाई का अभाव: जैसे-जैसे ग्रामीण श्रम (मज़दूरी) तेज़ी से दुर्लभ और महँगा होता जा रहा है, हाथों से कपास की तुड़ाई (picking) व्यवहार्य नहीं रह गई है।
- गुणवत्ता नियंत्रण और प्रसंस्करण अंतराल: भारतीय कपास ऐतिहासिक रूप से हाथ से तुड़ाई और पुरानी ओटाई मशीनों के कारण उच्च संदूषण (पत्तों, धूल, मानव बाल) की समस्या से ग्रस्त है।
- यद्यपि मिशन के 'कस्तूरी कॉटन भारत' का लक्ष्य कचरे की मात्रा को 2% से नीचे लाना है, लेकिन वैश्विक मानकों को प्राप्त करने के लिये गहरे तक जमे हुए विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण क्षेत्र के कायाकल्प हेतु भारी पूंजी और व्यवहारगत परिवर्तन की आवश्यकता होगी।
- व्यवहारगत प्रतिरोध: किसानों को पारंपरिक कृषि पद्धतियों के स्थान पर HDPS अपनाने हेतु प्रेरित करने के लिये सघन तकनीकी परामर्श, जोखिम सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली गारंटी और उपयुक्त वित्तीय सहायता प्रदान करना अनिवार्य है।
- बाज़ार और आर्थिक अस्थिरता: स्वामित्व वाले (पेटेंट) बीजों, उर्वरकों और कीट प्रबंधन की बढ़ती लागत किसानों के मुनाफे को कम कर देती है। यदि उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीज और HDPS जैसी तकनीकें पर्याप्त MSP या बेहतर बाज़ार मूल्य सुनिश्चित नहीं करतीं, तो किसानों के ऋणग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है।
कपास उत्पादकता मिशन को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- विस्तार सेवाओं को मज़बूत करना: HDPS और नई बीज किस्मों की सफलता "प्रयोगशाला से भूमि तक" स्थानांतरण पर बहुत अधिक निर्भर करती है। किसानों को सक्रिय रूप से प्रशिक्षित करने के लिये कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (SAU) को एकत्रित किया जाना चाहिये।
- मशीनीकरण को बढ़ावा देना: HDPS का समर्थन करने के लिये, यांत्रिक कपास हार्वेस्टरों के लिये समानांतर सब्सिडी और समर्थन होना चाहिये ताकि तुड़ाई के मौसम के दौरान श्रमिकों की कमी की समस्या का समाधान किया जा सके।
- सिंचाई एकीकरण: इस मिशन को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) - "पर ड्रॉप मोर क्रॉप" जैसी योजनाओं के साथ जोड़ने से यह सुनिश्चित होगा कि उच्च-उपज वाली किस्मों को वर्षा-आधारित क्षेत्रों में सूक्ष्म-सिंचाई के माध्यम से आवश्यक आर्द्रता मिले।
- अगली-पीढ़ी एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): केवल आनुवंशिक रूप से संशोधित बीजों (जैसे- Bt) पर निर्भरता कीट प्रतिरोधकता की ओर ले जाती है।
- इस मिशन को IPM को लागू करना चाहिये, जिसमें फेरोमोन ट्रैप, जैव कीटनाशक और "रिफ्यूज़ क्रॉप" (किनारों पर लगाया गया गैर-Bt कपास) का अनिवार्य रोपण शामिल है ताकि कीटों के अनुकूलन को धीमा किया जा सके।
- भारत की कपास पेटियों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग एक मूक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर रहा है, जिसमें कई किसान उचित सुरक्षा उपकरणों के बिना लंबे समय तक रासायनिक संपर्क में रहने के कारण आँखों के रोग, मोतियाबिंद और यहाँ तक कि अंधेपन से पीड़ित हैं।
- किसानों के स्वास्थ्य और आजीविका की रक्षा के लिये सुरक्षित कृषि पद्धतियाँ, एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM), सब्सिडी वाले सुरक्षा उपकरण एवं बेहतर व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
- डिजिटल कृषि (एग्री-स्टैक): AI और उपग्रह डेटा का लाभ उठाकर किसानों को उनके स्मार्टफोन पर मौसम की अनियमितताओं, मृदा की आर्द्रता एवं प्रारंभिक कीट हमले की चेतावनियों के बारे में हाइपर-लोकल, रीयल-टाइम सलाह प्रदान करना।
निष्कर्ष
कपास उत्पादकता मिशन अकेले सफल नहीं हो सकता। इसके लिये सहकारी संघवाद की आवश्यकता है, जिसमें राज्य कृषि विभाग कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी लें, साथ ही प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और डिजिटल विस्तार सेवाओं में निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी भी हो।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. विश्व में कपास की खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद, भारत को कम उत्पादकता की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारणों की जाँच कीजिये और उपाय सुझाइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कपास उत्पादकता मिशन क्या है?
