डेली न्यूज़ (04 Mar, 2020)



सांस्कृतिक संरक्षण से संबंधित योजनाएँ

प्रीलिम्स के लिये:

क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र, गुरु शिष्य परंपरा, ऑक्टेव, राष्ट्रीय सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम

मेन्स के लिये:

आदिवासियों की भाषा, लोकनृत्य, कला और संस्कृति को संरक्षित करने एवं बढ़ावा देने के लिये प्रारंभ की गई योजनाएँ

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने आदिवासियों की भाषा, लोकनृत्य, कला और संस्कृति को संरक्षित करने एवं बढ़ावा देने के लिये कई योजनाएँ शुरू की हैं।

मुख्य बिंदु:

  • भारत सरकार ने पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर और तंजावुर में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (Zonal Cultural Centres- ZCCs) स्थापित किये हैं।
  • केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत ये ZCCs लोक/जनजातीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये कई योजनाएँ लागू कर रहे हैं।

क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों द्वारा प्रारंभ की गईं योजनाएँ:

युवा प्रतिभाशाली कलाकारों को पुरस्कार:

  • ‘युवा प्रतिभाशाली कलाकार’ योजना का प्रारंभ विशेष रूप से दुर्लभ कला रूपों के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और पहचानने के लिये किया गया है।
  • इस योजना के अंतर्गत 18-30 वर्ष आयु वर्ग के प्रतिभाशाली युवाओं को चुना जाता है और उन्हें 10,000/- रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाता है।

गुरु शिष्य परंपरा:

  • यह योजना आने वाली पीढ़ियों के लिये हमारी मूल्यवान परंपराओं को प्रसारित करने की परिकल्पना करती है।
  • शिष्यों को कला के उन स्वरूपों में प्रशिक्षित किया जाता है जो दुर्लभ और लुप्तप्राय हैं।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत क्षेत्र के दुर्लभ और लुप्त हो रहे कला रूपों की पहचान की जाती है और गुरुकुलों की परंपरा में प्रशिक्षण कार्यक्रमों को पूरा करने हेतु प्रख्यात प्रशिक्षकों का चयन किया जाता है।
  • इस योजना में गुरु को 7,500 रुपए, सहयोगी को 3,750 रुपए और शिष्य को 1,500 रुपए मासिक पारिश्रमिक के तौर पर छह महीने से लेकर अधिकतम 1 वर्ष की अवधि तक दिये जाएंगे।

रंगमंच कायाकल्प:

  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत स्टेज शो और प्रोडक्शन आधारित वर्कशॉप सहित थिएटर गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये TA और DA को छोड़कर प्रति शो 30,000 रुपए का भुगतान किया जाता है।
  • इन समूहों को इनकी साख के साथ-साथ इनके द्वारा प्रस्तुत प्रोजेक्ट की योग्यता के आधार पर अंतिम रूप दिया जाएगा।

अनुसंधान और प्रलेखन:

  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य संगीत, नृत्य, रंगमंच, साहित्य, ललित कला आदि के माध्यम से क्षेत्रीय लोक कला, आदिवासी और शास्त्रीय संगीत सहित लुप्त दृश्य और प्रदर्शन कला रूपों को बढ़ावा देना और उनका प्रचार करना है।
  • राज्य सांस्कृतिक विभाग के परामर्श से कला को अंतिम रूप दिया जाता है।

शिल्पग्राम:

  • ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कारीगरों को डिज़ाइन के विकास और विपणन सहायता के लिये संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, प्रदर्शनियों, शिल्प मेलों का आयोजन कर क्षेत्र की लोक कला, आदिवासी कला और शिल्प को बढ़ावा देना।

ऑक्टेव (सप्तक) (Octave):

  • इस कार्यक्रम के तहत उत्तर-पूर्व क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने हेतु प्रचार प्रसार करना है जिसमें आठ राज्य- अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम, नगालैंड, मणिपुर और त्रिपुरा शामिल हैं।

राष्ट्रीय सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम:

(National Cultural Exchange Programme-NCEP):

  • इसे क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की जीवनरेखा कहा जा सकता है। इस योजना के तहत सदस्य राज्यों में कला प्रदर्शन, प्रदर्शनियाँ, यात्रा आदि से संबंधित विभिन्न उत्सव आयोजित किये जाते हैं।
  • अन्य क्षेत्रों/राज्यों के कलाकारों को इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया जाता है।
  • देश के अन्य हिस्सों में आयोजित होने वाले समारोहों में कलाकारों को भाग लेने हेतु सुविधा प्रदान की जाती है।
  • क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी सदस्य राज्यों के प्रमुख त्योहारों में भाग लेते हैं, इन त्योहारों के दौरान अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं जहाँ बड़ी संख्या में दर्शकों को अन्य क्षेत्रों के कला रूपों का आनंद लेने और समझने का मौका मिलता है।
  • ये त्योहार हमारे देश की विभिन्न संस्कृतियों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।

