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जनहित याचिका का पुनर्समायोजन

प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जनहित याचिका, न्यायिक अतिरेक, अनुच्छेद 32, मौलिक अधिकार

मेन्स के लिये: भारत में जनहित याचिका का विकास और महत्त्व, जनहित याचिकाओं में न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक अतिरेक, जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग एवं सुधारों की आवश्यकता

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत सरकार ने ‘एजेंडा-संचालित मुकदमों’ की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय से जनहित याचिका (PIL) की रूपरेखा की समीक्षा करने का आग्रह किया है।

  • इस घटनाक्रम ने उस विमर्श को पुनः गति प्रदान की है कि क्या जनहित याचिका का अधिकार क्षेत्र, जो कभी सामाजिक न्याय का एक प्रमुख माध्यम था, अब न्याय की सुलभता को अक्षुण्ण रखते हुए इसके संभावित दुरुपयोग को रोकने हेतु पुनर्समायोजन करने की आवश्यकता है। 

सारांश:

  • जनहित याचिका (PIL) पर पुनर्विचार करने के सरकार के प्रयास, इसके दुरुपयोग से जुड़ी चिंताओं को उजागर करते हैं—जैसे कि किसी विशेष एजेंडे से प्रेरित मामले, न्यायिक सीमाओं का उल्लंघन और प्रक्रियागत कमियाँ, हालाँकि अधिकारों की रक्षा करने और अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार करने के लिये PIL अब भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।
  • न्यायिक अनुशासन बनाए रखने और सुरक्षात्मक तंत्रों (जैसे- विशेष पीठों, छँटनी प्रक्रियाओं, शास्तियों और दिशा-निर्देशों) को और अधिक मज़बूत करने में ही भविष्य की राह निहित है। ऐसा करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि PIL बिना किसी अनुचित इस्तेमाल के, सामाजिक न्याय के एक प्रभावी उपकरण के तौर पर अपनी भूमिका निभाती रहे।

PILs से संबंधित मुख्य चिंताएँ क्या हैं?

