रैपिड फायर
अमेरिका ने चोरी की गई 657 प्राचीन वस्तुएँ भारत को लौटाईं
संयुक्त राज्य अमेरिका ने लगभग 14 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की 657 प्राचीन वस्तुएँ भारत को वापस सौंपी हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा तस्करी नेटवर्क के विरुद्ध वैश्विक कार्रवाई में एक महत्त्वपूर्ण सफलता को दर्शाता है।
पुनर्प्राप्त प्रमुख पुरावशेष
- कांस्य अवलोकितेश्वर: प्रमुख कलाकृतियों में छत्तीसगढ़ के सिरपुर से प्राप्त अवलोकितेश्वर (महायान बौद्ध धर्म में अनंत करुणा के बोधिसत्त्व) की कांस्य प्रतिमा शामिल है, जिस पर शिल्पकार द्रोणादित्य का अभिलेख अंकित है। यह द्वि-कमलाकार अभिलेखित आधार पर विराजमान है।
- लाल बलुआ पत्थर बुद्ध प्रतिमा: लाल बलुआ पत्थर से निर्मित खड़ी बुद्ध प्रतिमा, जिसमें दाहिना हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है, जो संरक्षण और निर्भयता का प्रतीक है।
- नृत्यरत गणेश: मध्य प्रदेश के एक मंदिर से चोरी की गई बलुआ पत्थर निर्मित नृत्यरत गणेश की प्रतिमा।
प्राचीन वस्तुओं की वापसी की प्रक्रिया
- 1947 से पूर्व (औपनिवेशिक काल): उस समय कोई अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचा मौजूद नहीं था, इसलिये वस्तुओं की वापसी मुख्यतः सांस्कृतिक कूटनीति, द्विपक्षीय वार्ता और आपसी सद्भाव पर निर्भर करती थी।
- 1947-1976: इस अवधि में पुनर्प्राप्ति मुख्यतः द्विपक्षीय कूटनीति तथा घरेलू कानूनों, जैसे- पुरावशेष (निर्यात नियंत्रण) अधिनियम, 1947, पर आधारित थी। चूँकि भारत ने 1970 यूनेस्को अभिसमय को 1977 में अनुमोदित किया, इसलिये उस समय अंतर्राष्ट्रीय तंत्र और साक्ष्य-आधारित प्रक्रिया सीमित होने के कारण वस्तुओं की वापसी कठिन थी।
- 1976 पश्चात: यह प्रक्रिया पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 द्वारा शासित है, जो 1976 में लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत निजी व्यक्तियों द्वारा प्राचीन वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध है; निर्यात केवल केंद्र सरकार या अधिकृत एजेंसियों द्वारा तथा आवश्यक अनुमति के साथ ही किया जा सकता है। इसलिये 1976 के बाद अवैध निर्यातित वस्तुओं को वापस लाना अपेक्षाकृत अधिक सुगम हो गया है।
प्राचीन वस्तु
पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 के अनुसार, ‘प्राचीन वस्तु’ में निम्नलिखित श्रेणियाँ शामिल हैं, बशर्ते वे निर्धारित आयु मानदंडों को पूरा करती हों:
- सामान्य कलाकृतियाँ (100 वर्ष या अधिक पुरानी): ऐसी कोई भी वस्तु, जो कम-से-कम 100 वर्ष पुरानी हो। इसमें कलात्मक कृतियाँ, वास्तुकला के पृथक हिस्से, प्राचीन काल को दर्शाने वाली वस्तुएँ तथा सामान्य ऐतिहासिक महत्त्व की सामग्री शामिल हैं।
- पांडुलिपियाँ एवं दस्तावेज (75 वर्ष या अधिक पुराने): कोई भी पांडुलिपि, अभिलेख या अन्य दस्तावेज, जिसका वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक या सौंदर्यात्मक महत्त्व हो तथा जो कम-से-कम 75 वर्ष पुराना हो, कानूनी रूप से प्राचीन वस्तु माना जाता है।
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शासन व्यवस्था
भारत में घृणास्पद भाषण
प्रिलिम्स के लिये: घृणास्पद भाषण, बंधुत्व, प्रस्तावना, अनुच्छेद 51A, शक्तियों का पृथक्करण, अनुच्छेद 19
मेन्स के लिये: वाक् स्वतंत्रता बनाम उचित प्रतिबंध (अनुच्छेद 19), बंधुत्व और सामाजिक सद्भाव का संवैधानिक मूल्य, आपराधिक कानूनों की प्रभावशीलता बनाम प्रवर्तन में कमियाँ
चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि घृणास्पद भाषण (हेट स्पीच) "हम बनाम वे" की मानसिकता से उत्पन्न होते हैं और 'बंधुत्व' के संवैधानिक मूल्य को कमज़ोर करते हैं। समाज पर इसके गंभीर प्रभाव को स्वीकार करते हुए भी, न्यायालय ने नए कानून बनाने का आदेश देने से इनकार कर दिया और इसके बजाय मौजूदा कानूनी प्रावधानों के बेहतर प्रवर्तन पर बल दिया।
सारांश
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "हम बनाम वे" की मानसिकता से प्रेरित घृणास्पद भाषण (हेट स्पीच) संवैधानिक बंधुत्व और सामाजिक सद्भाव को कमज़ोर करता है।
- न्यायालय ने बल देते हुए कहा कि समस्या मौज़ूदा कानूनों के खराब प्रवर्तन में है, न कि विधि के अभाव में, उसने नए कानून बनाने के बजाय प्रवर्तन को मजबूत करने का आह्वान किया।
घृणास्पद भाषण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ क्या हैं?
- बंधुत्व के विपरीत: न्यायालय ने पाया कि घृणास्पद भाषण केवल स्वीकार्य सार्वजनिक विचार-विमर्श से एक विचलन नहीं है; यह गणतंत्र के नैतिक ढाँचे पर हमला करता है और प्रस्तावना में उल्लिखित बंधुत्व के संवैधानिक मूल्य को कमज़ोर करता है।
- सभ्यतागत लोकाचार के विरुद्ध: "हम बनाम वे" की द्विआधारी मानसिकता भारत के "वसुधैव कुटुम्बकम्" (विश्व एक परिवार है) के गहन सभ्यतागत लोकाचार के विपरीत है।
- एक राष्ट्र जिसने ऐतिहासिक रूप से विविध समुदायों को अपनाया है, वह नागरिकता को बहिष्कार के आधार में नहीं बदल सकता है।
- मौलिक कर्त्तव्यों की भूमिका: अनुच्छेद 51A(e) का संदर्भ देते हुए, न्यायालय ने नागरिकों को धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं से परे, भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान्य बंधुत्व की भावना को बढ़ावा देने के अपने मौलिक कर्त्तव्य का स्मरण कराया।
- विधि निर्माण से इनकार (शक्तियों का पृथक्करण): न्यायालय ने कहा कि नए अपराधों का सृजन पूरी तरह से विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है। न्यायपालिका द्वारा घृणास्पद भाषण के विरुद्ध वैधानिक योजनाएँ बनाने का कोई भी प्रयास शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करेगा।
- कोई विधायी शून्यता नहीं: पीठ ने इस बात पर बल दिया कि मौजूदा दंडात्मक कानून (जैसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023) घृणास्पद भाषण को पर्याप्त रूप से संबोधित करते हैं।
- बार-बार होने वाली हिंसा और रक्तपात कानून की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि उसके खराब प्रवर्तन और कार्यान्वयन का फल है।
- घृणास्पद भाषण का सामना कर रहे नागरिकों के लिये प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय:
- वैकल्पिक शिकायत तंत्र: यदि कोई स्थानीय पुलिस थाना संज्ञेय अपराध दर्ज करने से इनकार करता है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173(4) शिकायतकर्ता को पुलिस अधीक्षक (SP) को पोस्ट के माध्यम से सूचना लिखित में भेजने की अनुमति देती है।
- कोई पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि घृणास्पद भाषण से संबंधित शिकायत पर संज्ञान लेने हेतु मजिस्ट्रेट के लिये किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
- अनिवार्य FIR पंजीकरण: ऐतिहासिक तहसीन पूनावाला मामले (2018) में अपने रुख को दोहराते हुए, न्यायालय ने बल देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों को घृणास्पद भाषण के बारे में शिकायत मिलने पर तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करनी चाहिये, जिससे अधिकारिक मजिस्ट्रेटों की निगरानी में निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच सुनिश्चित हो सके।
हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) क्या है?