साहित्य अकादमी जो कि संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संगठन है, भाषाओं के संरक्षण और संवर्द्धन को बढ़ावा देता है, विशेषकर लोक और आदिवासी भाषाओं को।

स्रोत- पीआईबी


लोकपाल के समक्ष शिकायत संबंधी नियम

प्रीलिम्स के लिये:

लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज करने से संबंधित प्रावधान

मेन्स के लिये:

भारत में लोकपाल और सार्वजानिक भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

लोकपाल के गठन के लगभग एक वर्ष पश्चात् कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (Department of Personnel and Training- DoPT) ने एक अधिसूचना जारी कर लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज कराने हेतु नियम और प्रारूप को स्पष्ट किया है।

प्रमुख बिंदु

  • विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, एक शिकायतकर्त्ता को पहचान का वैध प्रमाण देना होता है। इसके अलावा विदेशी नागरिक भी लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकते हैं, इसके लिये उन्हें पहचान के प्रमाण के रूप में केवल पासपोर्ट की एक प्रति देनी होगी।
  • शिकायत इलेक्ट्रॉनिक रूप से डाक के माध्यम से या व्यक्तिगत रूप से दर्ज की जा सकती है। यदि शिकायत इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज की जाती है तो इसकी हार्ड कॉपी 15 दिनों के भीतर लोकपाल को प्रस्तुत की जानी आवश्यक है।
  • आमतौर पर शिकायत अंग्रेज़ी में दर्ज की जा सकती है, किंतु शिकायतकर्त्ता इस कार्य हेतु कन्नड़, हिंदी, मराठी, मलयालम, गुजराती और तेलुगु जैसे आठवीं अनुसूची में उल्लिखित 22 भाषाओं में से किसी का भी प्रयोग कर सकता है।
  • आरोपी अधिकारी/अधिकारियों के विवरण, उन पर लगे आरोप और संबंधित साक्ष्यों के अतिरिक्त शिकायतकर्त्ता को एक हलफनामा भी प्रस्तुत करना होगा।
  • नियमों के अनुसार, जाँच या अन्वेषण का निष्कर्ष प्राप्त होने तक लोकसेवक (जिसके विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई है) की पहचान सुरक्षित रखी जाएगी।
  • लोकपाल (शिकायत) नियम, 2020 के अनुसार कोई भी झूठी शिकायत दर्ज करना दंडनीय अपराध है और ऐसा करने पर कारावास की सज़ा (जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है) और (जुर्माना जिसे 1 लाख तक बढ़ाया जा सकता है) लगाया जा सकता है।
  • निर्धारित नियमों के अनुसार, लोकपाल पीठ पहले चरण में प्रवेश स्तर पर शिकायत का फैसला करेगी और यदि आवश्यक हो तो लोकपाल अन्य विवरण भी मांग सकता है।
    • नियम के अनुसार, प्रधानमंत्री के विरुद्ध दायर शिकायत का फैसला प्रवेश चरण पर संपूर्ण लोकपाल पीठ द्वारा किया जाएगा, जिसमें उसके अध्यक्ष और सभी सदस्य शामिल होंगे।
    • नियमों के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री के विरुद्ध कोई शिकायत दर्ज की जाती है और लोकपाल पीठ उसे खारिज कर देती है तो लोकपाल पीठ को इस संदर्भ कोई स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं होगी।
    • कई विश्लेषक लोकपाल (शिकायत) नियम, 2020 के इस प्रावधान को लेकर अपनी असहमति दर्ज करा चुके हैं।
  • ध्यातव्य है कि सेना अधिनियम, नौसेना अधिनियम, वायुसेना अधिनियम और तटरक्षक अधिनियम के तहत आने वाले लोकसेवकों के विरुद्ध शिकायत नहीं दर्ज की जा सकती है।

भारत में लोकपाल

  • लोकपाल की परिकल्पना स्वच्छ एवं उत्तरदायी शासन हेतु सरकारी प्रतिबद्धता के साथ भ्रष्टाचार को रोकने एवं दंडित करने वाले प्रभावी निकाय के रूप में की गई है।
  • यद्यपि विश्व के विभिन्न देशों में लोक शिकायतों के निवारण एवं भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कई प्रकार की युक्तियाँ सृजित की गई हैं, जैसे- प्रशासनिक न्याय प्रणाली, ओम्बुड्समैन प्रणाली और प्रोक्यूरेटर प्रणाली। किंतु ओम्बुड्समैन या लोकपाल प्रणाली सबसे पुरानी संस्था है, जिसकी शुरुआत स्केंडिनेवियाई देशों में हुई थी।
  • प्रसिद्ध ओम्बुड्समैन डोनल्ड सी. रॉबर्ट के अनुसार लोकपाल ‘नागरिकों की अन्यायपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाइयों के खिलाफ शिकायतों को दूर करने के लिये विलक्षण रूप से उपयुक्त संस्था है।’
  • भारत में भी इसी तर्ज़ पर लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अंतर्गत सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करने हेतु संघ के लिये लोकपाल एवं राज्यों के लिये लोकायुक्त की स्थापना करने का उपबंध किया गया है।