  • लोकस स्टैंडी (Locus Standi) का पतन और “थ्री पी” सिद्धांत: जनहित याचिका (PIL) के विकास के साथ इसकी प्रकृति में बदलाव आया है। पहले यह केवल प्रतिनिधिक याचिकाओं तक सीमित थी, लेकिन अब यह किसी भी नागरिक द्वारा दायर की जा सकती है, जिससे इसके मूल उद्देश्य (वंचित और कमज़ोर वर्गों की सहायता करना) में कमी आई है।
  • इसके परिणामस्वरूप "Three Ps" (थ्री पीज़) की घटना के माध्यम से इसका दुरुपयोग हुआ है: प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन (निजी हित याचिका), जहाँ कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्विता को सार्वजनिक कारणों के रूप में प्रच्छन्न किया जाता है; पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन (प्रचार हित याचिका), जहाँ मीडिया का ध्यान खींचने के लिये याचिकाएँ दायर की जाती हैं; और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन (राजनीतिक हित याचिका), जहाँ अदालतों का उपयोग वास्तविक अधिकारों के प्रवर्तन के बजाय राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के रूप में किया जाता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) के अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत रंजिश, निजी शिकायतों या व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा के समाधान के लिये जनहित याचिका का प्रयोग अनुचित है।
  • संवैधानिक टकराव: एक प्रमुख चिंता न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच की सीमाओं का अस्पष्ट होना है। 
    • महत्त्वपूर्ण नीतिगत मामलों में न्यायालय के बढ़ते हस्तक्षेप और त्वरित फैसलों की मांग ने न्यायिक अतिचार की संभावनाओं और उससे जुड़ी चुनौतियों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
      • तमिलनाडु राज्य बनाम के. बालू (2017) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। 
        • कार्यपालिका की पूर्णतः अनदेखी कर जारी किए गए इस नीतिगत निर्देश के फलस्वरूप राज्य को न केवल हज़ारों करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई, बल्कि आतिथ्य क्षेत्र के लगभग 10 लाख श्रमिक रातों-रात बेरोज़गार हो गए। प्रतिकूल प्रभावों की व्यापकता को देखते हुए, अंततः न्यायालय को स्वयं अपने आदेशों में संशोधन करने के लिये बाध्य होना पड़ा।
    • साथ ही, न्यायपालिका में नीति-निर्माण के लिये आवश्यक संस्थागत क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का अभाव है, जिससे इस तरह के हस्तक्षेप संवैधानिक रूप से संवेदनशील हो जाते हैं।
    • बहुकेंद्रीयता और हितधारकों का बहिष्कार: जनहित याचिकाओं में अक्सर बहुकेंद्रीय विवाद शामिल होते हैं जहाँ एक ही न्यायिक आदेश का कई हितधारकों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। 
  • न्यायालय प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद करने जैसे मामलों में त्वरित कार्यवाही तो करते हैं, किंतु इस प्रक्रिया में प्रभावित श्रमिकों जैसे सभी हितधारकों (Stakeholders) का पक्ष सुने बिना ही निर्णय ले लिए जाते हैं।
  • यह बहिष्कार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को कमज़ोर करता है, विशेष रूप से ऑडी अल्टरम पार्टेम (दूसरे पक्ष की बात सुनने) के नियम को।
  • एमिकस क्यूरी और प्रक्रियात्मक चिंताएँ: जटिल जनहित याचिकाओं में, कुछ मामलों में एमिकस क्यूरी की भूमिका तटस्थ सहायता से आगे बढ़कर विस्तारित हो गई है। 
  • "इससे एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के स्वयं एक 'अर्द्ध-याचिकाकर्त्ता' के रूप में परिवर्तित होने का जोखिम उत्पन्न होता है। यह स्थिति न केवल प्रतिपक्षी न्याय प्रणाली को कमज़ोर करती है, बल्कि न्यायिक निर्णयों की निष्पक्षता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
  • "प्रायोजित" या "सुनियोजित" जनहित याचिकाओं का उदय: "वर्तमान में ऐसी जनहित याचिकाओं का चलन बढ़ा है जो अपरिपक्व और अव्यवस्थित ढंग से तैयार की गई होती हैं। इन्हें रणनीतिक रूप से केवल इसलिये दायर किया जाता है ताकि उन्हें शीघ्र खारिज कराया जा सके और मुख्य मुद्दे के कानूनी प्रभाव को कमज़ोर किया जा सके।
  • यह स्थिति वास्तविक याचिकाकर्त्ताओं के लिये 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के सिद्धांत के कारण एक विधिक अवरोध उत्पन्न करती है। इसके परिणामस्वरूप, बाद में प्रस्तुत की गई गंभीर और गहन शोध पर आधारित याचिकाओं पर सुनवाई के मार्ग प्रभावी रूप से बंद हो जाते हैं।
    • 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों के साथ भारतीय न्यायपालिका गंभीर केस बैकलॉग का सामना कर रही है। व्यापक जनहित याचिकाओं (PILs) पर विचार करना न्यायालय के महत्त्वपूर्ण समय और संसाधनों का उपयोग करता है, जिससे नियमित दीवानी एवं आपराधिक मामलों के निर्णय में देरी होती है तथा समय पर न्याय प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होती है।
  • प्रवर्तन अंतर और विश्वसनीयता संबंधी मुद्दे: अंततः न्यायिक निर्देशों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच एक अंतर पाया जाता है। 
    • कई जनहित याचिका (PIL) के आदेश व्यावहारिकता या प्रशासनिक समर्थन के अभाव से जूझते हैं और कमज़ोर प्रवर्तन तंत्र, जिसमें अवमानना कार्यवाही का सीमित उपयोग शामिल है, अनुपालन में कमी का कारण बनता है। इससे अंततः न्यायपालिका की विश्वसनीयता तथा अधिकारिता कमज़ोर होती है।

जनहित याचिका (PIL) क्या है?

