डेली न्यूज़ (04 Jan, 2020)



महिला शिक्षा में सावित्रीबाई फुले का योगदान

प्रीलिम्स के लिये:

सावित्रीबाई फुले, ज्योतिराव फुले, सत्यशोधक समाज, महिला अधिकार, बाल गंगाधर तिलक, भारत का सामाजिक और शैक्षणिक इतिहास

मेन्स के लिये:

महिला अधिकारों से संबंधित मुद्दे, भारतीय इतिहास में महिला सुधारों की दिशा में उठाए गए कदम, महिला शिक्षा में सावित्रीबाई फुले का योगदान

चर्चा में क्यों?

3 जनवरी, 2020 को सावित्रीबाई फुले की 189वीं जयंती मनाई गई। सावित्रीबाई फुले को भारत की प्रथम आधुनिक नारीवादियों में से एक माना जाता है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को हुआ था।
  • उनकी उपलब्धियों के कारण उन्हें विशेष रूप से भारत की पहली महिला शिक्षक के रूप में याद किया जाता है। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्राचार्या बनी थीं।
  • उन्होंने सदैव शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में महिलाओं और अछूतों उत्थान के लिये काम किया।
  • महिला अधिकारों के लिये जीवन समर्पित करने वाली सावित्रीबाई ने वर्ष 1848 में पुणे में देश का पहला कन्या विद्यालय खोला था।

सावित्रीबाई फुले के बारे में

  • फुले का जन्म 1831 में महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। उनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। वर्ष 1840 में 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक्टिविस्ट और समाज-सुधारक ज्योतिराव फुले से कर दिया गया था।
  • विवाह के बाद अपने पति के सहयोग से सावित्रीबाई फुले ने लिखना-पढ़ना सीखा और अंततः दोनों ने मिलकर वर्ष 1848 में पुणे में भिडेवाड़ा नामक स्थान पर लड़कियों के लिये भारत का पहला विद्यालय खोला।
  • उस समय लड़कियों को पढ़ाना एक कट्टरपंथी विचार माना जाता था। जब वह स्कूल जाती थीं तो लोग अक्सर उन पर गोबर और पत्थर फेंकते थे लेकिन फिर भी वह अपने कर्त्तव्य पथ से विमुख नहीं हुईं।
  • गौरतलब है कि सावित्रीबाई फुले के लिये महिलाओं की शिक्षा और अछूतों की वकालत करना आसान नहीं था क्योंकि महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में वर्ष 1881-1920 के मध्य एक राष्ट्रवादी विमर्श चल रहा था जिसमें तिलक सहित इन राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीयता की क्षति का हवाला देते हुए लड़कियों और गैर-ब्राह्मणों के लिये स्कूलों की स्थापना का विरोध किया था।
  • वह एक कवयित्री भी थीं, उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है।
  • 10 मार्च, 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। गौरतलब है कि प्लेग महामारी के दौरान सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। प्लेग से प्रभावित एक बच्चे की सेवा करने के कारण वह भी प्लेग से प्रभावित हुईं और इसी कारण से उनकी मृत्यु हो गई।
  • उनके सम्मान में वर्ष 2014 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय कर दिया गया।

