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डेली न्यूज़

भारतीय अर्थव्यवस्था

अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से भारत की आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ बनाना

प्रिलिम्स के लिये: अंतर्देशीय जलमार्ग, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण, जल मार्ग विकास परियोजना, कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम, व्यवहार्यता अंतराल वित्तपोषण

मेन्स के लिये: भारत की अर्थव्यवस्था और लॉजिस्टिक्स में आंतरिक जलमार्गों की भूमिका, पर्यावरणीय स्थिरता और हरित परिवहन, क्षेत्रीय विकास और अंतर्देशीय क्षेत्रों का एकीकरण

स्रोत: बिज़नेस लाइन

चर्चा में क्यों? 

मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) ने भारत की आपूर्ति शृंखलाओं और लॉजिस्टिक्स दक्षता को सुदृढ़ करने में आंतरिक जलमार्गों के महत्त्व पर प्रकाश डाला। 

  • उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि 2026 में पश्चिम एशियाई संघर्ष के कारण वैश्विक शिपिंग मार्गों में उत्पन्न व्यवधानों के बीच, आंतरिक परिवहन नेटवर्क का विकास लॉजिस्टिक्स अनुकूल और आर्थिक स्थिरता के लिये आवश्यक है। 

सारांश

  • आंतरिक जलमार्ग एक किफायती, पर्यावरण-सम्मत और अनुकूल परिवहन माध्यम के रूप में उभर रहे हैं, जो लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • नीतिगत प्रोत्साहन, अवसंरचना विकास और निर्धारित लक्ष्यों (2030 तक 5% मोडल शेयर) के साथ, भारत का उद्देश्य आंतरिक जलमार्गों को सतत आर्थिक विकास का एक प्रमुख स्तंभ बनाना है। 

भारत की आपूर्ति शृंखला में अंतर्देशीय जलमार्गों का क्या महत्त्व है?

  • लागत-प्रभावशीलता: आंतरिक जल परिवहन (IWT) माल ढुलाई का सबसे वहनीय माध्यम है।
    • जलमार्गों के माध्यम से माल ढुलाई की लागत लगभग ₹0.25–₹0.30 प्रति टन-किलोमीटर होती है, जो रेल (₹1.0) और सड़क (₹1.5) की तुलना में काफी कम है।
    • यह सीधे घरेलू उद्योगों की समग्र लॉजिस्टिक्स लागत को कम करता है, जिससे भारतीय वस्तुएँ वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनती हैं।
  • भारी मात्रा में माल ढोने की क्षमता: जलमार्ग अत्यधिक बड़े पैमाने पर भारी माल के परिवहन की सुविधा प्रदान करते हैं। एक सामान्य 2,000 टन क्षमता वाला आंतरिक जलयान लगभग 125 मानक ट्रकों के बराबर माल ढो सकता है। 
    • यह इसे कोयला, सीमेंट, उर्वरक और खाद्यान्न जैसे अर्थव्यवस्था के लिये आवश्यक थोक वस्तुओं के परिवहन का एक आदर्श माध्यम बनाता है। 
  • स्थलीय परिवहन नेटवर्क को कम करना: भारत के सड़क और रेल नेटवर्क अत्यधिक दबाव में हैं, जिससे माल की डिलीवरी में देरी होती है और रखरखाव लागत बढ़ जाती है।
    • भारी माल का एक बड़ा हिस्सा सँभालकर जलमार्ग राष्ट्रीय राजमार्गों और माल ढुलाई गलियारों पर गंभीर भीड़भाड़ को कम करते हैं, जिससे अवसंरचना के घिसाव और क्षति में कमी आती है और परिवहन में होने वाली देरी घटती है। 
  • वैश्विक अस्थिरता से सुरक्षा: हाल के भू-राजनीतिक संकटों (जैसे- पश्चिम एशियाई संघर्ष) ने यह दर्शाया है कि अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग मार्ग बड़े व्यवधानों और बढ़ती मालभाड़ा एवं बीमा लागतों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
    • आंतरिक जलमार्ग एक सुरक्षित, घरेलू परिवहन माध्यम प्रदान करते हैं जो इन बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित रहता है, जिससे आंतरिक व्यापार बिना किसी बाधा के जारी रह सकता है।
  • पर्यावरणीय स्थिरता: भारत के पंचामृत जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप, आंतरिक जल परिवहन (IWT) अत्यंत पर्यावरण-अनुकूल है। यह सड़क परिवहन की तुलना में 3 से 6 गुना कम ऊर्जा उपभोग करता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का बहुत ही छोटा हिस्सा उत्पन्न करता है। 
    • आपूर्ति शृंखलाओं को जलमार्गों की ओर स्थानांतरित करने से उद्योगों को अपने कार्बन पदचिह्न को कम करने में मदद मिलती है।
  • हिंटरलैंड का एकीकरण: जलमार्ग भू-समुद्रित और अविकसित क्षेत्रों की लॉजिस्टिक क्षमता को उजागर करते हैं, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे क्षेत्रों में। 
    • गंगा (राष्ट्रीय जलमार्ग-1) और ब्रह्मपुत्र (राष्ट्रीय जलमार्ग-2) जैसी नदियों के माध्यम से इन अंतर्देशीय क्षेत्रों को सीधे प्रमुख समुद्री बंदरगाहों से जोड़कर, स्थानीय MSME और किसानों को सहज रूप से राष्ट्रीय और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत किया जाता है। 
  • विश्वसनीयता और विस्तार की संभावना: जलमार्ग बिना यातायात ट्रैफिक के पूर्वानुमेय यात्रा समय प्रदान करते हैं तथा इनमें विस्तार की विशाल क्षमता होती है, क्योंकि भारत के 20,000+ किलोमीटर से अधिक नौगम्य नेटवर्क का अधिकांश हिस्सा अभी भी कम उपयोग में है तथा इसके लिये न्यूनतम भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता होती है। 