  • विवरण: जनहित याचिका (PIL) एक कानूनी तंत्र है, जिसके माध्यम से कोई भी जन-हितैषी व्यक्ति या संगठन उन लोगों की ओर से न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है, जिनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, लेकिन जो गरीबी, अशिक्षा या सामाजिक-आर्थिक बाधाओं के कारण स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुँच सकते। 
    • जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा अमेरिकी न्यायशास्त्र से ली गई मानी जाती है। भारत में इसका विकास 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक में हुआ, जिसे न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर और न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती जैसे दूरदर्शी न्यायाधीशों ने आगे बढ़ाया।
    • जनहित याचिकाओं (PIL) के अस्तित्व में आने से पहले पारंपरिक कानूनी सिद्धांत लॉकस स्टैंडी (Locus Standi) था, जिसका अर्थ है “मुकदमा दायर करने का अधिकार”। इस सिद्धांत के अनुसार केवल वही व्यक्ति न्यायालय में याचिका दायर कर सकता था, जिसके व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो। जनहित याचिका ने इस नियम को मूल रूप से शिथिल (relax) कर दिया।
  • भारत में जनहित याचिका (PIL) का संवैधानिक आधार
    • अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार): इसे अक्सर बी.आर. अंबेडकर द्वारा संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा गया है। अनुच्छेद 32 के तहत व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिये सीधे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर सकता है।
      • जनहित याचिका (PIL) के न्यायशास्त्र के माध्यम से इसका दायरा केवल पीड़ित व्यक्तियों तक सीमित न रहकर जन-हितैषी नागरिकों तक विस्तृत हो गया है, जो वंचित समूहों की ओर से कार्य करते हैं। इससे न्याय तक पहुँच और अधिक सुदृढ़ हुई है।
    • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति): यह प्रावधान उच्च न्यायालयों को क्षेत्रीय मुद्दों जैसे शासन की विफलताएँ, पर्यावरणीय समस्याएँ और प्रशासनिक त्रुटियों पर जनहित याचिकाएँ (PIL) सुनने एवं स्वीकार करने में सक्षम बनाता है।
    • अनुच्छेद 39A (राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व): यह राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि सभी को समान न्याय मिले तथा निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान की जाए, ताकि कोई भी नागरिक आर्थिक या अन्य कारणों से न्याय से वंचित न रहे।
      • PILs को अपना नैतिक और दार्शनिक आधार इसी प्रावधान से प्राप्त होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश:
    • बालवंत सिंह चौफाल दिशा-निर्देश (2010): उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग को रोकने के लिये कड़े दिशा-निर्देश निर्धारित किये।
      • इनमें याचिकाकर्त्ता की पृष्ठभूमि और तथ्यों का सत्यापन करना, वास्तविक जनहित एवं तात्कालिकता सुनिश्चित करना, निजी या राजनीतिक उद्देश्यों की अनुपस्थिति की जाँच करना, प्रचार-प्राप्ति के लिये दुरुपयोग को रोकना तथा निराधार याचिकाओं पर दंडात्मक लागत लगाना शामिल है।
    • सर्वोच्च न्यायालय नियम, 2013 (प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय): इन नियमों के तहत याचिकाकर्त्ता को समान मुद्दों पर पूर्व में दायर याचिकाओं का विवरण देना आवश्यक है, व्यक्तिगत हित की अनुपस्थिति की घोषणा करनी होती है (या यदि मौजूद हो तो उसे स्पष्ट रूप से बताना होता है), तथा अपनी आय और व्यवसाय का विवरण देना होता है ताकि उसकी सद्भावना स्थापित की जा सके। 
      • इन उपायों का उद्देश्य निराधार या स्वार्थ-प्रेरित मुकदमों को रोकना है, जबकि जनहित याचिका (PIL) को न्याय प्राप्ति के एक प्रभावी साधन के रूप में बनाए रखना है।