सावित्रीबाई फुले के कार्य

  • ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले दोनों का मानना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे महिलाएँ और दबे-कुचले वर्ग सशक्त बन सकते हैं और समाज के अन्य वर्गों के साथ बराबरी से खड़े होने की उम्मीद कर सकते हैं।
  • भारत के सामाजिक और शैक्षणिक इतिहास में महात्मा जोतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले एक असाधारण युगल के रूप में विख्यात हैं। वे पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता और सामाजिक न्याय के लिये एक आंदोलन का निर्माण करने हेतु आवेग-पूर्ण संघर्ष में लगे हुए थे।
  • सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने मिलकर वर्ष 1854-55 में भारत में साक्षरता मिशन भी शुरू किया था।
  • दोनों ने सत्यशोधक समाज (सत्य की तलाश के लिये समाज) की शुरुआत की जिसके माध्यम से वे सत्यशोधक विवाह प्रथा शुरू करना चाहते थे जिसमें कोई दहेज नहीं लिया जाता था।
  • उनका उद्देश्य समाज में विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था।
  • सावित्रीबाई फुले को आधुनिक भारत में एक ऐसी महिला के रूप में भी श्रेय दिया जाता है जिन्होंने ऐसे समय में जब महिलाओं को दबाया जा रहा था और वे उप-मानव के अस्तित्व में जी रही थीं फुले ने स्वयं की आवाज़ को बुलंद किया और महिला अधिकारों के लिये संघर्ष किया।
  • उनकी कविताएँ भले ही मराठी में लिखी गई थीं किंतु उन्होंने मानवतावाद, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, तर्कवाद और दूसरों के बीच शिक्षा के महत्त्व जैसे मूल्यों की पूरे देश में वकालत की।
  • उनके द्वारा स्थापित संस्था 'सत्यशोधन समाज' ने वर्ष 1876 और वर्ष 1879 के अकाल में अन्न सत्र चलाया और अन्न इकटठा करके आश्रम में रहने वाले 2000 बच्चों को खाना खिलाने की व्यवस्था की।
  • उन्होंने देश के पहले किसान स्कूल की भी स्थापना की थी। वर्ष 1852 में उन्होंने दलित बालिकाओं के लिये एक विद्यालय की स्थापना की।
  • उन्होंने कन्या शिशु हत्या को रोकने के लिये प्रभावी पहल की थी, इसके लिये उन्होंने न सिर्फ अभियान चलाया बल्कि नवजात कन्या शिशुओं के लिये आश्रम भी खोले ताकि उनकी रक्षा की जा सके।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


व्हिसल-ब्लोअर सुरक्षा कानून में सुधार

प्रीलिम्स के लिये:

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड

मेन्स के लिये:

व्हिसल ब्लोअर की सुरक्षा से संबंधित मुद्दे तथा कानून

चर्चा में क्यों?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India-SEBI) ने 24 दिसंबर, 2019 को निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिये नए नियमों और व्यवस्था को अपनाने की घोषणा की।

मुख्य बिंदु:

  • सेबी के नए नियमों के अनुसार, नए तंत्र में निवेश के मामले में अंतरंग व्यापार/भेदिया कारोबार (Insider Trading) तथा अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के बारे में सूचना देने वाले (व्हिसल ब्लोअर) की जानकारी को गोपनीय रखने तथा सूचना प्रदाता को पुरस्कृत करने के की व्यवस्था की गई है।

भेदिया कारोबार (Insider Trading): किसी भी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी की प्रतिभूतियों में कंपनी के बारे में आतंरिक जानकारी (जो बड़े पैमाने पर जनता के लिये उपलब्ध नहीं है) के आधार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ट्रेडिंग करना, जो की कंपनी की प्रतिभूतियों के बाज़ार मूल्य को प्रभावित कर सकता है।

  • सेबी भेदिया कारोबार पर नियंत्रण के लिये समय-समय पर अंतरंग व्यापार प्रतिषेध विनियम [Prohibition of Insider Trading (PIT) Regulations]- 2015 के तहत सर्कुलर जारी करता है।
  • तकनीकी और वर्तमान ज़रूरतों को देखते हुए विशेषज्ञों एवं समितियों के सुझावों के आधार पर इस कानून में कई संशोधन भी किये गए हैं, जैसे- भेदिया कारोबार और कई अन्य मामलों पर टी. के. विश्वनाथन समिति के सुझाव।
  • यदि दी गई सूचना से 1 करोड़ रूपए या इससे से अधिक के गैर-कानूनी वित्तीय लाभ की अनियमितता का पता चलता है तो ऐसी स्थिति में व्हिसल ब्लोअर को ‘अंतरंग व्यापार के प्रतिषेध संबंधी विनियम (Prohibition of Insider Trading-PIT) Regulations के तहत पुरस्कृत किये जाने का प्रावधान है।
  • सेबी ने इस दौरान ऑफिस ऑफ इन्फॉरमेंट प्रोटेक्शन (Office of Informant Protection) की स्थापना की घोषणा की, यह एक स्वतंत्र कार्यालय है जिसका उद्देश्य स्वैच्छिक सूचना प्रकटीकरण फॉर्म (Voluntarily Information Disclosure Form-VIDF) के माध्यम से सूचनाएँ प्राप्त करना एवं उनका प्रसंस्करण करना है।