यह वर्ष 2026-31 के लिये एक ₹5,659 करोड़ की केंद्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य आधुनिक प्रौद्योगिकियों, जलवायु-अनुकूल बीजों और मूल्य शृंखला सुधारों के माध्यम से कपास की उपज़, गुणवत्ता एवं किसानों की आय में वृद्धि करना है।
2. एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
ELS कपास प्रीमियम वस्त्र विनिर्माण के लिये आवश्यक है और भारत वर्तमान में घरेलू मांग को पूरा करने के लिये मिस्र एवं संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
3. भारत में कपास की कृषि के प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
प्रमुख चुनौतियों में स्थिर उत्पादकता, गुलाबी सुंडी और सफेद मक्खी जैसे कीटों का हमला, जलवायु संवेदनशीलता, छोटे-छोटे भूमि जोत और प्रसंस्करण के दौरान उच्च संदूषण शामिल हैं।
4. कस्तूरी कॉटन भारत क्या है?
कस्तूरी कॉटन भारत एक ब्रांडिंग पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय कपास को एक प्रीमियम, सतत और वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय उत्पाद के रूप में स्थापित करना है, साथ ही संदूषण स्तर को 2% से कम करना है।
5. Bt कपास किसानों की कैसे मदद करता है?
Bt कपास एक आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास की किस्म है जो बॉलवर्म कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती है, जिससे फसल सुरक्षा और उत्पादकता में सुधार करने में मदद मिलती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में काली कपास मृदा की रचना, निम्नलिखित में से किसके अपक्षयण से हुई है? (2021)
(a) भूरी वन मृदा
(b) विदरी (फिशर) ज्वालामुखीय चट्टान
(c) ग्रेनाइट और शिस्ट
(d) शेल और चूना-पत्थर
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. भारत के एक राज्य में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं: (2011)
- इसका उत्तरी भाग शुष्क और अर्द्ध शुष्क है।
- इसका मध्य भाग कपास का उत्पादन करता है।
- नकदी फसलों की खेती खाद्य फसलों पर प्रमुख है।
निम्नलिखित में से किस राज्य में उपरोक्त सभी विशेषताएँ हैं?
(a) आंध्र प्रदेश
(b) गुजरात
(c) कर्नाटक
(d) तमिलनाडु
उत्तर: (b)
प्रश्न 3. “यह फसल उपोष्ण प्रकृति की है। उसके लिये कठोर पाला हानिकारक है। विकास के लिये उसे कम-से-कम 210 पाला - रहित दिवसों और 50 - 100 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। हल्की सुअपवाहित मृदा जिसमें नमी धारण करने की क्षमता है उसकी खेती के लिये आदर्श रूप से अनुकूल है।" यह फसल निम्नलिखित में से कौन-सी है? (2020)
(a) कपास
(b) जूट
(c) गन्ना
(d) चाय
उत्तर: A
मेन्स
प्रश्न. भारत में अत्यधिक विकेंद्रित सूती वस्त्र उद्योग के कारकों का विश्लेषण कीजिये। (2013)
शासन व्यवस्था
सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन
प्रिलिम्स के लिये: सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम, 2021, IT अधिनियम, 2000, सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026, सेफ हार्बर संरक्षण, सहयोग पोर्टल, अनुच्छेद 19(2), भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023, डीपफेक, चलचित्र अधिनियम, 1952, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971, के.एस. पुट्टास्वामी मामला (2017)।
मेन्स के लिये: भारत में सेंसरशिप के विभिन्न प्रावधान। सेंसरशिप की आवश्यकता और इससे संबंधित चुनौतियाँ तथा सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये आवश्यक कदम।
चर्चा में क्यों?
ऑनलाइन सामग्री को सेंसर करने के लिये केंद्र सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम, 2021 और IT अधिनियम, 2000 के बढ़ते उपयोग से भारत में लोकतांत्रिक विमर्श एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक महत्त्वपूर्ण चुनौती उत्पन्न हो गई है।
सारांश
- भारत का डिजिटल सेंसरशिप परिदृश्य IT नियमों में संशोधनों और सहयोग पोर्टल जैसे उपकरणों के माध्यम से बदल रहा है, जो कार्यपालिका का उल्लंघन पर चिंताएँ बढ़ा रहा है।
- हालाँकि इन उपायों का उद्देश्य सुरक्षा और AI-जनित खतरों से निपटना है, फिर भी ये न्यायिक निरीक्षण को दरकिनार करने का जोखिम रखते हैं।
- लोकतांत्रिक अखंडता के लिये पारदर्शिता सुनिश्चित करना और आनुपातिकता परीक्षण का पालन करना महत्त्वपूर्ण है।
भारत में सेंसरशिप से संबंधित हालिया चिंताएँ क्या हैं?
