प्रारंभिक परीक्षा
NGT द्वारा दक्षिणी राज्यों पर वायु प्रदूषण नियंत्रण
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दक्षिणी क्षेत्र ने दक्षिणी राज्यों और पुडुचेरी को निर्देश दिया है कि वे राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत राज्य कार्य योजनाओं (SAP) को सख्ती से लागू करना अन्यथा NCAP निधियों के कम उपयोग पर "पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति" (ज़ुर्माना) का सामना करना पड़ेगा।
NGT द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे क्या हैं?
- अनुपातहीन व्यय: कर्नाटक जैसे राज्यों ने धन का भारी उपयोग सड़क धूल नियंत्रण (86%) पर किया, जबकि वाहन उत्सर्जन (6.6%) और जैविक दहन (4.1%) को काफी हद तक नज़रअंदाज़ कर दिया।
- सीमाओं का उल्लंघन: एलूर, कलबुर्गी, हैदराबाद और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में PM2.5 और PM10 का स्तर वर्तमान में WHO दिशा-निर्देशों से 4 से 6 गुना अधिक है।
- वायुक्षेत्र दृष्टिकोण: NGT ने दक्षिणी राज्यों के बीच "वायुक्षेत्र-स्तरीय समन्वय" के लिये संस्थागत व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया है (वायु प्रदूषण का प्रबंधन राज्य की राजनीतिक सीमाओं के बजाय भौगोलिक/मौसम संबंधी सीमाओं के आधार पर करना)।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) क्या है?
- NCAP (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम): राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP), 2019 में भारत के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा शुरू किया गया था। यह वायु प्रदूषण को कम करने के लिये एक राष्ट्रीय स्तरीय रणनीति है।
- NCAP एक 5-वर्षीय योजना है जिसे वर्ष 2019 में शुरू किया गया था, लेकिन वायु प्रदूषण के परिणामों में बदलाव लाने में अधिक समय लगता है, इसलिये समीक्षा के बाद इसे 20–25 वर्षों के लिये बढ़ाया जा सकता है।
- लक्ष्य: राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का उद्देश्य 2017–18 के आधार वर्ष की तुलना में 2024–25 तक PM10 स्तर में 20–30% की कमी करना था, जिसे बाद में संशोधित कर 2025–26 तक 40% तक कमी या राष्ट्रीय मानक (60 µg/m³) प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया। हालाँकि यह लक्ष्य अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है।
- लक्षित शहर: NCAP भारत के प्रत्येक शहर पर समान रूप से लागू नहीं होता है। यह विशेष रूप से 130 ‘नॉन-अटेनमेंट शहरों’ को लक्षित करता है।
- गैर-प्राप्ति शहर भारत के वे शहरी क्षेत्र हैं, जो पाँच वर्षों की अवधि में प्रदूषकों के लिये निर्धारित राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) को लगातार पूरा करने में असफल रहे हैं।
- कार्यान्वयन रणनीति: इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन की निगरानी राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा और राज्य स्तर पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) द्वारा की जाती है।
- शहरी कार्य योजना: स्थानीय स्तर पर धूल नियंत्रण, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी, अपशिष्ट प्रबंधन और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण पर केंद्रित योजनाएँ।
- राज्य कार्य योजनाएँ (SAPs): NCAP के तहत, राज्य कार्य योजनाएँ (SAP) पूरे राज्य या केंद्रशासित प्रदेश (UT) को कवर करती हैं। इसमें NCAP के अंतर्गत आने वाले और न आने वाले (non-NCAP), दोनों ही क्षेत्र शामिल होते हैं और इनके लिये एक स्पष्ट वित्तपोषण तंत्र की व्यवस्था होती है।
