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संस्थाओं की स्वायत्तता का सवाल | 26 Feb 2019 | भारतीय राजनीति

संदर्भ

पिछले दिनों जहाँ CBI के मामले में सरकार द्वारा गैर-ज़रूरी दखल का मामला सामने आया, वहीं सरकार पर आरोप लगा कि वह RBI की आज़ादी पर पाबंदी लगाना चाह रही है। इस आरोप को और मज़बूती तब मिली जब RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह RBI की स्वायत्तता पर अंकुश लगाना चाहती है।

इस लेख के माध्यम से हम इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।

हालिया वर्षों में संस्थाओं की स्वायत्तता पर विवाद के मामले

भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान के अध्यक्ष की नियुक्ति

केंद्र सरकार पर बेवज़ह संस्थानों के काम-काज में दखल देने का आरोप लगता रहा है। इस तरह का पहला मामला 2015 में प्रकाश में आया जब गजेन्द्र चौहान को भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान का अध्यक्ष बनाया गया। इस मामले में मनमाने ढंग से नियुक्ति कर संस्थान की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ करने का आरोप सरकार पर लगा था।

सेंसर बोर्ड

न्यायालय और सरकार

CBI बनाम CBI

स्वायत्तता के इस मसले ने तब तूल पकड़ा जब CBI और RBI का मामला प्रकाश में आया।

RBI बनाम केंद्र सरकार

उपरोक्त सभी विवादों के अतिरिक्त वर्ष 2018 में यूजीसी की जगह भारतीय उच्च शिक्षा आयोग, प्रतिष्ठित संस्थानों की सूची में जियो नामक संस्थान को जगह देने का मामला सुर्खियों में रहा।

संस्थाओं को स्वायत्तता की ज़रूरत क्यों?

ज़ाहिर है, संस्थाओं के मुखिया की नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं बरती जाएगी तो उनके द्वारा किये गए काम में पारदर्शिता की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है। फिर किसी भी संस्थान का राजनैतिक प्रभाव में काम करना एक स्वाभाविक बात हो जाएगी।

आगे की राह

निष्कर्ष

प्रश्न- ‘सार्वजिनक संस्थाओं की स्वायत्तता पर हमला न केवल पारदर्शिता और निष्पक्षता पर हमला है, बल्कि इससे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली भी कमज़ोर होती है’। इस कथन के आलोक में अपनी राय दीजिये।

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