- कानूनी प्रावधानों का शस्त्रीकरण: आलोचकों का तर्क है कि सरकार IT अधिनियम, 2000 की धारा 69A और 79(3)(b) का लाभ उठाकर सामग्री और संपूर्ण अकाउंट के निष्कासन का आदेश दे रही है, जिसका केंद्र अक्सर स्वतंत्र मीडिया और राजनीतिक विपक्ष होता है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 के लिये मेटा एवं एक्स जैसे प्लेटफॉर्मों को 3 घंटे की समय-सीमा में सामग्री हटाने का अनुपालन करना आवश्यक है; ऐसा न करने पर “सेफ हार्बर” संरक्षण खोने का जोखिम है, जो कर्मचारियों के लिये संभावित आपराधिक दायित्व भी बनता है।
- IT अधिनियम, 2000 की धारा 69A, केंद्र सरकार को राष्ट्रीय संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिये ऑनलाइन जानकारी को ब्लॉक करने का अधिकार देती है।
- धारा 79(3)(b) के तहत, यदि मध्यवर्ती अवैध सामग्री को तुरंत नहीं हटाते या उसकी पहुँच को अक्षम नहीं करते हैं, तो वे अपनी "सेफ हार्बर” संरक्षण खो देते हैं।
- न्यायिक मिसालों का कमज़ोर पड़ना: वर्तमान प्रथाएँ ऐतिहासिक मामले श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में स्थापित अवैधता के "वास्तविक ज्ञान" की आवश्यकता को दरकिनार करती होती हैं।
- सहयोग पोर्टल: देश भर की पुलिस के लिये सहयोग पोर्टल खोलने ने धारा 79(3)(b) के तहत सामग्री हटाने के अनुरोधों को "सुपरचार्ज" कर दिया है, जो बिना औपचारिक संसदीय विधान के प्रभावी रूप से एक सेंसरशिप रबर स्टैम्प के रूप में कार्य कर रहा है।
- पारदर्शिता का अभाव: सेंसरशिप बुनियादी ढाँचा गोपनीयता के पर्दे के पीछे कार्य करता है, जहाँ सरकार विमर्श हस्तक्षेपों की मात्रा या औचित्य पर सार्थक डेटा प्रकाशित करने में विफल रहती है।
- मध्यवर्ती (इंटरमीडियरी) अनुपालन: अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों ने न्यायालय में उन्हें चुनौती देने के बजाय, सामग्री हटाने के नोटिसों को स्वचालित रूप से संसाधित करना चुना है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा से अधिक कानूनी सुविधा को प्राथमिकता देता है।
भारत में सेंसरशिप के लिये विभिन्न प्रावधान क्या हैं?
- परिचय: सेंसरशिप भाषण, सार्वजनिक संचार या अन्य सूचनाओं को इस आधार पर दबाना है कि ऐसी सामग्री को आपत्तिजनक, हानिकारक, संवेदनशील या "असुविधाजनक" माना जाता है। यह सरकारी अधिकारियों और निजी संस्थानों दोनों द्वारा विशिष्ट राजनीतिक, नैतिक या सामाजिक मूल्यों को लागू करने के लिये किया जाता है।
- संवैधानिक सीमाएँ: भारत में सेंसरशिप संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत "उचित प्रतिबंधों" की धारा से कानूनी रूप से बंधी है। सरकार केवल तभी सामग्री को सेंसर कर सकती है जब वह प्रभावित करती है:
- राज्य की सुरक्षा
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता
- अदालत की अवमानना या अपराध के लिये उकसावा
- भाषण और सार्वजनिक व्यवस्था: भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 152 उन कृत्यों (जिनमें इलेक्ट्रॉनिक संचार भी शामिल है) को दंडित करती है जो अलगाववाद को भड़काते हैं या भारत की एकता और अखंडता को खतरे में डालते हैं। इसने पुरानी IPC धारा 124A (राजद्रोह) का स्थान ले लिया है।
- डिजिटल सामग्री: इंटरनेट पर सेंसरशिप का नियमन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा आईटी नियम (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता), 2021 के तहत किया जाता है।
- आईटी नियम, 2021 में संशोधन (2026 संशोधन): वर्ष 2026 के संशोधन के अनुसार, प्लेटफॉर्म्स को ‘हानिकारक AI-जनित सामग्री’ (जैसे- डीपफेक) या ‘कृत्रिम रूप से उत्पन्न सूचना’ को चिह्नित किये जाने के बाद तीन घंटे की अवधि के भीतर उसे हटाना अनिवार्य किया गया है।
- OTT प्लेटफॉर्म्स का नियमन: OTT प्लेटफॉर्म्स, जो CBFC के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं, उन्हें आईटी नियम, 2021 के तहत नियंत्रित किया जाता है। इन नियमों के अंतर्गत आचार संहिता का पालन अनिवार्य है, जिसके अनुसार OTT प्लेटफॉर्म्स को आयु-आधारित सामग्री वर्गीकरण लागू करना होगा तथा किसी भी अवैध सामग्री के प्रकाशन से सख्ती से बचना होगा।
- फिल्म सेंसरशिप: सेंसरशिप ऑफ फिल्म्स का अधिकार केवल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास है, जो सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 (तथा 2023 संशोधन) के तहत कार्य करता है। यह एकमात्र वैधानिक निकाय है जो किसी फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन से पूर्व प्रामाणित करता है। CBFC किसी फिल्म में काट-छाँट (Cuts), संशोधन (Modifications) का निर्देश दे सकता है या यदि फिल्म ‘राज्य की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था’ के हितों के विरुद्ध पाई जाती है, तो उसे प्रमाण-पत्र देने से पूर्णतः इनकार भी कर सकता है।