ऑफिस ऑफ इन्फॉरमेंट प्रोटेक्शन

(Office of Informant Protection-OIP):

  • इस कार्यालय की स्थापना के बाद कोई भी सूचना प्रदाता स्वेच्छा से किसी गैर-कानूनी गतिविधि की सूचना सेबी को VIDF के माध्यम से भेज सकता है।
  • सूचना देते समय सूचना प्रदाता को अपनी पहचान OIP के साथ साझा करना अनिवार्य होगा, परंतु यदि सूचना प्रदाता विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से सूचना साझा करना चाहता है तो उस स्थिति में विधिक प्रतिनिधि व संबंधित संस्थान के बारे में जानकारी देनी होगी।
  • विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से सूचना उपलब्ध करने की स्थिति में पुरस्कार प्राप्ति से पहले सूचना प्रदाता की जानकारी सेबी को देनी अनिवार्य होगी।
  • सूचना प्रदाता/व्हिसल ब्लोअर (whistleblowers): भारतीय कंपनी अधिनियम-2013 के अनुसार, किसी भी संस्थान में चल रही गैर-कानूनी गतिविधियों के बारे में नियामकों को सूचित करने की प्रक्रिया को व्हिसल ब्लोअर के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • कौन हो सकता है सूचना प्रदाता/व्हिसल ब्लोअर : कोई भी व्यक्ति किसी संस्थान में चल रही अनियमितता की सूचना नियामकों तक पँहुचा सकता है, चाहे वह संस्थान में काम करता हो या नहीं। वह एक पूर्व कर्मचारी, हिस्सेदार, वकील अथवा सामाजिक कार्यकर्त्ता भी हो सकता है।
  • सूचना प्रदाता (व्हिसल ब्लोअर) संरक्षण अधिनियम (Whistleblowers Protection Act)-2014: यह अधिनियम सूचना प्रदाता की गोपनीयता तथा उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था करता है, इस अधिनियम में सूचना प्रदाता के शोषण को रोकने के लिये कड़े प्रबंध किये गए हैं।

स्रोत: द हिंदू


पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद

प्रीलिम्स के लिये:

क्षेत्रीय परिषद, साइबर सेफ वुमेन कार्ययोजना

मेन्स के लिये:

केंद्र राज्य संबंधों में क्षेत्रीय परिषदों का महत्त्व

चर्चा में क्यों ?

जनवरी 2020 में केंद्रीय गृहमंत्री की अध्यक्षता में पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद (Western Zonal Council) की 25वीं बैठक का आयोजन महाराष्ट्र में किया जाएगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री इस बैठक की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। इस बैठक में महिलाओं की सुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा रहेगा।

मुख्य बिंदु:

  • गृह मंत्रालय के अंतर्राज्यीय परिषद सचिवालय (Inter-State Council Secretariat) के तत्त्वावधान में कार्य करने वाली पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद में गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, केंद्र शासित प्रदेश दमन-दीव तथा दादरा और नगर हवेली शामिल हैं।
  • इस बैठक की मेज़बानी महाराष्ट्र द्वारा की जाएगी। महाराष्ट्र इस बैठक में महिलाओं के लिये सुरक्षित इंटरनेट उपयोग की एक कार्ययोजना प्रस्तुत करेगा।
  • महाराष्ट्र सरकार ने इस कार्ययोजना में अपनी सहभागिता दर्ज़ करने के लिये सभी लोगों का आह्वान किया है ताकि साइबर सेफ वुमेन (Cyber Safe Women) नामक इस कार्ययोजना को सफल बनाया जा सके।
  • इस कार्ययोजना के माध्यम से साइबर बुलिंग (इंटरनेट के माध्यम से उत्पीड़न करना), साइबर फ्रॉड (इंटरनेट द्वारा धोखाधड़ी करना), इंटरनेट चाइल्ड पोर्नोग्राफी तथा अन्य इंटरनेट से संबंधित अपराधों के प्रति महिलाओं तथा समाज के अन्य वर्गों में जागरूकता फैलाने में सहायता की जाएगी।
  • इससे पूर्व गोवा में आयोजित पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की 24वीं बैठक में महिला यौन अपराधों की शीघ्र जाँच हेतु महाराष्ट्र को एक कार्ययोजना विकसित करने का सुझाव दिया गया था।

