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कावेरी जल विवाद

Posted By : Mr. Sunny Kumar     Posted Date : Oct 18,16   Hits : 11789    

हाल की कुछ घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि जल का सिर्फ पर्यावरणीय महत्त्व ही नहीं है बल्कि यह कभी राष्ट्रीय तो कभी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को भी गंभीरता से प्रभावित करता है। एक ओर जहाँ भारत-पाक संबंधों को लेकर ‘सिंधु जल समझौता’ महत्त्वपूर्ण हो चला है, तो वहीं दूसरी तरफ, भारत के ही दो राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बहरहाल, यहाँ चर्चा को कावेरी जल विवाद तक ही सीमित रखते हैं। वैसे तो कावेरी के पानी का यह विवाद लगभग सवा सौ वर्ष पुराना है, किंतु तमिलनाडु को दस दिन तक 15 हज़ार क्यूसेक पानी देने के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश के बाद कर्नाटक में इस बात का विरोध होने लगा, जिसके प्रत्युत्तर में तमिलनाडु में भी प्रदर्शन शुरू हो गए। अतः विवाद के वर्तमान संदर्भ पर बात करने से पूर्व बेहतर यह होगा कि हम कावेरी नदी तथा इस विवाद के ऐतिहासिक पहलू को संक्षेप में समझ लें।

कावेरी नदी से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य

802 किमी. लम्बी यह नदी दक्षिण भारत की एक महत्त्वपूर्ण नदी है, जो कर्नाटक के कुर्ग से निकलकर तमिलनाडु, केरल तथा पुद्दुचेरी से होकर बहती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी बेसिन का कुल अपवाह क्षेत्र 81,155 वर्ग किमी. है, जिसमें कर्नाटक का 32 हज़ार वर्ग किमी. और तमिलनाडु का 44 हज़ार वर्ग किमी. का क्षेत्र शामिल है तथा शेष हिस्सा पुद्दुचेरी और केरल का है। ध्यातव्य है कि कावेरी नदी को दक्षिण-पश्चिम तथा उत्तर-पूर्व दोनों मानसूनों से क्रमश  30% तथा 70% वर्षा जल की प्राप्ति होती है। यही वज़ह है कि मानसूनी वर्षा में कमी नदी जल विवाद का मुख्य कारण बन जाती है। कावेरी नदी के बारे में इस संक्षिप्त जानकारी के बाद उस ऐतिहासिक विकासक्रम को समझना आवश्यक होगा जो इस विवाद को और जटिल बना रहा है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

1892 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी और मैसूर रियासत के बीच कावेरी नदी के जल के बँटवारे को लेकर एक समझौता हुआ था। कुछ विवादों के शेष रह जाने के कारण 1924 में इनके बीच पुनः समझौता हुआ, जिसके मुताबिक कावेरी के 75% जल पर तमिलनाडु व पुद्दुचेरी तथा 23% जल पर कर्नाटक का अधिकार माना गया, शेष 2% केरल के हिस्से में आया। हालाँकि, यह समझौता भी अंतिम निदान प्रस्तुत नहीं कर पाया, जिस कारण 1976 में उपरोक्त चारों दावेदारों के बीच पुनः एक समझौता हुआ। लेकिन यह समझौता भी विवाद का अंत नहीं कर सका, अन्यथा वर्तमान विवाद जन्म ही नहीं लेता। आगे चलकर राज्यों के निवेदन तथा उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने 1990 में ‘कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण’ का गठन किया, जिसने 2007 में फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण ने फैसला दिया कि प्रतिवर्ष 419 अरब क्यूबिक फीट पानी तमिलनाडु को, 270 अरब क्यूबिक फीट पानी कर्नाटक को, 30 अरब क्यूबिक फीट पानी केरल को तथा 7 अरब क्यूबिक फीट पानी पुद्दुचेरी को दिया जाए। गौरतलब है कि न्यायाधिकरण ने कावेरी बेसिन में सामान्य मानसूनी वर्ष में पानी की मात्रा 740 अरब क्यूबिक फीट मानते हुए यह फैसला दिया था। हालाँकि, दोनों ही बड़े राज्य इस फैसले से खुश नहीं थे, जिससे यह मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय के पास चला गया। यहाँ यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-262 कहता है कि यदि संसद अंतर्राज्यीय नदी विवादों के अधिनिर्णयन के लिये किसी न्यायाधिकरण का गठन करती है तो उसके निर्णय को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इस तथ्य के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-136 के तहत उपरोक्त याचिका को स्वीकार कर लिया। याचिका स्वीकार करने के आठ वर्षों बाद तक भी सर्वोच्च न्यायालय किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाया। हालाँकि, चार सप्ताह में ‘कावेरी प्रबंधन बोर्ड’ (CMB) को गठित करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के हालिया आदेश के बाद यह उम्मीद जगी है कि इसका शीघ्र ही कोई निदान निकले।