- फिल्मों को U (सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु उपयुक्त), UA (माता-पिता की मार्गदर्शन सहित), A (केवल वयस्कों हेतु) या S (विशिष्ट दर्शक समूह हेतु) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। वर्ष 2023 के संशोधन में UA श्रेणी के भीतर आयु-आधारित उप-श्रेणियाँ (UA 7+, UA 13+, UA 16+) को भी शामिल किया गया है।
- के.ए. अब्बास बनाम भारत संघ मामला (1970) में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्मों पर पूर्व-सेंसरशिप को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक उचित प्रतिबंध के रूप में बनाए रखा था, यह मानते हुए कि फिल्मों का दृश्य प्रभाव विशेष और अधिक शक्तिशाली होता है।
- प्रिंट मीडिया और प्रकाशन: प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम, 1867 (संशोधित रूप में) के अंतर्गत समाचार-पत्रों और पुस्तकों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है; यह नियामक निगरानी के लिये उपयोग होता है।
- आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतिकूल जानकारी के प्रकाशन को प्रतिबंधित करता है।
- प्रसारण एवं केबल टेलीविज़न: केबल टेलीविज़न नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 के अंतर्गत प्रोग्राम कोड और विज्ञापन कोड लागू लिये गए हैं। ये ऐसे विषय-वस्तु को प्रतिबंधित करते हैं जो शालीनता, नैतिकता या लोक व्यवस्था को आहत करे अथवा मैत्रीपूर्ण देशों की आलोचना करे।
- अन्य संबंधित प्रावधान: अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 न्यायपालिका को बदनाम करने या निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित करने वाली रिपोर्टिंग पर रोक लगाता है। दूरसंचार अधिनियम, 2023 संचार की निगरानी और प्रतिबंध लगाने से संबंधित व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है, विशेषकर सुरक्षा और नियामक उद्देश्यों हेतु।
सेंसरशिप की आवश्यकता और संबंधित चुनौतियाँ क्या हैं?
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श्रेणी |
आवश्यकता |
चुनौतियाँ |
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राष्ट्रीय सुरक्षा |
संप्रभुता एवं अखंडता: यदि सामग्री भारत की क्षेत्रीय अखंडता (जैसे- गलत मानचित्र) को जोखिम में डालती है या सशस्त्र विद्रोह/अलगाववादी आंदोलनों को प्रेरित करती है, तो उसे सेंसर किया जाता है। |
अस्पष्ट परिभाषाएँ: ‘राज्य की सुरक्षा’ या ‘लोक व्यवस्था’ जैसे शब्दों की व्यापक व्याख्या होने से वैध असहमति का दमन हो सकता है। |
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सामाजिक सद्भाव |
सांप्रदायिक सुरक्षा: यह एक ‘निवारक उपाय’ के रूप में कार्य करता है, ताकि उत्तेजक भाषण से दंगे या भीड़ हिंसा जैसी स्थिति उत्पन्न न हो (जिसे ‘स्पष्ट एवं वर्तमान जोखिम’ कहा जाता है)। |
‘मौन कराने का प्रभाव’: एक समूह की सुरक्षा के नाम पर सेंसरशिप ‘हेकलर वीटो’ का कारण बन सकती है, जहाँ एक छोटा लेकिन मुखर समूह किसी भी रचनात्मक सामग्री को रोक देता है। |
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नाबालिगों की सुरक्षा |
मनोवैज्ञानिक संरक्षण: राज्य की संरक्षक राज्य (Parens Patriae) की भूमिका के तहत बच्चों के मानसिक विकास को ‘हानिकारक’ या ‘शोषणकारी’ सामग्री से बचाना आवश्यक है। |
डिजिटल सीमाहीनता: इंटरनेट और VPN के कारण नाबालिगों को प्रतिबंधित सामग्री से पूरी तरह रोकना लगभग असंभव हो गया है। |
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सूचना की सत्यनिष्ठा |
डिजिटल सत्यता: ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग में डीपफेक और फर्जी खबरों के माध्यम से आर्थिक या चुनावी प्रणाली को अस्थिर करने वाली ‘संज्ञानात्मक हैकिंग’ को रोकना आवश्यक है। |
तकनीकी अंतराल: नियामक संस्थाएँ AI की तेज गति के साथ तालमेल नहीं बैठा पातीं; ‘3 घंटे में हटाने’ के आदेश तक सामग्री पहले ही वायरल हो चुकी होती है। |
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लोक नैतिकता |
सामुदायिक मानक: जब सामग्री को “अश्लील” माना जाता है (हिकलिन टेस्ट के अनुसार जो नैतिक रूप से भ्रष्ट करने वाली हो), तब राज्य हस्तक्षेप करता है। |
विषयपरकता: ‘अश्लील’ या ‘अनैतिक’ की परिभाषा अत्यधिक व्यक्तिपरक होती है, जो पीढ़ियों और क्षेत्रों के अनुसार बदलती रहती है, जिससे असंगत प्रवर्तन होता है। |
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न्यायिक अखंडता |
न्याय का निष्पक्ष प्रशासन: ‘ट्रायल बाय मीडिया’ को रोकने के लिये, जिससे उप-न्यायाधीन मामलों पर पूर्वाग्रह उत्पन्न हो सकता है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। |
सूचना का अधिकार: अत्यधिक सेंसरशिप से पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है और जनता के खुले एवं पारदर्शी न्यायिक प्रणाली के अधिकार से टकराव हो सकता है। |
सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने के लिये किन कदमों की आवश्यकता है?