महत्त्व

  • निःस्वरों की आवाज़: जनहित याचिका (PIL) आज भी बंधुआ मज़दूरों, विचाराधीन कैदियों, वंचित समुदायों और सामूहिक आपदाओं के पीड़ितों के लिये देश के सर्वोच्च न्यायालयों तक पहुँचने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है। 
  • सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन का उत्प्रेरक: जनहित याचिकाओं (PIL) ने आधुनिक भारतीय न्यायशास्त्र को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
    • महत्त्वपूर्ण जनहित याचिका मामलों ने भारतीय कानून को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1986) में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण दायित्व के सिद्धांत को विकसित किया, जिससे पर्यावरणीय जवाबदेही को और अधिक सुदृढ़ किया गया। 
    • नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000) में सर्वोच्च न्यायालय ने विस्थापित व्यक्तियों के उचित पुनर्वास और पुनर्स्थापन की शर्त पर बाँध निर्माण की अनुमति दी।
    • इसी प्रकार विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिये विशाखा दिशा-निर्देश जारी किये, जिसके आधार पर बाद में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 बनाया गया। 
  • कार्यपालिका को जवाबदेह बनाना: जनहित याचिकाएँ (PILs) प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार और कार्यपालिका की निष्क्रियता पर एक महत्त्वपूर्ण नियंत्रण के रूप में कार्य करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकार अपने संवैधानिक तथा वैधानिक कर्त्तव्यों का पालन करे। 
  • मौलिक अधिकारों का विस्तार: जनहित याचिकाओं (PILs) के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार, त्वरित न्याय का अधिकार तथा निजता का अधिकार शामिल किया है। 
    • पहला प्रमुख जनहित याचिका (PIL) मामला, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979), ने जेलों की अमानवीय परिस्थितियों को सामने लाया और 40,000 से अधिक विचाराधीन कैदियों की रिहाई सुनिश्चित की। इस फैसले ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित सुनवाई के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी और आगे के PIL न्यायशास्त्र की मज़बूत आधारशिला रखी।

PIL को सुदृढ़ बनाने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • दिशा-निर्देशों का सख्ती के साथ पालन करना: न्यायालयों को प्रवेश स्तर पर ही बलवंत सिंह चौफल के दिशा-निर्देशों को सख्ती के साथ लागू करना चाहिये। 
  • उदाहरणात्मक दंड: छद्म या प्रचार-संचालित मुकदमों के माध्यम से न्यायालय का समय बर्बाद करने वाले दोषियों पर भारी आर्थिक दंड और भविष्य में याचिकाएँ दायर करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये।
  • छँटाई तंत्र: उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय याचिकाओं की जाँच करने और न्यायाधीशों की पीठ तक पहुँचने से पहले ही याचिकाओं को बाहर करने के लिये आंतरिक प्रशासनिक समितियाँ या "पीआईएल सेल" (PIL Cells) स्थापित कर सकते हैं।
  • विशेषज्ञ PIL बेंच: पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के लिये विशेष पीठों की स्थापना न्यायिक दक्षता और विशेषज्ञता में सुधार कर सकती है, जैसा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय की 'ग्रीन बेंच' के मामले में देखा गया है।
    • इसके अतिरिक्त, एक स्पष्ट कानूनी ढाँचा, जो संभवतः भारत के विधि आयोग की सिफारिशों द्वारा निर्देशित हो, वास्तविक जनहित के मामलों के दायरे को परिभाषित करके अस्पष्टता को कम कर सकता है और दुरुपयोग पर रोक लगा सकता है।
  • न्यायपालिका द्वारा आत्म-संयम: न्यायाधीशों को न्यायिक अनुशासन का पालन करना चाहिये और कार्यपालिका या विधायिका की भूमिका में आने से बचना चाहिये; उन्हें केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिये जब मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हो या कोई संवैधानिक शून्यता की स्थिति हो।