अंतर्देशीय जलमार्ग क्या हैं?

  • परिभाषा: आंतरिक जलमार्ग किसी देश के भीतर नौगम्य जल चैनल हैं, जैसे नदियाँ, नहरें, झीलें, लैगून और विशिष्ट नदी मुहाने जो समुद्र से अलग होते हैं।
    • राष्ट्रीय परिवहन नीति समिति (1980) ने सिफारिश की थी कि एक जलमार्ग को राष्ट्रीय घोषित किया जाए यदि उसकी न्यूनतम चैनल की चौड़ाई 45 मीटर, गहराई 1.5 मीटर और कम-से-कम 50 किमी. की निरंतर लंबाई हो, शहरी और अंतर-बंदरगाह क्षेत्रों के लिये अपवाद के साथ।
  • व्यावसायिक क्षमता: एक जलमार्ग को नौगम्य तब माना जाता है, जब वह सामान्य परिस्थितियों में व्यावसायिक व्यापार के लिये कम-से-कम 50 टन भार वाले जहाजों का समर्थन कर सकता है।
  • वर्गीकरण: इन्हें आमतौर पर तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
    • मुक्त प्रवाहित नदी मार्ग: प्राकृतिक, काफी हद तक स्वतंत्र रूप से बहने वाली नदियाँ जिनमें न्यूनतम संशोधन होते हैं।
    • नहरीकृत जलमार्ग: डैम और लॉक जैसी संरचनाओं का उपयोग करके संशोधित नदियाँ, ताकि शांत, विश्वसनीय खंड बनाए जा सकें।
    • नहरें: पूरी तरह से मानव निर्मित, इंजीनियर्ड चैनल, जो प्राकृतिक बाधाओं को दरकिनार करने या विभिन्न जल निकायों को जोड़ने के लिये डिज़ाइन किये गए हैं।
  • व्यापक उपयोगिता: विश्व बैंक के अनुसार, परिवहन से परे, ये जलमार्ग पर्यटन को बढ़ावा देते हैं, जल प्रबंधन (बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई) में सहायता करते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करते हैं।

भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों की वर्तमान स्थिति

  • व्यापक नेटवर्क: राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016, 23 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में 111 जलमार्गों (20,187 किमी.) को घोषित करता है। वर्ष 2026 तक, इनमें से 32 (5,155 किमी.) परिचालन में हैं और 52 जलमार्गों तक विस्तार करने की योजना है।
    • परिचालन जलमार्गों में फेयरवे, टर्मिनल और नौवहन सहायक उपकरण होते हैं, जो सुरक्षित जहाज़ों के आवागमन, कार्गो परिवहन को सक्षम बनाते हैं और आंतरिक जल परिवहन तथा निजी निवेश को बढ़ावा देते हैं।
  • माल परिवहन: राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (गंगा-भागीरथी-हुगली) और राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (ब्रह्मपुत्र) जैसे स्थानीय गलियारों द्वारा प्रेरित होकर, आंतरिक माल परिवहन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2024-25 में 145.84 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) और वर्ष 2025-26 में ~198 MMT तक पहुँच गया है।
    • टर्नअराउंड समय वर्ष 2013-14 में 41.76 घंटे से घटकर 2024-25 में 28.5 घंटे हो गया है, जो दक्षता में सुधार को दर्शाता है। यात्री यातायात भी वर्ष 2023-24 में 1.61 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 7.6 करोड़ हो गया है, जो तीव्र विस्तार और भारत की लॉजिस्टिक्स प्रणाली में बढ़ते महत्त्व को उजागर करता है।
  • शेयरों को लक्षित करने वाला मॉडल: इस वृद्धि के बावजूद, जलमार्ग घरेलू माल ढुलाई वाले शेयर मॉडल के 2% से भी कम हिस्से पर हैं, जो सड़क (65%) और रेल (27%) से काफी पीछे हैं।
    • भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक IWT (आंतरिक जल परिवहन) के शेयर मॉडल को 5% तक बढ़ाना है, जिसके लिये वर्ष 2030 तक 200 MMT और 2047 तक 500 MMT के कार्गो लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं।

भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • अपर्याप्त नौगम्य गहराई (ड्राफ्ट): भारतीय नदियाँ अत्यधिक मौसमी और वर्षा-निर्भर हैं।
    • गर्मियों में गाद जमा होने और निम्न जल स्तर के कारण बड़े, पूरी तरह से लदे जहाज़ों की आवाजाही प्रतिबंधित हो जाती है, जिसके लिये निरंतर एवं महँगी कैपिटल ड्रेजिंग की आवश्यकता होती है।
  • बुनियादी ढाँचे की कमियाँ: इस क्षेत्र में पर्याप्त आधुनिक टर्मिनल, रोल-ऑन/रोल-ऑफ (रो-रो) सुविधाओं, मशीनीकृत कार्गो हैंडलिंग उपकरणों और राजमार्गों या रेलवे माल गलियारों से मज़बूत लास्ट-माइल कनेक्टिविटी का अभाव है।
  • निम्न ऊर्ध्वाधर निकासी: नदियों और नहरों पर कई लो लायइंग ब्रिज बड़े आंतरिक जलीय जहाज़ों के सुरक्षित मार्ग में बाधा डालते हैं, विशेष रूप से उन जहाज़ों के लिये जिनकी ऊँचाई अधिक होती है।
  • जल का प्रतिस्पर्द्धी उपयोग: भारत में नदियों का उपयोग बहुउद्देशीय रूप से होता है। पेयजल और कृषि सिंचाई की मांग अक्सर नौवहन आवश्यकताओं पर प्राथमिकता ले लेती है, जिससे नदी प्रबंधन में केंद्र एवं राज्य के बीच समन्वय संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • नियामक और प्रक्रियागत बाधाएँ: अंतर्देशीय पोत अधिनियम, 2021 के बावजूद, अनुपालन बोझ, बीमा तंत्र और कराधान मुद्दे घरेलू जहाज़ों को कम प्रतिस्पर्द्धी बनाते हैं, जिससे निजी क्षेत्र (पीपीपी) निवेश में बाधा आती है।

अंतर्देशीय जलमार्गों से संबंधित भारत की पहलें

  • अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985: इस अधिनियम ने अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) की स्थापना एक नोडल निकाय के रूप में की, जिसका कार्य अंतर्देशीय जलमार्गों जैसे फेयरवे, टर्मिनल और नौवहन प्रणालियों का विकास, विनियमन एवं रखरखाव करना है।
  • राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016: यह राष्ट्रीय जलमार्गों के लिये एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिससे शिपिंग और नौवहन के लिये उनका नियोजित विकास एवं विस्तार संभव होता है।
  • जलवाह कार्गो प्रोत्साहन योजना, 2024: यह योजना सड़क/रेल से जलमार्गों पर कार्गो के परिवर्तन को वित्तीय प्रोत्साहन (35% तक लागत प्रतिपूर्ति) देकर प्रोत्साहित करती है, जिससे लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार होता है।
  • अंतर्देशीय पोत अधिनियम, 2021: यह अधिनियम राज्यों में एक समान सुरक्षा और परिचालन मानकों को अनिवार्य करता है, जिससे सुरक्षित नौवहन, कम प्रदूषण एवं कुशल पोत प्रबंधन सुनिश्चित होता है।
  • तटीय नौवहन अधिनियम, 2025: अंतर्देशीय जलमार्गों को तटीय नौवहन के साथ एकीकृत करने को बढ़ावा देता है, जिससे परिवहन में बहु-माध्यमीय संपर्क तथा लागत दक्षता में सुधार होता है।
  • हरित नौका दिशा-निर्देश (2024): पोतों के हरित संक्रमण पर केंद्रित हैं, जिनका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना तथा दीर्घकालिक समुद्री लक्ष्यों के अनुरूप सतत अंतर्देशीय परिवहन को बढ़ावा देना है।
  • जल मार्ग विकास परियोजना (JMVP): राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर नौवहन क्षमता में सुधार तथा गंगा नदी के तटवर्ती समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिये जल मार्ग विकास परियोजना और जल मार्ग विकास परियोजना-II (अर्थ गंगा) का कार्यान्वयन किया जा रहा है।
  • रिवर क्रूज़ पर्यटन रोडमैप 2047: नदी-आधारित पर्यटन को बढ़ावा देता है तथा आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और सांस्कृतिक संपर्क को सुदृढ़ करने हेतु जलमार्गों के उपयोग पर ज़ोर देता है।
  • केंद्रीय बजट 2026–27: 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों को परिचालन में लाने का प्रस्ताव करता है तथा तटीय कार्गो प्रोत्साहन योजना शुरू करता है, जिसका उद्देश्य माल परिवहन को सड़क एवं रेल से जलमार्गों की ओर स्थानांतरित करना तथा वर्ष 2047 तक जलमार्गों की परिवहन हिस्सेदारी को 12% तक बढ़ाना है।