वैश्विक स्तर पर लोकपाल

  • दुनिया में सबसे सर्वप्रथम लोकपाल का गठन वर्ष 1809 में स्वीडन में किया गया था। स्वीडन समेत दुनिया के अन्य देशों में लोकपाल को ओम्बुड्समैन (Ombudsman) कहा जाता है। इसे नागरिक अधिकारों का संरक्षक माना जाता है और यह एक ऐसा स्वतंत्र तथा सर्वोच्च पद है जो लोकसेवकों के विरुद्ध शिकायतों की सुनवाई करता है। साथ ही संबंधित जाँच-पड़ताल कर उसके खिलाफ उचित कार्रवाई के लिये सरकार को सिफारिश भी करता है।
  • स्वीडन के बाद धीरे-धीरे ऑस्ट्रिया, डेनमार्क तथा अन्य स्केंडिनेवियन देशों और फिर अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका व यूरोपीय देशों में भी ओम्बुड्समैन नियुक्त किये गए। भारत से पहले 135 से अधिक देशों में ‘ओम्बुड्समैन’ की नियुक्ति की जा चुकी है।

स्रोत : द हिंदू


निर्वाचन आयोग का निर्णय

प्रीलिम्स के लिये:

निर्वाचन आयोग

मेन्स के लिये:

चुनावी प्रक्रिया के संदर्भ में गठित विभिन्न समितियों की सिफारिशें

चर्चा में क्यों?

हाल ही में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान मिलने वाली सरकारी फंडिंग/मदद के बारे में अपना मत व्यक्त करते हुए, इसका विरोध किया है।

मुख्य बिंदु:

  • आयोग का मानना है कि इससे यह तय करने में कठिनाई होती है कि चुनाव के दौरान किस राजनीतिक उम्मीदवार द्वारा कितना पैसा खर्च किया गया है।
  • आयोग का यह भी मानना है कि इससे उम्मीदवारों के खर्च पर नियंत्रण रख पाने में मुश्किल उत्पन्न होती है।

सरकार के प्रयास:

चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों को मिलने वाली नकद मदद में पारदर्शिता लाने तथा चुनाव में काले धन के इस्तेमाल से बचने के लिये सरकार द्वारा समय-समय पर कुछ कदम उठाए गए जो इस प्रकार हैं-

  • सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने और नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिये आयकर कानून में बदलाव किया गया है।
  • अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे की सीमा अब 2000 रुपए निर्धारित कर दी गयी है।
  • वर्ष 2018 में चुनावी बाॅण्ड स्कीम की शुरुआत की गई जो राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से शरू की गई थी। इस योजना के क्रियान्वयन से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की ऑडिटिंग में आसानी होगी।
  • आयकर विभाग द्वारा नॉन-फिलर्स मानीटरिंग सिस्टम ( Non-Filers Monitoring System -NMS) को लागू किया गया है इसके तहत अन्य स्रोतों के माध्यम से ऐसे लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है जिन्होंने कोई बड़ा वित्तीय लेन-देन किया हो परंतु आय कर रिटर्न नहीं भरा हो।

इस दिशा में अन्य समितियाँ एवं रिपोर्ट्स :