क्षेत्रीय परिषदें :

  • सभी राज्‍यों के बीच और केंद्र एवं राज्‍यों के बीच मिलकर काम करने की संस्कृति विकसित करने के उद्देश्‍य से राज्‍य पुनर्गठन अधिनियम (States Reorganisation Act), 1956 के अंतर्गत क्षेत्रीय परिषदों का गठन किया गया था।
  • क्षेत्रीय परिषदों को यह अधिकार दिया गया कि वे आर्थिक और सामाजिक योजना के क्षेत्र में आपसी हित से जुड़े किसी भी मसले पर विचार-विमर्श करें और सिफारिशें दें।
  • क्षेत्रीय परिषदें आर्थिक और सामाजिक आयोजना, भाषायी अल्‍पसंख्‍यकों, अंतर्राज्‍यीय परिवहन जैसे साझा हित के मुद्दों के बारे में केंद्र और राज्‍य सरकारों को सलाह दे सकती हैं।

पाँच क्षेत्रीय परिषदें :

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग-।।। के तहत पाँच क्षेत्रीय परिषदें स्थापित की गई। पूर्वोत्तर राज्य अर्थात् (i) असम (ii) अरुणाचल प्रदेश (iii) मणिपुर (iv) त्रिपुरा (v) मिज़ोरम (vi) मेघालय और (vii) नगालैंड को आंचलिक परिषदों में शामिल नहीं किया गया और उनकी विशेष समस्याओं को पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम (North Eastern Council Act), 1971 के तहत वर्ष 1972 में गठित पूर्वोत्तर परिषद द्वारा हल किया जाता है। "सिक्किम राज्य को दिनांक 23 दिसंबर, 2002 में अधिसूचित पूर्वोत्तर परिषद (संशोधन) अधिनियम, 2002 के तहत पूर्वोत्तर परिषद में भी शामिल किया गया है। इसके परिणामस्वरूप सिक्किम को पूर्वी आंचलिक परिषद के सदस्य के रूप में हटाए जाने के लिये गृह मंत्रालय द्वारा कार्रवाई शुरु की गई है।" इन क्षेत्रीय परिषदों का वर्तमान गठन निम्नवत है:

  • उत्तरी क्षेत्रीय परिषद: इसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान राज्य, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख शामिल हैं।
  • मध्य क्षेत्रीय परिषद: इसमें छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्य शामिल हैं।
  • पूर्वी क्षेत्रीय परिषद: इसमें बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्य शामिल हैं।
  • पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद: इसमें गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र राज्य और संघ राज्य क्षेत्र दमन-दीव और दादरा और नगर हवेली शामिल है।
  • दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद: इसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, राज्य और संघ राज्य क्षेत्र पुद्दुचेरी शामिल हैं।

स्रोत: द हिंदू


जम्मू-कश्मीर में दो सार्वजनिक छुट्टियाँ रद्द

प्रीलिम्स के लिये:

जम्मू-कश्मीर में हुए वर्तमान बदलाव

मेन्स के लिये:

सरकार के कार्य एवं आम जनमानस पर उसका प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जम्मू-कश्मीर में सरकार ने दो मौजूदा सार्वजनिक छुट्टियों को रद्द कर दिया है और उनके स्थान पर एक नई छुट्टी की शुरुआत की है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • सरकार ने जम्मू-कश्मीर में 5 दिसंबर और 13 जुलाई का सार्वजनिक अवकाश रद्द कर दिया है।
    • ध्यातव्य है कि 5 दिसंबर को शेख मोहम्मद अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक, पूर्व जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री) की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
    • 13 जुलाई को जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। ध्यातव्य है कि 13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर निरंकुश डोगरा शासक के विरोध में इकट्ठा हुए 22 कश्मीरियों को मार दिया गया था।
  • सरकार ने जम्मू-कश्मीर में 26 अक्तूबर को एक नए सार्वजानिक अवकाश की शुरुआत की है, गौरतलब है कि यह अवकाश 26 अक्तूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्य के भारतीय डोमिनियन में प्रवेश के उपलक्ष्य में दिया जा रहा है।

छुट्टियों से संबधित इतिहास और उनका महत्त्व

  • वर्ष 1846 में अमृतसर की संधि (Treaty of Amritsar) के तहत अंग्रेज़ों ने जम्मू-कश्मीर राज्य को डोगरा राजा महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया था। जम्मू में डोगरा शासन लगभग एक सदी तक चला। 1931 में जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने डोगरा शासन की निरंकुशता के खिलाफ आवाज़ उठाई और विद्रोह कर दिया, जिसके कारण 22 मुसलमानों की हत्या कर दी गई। इस विद्रोह को जम्मू- कश्मीर में मुस्लिम पहचान के पहले दावे के रूप में देखा जाता है।
  • 5 दिसंबर का दिन शेख मोहम्मद अब्दुल्ला द्वारा जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ एकीकृत करने के प्रयासों के कारण महत्त्वपूर्ण है। अब्दुल्ला, जवाहरलाल नेहरू के करीबी दोस्त और राजनीतिक सहयोगी थे, जिन्होंने 1939 में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में बदल दिया। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के विपरीत नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पाकिस्तान के बजाय धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ अपने भविष्य की वकालत की।

उपर्युक्त छुट्टियों को खत्म करने के मायने

  • इस कदम को जम्मू-कश्मीर के वर्ष 1939 की राजनीति से एक प्रस्थान के रूप में देखा जा रहा है। कई लोग इसे शेख अब्दुल्ला की भूमिका को खत्म करने के प्रयास और जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम एकाधिकार के दावे की समाप्ति के रूप में देख रहे हैं।
  • यह जम्मू-कश्मीर में एक राजनीतिक प्रक्रिया के पुनरुद्धार पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (J&K Reorganization Act) के माध्यम से राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजन के बाद सरकार ने मुख्यधारा के राजनीतिक दलों पर भी शिकंजा कसा है। गौरतलब है कि यह कदम उस समय उठाया गया है जब जम्मू-कश्मीर विभाजन के पाँच महीने बाद भी यहाँ की स्थिति सामान्य नहीं हुई है।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


व्यावसायिक/कार्पोरेट देनदारों को राहत

प्रीलिम्स के लिये:

दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड

मेन्स के लिये:

दिवालियापन समाधान प्रक्रिया

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय मंत्री मंडल ने 31 दिसंबर, 2019 को दिवाला और शोधन अक्षमता कोड-2016 में नए संशोधन करने के लिये विधेयक को मंज़ूरी दी।

मुख्य बिंदु:

  • प्रस्तुत संशोधनों के अनुसार, कॉर्पोरेट देनदार को पूर्ववर्ती प्रबंधन द्वारा किये गए किसी भी अपराध के लिये दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Process-CIRP) के शुरू होने से पहले उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा।

दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Process-CIRP): यदि करदाताओं को कोई संस्था/ कंपनी निश्चित समय पर तय किस्तें देने में असमर्थ रहती है तो भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता कोड के तहत उसे दिवालिया घोषित कर CIRP की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह प्रकिया कंपनी अथवा देनदार द्वारा शुरु कराई जा सकती है, CIRP के तहत नोटिस देने के 180 दिनों के भीतर यदि दोनों पक्षों कोई समझौता नहीं होता है तो कंपनी की नीलामी की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है। 75% से अधिक देनदारों की सहमति से 180 दिनों की समय सीमा को एक बार पुनः 90 दिनों के लिये बढ़ाया जा सकता है।

