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रघुराम राजन के अनुसार खराब ऋण के मायने 
Sep 14, 2018

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
(खंड- 1 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति तथा विकास)

Bad Loan

संदर्भ

वित्त वर्ष 2018 में बैंकों की सकल NPA 10.3 लाख करोड़ रुपए या अग्रिम के 11.2% तक बढ़ गईं और बैंकों द्वारा 2017-18 में 1.44 लाख करोड़ रुपए के बैड लोन्स रिकॉर्ड किए गए हैं। इस लेख में RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा NPA की वृद्धि हेतु जिन कारकों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है, उन्हें विस्तारपूर्वक उल्लेखित किया गया है।

क्या है NPA? 

  • गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ (Non-Performing Assets-NPA) वित्तीय संस्थानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक ऐसा वर्गीकरण है जिसका सीधा संबंध कर्ज़/ऋण/लोन न चुकाने से होता है।
  • जब ऋण लेने वाला व्यक्ति 90 दिनों तक ब्याज अथवा मूलधन का भुगतान करने में विफल रहता है तो उसको दिया गया ऋण NPA माना जाता है।
  • NPA को ऐसी परिसंपत्ति कहा जा सकता है जो मूल रूप से वसूली की अनुमानित अवधि तक नकद मौद्रिक प्रवाह का हिस्सा नहीं बनती।

NPA के कारण

रघुराम राजन ने NPA की वृद्धि के लिये किसी एक कारक को ज़िम्मेदार न ठहराते हुए कई कारकों को उत्तरदायी माना है जिनका उल्लेख निम्नानुसार है – 

आशावादी बैंकर

  • वर्ष 2006-2008 की अवधि में बड़ी संख्या में खराब ऋण की शुरुआत हुई थी, जब आर्थिक विकास मज़बूत था और बिजली संयंत्रों जैसे पिछली आधारभूत परियोजनाओं को समय पर और बजट में पूरा कर लिया गया था।
  • यह ऐसा समय होता है जब बैंक गलतियाँ करते हैं तथा वे पिछले विकास और प्रदर्शन के आधार पर भविष्य की योजनाएँ निर्धारित करते हैं।
  • इसलिये बैंक परियोजनाओं से उच्च लाभ उठाने और कम प्रमोटर इक्विटी स्वीकार करने के इच्छुक होते हैं।
  • NPA की समस्या में वित्तीय गड़बड़ियाँ और भ्रष्टाचार दोनों शामिल हैं।
  • उन्होंने कहा कि बैंकर्स ओवरकॉन्फिडेंस में थे और लोन देने से पहले बहुत कम जाँच-पड़ताल की गई जिसके कारण डूबते क़र्ज़ पर भी कभी ध्यान नहीं दिया गया।
  • यहाँ तक कि बैंकों ने प्रमोटर के निवेश बैंक द्वारा परियोजना रिपोर्ट के आधार पर बिना सावधानी के ही उधार देने के लिये अनुमति प्रदान की। 

विकास की धीमी वृद्धि

  • दुर्भाग्यवश, विकास हमेशा अपेक्षा के अनुसार नहीं होता है। वैश्विक वित्तीय संकट से पहले मज़बूत वैश्विक विकास के वर्षों बाद मंदी आई, जिसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा, जिससे यह ज्ञात होता है कि हम दुनिया के साथ कितने जुड़े हुए हैं।
  • साथ ही ऐसी स्थिति में घरेलू परियोजनाओं की धीमी गति के चलते विभिन्न परियोजनाओं के लिये मज़बूत मांग अनुमान अवास्तविक दिखाई दे रहे थे।

सरकारी अनुमतियाँ और फुट-ड्रैगिंग

  • कोयला खदानों के संदिग्ध आवंटन और जाँच के डर जैसी समस्याओं की वज़ह से यूपीए और उसके बाद एनडीए सरकार द्वारा फैसले लेने में देरी के कारण कर्ज़दारों के लिये कर्ज़ चुकाना मुश्किल होता गया।