अंतर्देशीय जलमार्गों में प्रमुख डिजिटल पहल

  • CAR-D (कार्गो डेटा) पोर्टल: यह भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) द्वारा विकसित एक वेब-आधारित प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय जलमार्गों पर कार्गो एवं क्रूज़ की आवाजाही से संबंधित रियल-टाइम डेटा एकत्र करना, उसका विश्लेषण करना तथा उसे साझा करना है।
  • LADIS (न्यूनतम उपलब्ध गहराई सूचना प्रणाली): यह एक प्रणाली है जो न्यूनतम उपलब्ध जल-गहराई (Minimum Available Depth) की रियल टाइम जानकारी प्रदान करती है, जिससे जहाज़ों की सुरक्षित एवं कुशल नौवहन सुनिश्चित होती है।
  • RIS (नदी सूचना प्रणाली): यह एक उन्नत डिजिटल प्रणाली है, जो रियल टाइम में पोतों की ट्रैकिंग, यातायात प्रबंधन, मौसम संबंधी अपडेट तथा संचार सुविधा प्रदान करती है, जिससे सुरक्षा, दक्षता और समन्वय में सुधार होता है।
  • जल समृद्धि पोर्टल: यह जेटी एवं टर्मिनल निर्माण हेतु ऑनलाइन स्वीकृतियाँ प्रदान करता है, जिससे पारदर्शिता और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा मिलता है।
  • JALYAN एवं NAVIC पोर्टल: यह पोत संचालन, प्रशिक्षण, अवसंरचना प्रबंधन तथा हितधारक सेवाओं के लिये एकीकृत डिजिटल इंटरफेस प्रदान करते हैं।

भारत की आपूर्ति शृंखलाओं को बेहतर बनाने हेतु अंतर्देशीय जलमार्गों को कैसे सुदृढ़ किया जा सकता है?

  • पूंजीगत एवं अनुरक्षण ड्रेजिंग: वर्षभर न्यूनतम नौगम्य गहराई सुनिश्चित करने हेतु सतत एवं वैज्ञानिक ड्रेजिंग का कार्य किया जाना चाहिये, ताकि शुष्क ग्रीष्मकाल के दौरान भी बड़े और अधिकतम भार वहन करने वाले जहाज़ सुरक्षित रूप से नौवहन कर सकें।
  • PM गति शक्ति के साथ एकीकरण: अंतर्देशीय जलमार्गों को राष्ट्रीय मास्टर प्लान के साथ समन्वित किया जाना चाहिये, जिससे इन्हें डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC), राष्ट्रीय राजमार्गों तथा तटीय नौवहन मार्गों के साथ भौतिक रूप से एकीकृत किया जा सके।
  • हरित संक्रमण: लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के डीकार्बनाइजेशन के लिये ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम जैसी पहलों के अंतर्गत पर्यावरण-अनुकूल पोतों की ओर परिवर्तन को सब्सिडी के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। इसके तहत हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक या वैकल्पिक ईंधनों (जैसे- मेथेनॉल या हाइड्रोजन) पर आधारित जहाज़ों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देना: सरकार को टर्मिनल, वेयरहाउस और आधुनिक अंतर्देशीय जहाज़ों के निर्माण हेतु निजी पूंजी आकर्षित करने के लिये आकर्षक वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) मॉडल अपनाने चाहिये।
  • पर्यावरण-अनुकूल नदी प्रबंधन: वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-संवेदनशील ड्रेजिंग तकनीकों को लागू करना तथा नदी सूचना प्रणालियों (RIS) का उपयोग कर रियल टाइम में पोतों की ट्रैकिंग, गहराई निगरानी और नौवहन सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • घरेलू जहाज़ निर्माण को बढ़ावा देना: मेक इन इंडिया पहल के अंतर्गत कर प्रोत्साहन और सब्सिडी प्रदान कर कम गहराई वाले, उच्च क्षमता वाले बार्ज एवं हरित पोतों के घरेलू निर्माण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

अंतर्देशीय जलमार्गों का पुनर्जीवन एक रणनीतिक आवश्यकता है, जो अत्यधिक दबावग्रस्त सड़क एवं रेल मार्गों पर भीड़ कम करने, लॉजिस्टिक्स लागत घटाने तथा वैश्विक अस्थिरताओं से भारत की आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है। आवश्यक अवसंरचना अंतरालों को दूर कर तथा बहु-माध्यमीय एकीकरण को बढ़ावा देकर इस अल्प-उपयोगित संसाधन को एक सशक्त एवं पर्यावरण-अनुकूल आर्थिक धुरी में परिवर्तित किया जा सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न: “अंतर्देशीय जलमार्ग भारत के लॉजिस्टिक्स परिदृश्य को बदल सकते हैं।” लागत, सततता और आपूर्ति शृंखला की सहनशीलता के संदर्भ में इसकी विवेचना कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अंतर्देशीय जल परिवहन (IWT) क्या है?
यह देश के भीतर नदियों, नहरों, झीलों और बैकवॉटर के माध्यम से माल एवं यात्रियों के परिवहन को संदर्भित करता है। 

2. भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों के लिये नोडल प्राधिकरण कौन-सा है?
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI), जिसकी स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी, जलमार्गों के विकास और नियमन के लिये ज़िम्मेदार है। 

3. राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 का क्या महत्त्व है?
इस अधिनियम के तहत 111 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया, जिससे इनके विकास के लिये कानूनी ढाँचा उपलब्ध हुआ। 

4. अंतर्देशीय जलमार्गों को सतत क्यों माना जाता है?
ये सड़क परिवहन की तुलना में 3-6 गुना कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं और कम उत्सर्जन उत्पन्न करते हैं, जिससे ये पर्यावरण-अनुकूल होते हैं। 

5. भारत का अंतर्देशीय जलमार्गों के लिये लक्ष्य क्या है?
वर्ष 2030 तक जलमार्गों की परिवहन हिस्सेदारी को 5% तक बढ़ाना तथा वर्ष 2047 तक 500 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) कार्गो का संचालन करना। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. भारत में अंतर्देशीय जल परिवहन की समस्याओं और संभावनाओं का उल्लेख कीजिये। (2016)


भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में प्रमुख बंदरगाहों का निगमीकरण

प्रिलिम्स के लिये: प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021, सागरमाला कार्यक्रम, समुद्री भारत विज़न 2030, वधावन बंदरगाह, डिजिटल ट्विन, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (समुद्री), लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक (LPI), गैलेथिया खाड़ी, हरित सागर, तटीय कार्गो प्रोत्साहन योजना, हरित अमोनिया, हरित हाइड्रोजन

मेन्स के लिये: भारत के प्रमुख बंदरगाहों के निगमीकरण की आवश्यकता, प्रमुख बंदरगाहों से संबंधित मुख्य तथ्य, भारत में बंदरगाहों से संबंधित चिंताएँ और आगे की राह।  

स्रोत: बिज़नेस लाइन 

चर्चा में क्यों?

प्रमुख बंदरगाह ट्रस्ट अधिनियम, 1963 से प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 में संक्रमण एक ऐतिहासिक शासन सुधार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उद्देश्य निगमीकरण के माध्यम से भारत के प्रमुख बंदरगाहों में दक्षता, स्वायत्तता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाना है।

  • जबकि कामराजर बंदरगाह (एन्नोर) पहला निगमित प्रमुख बंदरगाह था, सरकार ने शेष 11 प्रमुख बंदरगाहों को आधुनिक बनाने के लिये कदम उठाए हैं।

सारांश

  • भारत अपने 12 प्रमुख बंदरगाहों को कठोर वैधानिक ट्रस्टों से स्वायत्त प्राधिकरणों में परिवर्तित कर रहा है, ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता और लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार किया जा सके।
  • यह सुधार लैंडलॉर्ड मॉडल को सुविधाजनक बनाता है, जो पेशेवर प्रबंधन और बुनियादी ढाँचे में निजी निवेश की अनुमति देता है।
  • अंततः ये कदम लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 को पूरा करने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।

भारत के प्रमुख बंदरगाहों के निगमीकरण की क्या आवश्यकता है?

परिचय

  • निगमीकरण एक सरकारी स्वामित्व वाली इकाई या वैधानिक निकाय को एक कानूनी कॉर्पोरेट इकाई में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है, जो सरकारी स्वामित्व में रहते हुए एक निजी कंपनी के सिद्धांतों के तहत कार्य करती है। भारत के बंदरगाहों के संदर्भ में इसमें "ट्रस्ट" मॉडल से परे "प्राधिकरण" या "कंपनी" मॉडल की ओर बढ़ना शामिल है।