- आनुपातिकता परीक्षण का अनुपालन: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रतिबंध को के.एस. पुट्टास्वामी मामले (2017) में स्थापित चार-स्तरीय परीक्षण को पूरा करना चाहिये:
- वैधता: कार्रवाई स्पष्ट कानून द्वारा समर्थित होनी चाहिये।
- आवश्यकता: इसका उद्देश्य राज्य के किसी वैध लक्ष्य की पूर्ति होना चाहिये।
- अनुपातिकता: उपाय ऐसा होना चाहिये जो लक्ष्य प्राप्त करने का सबसे कम प्रतिबंधात्मक तरीका हो।
- प्रक्रियात्मक सुरक्षा: दुरुपयोग रोकने के लिये पर्याप्त निगरानी और नियंत्रण तंत्र होना चाहिये।
- स्पष्ट और सटीक परिभाषाएँ: "क्षोभ", "आपत्तिजनक" या "फेक न्यूज़" जैसे अस्पष्ट शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिये ताकि व्यक्तिपरक व्याख्या को रोका जा सके। यह "चिलिंग इफेक्ट" को रोकता है, जहाँ निर्माता कानूनी परिणामों के डर से स्वयं को सेंसर करने लगते हैं।
- न्यायिक निगरानी और समीक्षा: धारा 69A, IT अधिनियम 2000 के तहत जारी किये जाने वाले टेकडाउन आदेशों को आदर्श रूप से केवल कार्यपालिका के निर्णय पर छोड़ने के बजाय पूर्व न्यायिक जाँच के अधीन होना चाहिये। जैसा कि अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में रेखांकित किया गया, इन आदेशों में पारदर्शिता अनिवार्य है, ताकि उनके विरुद्ध कानूनी चुनौती दी जा सके।
- स्वतंत्र निगरानी निकाय: एक स्वायत्त 'डिजिटल अधिकार लोकपाल' या एक बहु-हितधारक निकाय (जिसमें नागरिक समाज और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हों) की स्थापना करना सामग्री संबंधी विवादों का निष्पक्ष रूप से निपटारा करने में मदद कर सकता है, जिससे कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप के जोखिम को कम किया जा सकता है।
- हटाने की कार्रवाई में पारदर्शिता: सरकार और प्लेटफॉर्मों को विस्तृत पारदर्शिता रिपोर्ट प्रकाशित करनी चाहिये। इन रिपोर्टों में अनुरोधों की संख्या, उपयोग किये गए विशिष्ट कानूनी आधार और उपयोगकर्त्ताओं द्वारा सफलतापूर्वक अपील की गई सामग्री का प्रतिशत शामिल होना चाहिये।
- सुदृढ़ शिकायत निवारण: IT नियम, 2021 के तहत त्रि-स्तरीय तंत्र को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उपयोगकर्त्ताओं के पास अपील करने का सार्थक अधिकार हो। प्लेटफॉर्मों के लिये यह अनिवार्य होना चाहिये कि वे प्रभावित उपयोगकर्त्ता को किसी भी सामग्री को हटाने का लिखित आधार (तर्क) प्रदान करें।
- मध्यस्थ संरक्षण को सुदृढ़ करना: "सेफ हार्बर" प्रावधान (धारा 79) को संरक्षित किया जाना चाहिये। मध्यस्थों को केवल तभी उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिये जब वे अदालत के आदेश या विशिष्ट, कानूनी रूप से वैध सरकारी अधिसूचना पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, न कि उन पर सक्रिय और स्वचालित सेंसरशिप के लिये दबाव डाला जाना चाहिये।
निष्कर्ष
बदलते डिजिटल परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा और अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाना आवश्यक है। हालाँकि डीपफेक व भ्रामक सूचनाओं पर अंकुश लगाना महत्त्वपूर्ण है, फिर भी राज्य को प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिये। अधिनायकवादी अतिरेक को रोकने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिये सुधारों में स्वतंत्र निगरानी, संकीर्ण कानूनी परिभाषाएँ तथा सुदृढ़ शिकायत निवारण तंत्र शामिल होना चाहिये।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से की जाने वाली सेंसरशिप अक्सर वैध असहमति को दबाने का एक साधन बन जाती है।" इंटरनेट गवर्नेंस पर भारत के कानूनी ढाँचे के संदर्भ में इसका आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. IT अधिनियम के तहत 'सेफ हार्बर' सुरक्षा क्या है?