  • व्यवसायियों को इस तरह की सुरक्षा देने का उद्देश्य प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) या आर्थिक अपराध शाखा (Economic Offences Wing) जैसी विभिन्न जाँच एजेंसियों द्वारा कंपनी पर दायर जाँच के आपराधिक मामलों की जाँच में राहत देना है।
  • इस संशोधन विधेयक को संसद के गत शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत किया गया था, जिसके बाद इसे विचार के लिये स्थायी समिति के पास भेज दिया गया है।
  • यह समिति विधेयक की जाँच कर तीन महीनों में विधेयक पर अपने विचार के साथ विधेयक को संसद में पुनः प्रस्तुत करेगी।
  • कुछ दिवालिया कंपनियों की सफल बोली लगाने वाले व्यवसायियों द्वारा इस संबंध में चिंता व्यक्त की गई थी, जिसके बाद इस विधेयक में कुछ संशोधनों का सुझाव दिया गया।
  • इसी से संबंधित एक मामले में JSW स्टील ने ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण’ (National Company Law Appellate Tribunal-NCLAT) में की गई अपील में भूषण एनर्जी एंड स्टील (Bhushan Power and Steel) पर चल रहे वित्तीय गड़बड़ी के मामलों की जांच छूट की मांग की थी। वर्तमान में भूषण पावर एंड स्टील पर विभिन्न सरकारी एजेंसियों, जैसे-केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और ईडी की जाँच चल रही है। कई बैंकों ने पिछले साल कंपनी के पूर्व प्रवर्तकों पर लगभग 5,500 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करनें का आरोप लगाया था।

राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण

(National Company Law Appellate Tribunal-NCLAT):

  • राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण एक अर्द्ध-न्यायिक निकाय है जो कंपनियों के विवादों का निर्णय करती है।
  • इसकी स्थापना कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 410 के तहत किया गया थी यह राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई का काम करता है।
  • NCLAT के किसी भी आदेश से असहमत व्यक्ति/संस्था द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की सकती है।

NCLAT में अपील की प्रक्रिया:

  • राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के आदेश से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति निर्णय सुनाए जाने से 45 दिनों के अंदर NCLAT में अपील कर सकता है।
  • NCLAT अपने विवेक से याचिकाकर्त्ता को विशेष परिस्थियों में 45 दिनों की सीमा से अतिरिक्त समय भी प्रदान कर सकता है।
  • NCLAT के आदेशों को 60 दिनों के अंदर सर्वोच्च न्यायलय में चुनौती दी जा सकती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


सतत् विकास प्रकोष्ठ

प्रीलिम्स के लिये:

सतत् विकास प्रकोष्ठ तथा संबंधित मंत्रालय।

मेन्स के लिये:

खनन कार्यों का पर्यावरण पर प्रभाव तथा सतत् विकास प्रकोष्ठ की उपयोगिता।

चर्चा में क्यों?

केंदीय कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) ने सतत् विकास प्रकोष्ठ (Sustainable Development Cell-SDC) स्थापित करने का निर्णय लिया है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • प्रकोष्ठ का उद्देश्य देश में पर्यावरणीय रूप से सतत् कोयला खनन को बढ़ावा देना और खानों के कार्यशील न होने या बंद होने की स्थिति में पर्यावरण को होने वाले नुकसान से निपटना है।
  • यह निर्णय इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि भविष्य में बहुत सी निजी कंपनियाँ कोयला खनन से जुड़ेंगी। ऐसे में आवश्यक है कि खानों के उचित पुर्नवास के लिये वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यासों के अनुरूप दिशा-निर्देश तैयार किये जाएँ।