  • इन्द्रजीत गुप्त समिति (1998)-
    • चुनावी प्रणाली में व्यापक सुधार लाने के उद्देश्य से वर्ष 1998 में इस समिति का गठन किया गया।
    • इस समिति द्वारा राजनीतिक दलों को सरकारी खर्च पर चुनाव लड़ने का समर्थन करने की बात कही गई।
    • समिति द्वारा सुझाव दिया गया कि केंद्र सरकार द्वारा 600 करोड़ रुपए के योगदान से एक अलग चुनाव कोष का निर्माण किया जाए तथा कोष में सभी राज्यों की उचित भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
    • समिति द्वारा सरकारी खर्च पर चुनाव लड़ने के लिये राजनीतिक दलों के लिये दो सीमाएँ निर्धारित की गईं-
      1. चुनाव लड़ने के लिये सरकारी मदद (चंदा) उन्हीं राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों को प्राप्त हो जिन्हें चुनाव चिह्न आवंटित किया गया हो।
      2. अल्पकालीन स्टेट फंडिंग के तहत मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों को यह मदद अन्य सुविधाओं के रूप में दी जाएगी।
    • समिति द्वारा निर्दलीय उम्मीदवार को यह खर्च न देने की बात कही गई।
  • लाॅ कमीशन की रिपोर्ट (1999)-
    • वर्ष 1999 में प्रकाशित लाॅ कमीशन की रिपोर्ट में राज्यों को आंशिक फंडिंग की बात कहीं गई।
    • रिपोर्ट में सरकारी खर्च पर चुनाव तभी करने की बात कही गई है जब राजनीतिक दलों की किसी अन्य स्रोत से धन प्राप्ति पर पाबंदी हो।
  • संविधान समीक्षा आयोग (2001)-
    • वर्ष 2001 में संविधान समीक्षा आयोग द्वारा सरकारी खर्च पर चुनाव के विचार को पूरी तरह नकार दिया गया।
    • आयोग द्वारा 1999 में प्रकाशित लाॅ कमीशन की उस सिफारिश पर विचार करने की बात की गई जिसमें स्टेट फंडिंग पर विचार करने से पहले राजनीतिक दलों को उपयुक्त नियामक तंत्र के दायरे में लाए जाने का प्रावधान है।
  • प्रशासनिक सुधार आयोग (2008)-
    • वर्ष 2008 में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा अनैतिक एवं अनावश्यक फंडिंग को कम करने के उद्देश्य से आंशिक रूप से सरकारी खर्च पर चुनाव कराने की बात कही गई।

निर्वाचन आयोग:

निर्वाचन आयोग एक सवैधानिक निकाय है।

सविधान का अनुच्छेद-324 निर्वाचन आयोग से संबंधित कार्यों का वर्णन करता है।

स्रोत: द हिंदू


सुपोषित माँ अभियान

प्रीलिम्स के लिये:

सुपोषित माँ अभियान

मेन्स के लिये:

भारत में महिलाओं के पोषण से संबंधित कार्यक्रम

चर्चा में क्यों?

1 मार्च 2020 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने राजस्थान के कोटा से एक राष्ट्रीय अभियान ‘सुपोषित माँ अभियान’ (Suposhit Maa Abhiyan) प्रारंभ किया है।

मुख्य बिंदु:

  • यह योजना राजस्थान के कोटा में लॉन्च की गई है जो कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का संसदीय क्षेत्र भी है।

सुपोषित माँ अभियान के बारे में:

  • इस अभियान की योजना के अनुसार, 1000 महिलाओं को 1 महीने के लिये पोषक तत्त्वों से भरपूर भोजन दिया जाएगा साथ ही जच्चे-बच्चे की स्वास्थ्य चिकित्सा जाँच, रक्त, दवा, प्रसव सहित अन्य बातों का ध्यान रखा जाएगा।
  • यह अभियान गर्भवती माताओं और लड़कियों की पोषण सहायता से संबंधित है इस अभियान के माध्यम से न केवल गर्भवती महिलाओं की देखभाल की जाएगी बल्कि नवजात शिशु भी इस योजना का हिस्सा होंगे।
  • इस अभियान के पहले चरण में लगभग 1000 गर्भवती महिलाओं को लाभान्वित किया जाएगा।
  • सुपोषित माँ अभियान में एक परिवार से एक गर्भवती महिला को शामिल किया जाएगा।
  • सुपोषित माँ अभियान के तहत नवजात बच्चे के स्वास्थ्य की भी विशेष देखरेख की जाएगी।
  • अभियान के पहले चरण में 1,000 गर्भवती महिलाओं में से प्रत्येक को 17 किग्रा. संतुलित आहार की एक किट प्रदान की जाएगी।
  • इस किट में गेहूँ, चना, मक्का और बाजरे का आटा, गुड़, दलिया, दाल, बड़ी सोयाबीन, घी, मूँगफली, भुने हुए चने, खजूर और चावल शामिल होंगे।

उद्देश्य तथा लाभ:

  • सुपोषित माँ अभियान हमारी भावी पीढ़ियों को स्वस्थ बनाए रखने का एक विशेष अभियान है।
  • सुपोषित माँ अभियान” देश में किशोरियों और गर्भवती महिलाओं के लिये लाभकारी सिद्ध होगा।
  • इसका लक्ष्य गर्भवती महिलाओं, माताओं और बच्चों का पर्याप्त पोषण और उनका संपूर्ण विकास सुनिश्चित करना है।

वर्तमान में किये जा रहे अन्य प्रयास:

पोषण अभियान:

  • पोषण अभियान (पूर्ववर्ती राष्ट्रीय पोषण मिशन) के तहत 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के सभी ज़िलों को चरणबद्ध तरीके से कवर किया गया है। यह वर्ष 2022 तक कुपोषण मुक्त भारत की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये एक एकीकृत बहुमंत्रालयी मिशन है।
  • समान लक्ष्य प्राप्ति के लिये एकीकृत योजनाओं की विद्यमान कमी को दूर करने हेतु पोषण अभियान प्रारंभ किया गया जिसमें सभी तंत्रों और घटकों को समग्रता से शामिल किया जा रहा है।
  • पोषण अभियान का प्रमुख उद्देश्य आंँगनवाड़ी सेवाओं के उपयोग और गुणवत्ता में सुधार करके भारत के चिह्नित ज़िलों में स्टंटिंग को कम करना है। इसके अतिरिक्त गर्भवती महिलाओं और प्रसव के बाद माताओं एवं उनके बच्चों हेतु समग्र विकास तथा पर्याप्त पोषण सुनिश्चित करना है।

राष्ट्रीय पोषण मिशन 2022 के लक्ष्य:

  • जन्म के समय कम वज़न (Low Birth Weight) में वर्ष 2017 से 2022 तक प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की कमी लाना।
  • स्टंटिंग को वर्ष 2022 तक कम करके 25% के स्तर तक लाना।
  • 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तथा 15-49 वर्ष की महिलाओं में विद्यमान एनीमिया के स्तर में वर्ष 2017 से 2022 तक 3 प्रतिशत की वार्षिक कमी लाना।

उपरोक्त प्रयासों के अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ जैसे वैश्विक संस्थान सतत् विकास लक्ष्य- 2030 के अंतर्गत कुपोषण एवं इससे संबंधित समस्याओं से निपटने के लिये अनेक कदम उठा रहे हैं। इसके तहत निम्नलिखित लक्ष्यों को शामिल किया गया है:

  • जन्म के समय कम वज़न की समस्या हेतु इसमें वर्ष 2012 के स्तर से वर्ष 2030 तक 30% तथा चाइल्ड वेस्टिंग में वर्ष 2030 तक 3% की कमी लाना।
  • चाइल्ड स्टंटिंग को वर्ष 2012 के स्तर से वर्ष 2030 तक 50% कम करना।
  • 5-49 वर्ष की महिलाओं में एनीमिया के स्तर को वर्ष 2012 की तुलना में वर्ष 2030 तक 50% कम करना।
  • पहले 6 महीनों में अनन्य स्तनपान के प्रचलन को वर्ष 2030 तक 70% करना।

आगे की राह:

  • गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिये पर्याप्त आवश्यक पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों की पर्याप्तता माँ की शारीरिक कमज़ोरी और गर्भावस्था के तनाव से निपटने के लिये तथा गर्भ में पल रहे बच्चे को आवश्यक पोषण प्रदान करने हेतु ज़रूरी है।
  • अच्छी बात यह है कि गर्भवती महिलाओं की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये सरकार द्वारा कई अभियान चलाए जा रहे हैं। इससे गर्भवती महिलाओं तथा बच्चों की पोषण संबंधी सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

स्रोत- बिज़नेस स्टैंडर्ड


दिल्ली में जल गुणवत्ता

प्रीलिम्स के लिये:

केंद्रीय भू-जल बोर्ड, भारतीय मानक ब्यूरो, अटल भू-जल योजना, राष्ट्रीय जल नीति

मेन्स के लिये:

भारत में भू-जल प्रदूषण से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

2 मार्च, 2020 को जल शक्ति मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, दिल्ली के नौ ज़िलों का भू-जल प्रदूषित है।

प्रमुख बिंदु:

  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जिसमें दिल्ली के अलावा हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हैं, में कम-से-कम 30 ज़िलों का भू-जल प्रदूषित है। इन ज़िलों के भू-जल में आर्सेनिक, आयरन, लेड, कैडमियम, क्रोमियम, नाइट्रेट जैसी धातुएँ पाई गईं हैं।
  • केंद्रीय भू-जल बोर्ड (Central Ground Water Board) के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2019 में राजधानी के अधिकांश ज़िले आंशिक रूप से भू-जल प्रदूषण से प्रभावित थे।
  • भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) द्वारा घोषित भू-जल मानक की तुलना में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से एकत्रित नमूनों की गुणवत्ता कम पाई गई।

प्रदूषण की स्थिति:

  • नार्थ ईस्ट दिल्ली और ईस्ट दिल्ली के भू-जल में आर्सेनिक का स्तर निर्धारित सीमा से ऊपर पाया गया है।
  • उत्तर, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम ज़िलों में स्थित नजफगढ़ ड्रेन में लेड पाया गया, जबकि दक्षिण-पश्चिम ज़िलों में कैडमियम पाया गया। उत्तर-पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और नई दिल्ली ज़िलों में क्रोमियम पाया गया।