निष्कर्ष

जनहित याचिका (PIL) समस्या नहीं है — इसका विरूपण समस्या है। इसलिये, इसके क्षेत्राधिकार पर पुनर्विचार करने या इसे कम करने के बजाय, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करने, वास्तविक उपयोग को सुनिश्चित करने और न्यायिक अनुशासन को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये, ताकि जनहित याचिका सामाजिक न्याय के एक प्रभावी साधन के रूप में कार्य करना जारी रखे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  “जनहित याचिका सामाजिक न्याय के एक साधन से बदलकर रणनीतिक मुकदमेबाज़ी का एक उपकरण बन गई है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. जनहित याचिका (PIL) क्या है?
PIL एक कानूनी तंत्र है जो किसी भी सार्वजनिक भावना वाले व्यक्ति को अधिकारों के प्रवर्तन के लिये वंचित समूहों की ओर से न्यायालयों तक पहुँचने की अनुमति देता है।

2. भारत में PIL का आधार कौन-से संवैधानिक प्रावधान हैं?
अनुच्छेद 32 और 226 रिट क्षेत्राधिकार को सक्षम बनाते हैं, जबकि अनुच्छेद 39A न्याय तक समान पहुँच के लिये दार्शनिक आधार प्रदान करता है।

3. बलवंत सिंह चौफल के दिशा-निर्देश (2010) क्या हैं?
ये याचिकाकर्त्ता की साख के सत्यापन, वास्तविक जनहित, निजी उद्देश्यों की अनुपस्थिति और छोटी जनहित याचिकाओं पर हर्जाना लगाने का आदेश देते हैं।

4. 'एम्बुश पीआईएल' का क्या अर्थ है?
यह रणनीतिक रूप से दायर की गई कमज़ोर याचिकाओं को संदर्भित करता है ताकि उन्हें खारिज करवाकर 'रे जुडिकाटा' के माध्यम से वास्तविक याचिकाकर्त्ताओं का रास्ता रोका जा सके।

5. PIL ने अनुच्छेद 21 के विस्तार में कैसे योगदान दिया है?
न्यायालयों ने जनहित याचिका न्यायशास्त्र के माध्यम से जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए इसमें स्वच्छ पर्यावरण, कानूनी सहायता, त्वरित सुनवाई और गरिमा को शामिल किया है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न. भारत में जनहित याचिकाओं (PIL) के बढ़ने के कारण स्पष्ट कीजिये। इसके परिणामस्वरूप, क्या भारत का  उच्चतम न्यायालय दुनिया की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका के रूप में उभरा है? (2024)


मुख्य परीक्षा

PMUY के 10 वर्ष

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) ने महिलाओं को केवल योजना के लाभार्थी से आगे बढ़ाकर स्वच्छ ऊर्जा सशक्तीकरण की शुरुआत का केंद्र बना दिया है। 

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना क्या है?

  • परिचय: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) द्वारा वर्ष 2016 में शुरू की गई एक प्रमुख कल्याणकारी योजना है, जिसका उद्देश्य गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन (LPG) उपलब्ध कराना है, ताकि जलावन लकड़ी और कोयले जैसे पारंपरिक प्रदूषित ईंधनों का स्थान लिया जा सके। 
    • वर्ष 2025-26 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर पर प्रतिवर्ष अधिकतम 9 रिफिल तक ₹300 की लक्षित सब्सिडी जारी रखने को मंज़ूरी दी। 
  • मुख्य उद्देश्य: घर के अंदर होने वाले वायु प्रदूषण और धुएँ से संबंधित श्वसन रोगों को कम करके महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार करना।
    • दैनिक घरेलू कार्यों में गरिमा, सुविधा और सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • संतृप्ति लक्ष्य: अप्रैल 2026 के अंत तक इस योजना के तहत 10.54 करोड़ से अधिक कनेक्शन जारी किये जा चुके हैं। सार्वभौमिक कवरेज प्राप्त करने के लिये वर्ष 2025–26 चक्र हेतु अतिरिक्त 25 लाख कनेक्शनों को मंज़ूरी दी गई है। 
    • लक्षित लाभार्थी: इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों की महिलाएँ, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) परिवार, वनवासी तथा अन्य वंचित वर्ग शामिल हैं। 
    • इसे बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने के कारण अक्सर “ब्लू फ्लेम क्रांति” कहा जाता है। 
  • उज्ज्वला 2.0 (प्रवासन-अनुकूल चरण): वर्ष 2021 में शुरू किये गए इस चरण में दस्तावेज़ीकरण को सरल बनाया गया। अब प्रवासी श्रमिक औपचारिक राशन कार्ड या स्थानीय निवास प्रमाण के बजाय स्व-घोषणा के आधार पर आवेदन कर सकते हैं।  
  • वित्तीय मॉडल: सरकार प्रति कनेक्शन ₹1,600 प्रदान करती है, जिसमें सुरक्षा जमा और इंस्टॉलेशन लागत शामिल होती है। उज्ज्वला 2.0 के तहत पहला रिफिल और गैस चूल्हा (हॉटप्लेट) भी निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। 
  • उपभोग रुझान: प्रति व्यक्ति औसत खपत 2019-20 में लगभग 3 रिफिल से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 4.47 रिफिल हो गई है, जो स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन के निरंतर उपयोग को दर्शाती है। 