यह धारा 79, IT अधिनियम 2000 के तहत प्रदान की गई एक कानूनी छूट है, जो मध्यस्थों को तृतीय-पक्ष डेटा के लिए उत्तरदायित्व से बचाती है, बशर्ते वे आवश्यक सतर्कता का पालन करें और “वास्तविक जानकारी” मिलने पर अवैध सामग्री को शीघ्रता से हटा दें।
2. श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) के फैसले ने ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर क्या प्रभाव डाला?
सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 66A को अस्पष्ट और अत्यधिक व्यापक होने के कारण रद्द कर दिया, यह ज़ोर देते हुए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध सीमित एवं स्पष्ट होने चाहिये तथा हटाने के लिये “वास्तविक जानकारी/ज्ञान” तभी माना जाएगा जब उसके लिये अदालत या सरकारी आदेश हो।
3. भारतीय संविधान में उल्लिखित 'उचित प्रतिबंध' क्या हैं?
अनुच्छेद 19(2) के तहत, राज्य भाषण/अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ विशेष आधारों पर प्रतिबंध लगा सकता है, जिनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार एवं न्यायालय की अवमानना शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्भूत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है? (2018)
(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध।
(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये राज्य के नीति के निर्देशक तत्त्व।
(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की गई स्वतंत्रताएँ।
(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध।
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. आप 'वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य' संकल्पना से क्या समझते हैं? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (2014)
मुख्य परीक्षा
भारत के जल-ऊर्जा-खाद्य नेक्सस का पुनर्संतुलन
चर्चा में क्यों?विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट ‘नरिश एंड फ्लरिश’ में चेतावनी दी है कि वैश्विक खाद्य प्रणालियाँ जलवैज्ञानिक वास्तविकताओं के साथ असंगत हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा के समक्ष जोखिम उत्पन्न हो रहा है। इस चिंता को अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भी पुष्ट किया है, जिसने रेखांकित किया है कि ऊर्जा आघातों खाद्य एवं जल संकटों की शृंखलाबद्ध स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं।
- भारत के संदर्भ में, सब्सिडी युक्त विद्युत तथा जल-गहन फसलों पर आधारित कृषि प्रणाली ने असतत जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) नेक्सस को विकसित किया है, जो दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय संतुलन एवं खाद्य सुरक्षा के लिये जोखिम उत्पन्न करता है।
जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) नेक्सस से संबंधित वर्तमान चुनौतियाँ क्या हैं?
- जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) नेक्सस: WEF नेक्सस जल, ऊर्जा एवं खाद्य प्रणालियों की गहन अंतर्संबद्ध प्रकृति को संदर्भित करता है।
- खाद्य हेतु जल (Water for Food): भारत में कृषि स्वच्छ जल की सबसे बड़ी उपभोक्ता है, जो कुल जल उपयोग का 85% से अधिक भाग उपभोग करती है। इसका अधिकांश हिस्सा भूजल से प्राप्त किया जाता है।
- जल हेतु ऊर्जा (Energy for Water): इस भूजल के दोहन के लिये भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। कृषि पंपिंग भारत की कुल विद्युत खपत का लगभग 20% उपभोग करती है।
- नीति-प्रेरित असंतुलन (Policy-Driven Imbalance): कृषि हेतु निशुल्क या अत्यधिक सब्सिडीयुक्त विद्युत प्रदान करने वाली राज्य नीतियाँ जल-अभाव वाले क्षेत्रों (जैसे- पंजाब एवं महाराष्ट्र) में धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों की खेती के लिये भूजल के अति-दोहन को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करती हैं।