सतत् विकास प्रकोष्ठ की भूमिका

  • सतत् विकास सेल (SDC) कोयला कंपनियों को सलाह देगा, योजना तैयार करेगा और सतत् तरीके से उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने, खनन के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने और भविष्य में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर पड़ने वाले इन प्रभावों में कमी के लिये कंपनियों द्वारा उठाए गए कदमों की निगरानी करेगा।
  • उपरोक्त मामले में कोयला मंत्रालय एक नोडल केंद्र के रूप में कार्य करेगा। यह सेल माइन क्लोज़र फंड सहित पर्यावरणीय शमन उपायों के लिये भविष्य की नीति की रूपरेखा भी तैयार करेगा।
  • इस संबंध में प्रकोष्ठ कोयला मंत्रालय के नोडल प्वाइंट के रूप में काम करेगा। प्रकोष्ठ पर्यावरणीय क्षति को कम करने के उपायों पर एक नीतिगत फ्रेमवर्क तैयार करेगा।

प्रकोष्ठ के कार्य: SDC के प्रमुख कार्य इस प्रकार होंगे:

  • आँकड़ों का संग्रह
  • आँकड़ों का विश्लेषण
  • सूचनाओं की प्रस्तुति
  • सूचना आधारित योजना तैयार करना
  • सर्वोत्तम अभ्यासों को अपनाना
  • परामर्श, नवोन्मेषी विचार, स्थल विशेष दृष्टिकोण के आधार पर ज्ञान को साझा करना तथा लोगों और समुदायों के जीवन को आसान बनाना।

उपरोक्त सभी कार्य योजनाबद्ध तरीके से विभिन्न चरणों में पूरे किये जाएंगे।

चरण-I: भूमि को बेहतर बनाना और वनीकरण

  • भारत में लगभग 2550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कोयले की खदाने हैं। इन खदानों से संबंधित सभी प्रकार के आँकड़े, मानचित्र आदि GIS आधारित प्लेटफॉर्म के ज़रिये एकत्रित किये जाएंगे। GIS संबंधी सभी गतिविधियाँ CMPDIL द्वारा की जाएंगी।
  • कोयला कंपनियों को उन क्षेत्रों की जानकारी दी जाएगी जहाँ वृक्ष लगाए जा सकते हैं। खनन क्षेत्र की ज़मीन पर कृषि, बागवानी, नवीकरणीय ऊर्जा, नई टाउनशिप, पुनर्वास आदि की संभावनाओं की भी जाँच की जाएगी।

चरण-II: हवा की गुणवत्ता, उत्सर्जन और ध्वनि प्रवर्द्धन

  • SDC खनन गतिविधियों, HEM (Heavy Earth Moving) मशीनों, कोयले के परिवहन आदि के कारण होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण से संबंधित पर्यावरणीय शमन उपायों (पानी का छिड़काव, धूल को दबाने के तरीके, ध्वनि अवरोधन आदि) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिये कोयला कंपनियों को सलाह देगा।
  • विभिन्न कंपनियों के पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं (Environment Management Plans- EMP) का विश्लेषण तथा इन योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाने के लिये कोयला कंपनियों को सलाह देगा।

चरण-III: खान जल प्रबंधन

  • कोयला खानों के संदर्भ में जल की मात्रा, गुणवत्ता, भूतल पर जल प्रवाह, खान के जल को बाहर निकालना, भविष्य में जल उपलब्धता से संबंधित आँकड़ों को संगृहीत किया जाएगा।
  • आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कोयला खान जल प्रबंधन योजनाएँ (Coal Mine Water Management Plans- CMWMP) तैयार की जाएंगी।
  • इसके आधार पर जल के भंडारण, शोधन और पुनः प्रयोग के तरीकों के बारे में सलाह दी जाएगी ताकि इसका उपयोग सिंचाई, मछली-पालन, पर्यटन या उद्योग के लिये किया जा सके।

चरण-IV: अत्यधिक उपयोग किये जाने वाले खानों का सतत् प्रबंधन

  • SDC खानों की व्यवहार्यता की भी जाँच करेगा और अधिक बोझ वाले डंपों के पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और पुनर्वास के उपाय सुझाएगा।
  • अतिव्याप्त सामग्रियों की जाँच करेगा तथा विभिन्न अवसंरचना परियोजनाओं में इन सामग्रियों के उपयोग के लिये योजना तैयार करेगा।