निगमीकरण की आवश्यकता

  • महत्त्वपूर्ण आर्थिक भूमिका: प्रमुख बंदरगाह भारत के कुल कार्गो यातायात का लगभग 55-60% सँभालते हैं और सागरमाला कार्यक्रम तथा समुद्री भारत विज़न 2030 की रीढ़ हैं। साथ ही, भारत का लगभग 95% व्यापार (मात्रा के अनुसार) और 70% व्यापार (मूल्य के अनुसार) समुद्री मार्गों से होता है, जो यह रेखांकित करता है कि कुशल बंदरगाह शासन राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन के लिये एक पूर्व शर्त है।
  • परिचालन स्वायत्तता: निगमीकरण पेशेवर निदेशक मंडल की अनुमति देता है जिसमें स्वतंत्र सदस्य होते हैं, जिससे निरंतर सरकारी हस्तक्षेप के बगैर तीव्र, व्यावसायिक निर्णय लिये जा सकते हैं (भू-पट्टे या उपकरण खरीद में नौकरशाही में होने वाली देरी न्यूनतम होती है)।
  • "लैंडलॉर्ड मॉडल" में संक्रमण: आधुनिक वैश्विक बंदरगाह लैंडलॉर्ड बंदरगाहों के रूप में कार्य करते हैं। यहाँ, बंदरगाह प्राधिकरण भूमि का मालिक होता है और बुनियादी ढाँचा प्रदान करता है, जबकि निजी कंपनियाँ वास्तविक परिचालन (जहाज़ की बर्थिंग, लोडिंग, अनलोडिंग) करती हैं। निगमीकरण इन लैंडलॉर्ड-किरायेदार संबंधों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिये कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • वित्तीय स्वतंत्रता: कॉर्पोरेट संस्थाओं के रूप में बंदरगाह पूंजी बाज़ारों तक पहुँच सकते हैं, बॉण्ड जारी कर सकते हैं और बैंकों से व्यावसायिक ऋण अधिक आसानी से एकत्रित कर सकते हैं। यह सागरमाला कार्यक्रम या महाराष्ट्र में नए वधावन बंदरगाह के विकास जैसी विशाल परियोजनाओं के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • निजी (गैर-प्रमुख) बंदरगाहों के साथ प्रतिस्पर्द्धात्मक समता: एक कॉर्पोरेट संरचना बंदरगाहों को बाज़ार-आधारित टैरिफ निर्धारित करने और प्रतिस्पर्द्धी दरों की पेशकश करने की अनुमति देती है, जिससे उन्हें आक्रामक निजी प्रतिस्पर्द्धियों के लिये बाज़ार हिस्सेदारी खोने से रोका जा सकता है।
    • निजी बंदरगाह (जैसे- मुंद्रा या कृष्णापट्टनम) तेज़ी से बढ़े हैं क्योंकि वे अपने टैरिफ स्वयं निर्धारित कर सकते हैं और बाज़ार में होने वाले परिवर्तनों पर शीघ्र प्रतिक्रिया कर सकते हैं। प्रमुख बंदरगाह प्रमुख बंदरगाह टैरिफ प्राधिकरण (TAMP) से बाधित थे, जो दरों को कठोरता से निर्धारित करता था। जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT) और चेन्नई बंदरगाह समान पेशेवर प्रबंधन प्रथाओं को अपना सकते हैं ताकि प्रतिस्पर्द्धा का स्तर समान हो सके।
  • तकनीकी उन्नति: एक कॉर्पोरेट संरचना डिजिटल ट्विन तकनीक, लॉजिस्टिक्स के लिये ब्लॉकचेन और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (समुद्री) में निवेश करने एवं लागू करने के लिये बेहतर रूप से सक्षम है, जो लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक (LPI) में भारत की रैंकिंग में सुधार के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रमुख बंदरगाह क्या हैं?

  • परिचय: भारत में ‘प्रमुख बंदरगाह’ वे बंदरगाह हैं जो केंद्र सरकार के अधीन प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 द्वारा शासित होते हैं (इसने 1963 के अधिनियम को प्रतिस्थापित किया)। वर्तमान में भारत में 12 सरकारी नियंत्रित प्रमुख बंदरगाह हैं तथा एक कॉरपोरेट पोर्ट (एन्नोर) भी है, जिसे प्रमुख बंदरगाह के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • भारत के प्रमुख बंदरगाहों की सूची:

पश्चिमी तट के बंदरगाह (अरब सागर)

बंदरगाह का नाम

राज्य

प्रमुख विशेषताएँ

कांडला (दीनदयाल पोर्ट)

गुजरात

एक ज्वारीय बंदरगाह; कच्चा तेल एवं रसायनों का प्रमुख केंद्र; भारत में सर्वाधिक कार्गो सँभालता है। 

मुंबई बंदरगाह

महाराष्ट्र 

भारत का सबसे बड़ा प्राकृतिक बंदरगाह; थोक एवं सामान्य कार्गो की बड़ी मात्रा का प्रबंधन करता है।

JNPT (न्हावा शेवा)

महाराष्ट्र

भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह; मुंबई बंदरगाह पर दबाव कम करने हेतु विकसित किया गया। 

मोरमुगाओ बंदरगाह

गोवा

प्रमुख लौह-अयस्क निर्यातक बंदरगाह; जुआरी एस्ट्यूरी के प्रवेश द्वार पर स्थित। 

न्यू मैंगलोर बंदरगाह

कर्नाटक

‘कर्नाटक का प्रवेश द्वार’; मुख्यतः लौह-अयस्क निर्यात और पेट्रोलियम आयात के लिये प्रसिद्ध। 