चुनौतियाँ
- गंभीर भूजल क्षरण: केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा जारी डायनामिक भूजल संसाधन मूल्यांकन रिपोर्ट 2025 अनुसार, उत्तर-पश्चिमी एवं दक्षिण भारत के अनेक राज्यों को अत्यधिक दोहित श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
- पंजाब-हरियाणा मॉडल, जिसके अंतर्गत अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान (एक अत्यधिक जल-खपत वाली फसल) की खेती की जाती है, जलवैज्ञानिक दृष्टि से असतत है। अत्यधिक सिंचाई के कारण यहाँ भूजल स्तर प्रतिवर्ष 1 मीटर से अधिक की दर से घट रहा है।
- विश्व बैंक के अनुसार, यदि वर्तमान कृषि जल प्रणालियों में अक्षमताएँ बनी रहती हैं, तो वर्ष 2050 तक ये प्रणालियाँ वैश्विक जनसंख्या के केवल एक-तिहाई हिस्से की खाद्य आवश्यकताओं को ही सतत रूप से पूरा कर पाएंगी।
- विकृत फसल प्रतिरूप: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तथा असीमित खरीद व्यवस्था धान एवं गेहूँ को अत्यधिक प्राथमिकता प्रदान करती है।
- यह फसल विविधीकरण को हतोत्साहित करता है, जिससे किसान दलहन, तिलहनों एवं मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसी पारिस्थितिकीय रूप से उपयुक्त एवं सूखा-सहिष्णु फसलों से दूर होते जाते हैं।
- पावर DISCOMs पर वित्तीय बोझ: कृषि क्षेत्र को सब्सिडीयुक्त अथवा निशुल्क बिजली उपलब्ध कराने से राज्य स्वामित्व वाली विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOM) पर भारी वित्तीय दबाव पड़ता है, जिससे ऋणग्रस्तता तथा अप्रभावी अवसंरचना अनुरक्षण का दुष्चक्र उत्पन्न होता है।
- भारत बिजली सब्सिडी पर वार्षिक 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है, साथ ही बड़े पैमाने पर कृषि सहायता भी दी जाती है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा पानी और ऊर्जा के अकुशल उपयोग को बढ़ावा देता है।
- कृषि में उच्च ऊर्जा निर्भरता: भारत में सिंचाई काफी हद तक बिजली और डीज़ल पर निर्भर है, जो कृषि को 'तेल कीमतों की अस्थिरता' के प्रति संवेदनशील बनाती है, विशेष रूप से तब जब देश अपनी आवश्यकता का 85-90% कच्चा तेल आयात करता है। तेल की बढ़ती कीमतें आयात बिल, राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति को बढ़ा देती हैं, जिससे कृषि क्षेत्र वैश्विक व्यवधानों के सीधे प्रभाव में आ जाता है।
- PM-KUSUM (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान) जैसी पहलों का उद्देश्य कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित करना है, ताकि डिस्कॉम (बिजली वितरण कंपनियों) पर बोझ कम हो सके और स्वच्छ ऊर्जा प्रदान की जा सके।
- हालाँकि यदि इसका सावधानीपूर्वक नियमन न किया जाए, तो दिन में उपलब्ध ‘मुफ्त’ सौर ऊर्जा भूजल के और अधिक निर्मम एवं अनियंत्रित दोहन को बढ़ावा दे सकती है।
- वर्चुअल वाटर का निर्यात: भारत चावल और चीनी का एक प्रमुख वैश्विक निर्यातक है। इन जल-गहन वस्तुओं का निर्यात करके भारत वस्तुतः अरबों लीटर “वर्चुअल वाटर” का निर्यात कर रहा है, जिससे देश के भीतर जल-संकट और अधिक गंभीर हो रहा है।
- फ्रैगमेंटेड गवर्नेस: जल, ऊर्जा और कृषि से संबंधित नीतियाँ अलग-अलग (साइलो में) संचालित होती हैं, जिससे समग्र प्रणाली की की अनुकूलन क्षमता कमज़ोर हो जाती है।
जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) प्रणालियों के संरक्षण से संबंधित भारत की पहलें
- राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
- सही फसल अभियान (राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गत)
- अटल भूजल योजना
- श्री अन्न (राष्ट्रीय बाजरा संवर्द्धन)
- BioE3 नीति
- प्राकृतिक खेती हेतु राष्ट्रीय मिशन
जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) प्रणालियों को संरेखित करने हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?
- फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना और MSP का पुनर्संरेखण: “कैलोरी सुरक्षा” से आगे बढ़कर “पोषणीय और पारिस्थितिक सुरक्षा” की ओर संक्रमण की अत्यंत आवश्यकता है।
- MSP ढाँचे को उन फसलों को प्रोत्साहित करने के लिये पुनर्गठित किया जाना चाहिये जो विशिष्ट कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल हों। उदाहरण के लिये, राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों और दक्कन के पठार में 'श्री अन्न' (मोटे अनाज/मिलेट्स) को बढ़ावा देना।
- विद्युत् सब्सिडी का युक्तिकरण: मुफ्त बिजली प्रदान करने के बजाय, राज्य सरकारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) मॉडल की ओर बढ़ना चाहिये।
- किसानों को एक निश्चित मौद्रिक सब्सिडी प्रदान की जा सकती है, जिससे उन्हें बिजली की बचत (और परिणामस्वरूप जल संरक्षण) के लिये प्रोत्साहित किया जा सके।
- PM-KUSUM योजना के अंतर्गत किसानों को अतिरिक्त सौर ऊर्जा ग्रिड को बेचने के लिये पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। बिजली को “नकदी फसल” के रूप में देखने से किसान केवल आवश्यक मात्रा में ही जल का उपयोग करेंगे।
- जल उपयोग दक्षता (WUE) को बढ़ाना: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) – 'प्रति बूंद अधिक फसल' (Per Drop More Crop) के तहत सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (ड्रिप और स्प्रिंकलर) का आक्रामक प्रचार और प्रसार करना।
- पारंपरिक बाढ़ सिंचाई से सटीक खेती और IoT-आधारित मृदा नमी निगरानी की ओर संक्रमण।
- पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देना: ज़ीरो टिलेज, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और जैविक खेती जैसी प्रथाओं को अपनाना, जो मृदा स्वास्थ्य में सुधार करती हैं, जल धारण क्षमता बढ़ाती हैं एवं रासायनिक उर्वरकों (जिनके उत्पादन में अत्यधिक ऊर्जा लगती है) पर निर्भरता कम करती हैं।
- जल लेखांकन और बजटिंग का क्रियान्वयन: अटल भूजल योजना जैसी योजनाओं में देखे गए ग्राम-स्तरीय जल बजटिंग को व्यापक स्तर पर लागू किया जाना चाहिये। स्थानीय समुदायों को अपने भूजल भंडार का प्रबंधन करने और उपलब्ध जल बजट के आधार पर फसल पैटर्न तय करने के लिये सशक्त बनाया जाना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत की खाद्य सुरक्षा को अपनी जल और ऊर्जा सुरक्षा की कीमत पर बनाए नहीं रखा जा सकता है। "उत्पादन-केंद्रित" दृष्टिकोण से "पारिस्थितिकी-केंद्रित" दृष्टिकोण की ओर एक आदर्श परिवर्तन आवश्यक है। कृषि नीति-निर्माण में जल विज्ञान संबंधी वास्तविकताओं और ऊर्जा संबंधी अर्थशास्त्र को एकीकृत करके, भारत जलवायु-अनुकूल कृषि सुनिश्चित कर सकता है, किसानों की आजीविका सुरक्षित कर सकता है एवं भविष्य की पीढ़ियों के लिये अपने महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा से अविभाज्य हैं।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. जल-ऊर्जा-खाद्य (WEF) अंतर्संबंध क्या है?
यह जल, ऊर्जा और खाद्य प्रणालियों के बीच परस्पर निर्भरता को संदर्भित करता है, जहाँ एक क्षेत्र में परिवर्तन सीधे अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।
2. भारत में भूजल की कमी एक प्रमुख चिंता का विषय क्यों है?
कृषि मीठे जल के उपयोग का 85% से अधिक उपभोग करती है, जिसमें सब्सिडी वाली बिजली और अधिक जल वाली फसलों के कारण अत्यधिक दोहन होता है।
3. PM-KUSUM का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित करना, DISCOM (वितरण कंपनियों) का बोझ कम करना तथा किसानों को स्वच्छ ऊर्जा और आय के अवसर प्रदान करना है।
4. कृषि में 'आभासी जल' (Virtual Water) क्या है?
यह फसलों में निहित जल को संदर्भित करता है; जल-अनुकूल फसलों (जैसे- चावल) का निर्यात करने का अर्थ है बड़ी मात्रा में जल का निर्यात करना।
5. फसल विविधीकरण WEF अंतर्संबंध को कैसे मदद कर सकता है?
कदन्न जैसी शुष्कतारोधी फसलों की ओर परिवर्तन से जल का उपयोग कम होता है, ऊर्जा की मांग घटती है और जलवायु अनुकूलन बढ़ता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- भारत में 'जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)' दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (CCAFS) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है।
- CCAFS परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (CGIAR) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय फ्राँस में है।
- भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्द्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT), CGIAR के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में से किन्हें कृषि में सार्वजनिक निवेश माना जा सकता है? (2020)
- सभी फसलों के कृषि उत्पाद के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना
- प्राथमिक कृषि साख समितियों का कंप्यूटरीकरण
- सामाजिक पूंजी विकास
- कृषकों को निशुल्क बिजली की आपूर्ति
- बैंकिंग प्रणाली द्वारा कृषि ऋण की माफी
- सरकारों द्वारा शीतागार सुविधाओं को स्थापित करना
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 5
(b) केवल 1, 3, 4 और 5
(c) केवल 2, 3 और 6
(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र, फसल बीमा की आवश्यकता की विवेचना कीजिये और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी० एम० एफ० बी० वाई०) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2016)
प्रश्न. भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकारों की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिये। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है? (2017)
