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भारत में मानवाधिकार | 22 Mar 2019 | भारतीय राजनीति

संदर्भ

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1948 में 48 देशों के समूह ने समूची मानव-जाति के मूलभूत अधिकारों की व्याख्या करते हुए एक चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे। इसमें माना गया था कि व्यक्ति के मानवाधिकारों की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिये। भारत ने भी इस पर सहमति जताते हुए संयुक्त राष्ट्र के इस चार्टर पर हस्ताक्षर किये। हालाँकि देश में मानवाधिकारों से जुड़ी एक स्वतंत्र संस्था बनाने में 45 वर्ष लग गए और तब कहीं जाकर 1993 में NHRC अर्थात् राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अस्तित्व में आया जो समय-समय पर मानवाधिकारों के हनन के संदर्भ में केंद्र तथा राज्यों को अपनी अनुशंसाएँ भेजता है।

मानवाधिकार क्या है?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

भारत ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन और राज्य मानवाधिकार आयोगों के गठन की व्यवस्था करके मानवाधिकारों के उल्लंघनों से निपटने हेतु एक मंच प्रदान किया है।

NHRC के कार्य

एक आँकड़े के अनुसार, अप्रैल 2017 से लेकर दिसंबर 2017 की अवधि के दौरान लगभग 61,532 मामले विचार हेतु दर्ज किये गए और आयोग ने लगभग 66,532 मामलों का निपटारा किया। इस अवधि के दौरान आयोग द्वारा नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के कथित उल्लंघन के 49 मामलों की मौके पर जाँच की गई।

♦ समाज के विभिन्न वर्गों में मानवाधिकार से संबंधित जागरूकता बढ़ाना।
♦ किसी लंबित वाद के मामले में न्यायालय की सहमति से उस वाद का निपटारा करवाना।
♦ लोकसेवकों द्वारा किसी भी पीड़ित व्यक्ति या उसके सहायतार्थ किसी अन्य व्यक्ति के मानवाधिकारों के हनन के मामलों की शिकायत की सुनवाई करना।
♦ मानसिक अस्पताल अथवा किसी अन्य संस्थान में कैदी के रूप में रह रहे व्यक्ति के जीवन की स्थिति की जाँच की व्यवस्था करना।
♦ संविधान तथा अन्य कानूनों के संदर्भ में मानवाधिकारों के संरक्षण के प्रावधानों की समीक्षा करना तथा ऐसे प्रावधानों को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने के लिये सिफारिश करना।
♦ आतंकवाद या अन्य विध्वंसक कार्य के संदर्भ में मानवाधिकार को सीमित करने की जाँच करना।
♦ गैर-सरकारी संगठनों तथा अन्य ऐसे संगठनों को बढ़ावा देना जो मानवाधिकार को प्रोत्साहित करने तथा संरक्षण देने के कार्य में शामिल हों इत्यादि।

भारत में मानवाधिकारों की स्थिति

देश के विशाल आकार और विविधता, विकासशील तथा संप्रभुता संपन्न धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा तथा पूर्व में औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप भारत में मानवाधिकारों की परिस्थिति एक प्रकार से जटिल हो गई है।

भारत में मानवाधिकार आयोग के सामने मौजूदा चुनौतियाँ

ये सभी कारण जाने-पहचाने हैं लेकिन फिर भी इन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। लिहाज़ा अपने उद्देश्यों को पूरा करने में ये आयोग खुद को लाचार पाते हैं। इस स्थिति में मानवाधिकार आयोग भी सवालों के घेरे में आ गया है। इसकी तुलना उस गाय से की जाने लगी है जो चारा भी खाती है, जिसकी देखभाल भी होती है परंतु दूध नहीं दे सकती। लोगों का मानना है कि अगर मानवाधिकार आयोग आम आदमियों के लिये है तो भारत के दूरदराज़ इलाकों में रह रहे लोग जहाँ अशिक्षा और ग़रीबी व्याप्त है; अपने मूलभूत अधिकारों के बारे में अनजान क्यों हैं? मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी तभी सचेत होते हैं जब किसी क्षेत्र-विशेष में कोई बहुत बड़ा हादसा जैसे- बलात्कार, फ़ेक एनकाउंटर, जातिगत अथवा सांप्रदायिक हिंसा आदि हो गया हो । इन परिस्थितियों में क्या NHRC या राज्य मानवाधिकार आयोगों को एक निष्प्रभावी संस्था मान लिया जाए? क्या इसका हल सुप्रीम कोर्ट तथा इन आयोगों के पास है?

आगे की राह

प्रश्न : आज भी आम नागरिक जिन समस्यायों का सामना कर रहा है, क्या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उनका समाधान निकाल कर उनके मानव अधिकारों की रक्षा कर पाने में सफल हो पाया है? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिये।


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