- परिभाषा: भारत में हेट स्पीच की कोई एकल, व्यापक कानूनी परिभाषा नहीं है। हालाँकि, भारत के 267वें भारत का विधि आयोग प्रतिवेदन (2017) में इसे सामान्यतः ऐसे भाषण के रूप में परिभाषित किया गया है, जो नस्ल, जातीयता, लिंग, यौन अभिविन्यास, धार्मिक विश्वास आदि के आधार पर परिभाषित व्यक्तियों के किसी समूह के विरुद्ध घृणा को उकसाता हो।
- संदर्भ: यह किसी भी प्रकार के भाषण, संकेत, आचरण, लेखन या प्रदर्शन को संदर्भित करता है, जो किसी संरक्षित व्यक्ति या समूह के विरुद्ध अथवा उनके द्वारा हिंसा या पूर्वाग्रहपूर्ण कार्यवाही को प्रेरित किया जा सकता है या जो ऐसे व्यक्ति अथवा समूह को अपमानित या भयभीत करता हो।
- हेट स्पीच से निपटने हेतु कानूनी ढाँचा:
- संवैधानिक संरक्षण एवं सीमाएँ: अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) लोक व्यवस्था, गरिमा, संप्रभुता की रक्षा तथा अपराधों के उकसावे को रोकने के लिए युक्तिसंगत प्रतिबंधों की अनुमति प्रदान करता है।
- वैधानिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले कृत्यों को दंडित करती है।
- किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से उसके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का जानबूझकर एवं दुर्भावनापूर्ण अपमान करने वाले कृत्यों को दंडनीय बनाती है।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देने के दोषी ठहराए गए उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करता है।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: सार्वजनिक दृष्टि के अंतर्गत किसी स्थान पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को अपमानित करने के उद्देश्य से किये गए जानबूझकर अपमान, धमकी या अपमानजनक वक्तव्य को अपराध घोषित करता है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले कृत्यों को दंडित करता है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले कृत्यों को दंडित करती है।
- डिजिटल एवं मीडिया विनियमन:
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: ये नियम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और मध्यस्थों को न्यायालय के आदेश या सरकारी एजेंसी की सूचना प्राप्त होने पर हेट स्पीच सहित अवैध सामग्री को शीघ्र हटाने के लिए बाध्य करते हैं।
- केबल टेलीविजन नेटवर्क विनियमन अधिनियम, 1995: इसके प्रोग्राम कोड के अंतर्गत ऐसे टेलीविजन प्रसारणों पर कड़ा प्रतिबंध है, जिनमें धर्मों या समुदायों पर आक्रमण, धार्मिक समूहों के प्रति अपमानजनक दृश्य/शब्द अथवा सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देने वाली सामग्री शामिल हो।
हेट स्पीच से संबंधित न्यायिक निर्णय
- शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने हेट स्पीच की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए पुलिस को औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये बिना स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने हेट स्पीच से प्रेरित भीड़ हिंसा पर अंकुश लगाने हेतु दिशा-निर्देश जारी किये, जिनमें लिंचिंग रोकने के लिये ज़िला नोडल अधिकारियों की नियुक्ति शामिल थी।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को अस्पष्टता के आधार पर निरस्त कर दिया तथा स्पष्ट किया कि अस्पष्ट प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।
- प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने विधि आयोग को हेट स्पीच की स्पष्ट परिभाषा निर्धारित करने तथा इसके विनियमन हेतु निर्वाचन आयोग को सशक्त बनाने के उपायों पर विचार करने का सुझाव दिया।
- स्वतः संज्ञान FIR संबंधी निर्देश: हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि हेट स्पीच से संबंधित अपराधों में औपचारिक शिकायत के बिना भी स्वतः संज्ञान लेते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की जाए; साथ ही चेतावनी दी कि कार्रवाई में संकोच को न्यायालय की अवमानना के रूप में देखा जाएगा।
नोट: हेट क्राइम (घृणा अपराध), हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) से भिन्न है। हेट क्राइम से आशय ऐसे वास्तविक आपराधिक कृत्यों से है, जैसे- हिंसा, हमला या संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, जो किसी व्यक्ति की पहचान (धर्म, जाति, नस्ल, लिंग आदि) के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित हों; जबकि हेट स्पीच मुख्यतः अभिव्यक्ति या संप्रेषण तक सीमित होती है और इसमें आवश्यक रूप से शारीरिक क्षति शामिल नहीं होती।
हेट स्पीच के प्रमुख कारक क्या हैं?
- मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय कारक: हेट स्पीच पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्ध धारणाओं तथा ‘हम बनाम वे/us vs. them’ की मानसिकता से उत्पन्न होती है, जिसे भय, असुरक्षा और अन्य समुदायों के प्रति समानुभूति की कमी और अधिक प्रबल बनाती है।
- राजनीतिक कारक: चुनावी ध्रुवीकरण, पहचान-आधारित राजनीति तथा वोट-बैंक रणनीतियाँ प्रायः विभाजनकारी बयानबाज़ी को बढ़ावा देती हैं, जिससे विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता उत्पन्न होती है।
- प्रौद्योगिकीय कारक: सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया, एल्गोरिदम, इको चैंबर्स, गुमनामी, फेक न्यूज़ तथा TRP-प्रेरित सनसनीखेज़ी के माध्यम से हेट स्पीच को बढ़ावा देते हैं, जिससे ध्रुवीकरणकारी सामग्री का प्रसार तेज़ हो जाता है।
- एल्गोरिदमिक प्रवर्धन: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता सहभागिता को अधिकतम करने के लिए सनसनीखेज़ और ध्रुवीकरणकारी सामग्री को बढ़ावा देते हैं, जिससे हेट स्पीच का प्रसार और दृश्यता बढ़ जाती है।
- इको चैंबर प्रभाव: उपयोगकर्त्ताओं को बार-बार समान विचारों और मान्यताओं के संपर्क में रखा जाता है, जिससे पूर्वाग्रह और अधिक सुदृढ़ होते हैं तथा विविध दृष्टिकोणों के प्रति exposure सीमित हो जाता है।
- कानूनी एवं नियामकीय चुनौतियाँ: हेट स्पीच की स्पष्ट परिभाषा के अभाव तथा मौजूदा कानूनों के अप्रभावी प्रवर्तन के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इसके दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है।
- सामाजिक-आर्थिक कारक: आर्थिक दबाव और सामाजिक अस्थिरता अक्सर हाशिये पर स्थित समूहों को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति को जन्म देते हैं, जिससे हेट स्पीच की घटनाओं में वृद्धि होती है।
- डेटा संबंधी चुनौतियाँ: भारत में हेट स्पीच और उससे संबंधित अपराधों की निगरानी, डेटा की कमी तथा कम रिपोर्टिंग के कारण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने विश्वसनीयता संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए वर्ष 2017 के बाद लिंचिंग और हेट क्राइम से संबंधित विशिष्ट आँकड़ों का प्रकाशन बंद कर दिया।
- हालाँकि, इसकी क्राइम इन इंडिया 2022 रिपोर्ट में वर्ष 2021 और 2022 के बीच IPC की धारा 153A (समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देना) के अंतर्गत दर्ज मामलों में 45% वृद्धि दर्ज की गई, जो हेट स्पीच से प्रेरित अपराधों की बढ़ती प्रवृत्ति तथा उनकी सटीक निगरानी की कठिनाई को दर्शाती है।
हेट स्पीच पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगाने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- विधायी स्पष्टता: 267वीं विधि आयोग रिपोर्ट और विश्वनाथन समिति (2015) की सिफारिशों को लागू किया जाए, जिन्होंने घृणास्पद भाषण को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और दंडित करने के लिये आपराधिक कानून में विशिष्ट एवं सीमित दायरे वाले प्रावधान जोड़ने का सुझाव दिया था।
- संस्थागत जवाबदेही: सर्वोच्च न्यायालय के तहसीन पूनावाला निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें प्रत्येक ज़िले में नोडल पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति तथा औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये बिना स्वतः (सुओ मोटू) FIR दर्ज करना अनिवार्य करना शामिल है।
- वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: नेटवर्क प्रवर्तन अधिनियम (NetzDG), 2017 के प्रावधानों को अपनाना, जो सोशल मीडिया कंपनियों पर 24 घंटे के भीतर चिह्नित घृणास्पद सामग्री हटाने में विफल रहने पर भारी और समयबद्ध वित्तीय दंड लगाता है।
