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क्या ग्लोबल वार्मिंग को धीमा करना संभव है? 
May 16, 2018

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव-विविधता , पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-14 : संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।)

global-warming

संदर्भ
पेरिस समझौते पर प्रगति करने के लिये यह एक महत्त्वपूर्ण वर्ष है, जिस पर दिसंबर 2015 में आयोजित  यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के अंतर्गत आयोजित पार्टियों के सम्मेलन-21 (COP-21) नामक बैठक में चर्चा की गई थी। पेरिस समझौता नवंबर 2016 से लागू हुआ था। हाल ही में पेरिस समझौते के क्रियान्वयन के लिये आवश्यक दिशा-निर्देशों पर चर्चा करने के लिये और उन पर सहमति बनाने के लिये पार्टियों की जर्मनी के बॉन में दो सप्ताह लंबी बैठक (30 अप्रैल -10 मई) आयोजित की गई।

प्रमुख बिंदु 

  • यह यूएनएफसीसीसी की सब्सिडरी बॉडी फॉर इंप्लीमेंटेशन (SBI) और सब्सिडरी बॉडी फॉर साइंटिफिक एंड टेक्नोलॉजिकल एडवाइस (SBSTA) की 48वीं बैठक थी, जिसे SB48 कहा गया।
  • लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर हुई अपर्याप्त प्रगति को देखते हुए दिसंबर 2018 में पोलैंड में आयोजित होने वाली COP-24 से पहले एक और अंतिम बैठक प्रस्तावित की गई है।
  • आदर्श रूप से, इन दिशा-निर्देशों से देशों को अगले स्तर के राष्ट्रीय अभिप्रेत योगदान (Nationally Determined Contributions) के लक्ष्य निर्धारण में सहायता मिलने की उम्मीद है।
  • समृद्ध देशों से धन का एक नियमित और विश्वसनीय प्रवाह भी होना चाहिये, ताकि विकासशील देशों में जलवायु कार्यवाहियों (climate action) का कार्यान्वयन किया जा सके। 

बाधाएँ 

  • बॉन मीटिंग में जिन बाधाओं का अनुमान लगाया गया था, वे उचित प्रतीत होती हैं। 
  • एनडीसी के मामले में नियम-पुस्तिका (rulebook) के संदर्भ में विवाद था। विकासशील देश चाहते थे कि नियम-पुस्तिका में शमन लक्ष्य, अनुकूलन और कार्यान्वयन के साधनों को कवर किया जाए, जबकि विकसित देश नियम-पुस्तिका को शमन (mitigation) और ग्रीनहाउस गैसों के न्यूनीकरण तक सीमित रखना चाहते थे।
  • लेकिन, चूँकि अधिकांश विकासशील देशों को अनुकूलन कार्यक्रमों (adaptation programmes) की आवश्यकता है और उन्हें अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को लागू करने के लिये समर्थन की आवश्यकता होती है, अतः इन्हें भी नियम-पुस्तिका में शामिल किया जाना चाहिये।
  • कोपेनहेगन सम्मलेन में इस बात पर सहमति जताई गई थी, कि 2020 से विकसित देश गरीब और विकासशील देशों को प्रतिवर्ष कम-से-कम $100 बिलियन धनराशि प्रदान करेंगे। लेकिन इन फंडों के प्राप्त होने की बहुत कम संभावना नज़र आ रही है।
  • वित्तीयन पर विचार-विमर्श करने की बजाय चर्चा को इस और मोड़ दिया गया, कि कैसे उन दानदाताओं की संख्या को बढ़ाया जाए जो फंड प्रदान करेंगे, किन देशों को इन फंडों से बाहर रखा जाए आदि। 
  • यूएनएफसीसीसी की आम लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों (common but differentiated responsibilities) के सिद्धांत के अनुसार, जहाँ एक और कार्यवाहियों (actions) के उत्साहपूर्ण होने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी और इसके लिये समुचित मात्रा में वित्तीयन की भी आवश्यकता है।
  • हानि और क्षति (loss and damage) से संबंधित मुद्दे भी वार्ता में एक बड़ी बाधा है। 
  • एलएंडडी उन गरीब देशों को सहायता प्रदान करने का माध्यम है, जो जलवायु परिवर्तन से गंभीर प्रभाव का अनुभव करते हैं, लेकिन वार्मिंग और इसके प्रभावों के लिये जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों में इनका बहुत कम योगदान होता है।
  • यह उन अल्प विकसित देशों और छोटे द्वीपीय देशों के लिये यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो पहले ही समुद्र स्तर की वृद्धि का शिकार हैं।
  • बैठक में किसी भी महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हो सका। अतः बैठक के बाद पेरिस समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन हेतु दिशा-निर्देशों पर कोई मसौदा दस्तावेज तैयार नहीं किया जा सका। 

आगे की राह 

  • अतः सितंबर में आयोजित होने वाली चर्चा बहुत महत्त्वपूर्ण है जहाँ बॉन मीटिंग में अधूरे रह गए कार्यों को पूरा करने पर जोर दिया जाएगा। 
  • लगभग उसी समय संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि के प्रभावों पर रिपोर्ट जारी किये जाने की उम्मीद है। 
  • दो दशकों से चली आ रहीं जलवायु संबंधी वार्ताओं के बाद भी अभी तक की प्रगति निराशाजनक ही रही है । ऐसे में युवाओं द्वारा देशों की सरकारों पर दबाव बनाया जाना अति महत्वपूर्ण है। 
  • जब तक ये युवा अपनी सरकारों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं कराएंगे, तब तक ग्लोबल वार्मिंग को सुरक्षित स्तर तक रख पाना मुश्किल होगा। 

स्रोत : द हिंदू 


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