PMUY की उपलब्धियाँ

  • स्वास्थ्य और सुरक्षा: PMUY जलावन लकड़ी और कोयले से निकलने वाले विषैले धुएँ को समाप्त करता है, जिससे श्वसन रोग, फेफड़ों के संक्रमण तथा आँखों में जलन में उल्लेखनीय कमी आती है। यह गर्भवती महिलाओं को हानिकारक धुएँ के संपर्क से बचाता है, जिसकी तुलना अक्सर प्रतिदिन सैकड़ों सिगरेट पीने के प्रभाव से की जाती है। 
    • यह पहले जलावन लकड़ी इकट्ठा करने या गोबर के उपले बनाने में लगने वाले घंटों की बचत करता है। इस बचाए गए समय का उपयोग महिलाएँ आय अर्जित करने वाली गतिविधियों, शिक्षा या विश्राम के लिये कर सकती हैं। 
  • महिला सशक्तीकरण: LPG कनेक्शन परिवार की वयस्क महिला के नाम पर जारी किया जाता है, जिससे उसकी आर्थिक स्वायत्तता बढ़ती है और परिवार में उसका सामाजिक दर्जा मज़बूत होता है।
  • बुनियादी ढाँचा और ऊर्जा न्याय: भारत में कुल LPG कनेक्शनों की संख्या वर्ष 2014 में 14.52 करोड़ से बढ़कर 2024 के अंत तक 32 करोड़ से अधिक हो गई, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज लगभग दोगुना हो गया। 
    • LPG वितरकों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई, जिसमें विशेष रूप से पूर्वी और पहले से कम सेवित ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच बढ़ाने पर ध्यान दिया गया। 
  • व्यावहारिक और प्रणालीगत परिवर्तन: उज्ज्वला योजना की सफलता ने लोगों की आदतों तथा सोच में एक “व्यावहारिक बदलाव” उत्पन्न किया है, जिससे ऊर्जा परिवर्तन के अगले चरण, जैसे इंडक्शन-आधारित खाना पकाने, के लिये रास्ता तैयार हुआ है। 
  • तकनीकी दक्षता: इस योजना की सफलता JAM त्रिमूर्ति (जन धन, आधार और मोबाइल) पर आधारित है, जिसने लक्षित सब्सिडी को सीधे महिला लाभार्थियों के बैंक खातों में बिना लीकेज के स्थानांतरित करना संभव बनाया। 

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से कौन-सी चिंताएँ जुड़ी हैं?

