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भारत में 'विविधता में एकता' को बनाए रखने में क्षेत्रवाद एक खतरा है।" दिये गए कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

06 Dec 2021 | सामान्य अध्ययन पेपर 1 | भारतीय समाज

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

दृष्टिकोण

  • क्षेत्रीयता और विविधता में एकता की अवधारणा को परिभाषित कीजिये।
  • भारत में क्षेत्रवाद के कारणों पर चर्चा कीजिये।
  • क्षेत्रवाद के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव बताइये।
  • उपयुक्त निष्कर्ष दीजिये।

परिचय:

  • विविधता में एकता: भारत विविधता से परिपूर्ण देश है; “विविधता में एकता” भारतीय समाज की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यह वाक्यांश इस बात का भी सूचक है कि भारत किस प्रकार से विविधता पूर्ण संस्कृति, सामाजिक और जातीय तत्त्वों को अपनाते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है। यहाँ अपनी पहचान को अक्षुण्ण रखकर विविधता को अंगीकार करने की आज़ादी है।
  • क्षेत्रवाद: क्षेत्रवाद एक ऐसी अवधारणा है जो राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से क्षेत्र विशेष के हितों को सर्वोपरि मानता है। भारत में क्षेत्रवाद के लिये कई कारक उत्तरदायी हैं। उदाहरण के लिये पृथक् भाषा, अलग भौगोलिक पहचान, नृजातीय पहचान, असमान विकास, धार्मिक पहचान आदि। भारत में क्षेत्रवाद की अभिव्यक्ति पृथक् राज्य की मांग, विशेष राज्य या पूर्ण राज्य की मांग के साथ-साथ भारत संघ से अलग होने के रूप में भी होती रहती है।
    • क्षेत्रीयता की जड़ें भारत की भाषाओं, संस्कृतियों, जातीय समूहों, समुदायों, धर्मों आदि की विविधता में निहित हैं और इन पहचान चिह्नों को क्षेत्रीय एकाग्रता द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है, इससे क्षेत्रीय पृथक्करण की भावना प्रबल होती है।

संरचना

क्षेत्रवाद के कारण

भाषा: भाषायी राज्यों की मांग ने क्षेत्रीयता को बढ़ावा दिया है जिसके कारण आंध्र प्रदेश, पंजाब आदि जैसे नए राज्यों का निर्माण हुआ है।

धर्म: यह भी क्षेत्रवाद के प्रमुख कारकों में से एक है। उदाहरणतः

जम्मू और कश्मीर में तीन स्वायत्त राज्यों की मांग धर्म पर आधारित है। उनकी माँगों के आधार हैं- मुस्लिम बहुल जनसंख्या के लिये कश्मीर, हिन्दू बहुल जनसंख्या के लिये जम्मू और बौद्ध बहुल जनसंख्या के लिये लद्दाख।

क्षेत्रीय संस्कृति/नृजातीय पहचान: विभिन्न जनजातीय समूहों द्वारा अपनी नृजातीय पहचान को सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास भी क्षेत्रवाद का कारण बनते हैं, जैसे- बोडोलैंड और झारखंड का आंदोलन।

आर्थिक पिछड़ापन: सामाजिक आर्थिक विकास के असमान प्रतिरूप ने क्षेत्रीय विषमताएँ पैदा की हैं। सामाजिक आर्थिक विकास और संसाधनों के उपयोग के आधार पर राज्यों के वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण ने नाराज़गी पैदा की है, जिससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिला है। उदाहरणतः:आंध्र प्रदेश से तेलंगाना का विभाजन, विदर्भ, सौराष्ट्र आदि के लिये अलग राज्य की मांग।

राजनीतिक दलों का उदय: गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय ने क्षेत्रवाद को वोट हासिल करने हेतु एक राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रेरित किया है।

भूमि पुत्र का सिद्धांत: यह सिद्धांत बताता है कि एक सीमित भगौलिक क्षेत्र के समस्त संसाधनों पर केवल उन्हीं लोगों का अधिकार होना चाहिये जिनका जन्म उस क्षेत्र में हुआ है। जिनका जन्म उस क्षेत्र से बाहर हुआ हो, उनका उस क्षेत्र में कोई अधिकार नहीं है। प्रवासी और स्थानीय शिक्षित मध्यम वर्ग के युवाओं के बीच नौकरियों और संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्द्धा के कारण इस सिद्धांत का चलन बढ़ा है। उदाहरणतः