- ये योजनाएँ उत्सर्जन सूची और क्षेत्र-वार कटौती रणनीतियों पर आधारित हैं, जिन्हें शहर की कार्य योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये राज्य-स्तरीय नीतिगत हस्तक्षेपों का समर्थन प्राप्त है।
- संस्थागत ढाँचा: इसमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के स्तर पर एक शीर्ष समिति (Apex Committee) के साथ-साथ राज्य-स्तरीय और शहर-स्तरीय समितियाँ शामिल हैं।
- वित्तपोषण: धनराशि 15वें वित्त आयोग और अन्य योजनाओं जैसे स्वच्छ भारत मिशन (शहरी), स्मार्ट सिटी मिशन तथा फेम-II (FAME-II) के माध्यम से जारी की जाती है।
- निगरानी: PRANA पोर्टल वायु गुणवत्ता प्रबंधन, निगरानी डेटा और परियोजनाओं की वित्तीय स्थिति से संबंधित जानकारी तक सार्वजनिक पहुँच प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न: हमारे देश के शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक के मूल्य की गणना में सामान्यतः निम्नलिखित में से किस वायुमंडलीय गैस को ध्यान में रखा जाता है? (2016)
- कार्बन डाइऑक्साइड
- कार्बन मोनोऑक्साइड
- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
- सल्फर डाइऑक्साइड
- मीथेन
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर के सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 4 और 5
(d) 1,2,3,4 और 5
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा हाल ही में जारी संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देशों (AQGs) के प्रमुख बिंदुओं का वर्णन करें। ये वर्ष 2005 में इसके पिछले अद्यतन से किस प्रकार भिन्न हैं? संशोधित मानकों को प्राप्त करने के लिये भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में क्या बदलाव आवश्यक हैं? (2021)
मुख्य परीक्षा
आधुनिक कक्षीय संघर्ष
चर्चा में क्यों?
आधुनिक कक्षीय संघर्ष भौतिक विनाश से परे एक "साइलेंट वॉर" की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिसकी विशेषता जैमिंग, GPS स्पूफिंग और ग्राउंड स्टेशन हैकिंग है, जहाँ डिजिटल घुसपैठ बिना एक भी गोली चलाए किसी देश के महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को पंगु बना सकती है।
आधुनिक कक्षीय संघर्ष की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
- दैनिक आवश्यकताओं का शस्त्रीकरण: हाल के संघर्षों से पता चलता है कि साइबर हमले (जैसे- यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण से पहले रूस का Viasat KA-SAT साइबर हमला, जिसने यूरोप भर में महत्त्वपूर्ण संचार को बाधित कर दिया था) और GPS स्पूफिंग किसी मंच के अपने सुरक्षा तर्क को हथियार बना सकते हैं, जिससे विमान एवं समुद्री जहाज़ खतरनाक स्थितियों में फँस सकते हैं।
- हमले का श्रेय निर्धारण अंतराल: प्रॉक्सी नेटवर्क द्वारा प्रदान की गई रणनीतिक गुमनामी अंतर्राष्ट्रीय कानून में एक संरचनात्मक तनाव उत्पन्न करती है; अपराधी के बारे में उच्च साक्ष्यात्मक निश्चितता के बगैर पारंपरिक निवारण विफल हो जाता है।
- "कार्यात्मक स्ट्राइक" सिद्धांत: वर्ष 2026 तक बढ़ती कानूनी सहमति बताती है कि यदि एक डिजिटल घुसपैठ एक उपग्रह को "ब्रिक" (बेकार) कर देती है, तो इसके परिणाम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) (बल के प्रयोग का निषेध) का उल्लंघन करते हैं, भले ही "धुआँ और आग" क्यों न हो।
- नागरिक-सैन्य विभाजन का पतन: "स्टारलिंक प्रेसीडेंट" दर्शाता है कि कैसे दोहरे उपयोग वाले वाणिज्यिक समूह, जो मिलिट्री किल-चेन के लिये "एक सेवा के रूप में अंतरिक्ष" प्रदान करते हैं, नागरिकों से संबंधित वस्तुओं और सैन्य लक्ष्यों के बीच कानूनी अंतर को समाप्त कर देते हैं।
आधुनिक कक्षीय संघर्ष के क्या परिणाम हो सकते हैं?