- भारत को घृणास्पद भाषण से निपटने के लिये पुलिस की प्रतिक्रिया को मानकीकृत करना चाहिए, इसके लिये संयुक्त राष्ट्र के “रबत प्लान ऑफ एक्शन” पर आधारित एक राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अपनाई जानी चाहिये, जो छह तत्त्वों—वक्ता, मंशा, सामग्री, संदर्भ, प्रसार और संभावित हानि—के परीक्षण पर आधारित है।
- यह स्थानीय स्तर पर व्यक्तिपरक पक्षपात को कम करेगा, अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक घृणास्पद भाषण के बीच स्पष्ट अंतर करने में मदद करेगा तथा राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना समय पर FIR दर्ज सुनिश्चित करेगा।
- भारत को घृणास्पद भाषण से निपटने के लिये पुलिस की प्रतिक्रिया को मानकीकृत करना चाहिए, इसके लिये संयुक्त राष्ट्र के “रबत प्लान ऑफ एक्शन” पर आधारित एक राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अपनाई जानी चाहिये, जो छह तत्त्वों—वक्ता, मंशा, सामग्री, संदर्भ, प्रसार और संभावित हानि—के परीक्षण पर आधारित है।
- स्वतंत्र नियामक निकाय: चुनावी अवधि के दौरान वास्तविक समय में घृणास्पद भाषण की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय की स्थापना की जाए, जो राजनीतिक कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त हो।
- एल्गोरिदमिक जवाबदेही: इसके लिये IT अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली व्यापक “सेफ हार्बर” छूट से आगे बढ़कर ‘ड्यूटी ऑफ केयर’ ढाँचे की ओर जाना आवश्यक है, जैसा कि यूरोपीय संघ के डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट में देखा जाता है।
- यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को कानूनी रूप से बाध्य करेगा कि वे अपने एल्गोरिदम का स्वतंत्र ऑडिट करें ताकि ध्रुवीकरण करने वाली सामग्री के प्रसार को रोका जा सके और उन्हें उन्नत प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) प्रणालियाँ लागू करने के लिये भी बाध्य करेगा, जिन्हें भारतीय भाषाओं में प्रशिक्षित किया गया हो, जहाँ अधिकांश अनियंत्रित घृणास्पद भाषण देखने को मिलता है।
निष्कर्ष
घृणास्पद भाषण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हथियारकरण है। गणराज्य की नैतिक संरचना की रक्षा के लिये राज्य को प्रतिक्रियात्मक पुलिसिंग से आगे बढ़कर सक्रिय संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। अनुच्छेद 19(2) का पूर्ण निष्पक्षता के साथ पालन करना अनिवार्य है, ताकि गरिमा और बंधुत्व के संवैधानिक वादे को वास्तविक जीवन में साकार किया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता के लिये एक खतरा है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय कानूनी समझ के अनुसार, हेट स्पीच क्या है?
यह उस भाषण को संदर्भित करता है जो धर्म, जाति या जातीयता (विधि आयोग, 267वीं रिपोर्ट) जैसी पहचान के आधार पर समूहों के खिलाफ घृणा या हिंसा को भड़काता है।
2. भारत में हेट स्पीच को कौन से संवैधानिक प्रावधान नियंत्रित करते हैं?
अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और उकसावे की रोकथाम के लिये इस स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
3. भारत में हेट स्पीच से संबंधित कौन-से कानून हैं?
भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), और SC/ST अधिनियम के प्रावधान नफरती भाषण से संबंधित अपराधों को कवर करते हैं।
4. सर्वोच्च न्यायालय ने 2026 के फ़ैसले में किस बात पर ज़ोर दिया?
इसने नए कानून बनाने के बजाय मौजूदा कानूनों को बेहतर ढंग से लागू करने पर ज़ोर दिया।
5. हेट स्पीच पर अंकुश लगाने के लिये प्रमुख उपाय क्या हैं?
मज़बूत कानून प्रवर्तन, एल्गोरिदमिक जवाबदेही, कानूनी स्पष्टता, डिजिटल साक्षरता और संस्थागत सुधार।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. आप 'वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य' संकल्पना से क्या समझते हैं? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (2014)