  • रिफिल और वहनीयता अंतर: प्रारंभिक मुफ्त कनेक्शन और ₹300 की सब्सिडी के बावजूद, बाद के रिफिल की जेब से होने वाली लागत गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों के लिये वित्तीय बोझ बनी रहती है, खासकर तब जब पारंपरिक बायोमास ईंधन उन्हें निशुल्क उपलब्ध होता है। 
    • आँकड़े बताते हैं कि जहाँ सामान्य उपभोक्ता वर्ष में औसतन 6–7 रिफिल लेते हैं, वहीं PMUY लाभार्थियों का औसत लगभग 4–5 रिफिल रहता है और एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत ऐसे लाभार्थियों का है जो पहले वर्ष के बाद केवल एक या कोई भी रिफिल नहीं लेते। 
  • वैश्विक अस्थिरता: जैसा कि 2026 की शुरुआत में पश्चिम एशिया संकट के दौरान देखा गया, भारत की LPG पर 50% से अधिक आयात निर्भरता घरेलू कीमतों को वैश्विक संघर्षों के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके कारण सब्सिडी के बावजूद प्रभावी कीमत कई बार गरीब परिवारों की पहुँच से बाहर हो जाती है। 
  • फ्यूल स्टैकिंग (एकाधिक ईंधन का उपयोग): लाभार्थी अक्सर "फ्यूल स्टैकिंग" करते हैं—यानी चाय बनाने जैसे त्वरित कार्यों के लिये LPG का उपयोग करते हैं, जबकि रोटी बनाने या पानी उबालने जैसे अधिक श्रम वाले कार्यों के लिये लकड़ी या उपलों पर निर्भर रहते हैं। जब तक LPG के साथ पारंपरिक बायोमास का उपयोग किया जाता है, तब तक स्वास्थ्य संबंधी जोखिम (श्वसन संबंधी रोग, मोतियाबिंद) बने रहते हैं।
  • अंतिम मील वितरण और रसद: पहाड़ी या जनजातीय क्षेत्रों में होम डिलीवरी सेवाओं की कमी के कारण श्रमिकों को सिलेंडर लाने के लिये एक दिन के वेतन से हाथ धोना पड़ता है। कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में रिफिल के बीच 45 दिनों के अनिवार्य अंतराल जैसे परिचालन नियम उन बड़े परिवारों के लिये आपूर्ति बाधित कर सकते हैं जिनका सिलेंडर जल्दी समाप्त हो जाता है।
  • घोस्ट कनेक्शन (फर्जी कनेक्शन): ऐतिहासिक ऑडिट ने "निष्क्रिय" या "घोस्ट" कनेक्शन की ओर इशारा किया है, जहाँ सिलेंडरों को लक्षित गरीब परिवारों तक पहुँचाने के बजाय व्यावसायिक उपयोग (होटल/परिवहन) के लिये डायवर्ट किया जा सकता है।
  • सांस्कृतिक प्राथमिकता: कुछ क्षेत्रों में, पारंपरिक चूल्हे पर बने भोजन के स्वाद के प्रति प्राथमिकता या यह विश्वास कि लकड़ी की आग पर खाना बनाना अधिक "प्राकृतिक" है, एलपीजी को पूरी तरह से अपनाने की गति को धीमा कर देता है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को अधिक-से-अधिक अपनाने के लिये किन कदमों की आवश्यकता है?

  • वित्तीय सामर्थ्य को बढ़ाना: प्रति सिलेंडर सब्सिडी को 'डायनेमिक' (गतिशील) होना चाहिये — अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उछाल आने पर यह स्वतः बढ़नी चाहिये — ताकि परिवारों को वापस जलाऊ लकड़ी की ओर जाने से रोका जा सके।
    • 5 किलोग्राम वाले "छोटू" सिलेंडरों को आक्रामक रूप से बढ़ावा देना चाहिये, जिनकी रिफिल लागत कम होती है, जिससे वे दैनिक वेतन भोगियों के लिये अधिक सुलभ हो जाते हैं।
  • अंतिम मील तक वितरण को मज़बूत करना: ग्रामीण महिलाओं द्वारा तय की जाने वाली दूरी को कम करने के लिये सामान्य सेवा केंद्रों (CSC) और स्थानीय किराना स्टोरों का "माइक्रो-वितरण बिंदुओं" के रूप में उपयोग करना चाहिये।
    • आकांक्षी ज़िलों और पहाड़ी क्षेत्रों में होम डिलीवरी के लिये वितरकों को उच्च कमीशन प्रदान करना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि महिलाओं को ईंधन लाने के लिये एक दिन की मज़दूरी न गँवानी पड़े।
  • स्वच्छ ऊर्जा के साथ समन्वय: इंडक्शन स्टोन को बिजली प्रदान करने के लिये रूफटॉप सोलर (पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना) का उपयोग करके, परिवार महँगे एलपीजी सिलेंडरों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में, लघु स्तर के बायोगैस संयंत्रों (GOBARdhan) को बढ़ावा देना एक मुफ्त और स्थानीय विकल्प प्रदान करता है जो LPG का पूरक है, विशेष रूप से अधिक खाना पकाने की ज़रूरतों के लिये।
  • जागरूकता के लिये स्वयं सहायता समूहों (SHG) का लाभ उठाना: महिलाओं को "उज्ज्वला दीदी" के रूप में प्रशिक्षित करने के लिये लखपति दीदी पहल का उपयोग करना, जो अपने गाँवों में LPG उपयोग के लिये ब्रांड एंबेसडर और समस्या निवारक के रूप में कार्य करें।