- केसलर सिंड्रोम और कक्षीय निषेध: सबसे विनाशकारी भौतिक परिणाम केसलर सिंड्रोम (अपशिष्ट के टकराव की शृंखला अभिक्रिया जो और भी अधिक मलबा उत्पन्न करती है) को ट्रिगर करना है। गतिज प्रभाव (उपग्रहों को नष्ट करने के लिये मिसाइलों का उपयोग) उच्च-वेग वाले अपशिष्ट के विशाल मेघ का निर्माण करते हैं। ये टुकड़े अन्य उपग्रहों से टकराते हैं, जिससे अपशिष्ट में तेज़ी से वृद्धि होती है।
- पिछले परीक्षणों से 2,700 से अधिक अंतरिक्ष अपशिष्ट के टुकड़े अभी भी कक्षा में होने के साथ, टकरावों का एक नया कैस्केड निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) को पीढ़ियों के लिये अनुपयोगी बना सकता है।
- पर्यावरणीय और वैज्ञानिक हानि: वायुमंडल में पुनः प्रवेश करने वाला बढ़ा हुआ अपशिष्ट धात्विक कण उत्सर्जित कर सकता है जो ओज़ोन परत को संभावित रूप से प्रभावित कर सकता है। उच्च-घनत्व वाला अपशिष्ट और "मेगा-कांस्टेलेशन" प्रकाश प्रदूषण, भू-आधारित खगोलीय अनुसंधान में बाधा डालता है, जिससे ब्रह्मांड का हमारा दृश्य धुँधला हो जाता है।
- वैश्विक सामाजिक-आर्थिक पक्षाघात: आधुनिक अर्थव्यवस्थाएँ अंतरिक्ष परिसंपत्तियों पर गहराई से निर्भर हैं। इन्हें लक्षित करने वाला संघर्ष निम्नलिखित कारण बन सकता है:
- नेविगेशन (PNT) का पतन: GPS/GNSS (जैसे भारत का नेविगेशन इंडियन कॉन्स्टेलेशन - NavIC) का नुकसान वैश्विक लॉजिस्टिक्स, विमानन और समुद्री व्यापार को स्थिर कर देगा।
- वित्तीय पतन: वैश्विक बैंकिंग और शेयर बाज़ार लेन-देन के "टाइम-स्टैम्पिंग" (समय-अंकन) के लिये उपग्रहों की सटीक परमाणु घड़ियों पर निर्भर करते हैं। एक तुल्यकालन (sync) विफलता अंतर्राष्ट्रीय वित्त को स्थिर (फ्रीज़) कर सकती है।
- डिजिटल विभाजन: उपग्रह संचार का नुकसान ग्रामीण क्षेत्रों को अलग कर देगा और उच्च-गति उपग्रह इंटरनेट सेवाओं (जैसे- स्टारलिंक, वनवेब) को बाधित करेगा, जो आपदा प्रबंधन और शिक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- रणनीतिक अस्थिरता और तनाव में वृद्धि: चेतावनी उपग्रहों (प्रारंभिक चेतावनी उपग्रह) पर हमला, जिनका उपयोग मिसाइल प्रक्षेपण का पता लगाने के लिये किया जाता है, को परमाणु हमले के अग्रदूत के रूप में अनुचित समझा जा सकता है, जिससे आकस्मिक परमाणु तनाव में वृद्धि हो सकती है।
- गैर-गतिज हमले (साइबर-हैकिंग या "चकाचौंध" करने वाले लेज़र) साबित करना मुश्किल होता है, जो संघर्ष का एक "ग्रे ज़ोन" (grey zone) बनाते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय विश्वास और बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967) को कमज़ोर करता है।
- कक्षीय निर्भरता जोखिम: उभरती अर्थव्यवस्थाओं को "न्यायिक मृगतृष्णा" का सामना करना पड़ता है। यदि उनका डिजिटल बैकबोन (बुनियादी ढाँचा) तीसरे पक्ष के वाणिज्यिक उपग्रहों पर होस्ट किया गया है जिन्हें लक्षित किया जाता है या जो अंतर्राष्ट्रीय कानून से "अलग" हो जाते हैं, तो ये राष्ट्र अपने स्वयं के डेटा और सुरक्षा पर अपनी संप्रभुता खो देते हैं।
कक्षीय प्रबंधन पर अंतर्राष्ट्रीय विनियम
- बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967): संधि का अनुच्छेद VI राज्यों को निजी क्षेत्र की गतिविधियों सहित सभी राष्ट्रीय अंतरिक्ष गतिविधियों के लिये ज़िम्मेदार बनाता है, लेकिन इसमें प्रवर्तन तंत्र का अभाव है।
- अंतरिक्ष वस्तुओं द्वारा क्षति के लिये अंतर्राष्ट्रीय दायित्व पर सम्मेलन (1972): यह पृथ्वी पर अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाली क्षति के लिये निरपेक्ष दायित्व लगाता है, जिसमें लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन इसका प्रवर्तन कमज़ोर है।
- डीऑर्बिटिंग पर स्वैच्छिक संयुक्त राष्ट्र दिशानिर्देश: संयुक्त राष्ट्र 25 वर्षों के भीतर उपग्रहों को डीऑर्बिट (कक्षा से घटाने) की सिफारिश करता है, हालाँकि अनुपालन दर केवल 30% के आस-पास है।
ऑर्बिटल टकराव को रोकने हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?
- अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे को सुदृढ़ करना: बाह्य अंतरिक्ष में शस्त्र-होड़ की रोकथाम को अंतिम रूप देना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह प्रस्तावित कानूनी रूप से बाध्यकारी साधन कक्षा (orbit) में किसी भी प्रकार के हथियारों की तैनाती को प्रतिबंधित करने का लक्ष्य रखता है, न कि केवल व्यापक विनाश के हथियारों (WMDs) को।
- बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती की रोकथाम (PPWT) पहल का समर्थन करें, जो राष्ट्रों को अंतरिक्ष की कक्षा में हथियारों को तैनात करने वाला पहला राष्ट्र न बनने की प्रतिबद्धता जताने के लिये प्रोत्साहित करती है।
- उत्तरदायी मानक स्थापित करना: काइनेटिक एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षणों पर एक वैश्विक और स्थायी प्रतिबंध की आवश्यकता है, क्योंकि ये परीक्षण लंबे समय तक बने रहने वाले अंतरिक्ष मलबे को उत्पन्न करते हैं।
- रेंडेवू एंड प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशंस (RPO) के लिये स्पष्ट प्रोटोकॉल स्थापित करना: जब एक उपग्रह दूसरे उपग्रह के करीब पहुँचता है (मरम्मत या ईंधन भरने के लिये), तो इसे पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिये ताकि इसे 'स्टाकर' (पीछा करने वाला) या 'किलर' (नष्ट करने वाला) सैटेलाइट न समझा जाए।
- उन्नत अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA): SSA कक्षीय सुरक्षा के 'आँख और कान' की तरह है। एक अंतर्राष्ट्रीय 'यातायात नियंत्रण' (Traffic Control) प्रणाली निर्मित करना जहाँ देश उपग्रहों और मलबे के रीयल-टाइम ट्रैकिंग डेटा को साझा करें। भारत का प्रोजेक्ट नेत्रा और अमेरिका का स्पेस सर्विलांस नेटवर्क (US SSN) इसमें प्रमुख योगदानकर्त्ता हो सकते हैं।
- पहचान क्षमता विकसित करना: ऐसी तकनीक विकसित करें जिससे यह निश्चित रूप से सिद्ध हो सके कि उपग्रह में हस्तक्षेप किसने किया। यदि किसी उपग्रह को लेजर द्वारा निष्क्रिय कर दिया जाता है या हैक कर लिया जाता है, तो स्पष्ट पहचान एक शक्तिशाली निवारक के रूप में कार्य करती है।
- वितरित उपग्रह समूह: कुछ "महँगे, बड़े" उपग्रहों से हटकर "कई छोटे" उपग्रहों की ओर बढ़ना (जैसे- स्टारलिंक या भारत के नियोजित सैन्य उपग्रह समूह)। सैकड़ों उपग्रहों के समूह में से एक या दो को नष्ट करना रणनीतिक रूप से निरर्थक हो जाता है।
निष्कर्ष
अंतरिक्ष में 'काइनेटिक विनाश' (भौतिक टकराव) के स्थान पर 'मौन' साइबर युद्ध की ओर बढ़ते रुझान ने अब प्रतिक्रियात्मक रक्षा के बजाय 'सिक्योर-बाय-डिज़ाइन' (निर्माण के समय से ही सुरक्षित) वैश्विक ढाँचे की ओर संक्रमण को अनिवार्य बना दिया है। 'एट्रिब्यूशन गैप' (हमलावर की पहचान न हो पाना) को संबोधित करना तथा ASAT परीक्षणों के विरुद्ध कानूनी रूप से बाध्यकारी मानदंड स्थापित करना सामाजिक-आर्थिक पतन को रोकने एवं 'ग्लोबल कॉमन्स' (वैश्विक साझा संसाधनों) की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "आधुनिक कक्षीय संघर्ष की विशेषता भौतिक विनाश की अपेक्षा कार्यात्मक गतिरोध अधिक है।" गैर-गतिज (non-kinetic) अंतरिक्ष युद्ध द्वारा उत्पन्न रणनीतिक और विधिक चुनौतियों की चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. केसलर सिंड्रोम ‘ऑर्बिटल डिनायल’ की स्थिति कैसे उत्पन्न करता है?