चरण-V: सतत् खान पर्यटन

  • पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पुनर्गठित क्षेत्रों का सुंदरीकरण, इको पार्क की स्थापना और जलाशयों आदि का निर्माण किया जाएगा।

चरण-VI: योजना तैयार करना और निगरानी

  • SDC विभिन्न कंपनियों के खान बंद करने की योजनाओं का विश्लेषण करेगा तथा इन योजनाओं के क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी बनाने के संबंध में परामर्श देगा।
  • यह चरणबद्ध तरीके से सभी खानों में विभिन्न शमन गतिविधियों/परियोजनाओं के निष्पादन के लिये समय-सीमा तय करने में कोयला कंपनियों की मदद करेगा।
  • विभिन्न कोयला कंपनियों के माइन क्लोज़र फंड (Mine Closure Fund) और पर्यावरण बजट (Environment Budgets) के प्रभावी उपयोग की निगरानी की जाएगी।
  • माइन क्लोज़र प्लान, माइन क्लोज़र फंड आदि के लिये भविष्य के दिशा-निर्देश तैयार किये जाएंगे।

चरण-VII: नीति, शोध, शिक्षा और विस्तार

  • विशेष शोध और अध्ययन के लिये विशेषज्ञों/संस्थानों/संगठनों को नियुक्त किया जाएगा।
  • सलाहकार बैठकों, कार्यशालाओं, सेमिनार, क्षेत्र निरीक्षण, स्टडी टूर आदि का आयोजन किया जाएगा।

स्रोत: pib


Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 04 जनवरी, 2020

आर. रामानुजम

हाल ही में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये चेन्नई के रहने वाले कंप्यूटर वैज्ञानिक आर. रामानुजम को वर्ष 2020 के इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार वर्ष 1986 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी द्वारा स्थापित किया गया था और इसे प्रत्येक तीन वर्ष बाद किसी मीडिया पेशेवर या किसी वैज्ञानिक को दिया जाता है। भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अनुसार, इस पुरस्कार की स्थापना का मुख्य उद्देश्य देश भर में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना है। इससे पूर्व प्रसिद्ध भौतिकीय वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर और वैज्ञानिक तथा लेखक जी. वेंकटरमन को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।


सरकारी आँकड़ों की गुणवत्ता पर स्थाई समिति

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने देश के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन की अध्यक्षता में 28 सदस्यीय स्थायी समिति का गठन किया है। सरकारी आँकड़ों में राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर समय-समय पर हो रही आलोचना के मद्देनज़र इस समिति के गठन का निर्णय महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि यह समिति सरकारी आँकड़ों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर विचार करेगी।


कंक्रीट परिपक्वता मीटर

पुणे कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग रिसर्च फाउंडेशन (PCERF) ने हाल ही में देश के पहले स्वदेशी कंक्रीट परिपक्वता मीटर (Concrete Maturity Meter) के निर्माण का दावा किया है जो कंस्ट्रक्शन में प्रयुक्त कंक्रीट की मज़बूती निर्धारित करने में मदद करेगा। ज्ञात हो कि PCERF एक गैर-लाभकारी संगठन है जो कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नई और लागत प्रभावी तकनीकें उपलब्ध कराने का कार्य करता है। PCERF के अनुसार, यह उपकरण लागत को कम करते हुए ढाँचे की मज़बूती का आकलन करने में त्रुटि के मार्जिन को कम करने में काफी मददगार साबित हो सकता है।


टो-टोक मैसेजिंग एप

एक हालिया रिपोर्ट में सामने आई है कि टो-टोक नामक एक मैसेजिंग एप का इस्तेमाल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिये जासूसी करने में किया जा रहा है। इस मामले पर संज्ञान लेते हुए गूगल और एपल ने अपने एप स्टोर से अमीरात के मैसेजिंग एप को हटा दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक यह एप यूज़र्स की गतिविधियों को ट्रैक करता है और इसे UAE सरकार के साथ साझा करता है। ज्ञात हो कि टो-टोक को वर्ष 2019 की शुरुआत में लॉन्च किया गया था और यह मध्य पूर्व और अन्य देशों के यूज़र्स में लोकप्रिय है।