वर्तमान संदर्भ

वस्तुतः इस साल विवाद की मुख्य वज़ह बारिश का कम होना है। कर्नाटक का कहना है कि बारिश कम होने की वज़ह से कावेरी नदी का जल-स्तर घट गया है और कावेरी का अधिकांश जल बंगलुरू तथा अन्य शहरों में पीने में ही खर्च हो जा रहा है। इस कारण सिंचाई के लिये जल नहीं बचता, जबकि कर्नाटक के कुर्ग, मैसूर, मंड्या ज़िलों में खेती के लिये कावेरी का पानी अनिवार्य है। तथ्यों के आधार पर भी देखें तो कर्नाटक की चिंता वाज़िब है। इस वर्ष कावेरी के सबसे मुख्य जल-संग्रहण क्षेत्र कोदगू में सामान्य से 35% कम बारिश हुई है और विभिन्न जलाशयों में पिछले साल के 59.95 अरब क्यूबिक फीट के मुकाबले इस वर्ष केवल 31.58 अरब क्यूबिक फीट पानी ही जमा हो पाया है। ऐसे में तमिलनाडु को और अधिक पानी देने से स्वयं कर्नाटक में जल संकट उत्पन्न हो जाएगा। दूसरी तरफ, तमिलनाडु का कहना है कि यदि उसे पानी नहीं मिला तो उसके लाखों किसान बर्बाद हो जाएंगे। इसलिये तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

अब, तमिलनाडु और कर्नाटक के भावनात्मक तर्कों से परे हटकर निरपेक्ष होकर भी यदि कावेरी नदी बेसिन और उसके जल उपभोग संबंधी कुछ मूलभूत तथ्यों की पड़ताल करें तो यह मामला जटिल लगता है। मुद्दे को आसानी से समझने के लिये इसे बिंदुवार ढंग से प्रस्तुत करना ही अधिक उचित होगा-


ऐसा नहीं है कि अंतर्राज्यीय जल विवाद केवल कावेरी को लेकर है, बल्कि कृष्णा, गोदावरी, नर्मदा, महादयी इत्यादि नदियों को लेकर भी विभिन्न राज्यों के बीच मतभेद हैं। किंतु कावेरी का मामला इन सभी से भिन्न इसलिये है क्योंकि अन्य नदियों में जहाँ विवाद उनके अप्रयुक्त जल (Untapped Water) पर अधिकार को लेकर है, वहीं कावेरी नदी पर विवाद पहले से प्रयोग में लाए जा रहे जल के पुनर्वितरण को लेकर है। ध्यातव्य है कि कावेरी संभवतः एकमात्र ऐसी नदी है जिसका 95% से भी अधिक जल उपयोग कर लिया जाता है। अतः किसी भी राज्य द्वारा अतिरिक्त जल की मांग इस समस्या को और गंभीर बना देती है।


पिछले 50 वर्षों में तमिलनाडु में कावेरी बेसिन वाले इलाके में सिंचाई आधारित खेती का क्षेत्रफल 14,40,000 एकड़ से बढ़कर 25,80,000 एकड़ हो गया, जबकि कर्नाटक 6,80,000 एकड़ पर ही स्थिर रहा।


ध्यातव्य है कि तमिलनाडु में धान की फसलों के तीन मौसम होते हैं-कुरूवई, थालाडी तथा साम्बा। इनमें कुरूवई और थालाडी कम अवधि के, जबकि साम्बा लम्बी अवधि की फसल है। यह समय साम्बा धान की फसल का है जिसके लिये पर्याप्त मात्रा में पानी चाहिये। दूसरी तरफ, कर्नाटक में दो ही फसलें है तथा कम बारिश के कारण एक फसल की बुआई भी कठिन है। अतः दोनों राज्यों की चिंता वाज़िब है।

हालाँकि, कर्नाटक में हालात ज़्यादा बुरे हैं। कर्नाटक सूखे की मार झेल रहा है और पिछला साल (2015), विगत 40 वर्षों में सर्वाधिक सूखा रहा। साथ ही, 2015 में वहाँ किसान आत्महत्या के मामले भी 40% बढ़े हैं।

कावेरी नदी में जल के योगदान की दृष्टि से देखें तो कर्नाटक का योगदान जहाँ 425 अरब क्यूबिक फीट (53.8%) है, वहीं तमिलनाडु मात्र 253 अरब क्यूबिक फीट (31.9%) पानी का ही योगदान कर पाता है। इस आधार पर भी कर्नाटक अधिक जल की मांग करता है। नदी जल विवादों को सुलझाने के कई तरीकों और सिद्धांतों में कर्नाटक ‘हार्मन सिद्धांत’ (Harmon Theory) को मानता है, जिसके अनुसार उसके राज्य में बहने वाले जल पर उसका पूर्ण अधिकार है। वहीं, तमिलनाडु ‘ऐतिहासिक आधार’ पर कावेरी जल पर अपना अधिकार सिद्ध करता है। ज़ाहिर है कि दोनों के दावे विपरीत छोरों पर स्थित हैं, जिसका समाधान इनके बीच ही कहीं हो सकता है।


निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि इस अमूल्य संसाधन पर कोई निर्णय करते समय वास्तविक हित को राजनीतिक हित के ऊपर रखा जाए। दोनों ही राज्य संकीर्ण मांगों को छोड़ते हुए व्यापक हित पर एक हो जाएँ। साथ ही, वर्षा जल संग्रहण, खेती के तरीकों में बदलाव, नदियों में गादों की निरंतर सफाई, वनों का संरक्षण, जल का वैज्ञानिक उपयोग, नहरों की मरम्मत इत्यादि जैसे कदम विवाद की प्रभावशीलता को कम कर सकते हैं। 

(सन्नी कुमार)
  संपादक
"दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे"

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