यह एक शृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया है, जिसमें स्पेस डेब्रिस कोलिजन के कारण मलबे के टुकड़ों का घातीय विस्तार (Exponential Cloud of Fragments) उत्पन्न होता है, जिससे अंततः लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) किसी भी उपग्रह संचालन अथवा अंतरिक्ष यात्रा के लिये अत्यधिक जोखिमपूर्ण हो जाती है।
2. प्रस्तावित PAROS संधि का उद्देश्य क्या है?
बाह्य अंतरिक्ष में शस्त्र दौड़ की रोकथाम (Prevention of an Arms Race in Outer Space- PAROS) का उद्देश्य एक विधिक रूप से बाध्यकारी तंत्र विकसित करना है, जो कक्षा में किसी भी प्रकार के हथियारों की तैनाती पर प्रतिबंध लगाए। यह बाह्य अंतरिक्ष संधि द्वारा केवल विनाशकारी सामूहिक हथियारों (WMD) पर लगाए गए सीमित प्रतिबंध से आगे बढ़ने का प्रयास है।
3. भारत की अंतरिक्ष सुरक्षा हेतु प्रोजेक्ट NETRA क्यों महत्त्वपूर्ण है?
प्रोजेक्ट NETRA भारत का एक समर्पित 'स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस' (SSA) सिस्टम है, जो अंतरिक्ष में मौजूद मलबे एवं संभावित जोखिमों की निगरानी करता है; यह भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों को टकराव और व्यवधान से बचाने के लिये आवश्यक 'आँखें और कान/eyes and ears' प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित अंतरिक्ष मिशनों पर विचार कीजिये: (2025)
- एक्सिओम-4
- स्पाडेक्स
- गगनयान
उपर्युक्त अंतरिक्ष मिशनों में से कितने सूक्ष्मगुरुत्व (माइक्रोग्रैविटी) विषयक अनुसंधान को प्रोत्साहित और समर्थित करते हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (c)
प्रश्न. भारत के उपग्रह प्रमोचित करने वाले वाहनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- PSLV से वे उपग्रह प्रमोचित किये जाते हैं जो पृथ्वी संसाधनों के मानिटरन उपयोगी हैं जबकि GSLV को मुख्यतः संचार उपग्रहों को प्रमोचित करने के लिये अभिकल्पित किया गया है।
- PSLV द्वारा प्रमोचित उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप से स्थिर रहते प्रतीत होते हैं जैसा कि पृथ्वी के एक विशिष्ट स्थान से देखा जाता है।
- GSLV Mk III, एक चार स्टेज वाला प्रमोचन वाहन है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरणों में ठोस रॉकेट मोटरों का तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणों में द्रव रॉकेट इंजनों का प्रयोग होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) 2 और 3
(c) 1 और 2
(d) केवल 3
उत्तर: (a)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)
इसरो द्वारा प्रक्षेपित मंगलयान
- को मंगल ऑर्बिटर मिशन भी कहा जाता है।
- के कारण अमेरिका के बाद मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाला भारत दूसरा देश बना।
- ने भारत को अपने अंतरिक्ष यान को अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की परिक्रमा करने में सफल होने वाला एकमात्र देश बना दिया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. भारत की अपना स्वयं का अंतरिक्ष केंद्र प्राप्त करने की क्या योजना है और हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को यह किस प्रकार लाभ पहुँचाएगी? (2019)
प्रश्न 2. अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों पर चर्चा कीजिये। इस तकनीक के अनुप्रयोग ने भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायता की? (2016)
प्रश्न 3. भारत के तीसरे चंद्रमा मिशन का मुख्य कार्य क्या है जिसे इसके पहले के मिशन में हासिल नहीं किया जा सका? जिन देशों ने इस कार्य को हासिल कर लिया है उनकी सूची दीजिये। प्रक्षेपित अंतरिक्ष यान की उपप्रणालियों को प्रस्तुत कीजिये और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के ‘आभासी प्रक्षेपण नियंत्रण केंद्र’ की उस भूमिका का वर्णन कीजिये जिसने श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण में योगदान दिया है। (2023)
मुख्य परीक्षा
कैलाश यात्रा मार्ग को लेकर भारत-नेपाल सीमा तनाव
चर्चा में क्यों?
नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से प्रस्तावित आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर आधिकारिक रूप से भारत एवं चीन दोनों के समक्ष अपनी ‘चिंता’ व्यक्त की है।
- काठमांडू ने पुनः यह दावा दोहराया है कि कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख क्षेत्र नेपाल के संप्रभु भू-भाग का हिस्सा है, जिसे भारत ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया है।
नेपाल और भारत के भिन्न क्षेत्रीय दावे क्या हैं?
- नेपाल का दृष्टिकोण: नेपाल का दावा है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी (महाकाली नदी के पूर्व स्थित) क्षेत्र वर्ष 1816 की सुगौली संधि के बाद से नेपाल के अभिन्न भू-भाग रहे हैं।
- भारत का प्रत्युत्तर: भारत ने कहा है कि नेपाल के दावे ‘न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों एवं साक्ष्यों पर आधारित हैं।’
- भारत ने यह भी रेखांकित किया कि लिपुलेख दर्रा कोई नया विकास नहीं है, बल्कि वर्ष 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये एक दीर्घकालिक एवं पारंपरिक मार्ग रहा है।
- भारत का तर्क है कि काली नदी का उद्गम पूर्व दिशा में स्थित स्रोतों से होता है, जिसके आधार पर कालापानी क्षेत्र भारत के पिथौरागढ़ ज़िले (उत्तराखंड) के अंतर्गत आता है, जहाँ वर्ष 1960 के दशक से भारत की सैन्य उपस्थिति बनी हुई है।
- संवाद के प्रति प्रतिबद्धता: तनाव के बावजूद भारत ने पुनः दोहराया है कि वह सहमति-आधारित सीमा मुद्दों के समाधान हेतु नेपाल के साथ द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से रचनात्मक संवाद के लिये तैयार है।
- वर्ष 2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में सम्मिलित किया गया; बाद में इसे संशोधित 100 नेपाली रुपये के नोट में भी दर्शाया गया।
- उसी वर्ष भारत द्वारा लिपुलेख के माध्यम से तिब्बत तक सड़क संपर्क के निर्माण पर नेपाल ने प्रबल विरोध व्यक्त करते हुए इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया।
- दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में सुगौली संधि का संदर्भ देते हैं, किंतु मुख्य मतभेद महाकाली नदी के उद्गम बिंदु को लेकर है, जो सीमा निर्धारण का आधार है।
- अप्रैल 2026 में नेपाल ने सीमा पार ले जाए जा रहे 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर सीमा शुल्क लगाए जाने के नियम को सख्ती से लागू करना प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य अनौपचारिक व्यापार पर अंकुश लगाना तथा स्थानीय व्यापारियों के हितों की रक्षा करना है।
- भारत ने इसे पूर्व-प्रचलित नियम बताया, किंतु नागरिकों के उत्पीड़न से सुरक्षा सुनिश्चित करने संबंधी आश्वासन भी माँगा।
कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- परिचय: कैलाश मानसरोवर यात्रा भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित एक तीर्थयात्रा है, जो चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) में स्थित माउंट कैलाश (6,638 मीटर) एवं मानसरोवर झील (4,600 मीटर) तक संपन्न होती है।
- माउंट कैलाश के चारों ओर की कोरा (परिक्रमा) एक उच्च हिमालयी ट्रेक है, जिसका सर्वोच्च बिंदु डोल्मा ला दर्रा (~18,600 फीट) है और यह शारीरिक रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु विश्व की सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित स्वच्छ जल की झीलों में से एक मानसरोवर झील (~15,000 फीट) में धार्मिक स्नान भी करते हैं।
- यद्यपि माउंट कैलाश की ऊँचाई माउंट एवरेस्ट (8,849 मीटर) से कम है, फिर भी इसके पवित्र धार्मिक महत्त्व के कारण इस पर चढ़ाई निषिद्ध है और यह अब तक आरोहित नहीं किया गया है।
