Be Mains Ready

प्रश्न. आपदाएँ केवल 'दैवीय घटना' नहीं हैं बल्कि यह मानवीय हस्तक्षेपों से भी निर्धारित होती हैं। टिप्पणी कीजिये। (250 शब्द)

26 Nov 2021 | सामान्य अध्ययन पेपर 3 | आपदा प्रबंधन

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोण

  • आपदा को प्राकृतिक घटना और दैवीय घटना के रूप में लिखकर परिचय दीजिये।
  • प्रकृति के साथ मानवीय हस्तक्षेप कैसे आपदाओं की तीव्रता को बढ़ा रहा है, चर्चा कीजिये।
  • आगे की राह बताइये।
  • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।

परिचय

आपदा एक अचानक आने वाली विपत्तिपूर्ण घटना है जो किसी समुदाय या समाज की गतिविधियों को गंभीर रूप से बाधित करती है और यह भौतिक, आर्थिक या पर्यावरणीय नुकसान का कारण बनती है तथा जिसका सामना समुदाय या समाज अपने संसाधनों द्वारा करने में असमर्थ होता है। भूकंप, चक्रवात, बाढ़, सूखा जैसी आपदाएँ प्राकृतिक और दैवीय हैं।

हालाँकि चमोली फ्लैश फ्लड 2021 और वर्ष 2013 में केदारनाथ में बाढ़ जैसी घटनाओं से यह निष्कर्ष सामने आया कि इस प्रकार की आपदा कोई दैवीय घटना नहीं है बल्कि प्राकृतिक पर्यावरण के साथ मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है, जिससे गंभीर नुकसान हुआ।

प्रारूप

आपदाएँ केवल 'दैवीय घटना' नहीं हैं बल्कि यह मानव प्रेरित हैं

  • पर्यावरण क्षरण: एक जल विभाजक क्षेत्र से पेड़ों और वनों को हटाने से मिट्टी का क्षरण हुआ है, नदियों के ऊपरी और मध्य मार्ग में बाढ़ क्षेत्र का विस्तार एवं भूजल की कमी हुई है।
  • विकासात्मक प्रक्रिया: भूमि के दोहन, बुनियादी ढाँचे के विकास, तेज़ी से शहरीकरण और तकनीकी विकास के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
  • राजनीतिक मुद्दे: युद्ध, परमाणु ऊर्जा आकांक्षाएँ, भूमि, समुद्र एवं आसमान पर विजय प्राप्त करने की इच्छा और महाशक्ति बनने के लिये देशों के बीच संघर्ष आदि घटनाओं में वृद्धि हुई है। इनके परिणामस्वरूप हिरोशिमा परमाणु विस्फोट, सीरियाई गृहयुद्ध, महासागरों के बढ़ते सैन्यीकरण और बाहरी अंतरिक्ष जैसी आपदा घटनाओं की एक विस्तृत शृंखला तैयार हुई है।
  • औद्योगीकरण: इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति भी बढ़ गई है।
  • सख्त नीतियों की अनुपस्थिति: अध्ययनों से पता चला है कि हिमालय में बर्फ तेज़ी से पिघल रहा है, जिससे घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिये संकट उत्पन्न हो रहा है लेकिन इससे बचाव हेतु किसी भी कठोर और तीव्र नीति प्रतिक्रिया के क्रियान्वयन का अभाव है।
  • उचित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभाव: हाल ही में उत्तराखंड में आई बाढ़ के मामले में सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन के बारे में लोगों को कोई जागरूकता कार्यक्रम या प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया गया था।
  • सरकार की अनभिज्ञता: सरकार द्वारा वर्ष 2012 में नियुक्त एक विशेषज्ञ समूह ने अलकनंदा-भागीरथी बेसिन में बाँधों के निर्माण के खिलाफ सिफारिश की थी, जिसमें ऋषिगंगा और "पेरिग्लेशियल ज़ोन" शामिल थे लेकिन इन सिफारिशों को नज़रअंदाज कर दिया गया था।
    • इसी तरह पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील स्थानों में खनन, उत्खनन और बाँध निर्माण के नियमन के मामले में केरल सरकार की अनदेखी के कारण वर्ष 2018 और वर्ष 2019 में बड़े पैमाने पर बाढ़ और भूस्खलन हुआ।
  • अप्रभावी उपग्रह निगरानी: उल्लेखनीय उपग्रह क्षमता होने के बावजूद भारत अभी भी अग्रिम चेतावनी के लिये इस तरह की इमेजरी का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सक्षम नहीं है।

आगे की राह

  • बजटीय आवंटन: ऊर्जा, सड़कों, स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ सरकारी बजट में जलवायु शमन के लिये नीतियों को स्पष्ट रूप से शामिल करना एक महत्त्वपूर्ण कदम होना चाहिये।
    • विशेष रूप से विकास लक्ष्यों में स्वच्छ ऊर्जा पर स्विच करने की समय-सीमा शामिल होनी चाहिये।
  • जलवायु अनुकूलन: भले ही प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ जलवायु शमन को गति दें लेकिन वातावरण में संचित कार्बन उत्सर्जन के कारण आपदाओं की तीव्रता अधिक हो सकती है। ऐसी स्थिति में जलवायु अनुकूलन एकमात्र उपाय है।
    • भारत की केंद्र और राज्य सरकारों को जोखिम कम करने के लिये आवंटन बढ़ाना चाहिये, जैसे कि सूखे का सामना करने के लिये कृषि नवाचार को बढ़ावा दिया जा सकता है।
    • आग की आशंका वाले क्षेत्रों के मामले में एक क्षेत्र को विभिन्न खंडों में विभाजित किया जा सकता है ताकि किसी भी बड़े पैमाने पर आग को फैलने से रोका जा सके।
  • विस्तृत अध्ययन: यह समझने के लिये विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिये कि कौन से क्षेत्र आपदाओं से ग्रस्त हैं।
    • इस तरह के शोध को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट में शामिल करना चाहिये और विकासात्मक परियोजनाओं पर निर्णयों का मार्गदर्शन करना चाहिये।
  • पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना: इसे स्थानीय समुदायों को सुरक्षित क्षेत्रों में शीघ्रता से भेजने की योजना के साथ जोड़ा जाना चाहिये।
    • कोई भी आपदा की घटना अचानक नहीं होती है; ऐसे पर्याप्त संकेत हैं, जिन पर यदि पहले निगरानी रखी जाए तो बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाने और अन्य नुकसानों की रोकथाम में मदद मिल सकती है।

निष्कर्ष

आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है लेकिन अच्छी तैयारी और मज़बूत जलवायु परिवर्तन शमन नीतियाँ निश्चित रूप से भारी मात्रा में नुकसान को रोकने में मदद कर सकती हैं।