प्रमोटर और बैंकर के ब्याज को नुकसान

  • विभिन्न परियोजनाओं में देरी के कारण प्रमोटर्स द्वारा परियोजनाओं से अपने इक्विटी को हटा लिया गया तथा उन परियोजनाओं में दिलचस्पी लेना भी कम कर दिया।
  • ऐसे समय में परियोजनाओं को पुनर्गठित किये जाने की आवश्यकता थी, जब बैंकों ने प्रमोटर्स को दिये जाने वाले ऋण में कटौती करना प्रारंभ किया तब तक यह बैड लोन्स में तब्दील हो चुका था।
  • दिवालियापन सहिंता को लागू करने के बाद बैंकरों में प्रमोटरों को चेतवानी देने की क्षमता आई कि वे अक्षम किसी भी प्रोजेक्ट को रोक सकते हैं।
  • दरअसल, ऋणों की कटौती तो प्रमोटरों के लिये उपहारस्वरूप थी और कोई भी बैंकर ऐसा जोखिम लेकर जाँच एजेंसियों का ध्यान आकर्षित करना नहीं चाहता था।

धोखाधड़ी 

  • सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग प्रणाली में धोखाधड़ी का आकार बढ़ रहा है हालाँकि, NPA की कुल मात्रा के मुकाबले अभी भी यह बहुत कम है।
  • उल्लेखनीय है कि धोखाधड़ी सामान्यतः NPA से अलग होती है जिसमें नुकसान उधारकर्त्ता या बैंकर द्वारा मुख्य रूप से अवैध कार्रवाई के कारण होता है।
  • जाँचकर्त्ता एजेंसियाँ वास्तव में ​​धोखाधड़ी होने के बाद बैंकों को लेबल करने के लिये धोखाधड़ी का दोषी ठहराती हैं।
  • बैंककर्मी धीमी गति से काम करते हैं और दोषियों को पकड़ने में पर्याप्त प्रगति न होने के कारण जब वे किसी लेन-देन को धोखाधड़ी घोषित करते हैं, तो वे जाँच एजेंसियों द्वारा उत्पीड़न के शिकार हो जाते हैं।

क्यों ज़रूरी है बैड लोन्स की पहचान?

  • तनावग्रस्त ऋणों को समझने के लिये द्विध्रुवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होगी। पहला तो एक व्यक्ति जब कोई लोन लेता है तो उम्मीद करता है कि समय के साथ विकास के कारण परियोजनाएँ वापस ट्रैक पर सेट हो जाएंगी।
  • हालाँकि, कभी-कभी तो यह तरीका काम करता है लेकिन ज्यादातर समय ऋणों की तनावग्रस्तता में कमी, कम ही देखने को मिलती है।
  • एक एवरग्रीनिंग लोन्स जिसे रेवोल्विंग ऋण के रूप में भी जाना जाता है। इसका मतलब है कि आप इसका उपयोग कर सकते हैं, पैसे वापस भुगतान कर सकते हैं और इसे फिर से इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • सालाना तौर पर ऋणदाता द्वारा ऋण की समीक्षा की जाती है। यदि आप नवीनीकरण के मानदंडों को पूरा करते हैं, तो ऋण जारी रहता है।
  • यह अनिश्चितकाल तक जारी रह सकता है जब तक कि आप या बैंक, ऋण रद्द करने का फैसला नहीं करते।
  • जब तक आप ऋण का भुगतान और समर्थन कर सकते हैं, तब तक बैंक इसे बंद करने के लिये कोई कार्रवाई नहीं करेगा।
  • अतः संभावित रूप से इससे बढ़ते ऋण का सामना करना पड़ता है, प्रवर्तक मौजूदा समस्याओं का समाधान करने के लिये बहुत कम काम करता करता है तथा इससे परियोजना को और नुकसान होता है।
  • बदली हुई परिस्थितियों के कारण मौजूदा ऋणों में कुछ हद तक कटौती की जानी चाहिये।
  • यदि ऋणों में कटौती की जाएगी, तो प्रमोटर के पास अधिक इक्विटी होगी और टैरिफ प्राधिकरणों या स्थानीय सरकारी जैसे अन्य हितधारकों का योगदान भी मिल सकता है तथा इससे परियोजना के पुनरुत्थान के लिये एक और मौका मिल सकता है, किंतु इसके लिये प्रमोटर को परियोजना को वापस ट्रैक पर लाने के लिये उसकी कोशिश हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • लेकिन ज़रूरी है कि बैंकों का पुनर्गठन या ऋण में कटौती आदि से पूर्व, बैंक संपत्ति की गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) के रूप में वर्गीकृत करें।
  • NPA के वर्गीकरण के प्रति असंवेनशील होकर सोचें तो यह बैंक को परियोजना को पुनर्स्थापित करने के लिये व्यापक आवश्यक सर्जरी करने की अनुमति देता है। अगर बैंक कोई बहाना बनाना चाहता है कि ऋण के साथ सबकुछ ठीक है, तो यह केवल तात्कालिक सहायता लागू कर सकता है, किंतु किसी भी कठोर कार्रवाई के लिये NPA के वर्गीकरण की आवश्यकता होगी।
  • ऋण वर्गीकरण केवल एक अच्छा लेखांकन है, जो यह दर्शाता है कि ऋण का वास्तविक मूल्य क्या हो सकता है।
  • यह प्रावधान बैंकों को संभावित नुकसान की भरपाई करने के लिये एक बफर के निर्माण को सुनिश्चित करता है। यदि नुकसान पूरा नहीं होता है, तो बैंक मुनाफे के प्रावधान में कटौती कर सकता है।
  • यदि नुकसान की भरपाई हो जाती  है, तो बैंक को अचानक एक बड़ा नुकसान घोषित करने की ज़रूरत नहीं है, बैंक नुकसान के प्रावधानों के अनुसार ही घाटे को निर्धारित कर सकता है।
  • इस प्रकार बैंक बैलेंस शीट, बैंक के स्वास्थ्य की एक सच्ची और निष्पक्ष तस्वीर का प्रतिनिधित्व कर सकेगा।