- आधिकारिक परिचालन मार्ग:
- लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड): यह मानसरोवर तक पहुँचने का सबसे छोटा मार्ग है (सीमा से लगभग 50 किमी.), किंतु दुर्गम भू-भाग के कारण यात्रा मार्ग लगभग 200 किमी. तक विस्तृत हो जाता है।
- यह वर्ष 1992 में चीन के साथ व्यापार के लिये खोला गया पहला भारतीय सीमा चौकी था, इसके बाद शिपकी ला (1994) और नाथू ला (2006) का अनुसरण किया गया।
- नाथू ला दर्रा (सिक्किम): यह लगभग 1,500 किमी. लंबा पूर्णतः मोटर योग्य मार्ग है (जो विश्व के सर्वाधिक ऊँचाई वाले मोटर योग्य मार्गों में से एक है), जिसे वर्ष 2015 में खोला गया। यह तीर्थयात्रियों के लिये अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि इसमें पैदल ट्रेकिंग की आवश्यकता नहीं होती।
- नाथू ला सिक्किम को चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) से जोड़ता है तथा यह प्राचीन सिल्क रूट का एक हिस्सा है।
- लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड): यह मानसरोवर तक पहुँचने का सबसे छोटा मार्ग है (सीमा से लगभग 50 किमी.), किंतु दुर्गम भू-भाग के कारण यात्रा मार्ग लगभग 200 किमी. तक विस्तृत हो जाता है।
- माउंट कैलाश: यह तिब्बत में स्थित हीरे के आकार की एक काली शैल-चोटी है, जिसे हिंदू, बौद्ध, जैन एवं बोन परंपराओं में पवित्र माना जाता है। यह ब्रह्मपुत्र, सतलुज, सिंधु और कर्णाली जैसी एशिया की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र भी है।
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धर्म |
माउंट कैलाश का महत्त्व |
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हिंदू धर्म |
माउंट कैलाश को भगवान शिव एवं माता पार्वती का निवास स्थान माना जाता है; इसे ब्रह्मांड का आध्यात्मिक केंद्र भी समझा जाता है। मानसरोवर झील में स्नान को पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। |
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बौद्ध धर्म |
इसे कांग रिनपोछे (‘हिम का बहुमूल्य रत्न’) कहा जाता है; इसे सर्वोच्च आनंद के प्रतीक डेमचोक का निवास स्थान माना जाता है। |
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जैन धर्म |
इसे अष्टापद पर्वत के रूप में जाना जाता है; यह वह पवित्र स्थल माना जाता है जहाँ ऋषभनाथ ने मोक्ष प्राप्त किया था। |
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बोन धर्म |
इसे ‘नौ-मंज़िला स्वस्तिक पर्वत/Nine-Story Swastika Mountain’ कहा जाता है और स्वदेशी बोन परंपरा में इसे रहस्यमय एक्सिस मुंडी (विश्व का केंद्र) माना जाता है। |
- भौतिक चुनौतियाँ: यह उच्च हिमालयी तीर्थयात्रा एक्यूट माउंटेन सिकनेस (AMS) तथा अत्यंत दुर्गम भू-भाग जैसी गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है, इसलिये यात्रा आरंभ करने से पूर्व कठोर चिकित्सीय जाँच अनिवार्य मानी जाती है।
आगे की राह
- सीमा वार्ता को पुनर्जीवित करना: कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा मुद्दों को हल करने के लिये विदेश सचिव स्तर के संवाद (2014 में अनिवार्य) को सक्रिय करना; सीमा कार्य समूह के माध्यम से तकनीकी कार्य जारी रखना।
- तीर्थयात्रा की सुविधा और नेपाल के हितों को संतुलित करने के लिये लिपुलेख मार्ग के लिये एक संयुक्त ढाँचा विकसित करना।
- कूटनीति का पुनर्मूल्यांकन: भारत को नेपाल के नए नेतृत्व के अनुरूप ढलना चाहिये तथा विश्वास और सद्भावना बनाने के लिये गैर-पारस्परिक रियायतें देकर गुजराल सिद्धांतों का पालन करना चाहिये।