Mapping-toxins

  • विद्युत चालकता का स्तर निर्धारित सीमा 3000 micro mhos/cm से ऊपर है।
  • फ्लोराइड तथा नाइट्रेट क्रमशः निर्धारित सीमा 1.5mg/litre तथा 45mg/litre से ऊपर है।
  • आर्सेनिक निर्धारित सीमा 0.01mg/litre से ऊपर है।
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी ज़िलों के आँकड़ों में से 30 ज़िलों में नाइट्रेट तथा 25 ज़िलों में फ्लोराइड का स्तर निर्धारित मानकों से काफी ऊपर पाया गया।

भू-जल संरक्षण:

  • भू-जल प्रदूषण:
    • भू-जल प्रदूषण वर्तमान दौर की सबसे प्रमुख समस्याओं में से एक है। भू-जल प्रदूषण के प्रमुख कारकों का पता लगाना आसान कार्य नहीं है। उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्टों के जल में घुलने से भी प्रदूषण संबंधी समस्या उत्पन्न होती है जिसे बढ़ाने में मनुष्य की मुख्य भूमिका होती है। भू-जल प्रदूषण मुख्यतः विषैले कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थो के जल स्रोतों में मिलने से होता है।
  • प्रभाव:
    • सेप्टिक टैंकों (Septic Tank) का निर्माण सही ढंग से न किये जाने के कारण भू-जल का स्रोत दूषित हो जाता है। दूषित भू-जल के कारण स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
    • भू-जल के बहुत अधिक दूषित होने के कारण जलीय जंतु जैसे-मछलियाँ जल्दी मर जाती हैं।
    • भू-जल प्रदूषण के कारण पर्यावरण-चक्र में परिवर्तन हो सकता है।
    • इसके कारण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
  • महत्त्वपूर्ण कारक:
    • औद्योगिक कचरा तथा कार्बनिक विषाक्त पदार्थों सहित अन्य उत्पादों का जलस्रोतों में डाला जाना।
    • रिफाइनरियों एवं बंदरगाहों से पेट्रोलियम पदार्थ एवं तेलयुक्त तरल द्रव्य का रिसाव।
    • व्यावसायिक पशुपालन उद्यमों, पशुशालाओं एवं बूचड़खानों से उत्पन्न कचरे का अनुचित निपटान।
    • कृषि क्रियाओं से उत्पन्न जैविक अपशिष्ट, उर्वरकों और कीटनाशकों से भी भू-जल प्रदूषित होता है।
  • केंद्र सरकार की योजनाएँ:
    • अटल भू-जल योजना:
      • इस योजना का कुल परिव्यय 6000 करोड़ रुपए है तथा यह योजना पाँच वर्षों की अवधि (2020-21 से 2024-25) के लिये लागू की जाएगी।
      • इस योजना का उद्देश्य चिन्हित प्राथमिकता वाले 7 राज्‍यों- गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में जन भागीदारी के माध्यम से भू-जल प्रबंधन में सुधार लाना है।
      • इस योजना के कार्यान्‍वयन से इन राज्‍यों के 78 ज़िलों में लगभग 8350 ग्राम पंचायतों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
    • राष्ट्रीय जल नीति:
      • सर्वप्रथम 1987 में राष्ट्रीय जल नीति बनाई गई थी, तत्पश्चात् क्रमशः वर्ष 2002 और 2012 में इसे संशोधित किया गया। राष्ट्रीय जल नीति में जल को एक प्राकृतिक संसाधन मानते हुए इसे जीवन, आजीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का आधार माना गया है।

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड:

  • केंद्रीय भूमि जल बोर्ड जल संसाधन मंत्रालय (जल शक्ति मंत्रालय), भारत सरकार का एक अधीनस्‍थ कार्यालय है।
  • इस अग्रणी राष्ट्रीय अभिकरण को देश के भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन, अन्‍वेषण, माॅनीटरिंग, आकलन, संवर्द्धन एवं विनियमन का दायित्व सौंपा गया है ।
  • वर्ष 1970 में कृषि मंत्रालय के तहत समन्‍वेषी नलकूप संगठन को पुन:नामित कर केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की स्थापना की गई थी। वर्ष 1972 के दौरान इसका विलय भू-विज्ञान सर्वेक्षण के भूजल खंड के साथ कर दिया गया था।
  • केंद्रीय भूमि जल बोर्ड एक बहु संकाय वैज्ञानिक संगठन है जिसमें भूजल वैज्ञानिक, भूभौतिकीविद्, रसायनशास्त्री, जल वैज्ञानिक, जल मौसम‍ वैज्ञानिक तथा अभियंता कार्यरत हैं।

आगे की राह:

जल पृथ्वी का सर्वाधिक मूल्यवान संसाधन है, भू-जल प्रदूषण को कम करने एवं भू-जल स्तर को बढ़ाने संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णय अतिशीघ्र लिये जाने चाहिये। जलभराव, लवणता, कृषि में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग और औद्योगिक अपशिष्ट जैसे मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिये, साथ ही सीवेज के जल के पुनर्चक्रण के लिये अवसंरचना का विकास करने की आवश्यकता है जिससे ऐसे जल का पुनः उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

 स्रोत : द हिंदू


रेड-स्नो: कारण और चिंताएँ

प्रीलिम्स के लिये:

रेड-स्नो की परिघटना

मेन्स के लिये:

जलवायु परिवर्तन एवं हिमनदों का पिघलना

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अंटार्कटिका में यूक्रेन के वर्नाडस्की रिसर्च बेस (Vernadsky Research Base) के आसपास ‘रेड-स्नो’ (Red Snow) की तस्वीरें वायरल हुईं, जिसने ‘रेड-स्नो’ को लेकर जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओ को पुन: वैज्ञानिक अध्ययन के केंद्र में ला दिया है।

रेड-स्नो की परिघटना:

  • रेड-स्नो जिसे लाल तरबूज़ (Watermelon) के रूप में भी जाना जाता है, इसे प्राचीन काल की परिघटना माना जाता है जिसने हाल ही में जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है।
  • ऐसा माना जाता है कि रेड-स्नो की परिघटना का लिखित विवरण सर्वप्रथम अरस्तू द्वारा लगभग 2,000 वर्ष पूर्व दिया गया था।
  • ‘जानवरों के इतिहास’ के बारे में अरस्तू ने लिखा है: “जीवित जानवर उन पदार्थों में भी पाए जाते हैं जिनकी सामान्यत: पुष्टि नहीं की जा सकती है। यथा- कृमियों के लंबे समय तक हिम में दबे रहने के कारण हिम का आवरण लाल हो जाता है, साथ ही इस आवरण में जन्मे कृमि-बीज (Grub) भी लाल रंग के होते हैं।”
  • अरस्तू ने जिसका वर्णन कृमि और कृमि-बीज के रूप में किया है उसे आज वैज्ञानिक समुदाय के बीच शैवाल के रूप में जाना जाता है। यह शैवाल की एक प्रजाति (Chlamydomonas Chlamydomonas Nivalis) है जो ध्रुवीय और हिमनद क्षेत्रों में मौजूद है, जो खुद को गर्म रखने के लिये एक लाल वर्णक (Red Pigment) को धारण करती है।

रेड-स्नो का प्रभाव:

  • रेड-स्नो के कारण आसपास की हिम तेज़ी से पिघलती है। शैवाल जितने अधिक पास-पास होते हैं, हिम का रंग उतना ही लाल एवं गहरा होता है तथा हिम उतनी ही अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर पिघलती है।
  • यद्यपि हिम का पिघलना उन जीवाणुओं के लिये अच्छा है जिन्हें जीवित रहने के लिये पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन इससे हिमनदों के पिघलने की दर बढ़ जाती है।
  • ये शैवाल हिम के एल्बेडो (Albedo- यह उस प्रकाश की मात्रा को बताता है जिसका हिमावरण से परावर्तन होता है) को बदल देते हैं, जिससे हिमावरण पिघलने लगता है।
  • जर्नल नेचर पत्रिका के एक अध्ययन के अनुसार, आर्कटिक में बर्फ के पिघलने के प्रमुख कारकों में से एक हिम एल्बेडो है।

हिमनद के पिघलने के अन्य कारण:

  • औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन डाईऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ध्रुवों पर भी तापमान में वृद्धि देखने को मिल रही है।
  • पर्यटक के कारण भी इन क्षेत्रों की पारिस्थितिकी प्रभावित हुई है। मनुष्यों के साथ वाहनों की आवाजाही से हिम के पिघलने की रफ्तार में तेज़ी आई है।
  • एल्बेडो में परिवर्तन से हिमावरण में दबी हुई मीथेन गैस बाहर निकलती है। मीथेन गैस भी वातावरण को गर्म करने में योगदान देती है तथा ग्लोबल वार्मिंग में इज़ाफा करती है।

हिमनद पिघलने का प्रभाव:

  • बाढ़ की बारंबारता में वृद्धि, जिसके परिणामस्वरूप नदियों, झीलों और समुद्रों आदि के जलस्तर में अचानक वृद्धि हो जाती है।

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  • हिमनदों के पिघलने से जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है तथा जल का बढ़ता तापमान और जलीय जंतुओं एवं जलीय पादपों को प्रभावित करता है।
  • इसका प्रभाव प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) पर भी पड़ता है, जिन्हें प्रकाश संश्लेषण के लिये सूर्य की रोशनी की आवश्यकता होती है, लेकिन जब जलस्तर में वृद्धि होती है तो सूर्य का प्रकाश उन तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पाता।