कोचीन (कोच्चि) बंदरगाह

केरल 

विलिंग्डन आइलैंड पर स्थित; वल्लारपदम में भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) स्थित है। 

पूर्वी तट के बंदरगाह (बंगाल की खाड़ी)

बंदरगाह का नाम

राज्य

प्रमुख विशेषताएँ


तूतीकोरिन (वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट) 

तमिलनाडु

एक कृत्रिम गहरे समुद्री बंदरगाह; श्रीलंका के साथ व्यापार का प्रमुख केंद्र। 

चेन्नई बंदरगाह

तमिलनाडु

भारत का दूसरा सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह; एक कृत्रिम बंदरगाह। 

एन्नोर (कामराजार पोर्ट)

तमिलनाडु

भारत का पहला कॉरपोरेटाइज्ड प्रमुख बंदरगाह; मुख्यतः ताप विद्युत संयंत्रों के लिये कोयला हैंडल करता है। 

विशाखापत्तनम बंदरगाह

आंध्र प्रदेश

भारत का सबसे गहरा स्थल-आवेष्ठित एवं सुरक्षित बंदरगाह; लौह अयस्क एवं तेल का प्रमुख केंद्र। 

पारादीप बंदरगाह 

ओडिशा

गहरा जल एवं हर मौसम में कार्यशील बंदरगाह; महानदी नदी और बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित। 

कोलकाता बंदरगाह (श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट)

पश्चिम बंगाल

भारत का एकमात्र नदी-आधारित प्रमुख बंदरगाह; इसमें हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स शामिल है जो गहरे ड्राफ्ट वाले जहाज़ों को सँभालता है। 

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भारत में बंदरगाहों से जुड़ी क्या चिंताएँ हैं?

  • गहराई संबंधी सीमाएँ: भारत के प्रमुख बंदरगाहों की औसत गहराई लगभग 12 से 14 मीटर है, जिसके कारण वे 16 से 18 मीटर ड्राफ्ट वाले अल्ट्रा लार्ज कंटेनर वेसल्स (ULCV) को सँभालने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप, भारत को कोलंबो या सिंगापुर जैसे ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भर रहना पड़ता है।
    • परिणामस्वरूप, भारत के लगभग 75% कंटेनर कार्गो का ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों पर होता है, जिससे आयातकों और निर्यातकों पर प्रति कंटेनर लगभग 80-100 अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त लागत का भार पड़ता है।
  • लास्ट माइल समस्या: सड़कों और रेलमार्गों में अपर्याप्त अंतिम चरण की कनेक्टिविटी के कारण अक्सर बंदरगाहों पर माल का जमाव हो जाता है, क्योंकि बंदरगाहों की दक्षता उनके सहायक अवसंरचना पर निर्भर होती है। ये बंदरगाहीय अक्षमताएँ भारत की लॉजिस्टिक्स लागत में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं (लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स 2023 में भारत का स्थान 38वाँ है), जो विकसित देशों के 8-10% की तुलना में GDP का लगभग 13-14% बनी हुई है।
  • उच्च टर्नअराउंड समय (TRT): यद्यपि इसमें उल्लेखनीय सुधार हुआ है (अब लगभग 2 दिन), फिर भी भारत का औसत TRT वैश्विक मानकों से अधिक है, जैसे सिंगापुर में जहाज़ों का संचालन 24 घंटे से भी कम समय में पूरा हो जाता है।
  • विनियामक एवं शासन संबंधी मुद्दे: यद्यपि प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 का उद्देश्य बंदरगाह प्रशासन का आधुनिकीकरण करना है, तथापि ‘लैंडलॉर्ड मॉडल’ की ओर संक्रमण को श्रमिक संघों द्वारा नौकरी छूटने की आशंका के कारण विरोध का सामना करना पड़ा है।
  • पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताएँ: बंदरगाहों की गहराई बढ़ाने के लिये बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग की आवश्यकता तटीय क्षरण और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचा सकती है। साथ ही,बलास्ट वाटरका प्रबंधन तथा तेल रिसाव को रोकना बंदरगाह प्राधिकरणों के लिये एक सतत पर्यावरणीय चुनौती बना रहता है।

बंदरगाह विकास एवं आधुनिकीकरण हेतु सरकारी पहल

विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बंदरगाह के विकास और आधुनिकीकरण हेतु किन रणनीतियों की आवश्यकता है?