- व्यापारिक तनाव को कम करना: सीमा शुल्क संबंधी तनावों को दूर करने के लिये अंतर-सरकारी समिति का उपयोग करना, साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में आजीविका के साथ तस्करी विरोधी उपायों को संतुलित करना।
- आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना: प्रमुख परियोजनाओं (जैसे- अरुण-III) का समय पर पूर्णता सुनिश्चित करना और नेपाल से 10,000 मेगावाट जलविद्युत आयात करने की भारत की प्रतिबद्धता को क्रियान्वित करना।
- धार्मिक पर्यटन: दोनों देशों को रामायण सर्किट (भारत में अयोध्या को नेपाल में जनकपुर से जोड़ने वाला) तथा बुद्ध सर्किट (सारनाथ/बोधगया को लुम्बिनी से जोड़ने वाला) जैसी संयुक्त पर्यटन पहलों को आक्रामक रूप से बढ़ावा देना चाहिये।
- लोगों के बीच संबंधों को मज़बूत करना: छात्रवृत्ति, कौशल विकास और डिजिटल सहयोग (जैसे- यूपीआई) का विस्तार करके लोगों के बीच संबंधों को मज़बूत करना, साथ ही खुली सीमा का लाभ उठाना जो भारत और नेपाल के बीच आजीविका (रोटी) एवं वैवाहिक (बेटी) संबंधों के निर्बाध आवागमन को सक्षम बनाती है।
निष्कर्ष
भारत-नेपाल संबंध एक खुली सीमा तथा गहन आत्मीयता से विशिष्ट रूप से परिभाषित होते हैं। प्रशासनिक नियमों अथवा स्थानीयकृत क्षेत्रीय विवादों को कूटनीतिक गतिरोध में परिवर्तित होने से रोकने हेतु, दोनों राष्ट्रों को उग्र सार्वजनिक बयानबाज़ी के स्थान पर शांत कूटनीति को प्राथमिकता देनी चाहिये तथा अपने पारस्परिक संवाद में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को केंद्र में बनाये रखना चाहिये।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न: “भारत और नेपाल के मध्य सीमा विवाद भूगोल की अपेक्षा व्याख्या में अधिक निहित हैं।” परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत–नेपाल सीमा विवाद का मूल मुद्दा क्या है?
यह सुगौली संधि की भिन्न व्याख्याओं तथा महाकाली नदी के उद्गम स्थल को लेकर असहमति पर आधारित है।
2. लिपुलेख दर्रे का महत्त्व क्या है?
लिपुलेख दर्रा एक सामरिक व्यापार मार्ग है तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये प्रमुख पहुँच बिंदु है, जिस पर भारत और नेपाल दोनों दावा करते हैं।
3. नेपाल का 2020 मानचित्र विवाद क्या था?
वर्ष 2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दर्शाया गया, जिससे भारत–नेपाल संबंधों में तनाव बढ़ गया।
4. कैलाश मानसरोवर यात्रा का उद्देश्य क्या है?
यह माउंट कैलाश एवं मानसरोवर झील की धार्मिक तीर्थयात्रा है, जिसका आयोजन भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
5. गुजराल सिद्धांत क्या है?
गुजराल सिद्धांत के अनुसार भारत अपने छोटे पड़ोसी देशों के प्रति विश्वास और क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने हेतु एकपक्षीय (non-reciprocal) रियायतें प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)
- पिछले दशक में भारत-श्रीलंका व्यापार के मूल्य में सतत् वृद्धि हुई है।
- भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले व्यापार में ‘कपड़े और कपड़े से बनी चीज़ों’ का व्यापार प्रमुख है।
- पिछले पाँच वर्षों में, दक्षिण एशिया में भारत के व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार नेपाल रहा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न: दक्षिण एशिया के अधिकतर देशों तथा म्याँमार से लगी विशेषकर लंबी छिद्रिल सीमाओं की दृष्टि से भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ सीमा प्रबंधन से कैसे जुड़ी हैं? (2013)
प्रश्न: गुजराल सिद्धांत से क्या अभिप्राय है? क्या इसकी आज भी कोई प्रासंगिकता है? विवेचना कीजिये।

