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कितना सफल है भारत का लोकतंत्र | 07 May 2019 | भारतीय राजनीति

देश में लोकसभा के चुनावों का दौर चल रहा है और कहा यह जाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत में चुनावों को एक उत्सव की भाँति लिया जाता है। भारत के लोकतंत्र की वैश्विक प्रतिष्ठा भी है और हमारा निर्वाचन आयोग कई विकासशील एवं अल्प-विकसित देशों में होने वाले चुनावों के संचालन में सहयोग भी देता है।

लोकतंत्र सूचकांक (Democracy Index) में भारत की स्थिति

लंदन स्थित द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट हर साल दुनियाभर के देशों के लिये डेमोक्रेसी इंडेक्स यानी लोकतंत्र सूचकांक जारी करता है। 2018 के लिये 167 देशों का यह सूचकांक जारी किया गया और इसमें भारत को 41वें स्थान पर रखा गया है। पिछले साल की तुलना में भारत को एक पायदान का फायदा मिला है, लेकिन इसके बावजूद भारत को दोषपूर्ण लोकतांत्रिक (Flawed Democracy) देशों की श्रेणी में रखा गया है। जहाँ तक स्कोर का सवाल है, पिछले 11 सालों में भारत को 2017 और 2018 दोनों वर्षों में समान रूप से सबसे कम स्कोर मिला। इस रिपोर्ट में एशिया की स्थिति में सुधार की प्रशंसा की गई है। लेकिन, चिंता का विषय यह है कि एशिया के अधिकतर देशों को दोषपूर्ण लोकतांत्रिक देशों की श्रेणी में रखा गया है।

पाँच पैमानों पर दी जाती है रैंकिंग

इस रिपोर्ट में दुनिया के देशों में लोकतंत्र की स्थिति का आकलन पाँच पैरामीटर्स पर किया गया है- चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद (Pluralism), सरकार की कार्यशैली, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक आज़ादी। गौरतलब है कि ये सभी पैमाने एक-दूसरे से जुड़े हैं और इन पाँचों पैमानों के आधार पर ही किसी भी देश में मुक्त और स्वच्छ चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिति का पता लगाया जाता है। इस रिपोर्ट में 9.87 अंकों के साथ नॉर्वे पहले स्थान पर और 1.08 अंकों के साथ उत्तर कोरिया सबसे आखिरी स्थान पर है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

लोकतंत्र के विभिन्न पैमानों पर भारत की स्थिति

इस रिपोर्ट में 167 देशों की सूची में भारत को 41वें स्थान पर रखा गया है। लेकिन एशिया और ऑस्ट्रेलेशिया समूह में शामिल भारत को छठा स्थान मिला है। भारत को कुल 7.23 अंक मिले हैं। अलग-अलग पैमानों पर देखें तो चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद में 9.17, सरकार की कार्यशैली में 6.79, राजनीतिक भागीदारी में 7.22, राजनीतिक संस्कृति में 5.63 और नागरिक आजादी में 7.35 अंक भारत को दिये गए हैं।

कितना सफल है भारत का लोकतंत्र?

अपने 71 वर्षों के सफर में भारत का लोकतंत्र कितना सफल रहा, यह देखने के लिये इन वर्षों का इतिहास, देश की उपलब्धियाँ, देश का विकास, सामाजिक-आर्थिक दशा, लोगों की खुशहाली आदि पर गौर करने की ज़रूरत है। भारत का लोकतंत्र बहुलतावाद पर आधारित राष्ट्रीयता की कल्पना पर आधारित है। यहाँ की विविधता ही इसकी खूबसूरती है। सिर्फ दक्षिण एशिया को ही लें तो, भारत और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच यह अंतर है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में उनके विशिष्ट धार्मिक समुदायों का दबदबा है। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता भारत का एक बेहद सशक्त पक्ष रहा है। सूचकांक में भारत का पड़ोसी देशों से बेहतर स्थिति में होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है।

पिछले 71 सालों में देश ने प्रगति की है, काफी विकास किया है। देशवासियों का जीवन-स्तर पहले से बेहतर हुआ है। सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोग एक ही समाज में एक साथ रहते हैं। कृषि, औद्योगिक विकास, शिक्षा, चिकित्सा, अंतरिक्ष विज्ञान जैसे कई क्षेत्रों में भारत ने कामयाबी हासिल की है। अर्थव्यवस्था के मामले में हम दुनिया की छठी बड़ी शक्ति हैं। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है। लेकिन किसी लोकतंत्र की सफलता को आँकने के लिये ये पर्याप्त नहीं हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि देश का विकास तो हुआ है, लेकिन देखना यह होगा कि विकास किन वर्गों का हुआ। सामाजिक समरसता के धरातल पर विकास का यह दावा कितना सटीक बैठता है। दरअसल, किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार ने गरीबी, निरक्षरता, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव और जातिवाद को किस हद तक समाप्त किया है। लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता को कम करने के क्या-क्या प्रयास हुए हैं।

इन सभी मोर्चों पर भारत का प्रदर्शन कोई बहुत उल्लेखनीय तो नहीं ही रहा है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

निस्संदेह इस तरह की परिस्थितियाँ लोकतंत्र की कामयाबी की राह में बाधक बनती है।

बहुत कुछ करना बाकी है

अभ्यास प्रश्न: क्या भारतीय लोकतंत्र को एक सफल लोकतंत्र कहा जा सकता है? अपने उत्तर के पक्ष में ठोस तर्क प्रस्तुत करें।