निष्कर्ष

'ब्लू फ्लेम रिवोल्यूशन' ने महिलाओं को ऊर्जा संक्रमण के सक्रिय एजेंट के रूप में मानकर शासन के प्रतिमान को महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर सफलतापूर्वक स्थानांतरित कर दिया है। यह सुनिश्चित करने के लिये कि यह बदलाव अपरिवर्तनीय हो, सरकार को कैलिब्रेटेड सब्सिडी और अंतिम मील तक रसद के माध्यम से 'सामर्थ्य-उपभोग अंतराल' (affordability-consumption gap) को संबोधित करना चाहिये, ताकि ऊर्जा न्याय के लक्ष्य को वास्तव में प्राप्त किया जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने में 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' की परिवर्तनकारी भूमिका पर चर्चा कीजिये और साथ ही इसके निरंतर उपयोग तथा 'फ्यूल स्टैकिंग' (ईंधन के मिश्रित उपयोग) से संबंधित चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. PMUY के लिये कौन-सा मंत्रालय ज़िम्मेदार है और वर्तमान में संतृप्ति की स्थिति क्या है?
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) इसके लिये नोडल मंत्रालय है; अप्रैल 2026 तक, इस योजना ने 10.54 करोड़ से अधिक कनेक्शनों की संतृप्ति प्राप्त कर ली है।

2. योजना के प्राथमिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय उद्देश्य क्या हैं?
योजना का उद्देश्य बायोमास को स्वच्छ दहन वाली LPG से बदलकर घरेलू वायु प्रदूषण (IAP) और संबंधित श्वसन रोगों को कम करना है, जो SDG 3 (उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली) और SDG 7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) के अनुरूप है।

3. 'फ्यूल स्टैकिंग' (ईंधन का दोहरा उपयोग) क्या है और यह नीति-निर्माताओं के लिये चिंता का विषय क्यों है?
फ्यूल स्टैकिंग LPG और पारंपरिक बायोमास का एक साथ उपयोग है; यह नीति-निर्माताओं के लिये चिंता का विषय है क्योंकि यह महिलाओं एवं बच्चों के विषैले धुएँ के संपर्क में आने के पूर्ण उन्मूलन को रोकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. भारत की जैव-ईंधन की राष्ट्रीय नीति के अनुसार, जैव-ईंधन के उत्पादन के लिये निम्नलिखित में से किनका उपयोग कच्चे माल के रूप में हो सकता है? (2020)

  1. कसावा
  2. क्षतिग्रस्त गेहूँ के दाने
  3. मूँगफली के बीज
  4. कुलथी (Horse gram)
  5. सड़ा आलू
  6. चुकंदर

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग करते हुए सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 5 और 6

(b) केवल 1, 3, 4 और 6

(c) केवल 2, 3, 4 और 5

(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न. "वहनीय (ऐफोर्डेबल), विश्वसनीय, धारणीय तथा आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच संधारणीय (सस्टेनबल) विकास लक्ष्यों (एस० डी० जी०) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।" भारत में इस संबंध में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018) 


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