मराठों के लिये महाराष्ट्र, गुजरातियों के लिये गुजरात आदि।

नकारात्मक प्रभाव

  • उग्रवाद का उदय: क्षेत्रवाद राष्ट्र के विकास और एकता के लिये एक खतरा है क्योंकि यह विद्रोही समूहों (पंजाब में खालिस्तान आंदोलन) द्वारा आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ पैदा करता है, जो देश की मुख्यधारा की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ क्षेत्रीयता की भावनाओं का प्रचार करता है।
  • असममित विकास: क्षेत्रीय माँगें राष्ट्रीय मांगों को कम करती हैं क्योंकि विकास संबंधी योजनाएँ उन क्षेत्रों पर असमान रूप से लागू होती हैं, जहाँ महत्त्वपूर्ण नेता होते हैं, इसलिये बाकी क्षेत्रों के बीच अशांति उत्पन्न होती है।
  • विदेश नीति के लिये चुनौती: क्षेत्रीयता अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में बाधा पैदा करती है, उदाहरण के लिये भूमि सीमा समझौते और तीस्ता नदी जल बँटवारे के लिये केंद्र सरकार के सहमत होने के बावजूद भी राज्य सरकार द्वारा सहमति न देने का मामला।
  • मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करना: क्षेत्रवाद भारत के किसी भी भाग में अबाध संचरण की स्वतंत्रता और आजीविका की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 की अवेहलना है, जैसा कि गैर-मूल निवासियों का शोषण किया जाता है और प्रवासी आबादी की संवेदनशीलता को बढ़ाया जाता है। उदाहरण के लिये: हाल ही में घटित गुजरात का प्रवासी संकट।
  • संवैधानिक लोकाचार के विरुद्ध: यह भारत के लोकाचार, संस्कृति और संवैधानिक आदर्श जो कि समन्वयात्मक, लोकतांत्रिक, संघीय एकता आदि हैं, के विरुद्ध हैं।

सकारात्मक प्रभाव

  • सममित विकास: क्षेत्रीय आकांक्षाओं का, संतुलित क्षेत्रीय विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि ऐसे क्षेत्रों से संबंधित समस्याओं को केंद्रीय प्राधिकरण द्वारा सुना जाता है जिसके तहत क्षेत्रीय स्तर पर व्याप्त असमानताओं को कम करने की कोशिश की जाती है।
  • प्रतिस्पर्द्धात्मक संघवाद: यह प्रतिस्पर्द्धी संघवाद की भावना के विकास में मदद करता है, जिससे राष्ट्रीय विकास के साथ अविकसित क्षेत्रों को समान स्तर पर लाया जाता है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा : क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा, बहस और कार्रवाई द्वारा समाज की लोकतांत्रिक संस्कृति को बढ़ावा देने में मदद करता है।
  • सेफ्टी वाल्व: यह समाज की विभिन्न समस्याओं और चिंताओं तथा उनके समय पर निवारण के लिये एक आउटलेट प्रदान करता है, जो कि विविधता से परिपूर्ण समाज में उत्पन्न होने वाले तनाव से मुक्ति में मदद करता है।

निष्कर्ष

  • इस प्रकार, क्षेत्रीयता भारत की संघीय राजनीति में एक प्राकृतिक घटना है जहाँ विविधताएँ बड़े पैमाने पर राजनीतिक, जातीय, सांस्कृतिक और भाषाई आधार पर क्षेत्रीय रूप से समूहीकृत हैं। राजव्यवस्था की संघीय व्यवस्था ने वास्तव में क्षेत्रवाद को व्यवहार्य बनाया है।
  • भारत में क्षेत्रों की सांस्कृतिक विशिष्टता केंद्रीकरण की प्रवृत्ति का प्रतिकार करती है और इस प्रकार संघीय राजनीतिक प्रणाली में एक केन्द्रापसारी बल का गठन करती है।
  • हालाँकि क्षेत्रीयता निहित स्वार्थों की पूर्ति करती है किंतु यह क्षेत्रीय चिंताओं को दूर करने के नाम पर भारतीय समाज को खतरे में डालती है।
  • क्षेत्रवाद की विचारधारा को समझने के साथ-साथ हमें इस बात पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि हम सबसे पहले भारतीय हैं उसके बाद मराठी, गुजराती, पंजाबी इत्यादि हैं। हमें अपने व्यक्तिगत हितों को नज़रअंदाज़ करते हुए देश की संप्रभुता, एकता एवं अखंडता का सम्मान करना चाहिये।