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संरक्षण के उपाय:

  • हिमनदों के आसपास के क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियाँ सीमित करनी होंगी, ताकि इनके पिघलने की गति को कम किया जा सके।
  • ‘साझा संपत्ति संसाधन’ (Common Property Resources- CPRs) के संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय नियमों का निर्माण करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


कोरोना वायरस का आर्थिक प्रभाव

प्रीलिम्स के लिये:

कोरोना वायरस, सरकारी प्रतिभूतियाँ

मेन्स के लिये:

कोरोना वायरस का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘कोरोना वायरस महामारी और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर इसके प्रभाव’ के अध्ययन ने इस तथ्य को उजागर किया है कि इस महामारी ने सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है तथा भारत की अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हो रही है।

अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव:

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कोरोना वायरस का आयात पर प्रभाव

  • इस वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है। इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।

अमेरिका पर प्रभाव:

  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।

सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Sec):

  • ये ऐसी सर्वोच्च प्रतिभूतियाँ होती हैं जिनकी नीलामी भारत सरकार की ओर से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा केंद्र/राज्य सरकार के बाज़ार उधार प्रोग्राम के एक भाग के रूप में की जाती हैं।
  • ट्रेज़री बिल:
    • आमतौर पर एक वर्ष से भी कम अवधि की मेच्योरिटी वाली प्रतिभूतियों को ट्रेजरी बिल कहा जाता है जिसे वर्तमान में तीन रूपों में जारी किया जाता है, अर्थात् 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन के लिये।
  • सरकारी बॉण्ड:
    • एक वर्ष या उससे अधिक की मेच्योरिटी वाली इन प्रतिभूतियों को सरकारी बॉण्ड या दिनांकित प्रतिभूतियाँ कहा जाता है।

Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव:

भारत-चीन व्यापार संबंध:

  • भारत अपने कुल आयातित माल का 18%, इलेक्ट्रॉनिक घटक का 67% एवं उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं का 45% चीन से आयात करता हैं।

trade calender

trade

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।

सकारात्मक पक्ष:

  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।

सामान्य वित्तीय संकट से अलग:

  • वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों (Time-tested Measures) जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है।

आगे की राह:

  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।

स्रोत: द हिंदू


Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 04 मार्च, 2020

क्रिप्टोकरेंसी

सर्वोच्च न्यायालय ने क्रिप्टोकरेंसी पर लगी रोक को हटा दिया है। ध्यातव्य है कि अप्रैल 2018 में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने क्रिप्टोकरेंसी के व्यापार पर रोक लगा दी थी, किंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने RBI द्वारा जारी आदेश को खारिज कर क्रिप्टोकरेंसी पर रोक को हटा दिया है। गौरतलब है कि भारत सरकार क्रिप्टोकरेंसी के क्रय, विक्रय, वितरण, माइनिंग पर रोक लगाने के लिये ड्राफ्ट विधेयक भी तैयार कर चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का अर्थ है कि अब देश में क्रिप्टोकरेंसी का लेन-देन शुरू हो सकेगा। क्रिप्टोकरेंसी क्रिप्टोग्राफी प्रोग्राम पर आधारित एक वर्चुअल करेंसी या ऑनलाइन मुद्रा है। यह पीयर-टू-पीयर कैश सिस्टम है। इसे डिजिटल वालेट में रखा जा सकता है। दरअसल क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल के लिये बैंक या किसी अन्य वित्तीय संस्थान की आवश्यकता नहीं होती।

संजय कुमार पांडा

अनुभवी राजनयिक संजय कुमार पांडा को तुर्की में भारत का नया राजदूत नियुक्त किया गया है। पांडा 1991 बैच के भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अधिकारी हैं और वर्तमान में वह सैन फ्रांसिस्को में भारत के महावाणिज्य दूत के रूप में कार्य कर रहे हैं। तुर्की में संजय कुमार पांडा की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब भारत और तुर्की के संबंधों में तनाव बना हुआ है। 370 पर प्रतिक्रिया के पश्चात् भारत ने तुर्की को भारत के आंतरिक मामलों से अलग रहने को कहा था।

स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार

असम में वन संरक्षण में बहुमूल्य योगदान देने वाले और फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर पर्यावरणविद् जादव मोलाई पायेंग को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार पूर्वोत्तर भारत से जुड़े विषयों पर कार्य करने वाली संस्था माय होम इंडिया के तत्वावधान में आयोजित स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार समारोह में प्रदान किया गया। असम के जोरहट के निवासी जादव पायेंग को फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया और पर्यावरण कार्यकर्त्ता के रूप में जाना जाता है। जादव मोलाई पायेंग ने अपने जीवन के 30 वर्ष पर्यावरण संरक्षण में बिताए हैं।