  • अवसंरचना संवर्द्धन: अल्ट्रा लार्ज कंटेनर वेसल्स (ULCVs) को समायोजित करने और विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भरता कम करने के लिये बंदरगाहों की गहराई को 18+ मीटर तक बढ़ाना। जहाज़ों के त्वरित संचालन को सुनिश्चित करने हेतु क्वे क्रेनों तथा यार्ड उपकरणों का आधुनिकीकरण करना। उदाहरण: ग्रेट निकोबार के गैलेथिया खाड़ी में अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP) का विकास। 
  • डिजिटलीकरण और स्मार्ट बंदरगाह: राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्ट को सीमा शुल्क, शिपिंग लाइनों तथा रेल/सड़क वाहकों के साथ एकीकृत कर निर्बाध डेटा प्रवाह सुनिश्चित करना। ब्लॉकचेन एवं IoT तकनीकों का उपयोग करके कंटेनरों की वास्तविक समय में ट्रैकिंग करना, जिससे “ड्वेल टाइम” (पोर्ट पर कंटेनर के ठहरने का समय) कम हो सके। 
  • बहु-मोडल अंतर्देशीय संपर्क: समर्पित माल ढुलाई गलियारों के माध्यम से उच्च गति रेल संपर्क को सीधे बंदरगाह टर्मिनलों तक सुनिश्चित करना, ताकि स्थानीय यातायात से बचा जा सके। घने ट्रैफिक वाले सड़क मार्गों से घरेलू माल को “समुद्र-से-नदी” मार्गों की ओर मोड़ना, जिससे कार्बन उत्सर्जन और लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
    • तटीय कार्गो संवर्द्धन योजना का उपयोग करके तटीय शिपिंग और आंतरिक जलमार्गों की हिस्सेदारी को 6% से बढ़ाकर 2047 तक 12% करने का लक्ष्य रखना, जिससे सड़क एवं रेल नेटवर्क पर भीड़भाड़ कम हो सके। 
  • हरितीकरण और ग्रीन पोर्ट्स: ग्रीन अमोनिया, ग्रीन हाइड्रोजन और LNG बंकरिंग के लिये अवसंरचना विकसित करना, ताकि पर्यावरण-अनुकूल जहाज़ों की अगली पीढ़ी को आकर्षित किया जा सके। जहाज़ों को बंदरगाह की विद्युत ग्रिड से जोड़ने (शोर-टू-शिप पावर) की सुविधा देना, जिससे वे डॉक पर रहते समय अपने डीज़ल इंजन बंद रख सकें।
  • बंदरगाह-आधारित औद्योगीकरण: ‘शेन्ज़ेन मॉडल’ के अनुरूप, बंदरगाहों को केवल पारगमन बिंदु न बनाकर उन्हें विनिर्माण के केंद्र के रूप में विकसित करना। बंदरगाह से 50–100 किमी. के दायरे में वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन आदि के उत्पादन क्लस्टर के रूप में तटीय आर्थिक क्षेत्र (CEZs) विकसित करना, जिससे अंतर्देशीय परिवहन लागत कम हो सके।

निष्कर्ष

प्रमुख पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2021 के तहत बंदरगाहों का कॉरपोरेटीकरण एक रणनीतिक परिवर्तन है, जो नौकरशाही आधारित ट्रस्ट-प्रणाली से हटकर पेशेवर और स्वायत्त बंदरगाह प्रबंधन की ओर अग्रसर करता है। यद्यपि उथली जलगहराई, उच्च लॉजिस्टिक्स लागत और श्रम संबंधी मुद्दों जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं, फिर भी डिजिटलीकरण, हरित पहल एवं बहु-माध्यमीय संपर्क को एकीकृत करके भारत के प्रमुख बंदरगाहों को वैश्विक स्तर के लॉजिस्टिक्स हब में बदला जा सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. "भारतीय बंदरगाहों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिये 'विश्वास' मॉडल से 'प्राधिकार' मॉडल की ओर संक्रमण अनिवार्य है।" चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत का पहला कॉर्पोरेटाइज़्ड प्रमुख बंदरगाह कौन-सा है?
कामराजार बंदरगाह भारत का पहला कॉरपोरेटीकृत प्रमुख बंदरगाह है। इसने बेहतर परिचालन दक्षता और धन संग्रह की क्षमता का प्रदर्शन किया तथा प्रमुख पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2021 के लिये एक मॉडल के रूप में कार्य किया।

2. भारतीय प्रमुख बंदरगाहों के लिये 'ड्राफ्ट डेप्थ' एक गंभीर चिंता का विषय क्यों है?
भारत के अधिकांश बंदरगाहों की जलगहराई (ड्राफ्ट) 12–14 मीटर होती है, जिसके कारण वे अल्ट्रा लार्ज कंटेनर वेसल्स (ULCVs) को सँभालने में सक्षम नहीं हैं, जिन्हें 16–18 मीटर की आवश्यकता होती है। इसके परिणामस्वरूप विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर उच्च निर्भरता बनी रहती है।

3. हरित सागर दिशा-निर्देशों का क्या महत्त्व है?
ये ग्रीन पोर्ट दिशा-निर्देश हैं, जिनका उद्देश्य शोर-टू-शिप पावर, ग्रीन हाइड्रोजन बंकरिंग और “वेस्ट टू वेल्थ” पहलों के माध्यम से शून्य-कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करना है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

प्रश्न: भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है?(2017)

(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।

(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।

(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।

उत्तर: C


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