आगे की राह

  • बैड लोन या NPA से निपटना नीति निर्माताओं के लिये हमेशा से ही एक चुनौती भरा कार्य रहा है। गौरतलब है कि NPA से निपटने के उपाय सुझाने हेतु गठित नायक समिति ने वर्ष 2014 में अपनी सिफारिशें आरबीआई को सौंपी थीं, नायक समिति ने सरकार को सुझाव दिया कि वह बैंकों के अपने स्वामित्व को कम करके 50 प्रतिशत के नीचे लाए, जो कि एक व्यावहारिक सुझाव था। सरकार को इस पर गंभीरता से अमल करना चाहिये।
  • नायक समिति ने ही “बैंक्स बोर्ड ब्यूरो-बीबीबी” की स्थापना की भी बात की थी, भारत सरकार ने वर्ष 2016 में इसकी स्थापना भी कर दी और इसे सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में शीर्ष पदों के लिये उम्मीदवार तय करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी।
  • अतः एक विशेषज्ञ संस्था के तौर पर स्थापित बीबीबी को NPA के प्रबंधन में निर्णायक भूमिका निभानी होगी। इसके अलावा NPA के प्रबंधन में बैड बैंक की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
  • दरअसल, 'बैड बैंक' एक आर्थिक अवधारणा है जिसके अंतर्गत आर्थिक संकट के समय घाटे में चल रहे बैंकों द्वारा अपनी देयताओं को एक नए बैंक को स्थानांतरित कर दिया जाता है।
  • यह बैड बैंक कर्ज़ में फँसे  बैंकों की राशि को खरीद लेगा और उससे निपटने का काम भी इसी बैंक का होगा। जब किसी बैंक की गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ सीमा से अधिक हो जाती हैं, तब राज्य के आश्वासन पर एक ऐसे बैंक का निर्माण किया जाता है जो मुख्य बैंक की देयताओं को एक निश्चित समय के लिये धारण कर लेता है।
  • बैड बैंक, एक ऐसा बैंक होगा जो दूसरे बैंकों के डूबते क़र्ज़ को खरीदेगा। बैड बैंक के आने से दूसरे बैंकों से डूबते कर्ज़ को वसूलने का दबाव हट जाएगा।
  • दूसरे बैंक नए ऋण देने पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। बैंकों को अपने डूबते कर्ज़ बैड बैंक को बेचने की सुविधा मिलेगी।
  • डिफाल्टर कंपनियों की संपत्ति बेचने के काम में तेज़ी आएगी। बैंक अधिकारी परिसंपत्तियों की ज़ब्ती की जगह बैंकिंग गतिविधियों को सुचारु ढंग से चला पाएंगे।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस 


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